स्पेस से आया वो 'भूतिया कण' क्या है, जिसे पकड़ने के लिए मिला फिजिक्स का नोबेल

भूतिया कण? हां, इसे कोई पकड़ नहीं सकता। कोई दीवार नहीं। कोई इंसान नहीं। ये कहीं भी जा सकते हैं। यहां तक कि घूमते हुए अंतरिक्ष में ये बहुत दूर से धरती पर आ गए हैं। अब इन्हें देखने वाली आंखों को फिजिक्स का नोबेल दिया गया है।

क्या आपको पता है जब आप यह आर्टिकल पढ़ रहे हैं, आपके चारों तरफ बेहद बारीक अरबों कण घूम रहे हैं। ये कण इतने बारीक हैं कि हमारे शरीर तो क्या मोटी दीवार के आर-पार भी निकलते रहते हैं। हैरानी हो रही है। यह दरअसल न्यूट्रिनो हैं। 

इस साल फिजिक्स (Physics) में दिए गए नोबेल पुरस्कार का कनेक्शन इन्हीं बारीक कणों से है। साइंटिस्ट फ्रांसिस हाल्जन को हाई एनर्जी वाले न्यूट्रिनों की खोज के लिए नोबेल दिया गया है। न्यूट्रिनो यानी ब्रह्मांड का वो बारीक कण, जिसके आसपास हम और आप अभी बैठे हैं। हां, हर सेकंड सूरज से निकलने वाले 65 अरब न्यूट्रिनो हमारे शरीर से होकर गुजरते हैं और हमें इसका पता भी नहीं चलता।

यह चारों तरफ घूम रहे ब्रह्मांड के रहस्यमय कणों में से एक है। इनका कोई वजन नहीं, न कोई आकार दिखता है। ये बिना किसी से टकराए कहीं भी आ-जा रहे हैं। या कहिए कि इन्हें रोकने वाली कोई दीवार बनी ही नहीं है। तभी तो इन्हें 'घोस्ट पार्टिकल' कह देते हैं।

अब थोड़ा रुककर यह तस्वीर देखिए। 

अब सवाल है ये कण आए कहां से?

माना जाता है कि ये न्यूट्रिनो सूरज या पृथ्वी की दुनिया की चीज नहीं हैं, ये कहीं दूर गहरे अंतरिक्ष से घूमते हुए आए हैं। हो सकता है ब्लैक होल से या मरते हुए तारों से।

इनके पास ऊर्जा कितनी होती है?

यूं समझ लीजिए कि वैज्ञानिक कहते हैं ये ऐसे सामान्य कणों की तुलना में बहुत शक्तिशाली होते हैं। इतनी ऊर्जा ब्रह्मांड में किसी दूसरी घटना से ही पैदा हो सकती है।

अब बात नोबेल की

धरती के साउथ पोल यानी अंटार्कटिका में दुनिया का सबसे बड़ा न्यूट्रिनो टेलीस्कोप और पार्टिकल डिटेक्टर लगाया गया है। इसे आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेट्री कहते हैं। यहीं पर घोस्ट पार्टिकल यानी न्यूट्रिनों पर खोज और स्टडी चल रही है। इसी के हेड साइंटिस्ट फ्रांसिस हाल्जन हैं, जिन्हें हाई एनर्जी वाले खगोलीय न्यूट्रिनों की खोज के लिए फिजिक्स का नोबेल मिला है।

आपको लगेगा कि न्यूट्रिनो के बारे में रिसर्च ही करनी थी तो यहीं करते, बर्फीली दुनिया में क्यों चले गए? असल में वहां हाई एनर्जी वाला न्यूट्रिनो जब बर्फ के परमाणु से टकराता है, तो उस घटना को रिकॉर्ड करना थोड़ा आसान हो जाता है। इस टक्कर से हल्की रोशनी निकलती है। यहीं हाई-एनर्जी वाले न्यूट्रिनो के स्रोत का भी पता लगाने की कोशिश होती है। 

असल में, 80 के दशक में हाल्जन ने साउथ पोल के बारे में सोचा था, जो इस न्यूट्रिनो को पकड़ने का सेंटर बन सकता है। असल में, बर्फ के कई फायदे हैं। यहां गहराई में हमेशा अंधेरा रहता है, इसलिए रोशनी की चमक आसानी से देखी जा सकती है। (समझने के लिए ऊपर की तस्वीर फिर से देखिए) समंदर में जीवों के रहने से हलचल रहती है। अंटार्कटिका में रेडियोएक्टिविटी भी कम है, बर्फ स्थिर है और उस इलाके में भूकंप नहीं आते। 

समझिए हाल्जन की रिसर्च क्यों क्रांतिकारी है?

1. साइंस के एक बिल्कुल नए क्षेत्र न्यूट्रिनो एस्टोनॉमी की शुरुआत हुई, जिससे इंसान का ब्रह्मांड को समझने का नजरिया बदला। या कहिए नए नजरिए से ब्रह्मांड को आप समझ सकते हैं।

2. आइसक्यूब ऑब्जर्वेट्री में पहली बार कॉस्मिक न्यूट्रिनो के बारे में पता चला।

3. अब तक एस्ट्रोनॉमी पूरी तरह लाइट यानी फोटान पर निर्भर थी जैसे एक्स रे, रेडियो वेव आदि। हाल्जन ने न्यूट्रिनो का कनेक्शन कॉस्मिक मैसेंजर के तौर पर जोड़ा, मतलब वो दूत जो दूसरी दुनिया से आए हों। क्योंकि ये बिना भार वाले पार्टिकल सीधी रेखा में बिना खत्म हुए अरबों प्रकाश वर्ष की दूरी तय कर सकते हैं।

4. 100 साल से भी ज्यादा समय से साइंटिस्ट मानते रहे कि धरती पर हाई-एनर्जी कॉस्मिक किरणें आती हैं लेकिन वे उनके स्रोत का पता नहीं लगा पाते थे क्योंकि सीधा रास्ता नहीं मिल पाता था। हाल्जन ने इस गुत्थी को सुलझाने में मदद की। 2017 में आइसक्यूब ने ही पता लगाया कि हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो 4 अरब प्रकाश वर्ष दूर एक बहुत बड़े ब्लैक होल से आया था। इस तरह से इतिहास में पहली बार किसी कॉस्मिक किरणों के स्रोत का ठीक-ठीक पता चल सका।

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