ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच तेल-गैस संकट से कैसे निपटा भारत? ओमान बना बड़ा LNG सप्लायर

ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर नाकेबंदी के बाद दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा गया। पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश समेत कई यूरोपीय देशों में भी तेल और गैस की किल्लत बढ़ गई। इस दौरान भारत ने नए सप्लायर तलाशकर अपनी स्थिति संभालने की कोशिश की।

ईरान-अमेरिका युद्ध के दौरान दुनिया भर में ऊर्जा संकट के चलते हाहाकार मचा था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकेबंदी के कारण तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो गई थी। ऐसे में भारत ने इस संकट को नए अवसरों और दूसरे विकल्पों की तलाश के मौके के तौर पर देखा। यही वजह है कि तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने के बावजूद भारत की स्थिति अपने पड़ोसी देशों के मुकाबले बेहतर रही। सितंबर महीने में ओमान भारत का सबसे बड़ा एलएनजी सप्लायर बन गया और उसने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया।

भारत ने आपदा में तलाशे विकल्प

दुनिया जब ऊर्जा संकट से जूझ रही थी, तब भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल में भी तेल और गैस की भारी किल्लत होने लगी। इनके दाम भी आसमान छूने लगे। इस दौरान भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए नए सप्लायर तलाश रहा था। देश में तेल और गैस की कमी का संकट टालने के लिए भारत ने कतर और यूएई के अलावा अमेरिका, नाइजीरिया और ओमान जैसे देशों से भी सप्लाई के विकल्प तलाशे और उनसे गैस खरीदना शुरू किया।

इस रणनीति के चलते भारत की स्थिति दूसरे देशों के मुकाबले बेहतर रही। दुनिया भर में गैस की कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत की मांग मजबूत बनी रही। वुड मैकेन्जी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 'टेंडर की कीमतें' सितंबर तक बढ़कर 26.4 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBtu) हो गईं। मार्च से जून 2026 के बीच ये कीमतें 16.8 से 18.8 डॉलर प्रति MMBtu थीं। यानी महंगी दरों के बावजूद भारत गैस खरीदने के लिए टेंडर जारी करता रहा।

ओमान भारत को कितनी LNG सप्लाई कर रहा है?

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद कई महीनों तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर रहा। लेकिन सितंबर में ओमान ने उसे पीछे छोड़ दिया। इसकी एक वजह अमेरिकी LNG कार्गो के लिए यूरोपीय खरीदारों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। यूरोप की मांग बढ़ने से एशियाई देशों के लिए अमेरिकी स्पॉट सप्लाई हासिल करना मुश्किल हुआ है।

कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर (Kpler) के टैंकर-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, सितंबर में ओमान से भारत का LNG आयात अगस्त के मुकाबले 11.6% बढ़कर 0.59 मिलियन टन यानी 5.9 लाख टन हो गया। वहीं, अमेरिका से आयात 60.7% घटकर 0.34 मिलियन टन यानी 3.4 लाख टन रह गया।

अन्य देशों से कितनी LNG आई?

सितंबर में 0.35 मिलियन टन LNG की सप्लाई के साथ नाइजीरिया भारत का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर रहा। हालांकि, अगस्त के मुकाबले वहां से आयात में 35% की गिरावट आई। अमेरिका तीसरे और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) चौथे स्थान पर रहा। इस दौरान UAE से LNG का शिपमेंट 27.3% बढ़कर 0.31 मिलियन टन पहुंच गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में यूरोप को भी अमेरिकी LNG कार्गो के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा का फायदा मिला। सर्दियों से पहले यूरोपीय संघ (EU) के देशों में गैस भंडारण का स्तर ऐतिहासिक रूप से काफी कम था। ऐसे में यूरोपीय खरीदारों ने अमेरिकी गैस की अतिरिक्त सप्लाई हासिल करने पर जोर दिया।

भारत की स्थिति पड़ोसी देशों से बेहतर क्यों रही?

ऊर्जा परामर्श फर्म वुड मैकेन्जी के ताजा विश्लेषण के मुताबिक, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद दक्षिण एशिया के बड़े LNG खरीदारों में भारत की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुकाबले बेहतर रही। इसकी एक वजह भारत की चरणबद्ध मांग-प्रबंधन रणनीति थी।

मार्च और अप्रैल में भारत ने उर्वरक, रिफाइनरी और औद्योगिक क्षेत्रों को गैस की सप्लाई में कटौती की। इससे घरेलू गैस वितरण पर असर कम रखने में मदद मिली और ऊर्जा संकट के दौरान आपूर्ति को संभालना आसान हुआ

अगस्त-सितंबर में भारत का LNG आयात

सितंबर में भारत का कुल LNG आयात 2.17 से 2.24 मिलियन टन के बीच रहा। यह अगस्त के मुकाबले करीब 7% ज्यादा था। इस दौरान अमेरिका ने अपनी आधी से ज्यादा LNG सप्लाई यूरोप भेजी। वहीं, भारत ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते पर निर्भरता कम करने के लिए ओमान से गैस मंगाई।

एक समय भारत को सबसे ज्यादा LNG सप्लाई करने वाले कतर से सितंबर में आयात करीब 90% गिर गया। इसकी वजह मार्च में कतर के रास लाफान एनर्जी कॉम्प्लेक्स पर हुए हमले और शिपिंग पर लगी पाबंदियां थीं।

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