अमेरिका की संसद में बैठे कुछ लोग अब यह तय करने निकले हैं कि कौन-सा देश किससे तेल खरीदेगा और किस देश के साथ कारोबार करेगा। जो उनकी बात न माने, उसके सामान पर इतना टैरिफ लगा दो कि उसका अमेरिकी बाजार ही टूट जाए। विडंबना ये है कि इस बाजार को खड़ा करने में दुनियाभर के लोगों की मेहनत शामिल है।
अमेरिका में अब ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ बिल पास हो गया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को इसे 262 वोटों से पारित कर दिया, जबकि विरोध में 159 वोट पड़े। सीनेट पहले ही इसे 86-11 से मंजूरी दे चुका है। अब विधेयक डोनाल्ड ट्रंप की टेबल पर है।
ट्रंप के साइन के बाद अमेरिका रूसी तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त शुल्क लगा सकेगा। दूसरी ओर, ईरान के ऊर्जा क्षेत्र और उससे कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों पर कार्रवाई के लिए बने पुराने अमेरिकी प्रतिबंध कानून को 2031 तक बढ़ा दिया जाएगा। यानी रूस के मामले में अमेरिका दूसरे देशों को उनकी तेल खरीद के लिए दंडित करना चाहता है, जबकि ईरान के मामले में वह अपने पुराने आर्थिक शिकंजे को अगले पांच साल तक कसकर रखना चाहता है। आइए आसान भाषा में समझ लेते हैं कि इस विधेयक में है क्या?
US के इस फैसले पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत सरकार ने अमेरिकी कांग्रेस में ‘सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ पारित होने का संज्ञान लिया है और इससे जुड़े आगे के घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है। भारत अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और बदलती बाजार स्थितियों के आधार पर अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीदना जारी रखेगा।
रूस पर क्या कार्रवाई होगी?
विधेयक रूस के अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र को निशाना बनाता है। इसमें उन जहाजों पर भी कार्रवाई की व्यवस्था है, जिन्हें रूस की कथित ‘शैडो फ्लीट’ यानी प्रतिबंधों से बचकर तेल पहुंचाने वाले जहाजों का हिस्सा माना जाता है। लेकिन भारत के लिए सबसे अहम प्रावधान इसकी धारा 113 है। इसके अनुसार कानून लागू होने के 30 दिन बाद भी रूसी मूल का कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिका अतिरिक्त शुल्क लगा सकता है।
यह व्यवस्था उन देशों पर लागू होगी जो पिछले 12 महीनों में:
- रूसी कच्चे तेल के पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल रहे हों,
- रूसी प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों में हों, या
- रूस को तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल हों।
ऐसे देश से अमेरिका जाने वाले सभी सामान पर शुल्क शून्य से 100 फीसदी तक रखा जा सकता है। यह शुल्क पहले से लागू शुल्क के ऊपर लगेगा। हर 180 दिन में देशों की सूची की दोबारा समीक्षा होगी।
यहां एक जरूरी बात ये है कि विधेयक अपने आप भारत पर सीधे 100 फीसदी शुल्क तय नहीं करता। वह भारत का नाम भी मूल प्रावधान में नहीं लिखता। भारत तभी इसकी जद में आएगा, जब अमेरिकी प्रशासन उसे निर्धारित श्रेणी में रखेगा। शुल्क की दर तय करने और बाद में उसे बढ़ाने या घटाने की शक्ति भी अमेरिकी प्रशासन के पास होगी।
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ईरान पर ट्रंप को क्या अधिकार मिला?
विधेयक के नाम में ईरान जरूर है, लेकिन इसमें ईरान के खिलाफ रूस जैसी नई 100 फीसदी शुल्क व्यवस्था नहीं बनाई गई है। इसके बजाय अमेरिका के पुराने ईरान प्रतिबंध कानून, 1996 की अवधि पांच साल बढ़ाई गई है। यह कानून 2026 में समाप्त होने वाला था। नए विधेयक की धारा 201 में केवल वर्ष 2026 को बदलकर 2031 किया गया है। यानी राष्ट्रपति ट्रंप को कोई बिल्कुल नया और खुला अधिकार देने के बजाय ईरान पर पहले से मौजूद प्रतिबंध लगाने की शक्तियां अगले पांच वर्षों तक जारी रखी गई हैं।
इन अधिकारों के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में बड़े निवेश, तेल और पेट्रोलियम कारोबार तथा ईरान की प्रतिबंधित गतिविधियों में मदद करने वाली विदेशी कंपनियों और व्यक्तियों पर कार्रवाई कर सकते हैं। इनमें अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच रोकना, संपत्ति जब्त करना, बैंकिंग पाबंदियां लगाना और अमेरिकी बाजार से जुड़ी दूसरी रोक शामिल हो सकती हैं।
सरल शब्दों में कहें तो इस विधेयक के दो हिस्से हैं.
पहला यानी रूस वाला हिस्सा- ट्रंप को रूसी ऊर्जा खरीदने वाले दूसरे देशों पर भी 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का औजार देता है।
दूसरा यानी ईरान वाला हिस्सा- पुराने अमेरिकी प्रतिबंध कानून को 2031 तक जीवित रखता है। ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि यह विस्तार ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और आतंकवाद को समर्थन देने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए जरूरी है।
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भारत के पास क्या विकल्प हैं?
विदेश मामलों के जानकार रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, भारत के सामने मुख्य रूप से दो रास्ते हैं।
पहला- भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत रूस से तेल खरीदना जारी रखे और शुल्क से राहत पाने के लिए अमेरिका से बातचीत करे।
इस विकल्प में भारत को यह स्वीकार करना पड़ सकता है कि अपनी नीति बनाए रखने के लिए उसे कुछ आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़े।
दूसरा रास्ता- रूस से सीधे खरीदे जाने वाले तेल की मात्रा कम करना और दूसरे देशों या कारोबारी माध्यमों से अपनी जरूरत पूरी करना हो सकता है।
यानी भारत के लिए असली सवाल केवल यह नहीं होगा कि रूसी तेल कितना सस्ता है। उसे यह भी देखना होगा कि उस बचत के बदले अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात को कितना नुकसान हो सकता है।
अब फैसला ट्रंप को करना है
विधेयक की धारा 115 राष्ट्रपति को रूस से जुड़े प्रतिबंध या शुल्क से किसी देश, व्यक्ति या संस्था को छूट देने का अधिकार भी देती है। इसके लिए उन्हें अमेरिकी कांग्रेस को लिखित रूप में बताना होगा कि यह छूट अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है और इसके कारण समझाने होंगे। यानी भारत के खिलाफ शुल्क लगाना एक संभावित रास्ता है, लेकिन यह पूरी तरह अपने आप लागू होने वाली व्यवस्था नहीं है। भारत और अमेरिका के बीच बातचीत से शुल्क की दर कम करने या छूट हासिल करने की गुंजाइश बनी रहेगी।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में शामिल है। इसलिए कानून बनने के बाद भारत पर धारा 113 लागू होने का जोखिम रहेगा। ऐसा हुआ तो असर केवल तेल कारोबार तक सीमित नहीं होगा। भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले कपड़े, दवाएं, इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न-आभूषण और दूसरे सामान भी अतिरिक्त शुल्क की चपेट में आ सकते हैं। 100 फीसदी एक्स्ट्रा टैरिफ का मतलब है कि अमेरिका में भारतीय सामान की कीमत तेजी से बढ़ सकती है। इससे अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों से सामान लेने लग सकते हैं और भारत के निर्यातकों के लिए मौजूदा सौदे आर्थिक रूप से मुश्किल हो सकते हैं।
हालांकि, यह टैरिफ वस्तुओं पर लागू होगा। IT जैसी सेवाओं पर सीधे सीमा शुल्क नहीं लगता, इसलिए उन्हें उसी तरह 100 फीसदी टैरिफ के दायरे में रखना सही नहीं होगा। उन पर अप्रत्यक्ष असर कारोबार घटने, निवेश या कंपनियों के खर्च में कटौती के रूप में हो सकता है।
भारतीय कंपनियों को क्या करना होगा?
अगर विधेयक कानून बनता है तो अमेरिकी खरीदारों के साथ लंबे कारोबारी समझौते करने वाली भारतीय कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है। देशों की सूची हर 180 दिन में बदल सकती है और शुल्क की दर शून्य से 100 फीसदी के बीच घटाई-बढ़ाई जा सकती है।
ऐसी स्थिति में कंपनियां नए समझौतों में यह साफ कर सकती हैं कि अतिरिक्त शुल्क लगने पर लागत कौन उठाएगा। कीमत बदलने, लागत साझा करने और सौदा आर्थिक रूप से संभव न रहने पर उससे बाहर निकलने की शर्त भी रखी जा सकती है। केवल अप्रत्याशित घटना वाली शर्त पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इस टैरिफ का रिस्क पहले से दिखाई दे रहा है। इसके साथ निर्यातकों को अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने के लिए दूसरे बाजार और खरीदार भी तलाशने होंगे। उद्योग संगठनों के लिए भारत सरकार के जरिए अमेरिका से संभावित छूट या कम शुल्क की मांग करना भी एक विकल्प होगा।
फिलहाल, विधेयक कानून नहीं बना है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर होने के बाद भारत के लिए अगली अहम तारीख कानून लागू होने के 30 दिन बाद आएगी। अमेरिका रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार देशों की पहचान कर शुल्क पर फैसला कर सकता है।