इजरायल में 76 प्रतिशत काउंटिंग पूरी होने के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। बंद दरवाजे में आगे का प्लान बनना शुरू हो चुका है। सबसे बड़े सवाल पर मंथन चल रहा है- सरकार कौन और कैसे बनाएगा? इससे पहले, वोटिंग पूरी होने तक पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की धड़कनें बढ़ी रहीं और अब छोटे दलों पर सबसे ज्यादा फोकस क्यों है? आइए समझते हैं।
पहले से माना जा रहा था कि किसी भी गठबंधन को शायद बहुमत न मिले। लेकिन जिस तरह से विपक्षी उम्मीदवार गादी आइजेनकोट के गठबंधन और अरब पार्टियोंं का परफॉर्मेंस दिखा है, उसने जोड़तोड़ की पॉलिटिक्स शुरू कर दी है। 76.8 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी होने के बाद नेतन्याहू का गठबंधन 54 सीटें जीतता दिख रहा है, विपक्षी खेमे के पास 47 सीटें आ रही हैं। अरब पार्टियों ने सबसे ज्यादा चौंकाया है। इनकी झोली में 19 सीटें मिल सकती हैं।
यहीं अरब पार्टियों का रोल बड़ा हो जाता है।
फिलिस्तीनी-इजरायली समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाली अरब पार्टियों के गढ़ में रिकॉर्ड 80 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। यहीं के लोग वोटिंग करने ऊंट पर बैठकर निकले थे। आप पहले वायरल वीडियो देखिए।
यही देख शायद पीएम नेतन्याहू ने वीडियो जारी कर अपने सपोर्टरों से घर से बाहर निकलकर वोट डालने की अपील की थी। आगे देखिए कैसे वह अपने सपोर्टरों को वोट डालने के लिए बोल रहे थे।
अब अरब पार्टियों को 19 सीटें मिल सकती हैं। ऐसा तब हुआ है जब इजरायल में फिलिस्तीनी नागरिकों के बीच मतदान का स्तर कई दशकों में सबसे ज्यादा रहा है।
कौन बनेगा इजरायल का अगला प्रधानमंत्री? यह आधिकारिक नतीजों के बाद ही साफ होगा लेकिन इतना तय है कि छोटी पार्टियां किंगमेकर बनकर उभर सकती हैं। हां, सत्ता की चाबी उनके पास रह सकती है।
आगे बढ़ने से पहले जानिए ये अरब पार्टियां हैं क्या?
दरअसल, इजरायल की एक करोड़ की आबादी में अरब पार्टियां करीब 20 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये अरब नागरिक असल में फिलिस्तीनी हैं। अब तक ये यहूदी इजरायलियों की तुलना में कम मतदान करते रहे हैं, लेकिन इस बार इनके इलाके में बंपर वोट पड़े हैं।
इजरायल में दो बड़े अरब गुट
1. जॉइंट लिस्ट (Joint List) - यह तीन अलग-अलग अरब की तरफ झुकाव रखने वाली पार्टियों का गठबंधन है। इसके मुख्य नेता यूसुफ जबरिन हैं। तीन पार्टियों में एक अरब-यहूदी कम्युनिस्ट पार्टी, दूसरी अरब राष्ट्रवादी पार्टी और तीसरी फिलिस्तीनी राष्ट्रवादी पार्टी है।
2. राआम (Ra'am- United Arab List)- यह रूढ़िवादी इस्लामिक पार्टी है। इसके प्रमुख नेता मंसूर अब्बास हैं। Ra'am असल में पार्टी का हिब्रू में नाम है।
अब समझिए, इनका झुकाव किस तरफ है?
यही सवाल इजरायल की राजनीति में एक बड़ी लकीर खींचता है। ये सभी अरब पार्टियां फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए समान अधिकार की वकालत करती हैं।
- जॉइंट लिस्ट का मानना है कि इजरायली कब्जे को खत्म कर स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र बनने देना चाहिए।
- मंसूर अब्बास की पार्टी इजरायल के भीतर अरब समुदायों के आंतरिक मुद्दों, विकास बजट आदि पर जोर देती है।
सबसे बड़ा मकसद
- अरब पार्टियों का एक साझा लक्ष्य है। ये लोग नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को सत्ता से हटाना चाहते हैं। ये धुर दक्षिणपंथियों को सत्ता में नहीं चाहते हैं।
अब पढ़िए आगे।
एग्जिट पोल में अनुमान लगाया गया है कि अरब पार्टियों के प्रमुख गठबंधन - 'जॉइंट लिस्ट' और 'राआम' 120 सदस्यों वाली संसद (नेसेट) में रिकॉर्ड सीटें हासिल कर सकते हैं। काउंटिंग शुरू होने के बाद कुछ देर के लिए इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट की 'यशार' पार्टी के नेतृत्व वाला विपक्षी गुट और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की 'लिकुड' पार्टी के नेतृत्व वाला गुट बराबर की टक्कर देता दिखा है।
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इजरायल के 'चैनल 12' की रिपोर्ट का दावा है कि इजरायल के फिलिस्तीनी नागरिकों के बीच वोटिंग का प्रतिशत 80 प्रतिशत रहा, जो ऐतिहासिक है। इसने 1999 के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।
'राआम' (यूनाइटेड अरब लिस्ट) के नेता मंसूर अब्बास ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि चुनाव के अंतिम नतीजों में नेतन्याहू-विरोधी गुट (जिसमें उनकी पार्टी भी शामिल है) सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें हासिल कर लेगा। अब्बास ने इजरायल के 'चैनल 12' से कहा, 'अभी जो आंकड़े सामने आए हैं, उनके हिसाब से कोई भी सरकार नहीं बन सकती।'
अब्बास की 'राआम' पार्टी के पास अभी संसद (नेसेट) में पांच सीटें हैं। यह पार्टी उस गठबंधन का भी हिस्सा थी, जो 2021 से 2022 तक इजरायल में सत्ता में थी। अब्बास ने बताया कि चुनाव से पहले और बाद में, दोनों मुख्य गुटों ने उनकी पार्टी से संपर्क किया था।
इसमें भी एक पेच है
इजरायल के पूर्व राजदूत एलोन पिंकास ने अलजजीरा से कहा कि आइजेनकोट की पार्टी आगे भी रहती है तो उसके लिए सरकार बनाना मुश्किल हो सकता है। क्योंकि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि वे अरब पार्टियों के साथ कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
पिंकास ने कहा, 'इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी, क्योंकि आप अरबों को हमेशा बाहर नहीं रख सकते और केवल तब उनके बारे में नहीं सोच सकते, जब आपको उनके वोट चाहिए।' उन्होंने आगे कहा कि अरब पार्टियों की मांगें ऐसी होंगी, जिसका समर्थन शायद यहूदी-नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार न करे।
नेतन्याहू की टेंशन क्या है?
वोटिंग के दौरान नेतन्याहू और उनका दक्षिणपंथी गठबंधन समर्थकों को मतदान केंद्रों तक लाने के लिए पूरा जोर लगाता रहा। सोशल मीडिया पर वीडियो डाले जा रहे थे। उन्होंने चेतावनी भी दी कि इजरायल के फिलिस्तीनी नागरिकों का वोटिंग प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है। अरब नेताओं ने इस रणनीति की निंदा करते हुए इसे भड़काऊ बताया।
एक सोशल मीडिया पोस्ट में, पीएम नेतन्याहू ने अरब समुदायों के वोटिंग सेंटर पर जुटने का जिक्र किया। उन्होंने एक तस्वीर भी साझा की, जिसमें अरब मतदाता (नकाब में महिलाएं भी थीं) वोट डालने के लिए इंतजार करते दिख रहे थे। उन्होंने कहा, 'अगर हम अभी नहीं जागे, तो हमें मंसूर अब्बास और अहमद तिबी की सरकार देखनी पड़ सकती है।' ये दोनों इजरायल की संसद के प्रमुख फिलिस्तीनी नेता हैं।
केंद्रीय चुनाव समिति ने बताया है कि मंगलवार को 1999 के बाद सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है। कुल 77.7 प्रतिशत वोटरों ने अपने वोट डाले।
इस चुनाव को फिलिस्तीनी-इजरायलियों के लिए अस्तित्व से जुड़ा एक अहम मोड़ माना जा रहा है।
यह एक महत्वपूर्ण मतदाता समूह है, जो इस बार खुलकर सामने आया है। अब तक ये लोग चुनावों का बहिष्कार करते थे। इन्हें लगता था कि वोट देने से कोई असर नहीं पड़ेगा, न ही इससे उनकी स्थिति बदलेगी। इनका आरोप है कि इनके साथ भेदभाव होता है, बजट भी कम मिलता है।