3 देश, 3 पत्रकार: जियोपॉलिटिक्स में BRICS का पावर गेम समझिए

भारत, रूस और चीन के तीन पत्रकारों ने BRICS की ताकत और मतभेदों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि पश्चिम इसे अपने खिलाफ खड़े गुट के रूप में देखता है, जबकि BRICS पुरानी वैश्विक व्यवस्था को गिराने के बजाय उसमें ग्लोबल साउथ के लिए बराबरी की जगह चाहता है।

दुनिया बदल चुकी है, लेकिन उसे चलाने वाली ताकत और संस्थाएं अब भी बीती सदी की व्यवस्था में अटकी हुई हैं। वैश्विक फैसलों पर पश्चिम का दबदबा है, डॉलर को आर्थिक दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और IMF-वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों को उनके बढ़ते वजन के मुताबिक जगह नहीं मिली है।

ऐसे में BRICS क्या पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने वाला नया गुट बन रहा है या यह अलग-अलग हितों वाले देशों का एक मंच है? क्या BRICS डॉलर का विकल्प खड़ा कर सकता है? भारत एक साथ BRICS, SCO और QUAD में रहकर संतुलन कैसे साध रहा है? भारत-चीन सीमा विवाद और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर मौजूद मतभेदों के बीच यह संगठन कितना आगे बढ़ सकता है?

इन्हीं सवालों पर भारत, रूस और चीन का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन पत्रकार एक साथ बैठे। RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा, इंडिया ग्लोबल रिव्यू की फाउंडर पलकी शर्मा और CGTN के हेड ऑफ डायलॉग शू चिनड्वा (Qinduo XU) ने BRICS की ताकत, कमजोरियों और इसके भीतर मौजूद टकरावों पर खुलकर बात की।

BRICS से क्यों बेचैन है अमेरिका?

पलकी शर्मा के मुताबिक, दुनिया में ताकत का मौजूदा ढांचा, चाहे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हों या वैश्विक मीडिया, उस दुनिया के हिसाब से बना है, जिसे हम करीब 100 साल पीछे छोड़ चुके हैं। लेकिन पश्चिम आज भी BRICS को उसी पुराने नजरिए से देख रहा है। डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश करने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी का जिक्र करते हुए पलकी ने कहा कि यह वॉशिंगटन की बेचैनी दिखाती है। BRICS की साझा मुद्रा निकट भविष्य में बनती नहीं दिखती, फिर भी इसकी चर्चा अमेरिका को परेशान कर रही है। इसका मतलब है कि इन देशों के साथ आने में अपनी एक ताकत है।

BRICS के सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, प्राथमिकताएं और हित अलग-अलग हैं। इसके बावजूद वे मतभेदों को किनारे रखकर कुछ मुद्दों पर साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं। पलकी के मुताबिक, यही इस समूह का मूल विचार है। शू चिनड्वा भी इससे सहमत दिखे। उन्होंने कहा कि BRICS का मकसद एक जैसी राजनीतिक व्यवस्था वाले देशों का समूह बनाना नहीं है। इसके सदस्य अलग-अलग संस्कृति, परंपराओं और सभ्यताओं से आते हैं। इसके बाद भी वे मतभेद संभालते हुए एक-दूसरे के साथ सहयोग कर सकते हैं।

G7 जैसा बंद क्लब नहीं है BRICS

शू चिनड्वा ने कहा कि BRICS की यही विविधता उसे G7 से अलग बनाती है। G7 में पश्चिमी शैली के लोकतंत्र और एक जैसी सोच वाले देश साथ काम करने की बात करते हैं। इसके उलट BRICS का विचार यह है कि अलग-अलग सोच और व्यवस्थाओं के बावजूद सहयोग किया जा सकता है।

G7
G7 पहले G8 बना, लेकिन रूस को बाहर किए जाने के बाद फिर G7 हो गया। इस बीच दुनिया और उसके आर्थिक समीकरण बदलते रहे, मगर यह समूह लगभग वैसा ही बना रहा।
रुनझुन शर्मा
रुनझुन शर्मा
RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज

इसके उलट BRICS एक नया समूह है और तेजी से अपना विस्तार कर रहा है। यह नई परिस्थितियों और नए सदस्यों के मुताबिक खुद को ढालने के लिए तैयार है। हालांकि नए सदस्य को शामिल करने के लिए मौजूदा देशों के बीच सहमति जरूरी है, फिर भी यह ज्यादा देशों को प्रतिनिधित्व देने के विचार के लिए खुला है।

रुनझुन के मुताबिक, G7 कभी बहुत ताकतवर था, लेकिन अब वह एक ऐसे एलीट क्लब की तरह दिखाई देता है, जो यह स्वीकार नहीं कर पा रहा कि दुनिया में उसका पुराना प्रभाव कम हो रहा है।

शू चिनड्वा ने IMF और विश्व बैंक का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ये खुद को वैश्विक वित्तीय संस्थाएं बताते हैं, लेकिन इनके शीर्ष पदों पर अमेरिका और यूरोप का दबदबा बना रहता है। अगर ये संस्थाएं पूरी दुनिया की हैं तो इनके नेतृत्व में बाकी देशों का उचित प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है?

यह भी पढ़ें- BRICS को कैसे बैलेंस कर रहा भारत, डिफेंस एक्सपर्ट सी. उदय भास्कर से बातचीत

घोषणाओं से आगे क्या दे पाया BRICS?

बातचीत में BRICS की कमजोरियों पर भी सवाल उठाए गए। रुनझुन शर्मा ने कहा कि यह समूह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की मांग करता है और उसने न्यू डेवलपमेंट बैंक भी बनाया है, लेकिन बैंक अब तक उतना काम नहीं कर पाया, जितने बड़े उद्देश्य के साथ उसे बनाया गया था। पलकी शर्मा ने कहा कि 

पालकी
पुरानी व्यवस्था में कमियां, झुकाव और दूसरे देशों का नजरिया न समझने की समस्या है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी कई बार पश्चिम में दो पक्षों के बीच बैठे रहने की नीति बताया जाता है, जबकि भारत अपने हितों के मुताबिक फैसले लेने के अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है।
पलकी शर्मा उपाध्याय
पलकी शर्मा उपाध्याय
फाउंडर, IGR

लेकिन सवाल केवल पुरानी व्यवस्था की कमियां गिनाने का नहीं है। पलकी के मुताबिक, BRICS को यह भी बताना होगा कि वह खुद क्या हासिल कर सकता है। ज्यादा देशों को जोड़ने से संगठन अधिक प्रतिनिधित्व वाला बन सकता है, लेकिन क्या इससे आपसी सहमति बनाना मुश्किल नहीं होगा?

हर साल BRICS शिखर सम्मेलन होता है, नेता मिलते हैं और साझा बयान जारी किए जाते हैं। असली सवाल यह है कि इन बैठकों से जमीन पर क्या बदल रहा है? क्या यह समूह बयानों से आगे जाकर वास्तविक अंतर पैदा कर सकता है?

लोकल करेंसी में व्यापार पर जोर

BRICS की चर्चा अक्सर डॉलर को चुनौती देने वाली साझा मुद्रा से जोड़कर की जाती है। हालांकि, तीनों पत्रकारों की बातचीत से यह बात सामने आई कि ऐसी मुद्रा जल्द बनने की संभावना नहीं है।

Qinduo XU
डॉलर पर टिकी ग्लोबल वित्तीय व्यवस्था के कारण अमेरिका दूसरे देशों के सामने कठिन विकल्प रख सकता है। वह कह सकता है कि या तो ईरान जैसे देश से अपने रिश्ते तोड़िए या फिर डॉलर आधारित व्यवस्था से बाहर होने का खतरा उठाइए।
शू चिनड्वा
शू चिनड्वा
CGTN के हेड ऑफ डायलॉग

भारत, रूस या चीन जैसे देश अगर ईरान से तेल और गैस खरीदना जारी रखना चाहें तो उन्हें बाहरी दबाव का सामना करना पड़ सकता है। शू के मुताबिक, अगर कोई प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्ताव के तहत नहीं लगाया गया है तो उसे कानूनी नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में किसी संप्रभु देश पर उसे मानने की बाध्यता भी नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पहले BRICS की साझा मुद्रा बनाकर डॉलर को बदलने की चर्चा हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह समझ आया कि कम से कम निकट भविष्य में ऐसा करना संभव नहीं है। इसलिए अब देश स्थानीय या अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने जैसे विकल्प तलाश रहे हैं। इसका मकसद किसी दूसरे देश को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि खुद को बाहरी आर्थिक दबाव से बचाना है।

क्या BRICS का मकसद डॉलर को खत्म करना है?

रुनझुन शर्मा ने कहा कि BRICS को अब डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश के पर्याय के रूप में देखा जाने लगा है, जबकि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का मूल उद्देश्य डॉलर को खत्म करना नहीं था। डॉलर का इस्तेमाल आर्थिक हथियार की तरह किया जाने लगा। एकतरफा प्रतिबंध लगाए गए और देशों को रूस जैसे कुछ देशों से व्यापार न करने की चेतावनी दी गई। भारत पर रूसी तेल नहीं खरीदने का दबाव पड़ा, लेकिन उसने खरीद जारी रखी और रुपया-रूबल में व्यापार का रास्ता सामने आया। इसके बाद कई दूसरे देशों ने भी स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाना शुरू किया।

यह भी पढ़ें- खत्म हो रहा डॉलर का दबदबा? क्यों ‘गोल्ड’ को भविष्य की ग्लोबल करेंसी मान रहे एक्सपर्ट

रुनझुन के मुताबिक, मकसद डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि ऐसी पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था का विकल्प खोजना है, जो उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अपनी मुद्राओं और हितों के मुताबिक फैसले लेने से रोकती है। पलकी शर्मा ने इस पर कहा कि अगर BRICS का उद्देश्य डॉलर को खत्म करना भी हो तो यह हमारे जीवनकाल में होता नहीं दिखता। इसलिए संगठन को बड़े और अव्यावहारिक लक्ष्य के बजाय उन कामों पर ध्यान देना चाहिए, जिनके नतीजे तुरंत दिखाई दे सकते हैं।

BRICS की वास्तविक सफलता सीमा पार भुगतान आसान बनाने, वित्तीय संपर्क बढ़ाने और ऐसा ढांचा तैयार करने में होगी, जिससे सदस्य देश आपस में आसानी से कारोबार कर सकें।

BRICS और QUAD दोनों में भारत

शू चिनड्वा ने सवाल उठाया कि भारत एक तरफ BRICS और SCO का महत्वपूर्ण सदस्य है तो दूसरी तरफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ QUAD में भी शामिल है। क्या इतने अलग-अलग समूहों के बीच संतुलन बनाना भारत के लिए चुनौती है? पलकी शर्मा ने कहा कि इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और कई देशों के साथ एक साथ संबंध रखने की नीति है। भारत BRICS और SCO का सदस्य है। उसके खाड़ी देशों और यूरोप से भी मजबूत संबंध हैं। पलकी के मुताबिक, भारत ने खुद को कभी ऐसे गठबंधन में बंद नहीं किया, जहां एक देश के फैसले के पीछे बाकी सभी को चलना पड़े।

उन्होंने इराक युद्ध का उदाहरण दिया। कई देश केवल अमेरिका के कहने पर युद्ध में शामिल हो गए थे, लेकिन भारत ने हमेशा अपने हितों के आधार पर फैसले लिए हैं। भारत खुद को अलग-अलग खेमों के बीच पुल के रूप में देखता है। पलकी ने G20 का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ने अफ्रीकी संघ को फैसलों की मेज पर जगह दिलाने की पहल की और इसे संभव बनाया।

इसी तरह भारत रूस से ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी जारी रखता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से युद्ध खत्म करने की बात भी कहते हैं। पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत रूस से जुड़ा हुआ है और दूसरी तरफ भारतीय विदेश मंत्री यूक्रेन भी जाते हैं। पलकी के मुताबिक, भारत किसी देश को यह नहीं बताता कि उसे क्या करना चाहिए। वह सभी देशों के अपने फैसले लेने के अधिकार को स्वीकार करता है और खुद को ऐसे देश के रूप में पेश करता है, जो हर कमरे में मौजूद होकर सभी पक्षों से बात कर सकता है।

पुरानी व्यवस्था को बदलना चाहता है BRICS

शू चिनड्वा ने कहा कि जो विकासशील देश कभी वैश्विक व्यवस्था के किनारे खड़े थे, वे अब उसके केंद्र में आ रहे हैं। पलकी शर्मा के मुताबिक, पुरानी ग्लोबल व्यवस्था खत्म नहीं हुई है, लेकिन उसका प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएं आज की दुनिया से तालमेल नहीं बैठा पा रही हैं। ग्लोबल साउथ और उभरती अर्थव्यवस्थाएं दुनिया की आबादी, व्यापार और कारोबार का बड़ा हिस्सा हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनकी भूमिका भी उसी मुताबिक बढ़नी चाहिए।

उन्होंने कहा कि BRICS पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि यह व्यवस्था 2026 की वास्तविकता के अनुसार खुद को बदले। रुनझुन शर्मा ने कहा कि पश्चिमी देशों की राजधानियों को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि बाकी दुनिया कैसे व्यवहार करे। वैश्वीकरण और विश्व अर्थव्यवस्था के नियम केवल वॉशिंगटन में नहीं लिखे जाने चाहिए।

भारत, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों को अपनी रणनीति और आर्थिक फैसले खुद लेने का अधिकार होना चाहिए। उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक फैसलों की मेज पर अपनी आवाज और जगह चाहती हैं।

शू चिनड्वा ने इसे एक लाइन में समझाया कि इन देशों को फैसलों की मेज पर होना चाहिए, किसी और के मेन्यू में नहीं। उन्होंने कहा कि भारत और चीन तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं, जबकि रूस और सऊदी अरब ऊर्जा की बड़ी ताकत हैं। BRICS के सदस्य मौजूदा व्यवस्था को पलटना नहीं, बल्कि उसमें सुधार करके उसे ज्यादा बराबरी वाला बनाना चाहते हैं।

BRICS पश्चिम-विरोधी नहीं, अपने हितों का मंच

पलकी शर्मा ने कहा कि पश्चिम में BRICS को अक्सर इस नजर से देखा जाता है कि वह पश्चिम के खिलाफ क्या कर रहा है। जबकि BRICS पश्चिम के विरोध के लिए नहीं, अपने सदस्य देशों के हितों के लिए बना मंच है। उन्होंने BRICS को मतभेद रखने वाले दोस्तों का क्लब बताया। भारत और चीन के बीच मतभेद हैं। सऊदी अरब और ईरान के भी अपने विवाद हैं। इसके बावजूद ये देश व्यापार, विकास और दूसरे साझा मुद्दों पर साथ आने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत और चीन के रिश्ते इसका बड़ा उदाहरण हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद है, जो अक्सर पूरे द्विपक्षीय रिश्ते पर हावी हो जाता है। पलकी के मुताबिक, चुनौती यह है कि सीमा को पूरे रिश्ते की पहचान न बनने दिया जाए, लेकिन ऐसा दिखावा भी न हो कि सीमा का मुद्दा मायने नहीं रखता। शू चिनड्वा ने कहा कि पिछले करीब तीन वर्षों में भारत और चीन ने सीमा के मुद्दे पर प्रगति की है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच नई हॉटलाइन और बातचीत के नए रास्ते बने हैं। उनके मुताबिक, इससे स्थिति स्थिर करने में मदद मिली है।

मतभेद ही BRICS की चुनौती भी, पहचान भी

इस बातचीत में तीनों पत्रकार डॉलर के इस्तेमाल, पश्चिमी संस्थाओं में सुधार और ग्लोबल साउथ को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने जैसे मुद्दों पर सहमत दिखे। लेकिन आतंकवाद, पाकिस्तान, रूस और चीन की भूमिका पर उनमें स्पष्ट मतभेद भी सामने आए। यही BRICS की वास्तविक तस्वीर है। यह समान विचारधारा या एक जैसी राजनीतिक व्यवस्था वाले देशों का गठबंधन नहीं है। इसकी ताकत इस बात में है कि अलग-अलग हित, व्यवस्थाएं और विवाद रखने वाले देश भी कुछ साझा मुद्दों पर बैठकर बात कर सकते हैं।

लेकिन BRICS की सफलता शिखर सम्मेलनों, नेताओं की तस्वीरों और लंबे साझा बयानों से तय नहीं होगी। असली कसौटी यह होगी कि संगठन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कितना बढ़ा पाता है, सीमा पार भुगतान कितना आसान करता है, न्यू डेवलपमेंट बैंक को कितना असरदार बनाता है और मतभेदों के बीच कितनी ठोस सहमति तैयार कर पाता है। तीनों पत्रकारों की बातचीत भी इसी मैसेज के इर्द-गिर्द रही।

यहां देखें पूरी बातचीत-