जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध से एक आदेश दूर थी, रूसी अफसर ने कैसे बचाई लाखों जानें?

जब दुनिया तीसरे विश्व युद्ध से एक आदेश दूर थी, रूसी अफसर ने कैसे बचाई लाखों जानें?

यह कहानी है क्यूबा मिसाइल संकट की, जब दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने तक पहुंच गई थी और एक रूसी नौसैनिक अधिकारी की सूझबूझ ने लाखों लोगों की जान बचा ली.
सत्यम बघेलसत्यम बघेल Published

अक्टूबर 1962, शीत युद्ध अपने चरम पर था। एक तरफ अमेरिका, दूसरी तरफ सोवियत संघ। दोनों के पास इतने परमाणु हथियार थे कि धरती को कई बार तबाह किया जा सकता था। दुनिया की नजरें क्यूबा पर थीं, लेकिन इतिहास की सबसे खतरनाक घटनाओं में से एक समुद्र की गहराइयों में घट रही थी। वहां एक ऐसा फैसला लिया जाने वाला था, जो अगर हो जाता तो शायद आज दुनिया वैसी नहीं होती जैसी हम जानते हैं.

यह कहानी है क्यूबा मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis) की, जब दुनिया परमाणु युद्ध के मुहाने तक पहुंच गई थी और एक रूसी नौसैनिक अधिकारी की सूझबूझ ने लाखों लोगों की जान बचा ली.

क्यूबा क्यों बना जंग का मैदान?

1959 में Fidel Castro के नेतृत्व में क्यूबा में क्रांति हुई। अमेरिका समर्थित सरकार का अंत हुआ और कम्युनिस्ट शासन स्थापित हो गया। वॉशिंगटन को यह बिल्कुल पसंद नहीं था।

1961 में अमेरिका समर्थित विद्रोहियों ने क्यूबा में घुसकर कास्त्रो सरकार को गिराने की कोशिश की। इस अभियान को इतिहास में Bay of Pigs Invasion के नाम से जाना जाता है। यह ऑपरेशन बुरी तरह विफल रहा, लेकिन इससे क्यूबा और सोवियत संघ और करीब आ गए। कास्त्रो को डर था कि अमेरिका फिर हमला कर सकता है इसलिए उन्होंने मॉस्को से सुरक्षा मांगी। सोवियत नेता Nikita Khrushchev ने क्यूबा में मिसाइलें तैनात करने का फैसला किया। 

फाइल फोटो। जॉन एफ. केनेडी और निकिता ख्रुश्चेव।© यूनिवर्सल हिस्ट्री आर्काइव/यूनिवर्सल इमेजेज ग्रुप Via Getty Images

यहीं से संकट शुरू हुआ। गुप्त मिशन पर निकलीं चार पनडुब्बियां।

1 अक्टूबर 1962 को सोवियत संघ की चार पनडुब्बियां आर्कटिक क्षेत्र के कोला बे से क्यूबा की ओर रवाना हुईं। ये कोई सामान्य पनडुब्बियां नहीं थीं। इनमें परमाणु हथियारों से लैस टॉरपीडो मौजूद थे। मिशन पूरी तरह गुप्त था। खराब मौसम, बर्फ, बारिश और कम दृश्यता ने उनकी पहचान छिपाने में मदद की। कई दिनों तक अमेरिकी निगरानी तंत्र को उनकी भनक तक नहीं लगी लेकिन 18 अक्टूबर के आसपास पश्चिमी खुफिया एजेंसियों को संकेत मिलने लगे कि सोवियत पनडुब्बियां अटलांटिक में मौजूद हैं और अमेरिकी तटों की ओर बढ़ रही हैं। तनाव तेजी से बढ़ रहा था।

फ़ाइल फ़ोटो। सोवियत संघ में कहीं एक बेस पर तीन सोवियत पनडुब्बियां लंगर डाले खड़ी हैं और उनके डेक पर "ऑर्डर ऑफ़ द रेड बैनर" लहरा रहा है।

केनेडी का आदेश और युद्ध का खतरा

22 अक्टूबर 1962 को अमेरिकी राष्ट्रपति John F. Kennedy ने क्यूबा की समुद्री नाकेबंदी की घोषणा कर दी। अमेरिकी नौसेना को आदेश दिया गया कि क्यूबा के आसपास पहुंचने वाली किसी भी विदेशी पनडुब्बी की पहचान की जाए। अगर कोई पनडुब्बी सतह पर आने से इनकार करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती थी।

मॉस्को से भी सख्त संदेश

ख्रुश्चेव ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी जहाज सोवियत जहाजों को रोकने या उनकी तलाशी लेने की कोशिश करेंगे तो इसे समुद्री डकैती माना जाएगा। दोनों महाशक्तियां आमने-सामने थीं, बस चिंगारी लगनी बाकी थी.

वह दिन जब बड़ी तबाही मचने वाली थी

27 अक्टूबर 1962 को सोवियत पनडुब्बी B-59 बैटरियां चार्ज करने के लिए समुद्र की सतह पर आई, लेकिन ऊपर का दृश्य देखकर चालक दल के होश उड़ गए। चारों तरफ अमेरिकी सेना का जमावड़ा था। एक विमानवाहक पोत, 9 विध्वंसक युद्धपोत, गश्ती विमान, कोस्ट गार्ड, तेज सर्चलाइटें, गहराई में विस्फोट करने वाले चार्ज। अमेरिकी विमान पनडुब्बी के बेहद करीब उड़ रहे थे। सोवियत कमांडर Valentin Savitsky को लगा कि युद्ध शुरू हो चुका है। उन्हें विश्वास हो गया कि अमेरिका हमला कर रहा है। पनडुब्बी के अंदर तनाव चरम पर था।

वह आदेश, जो तीसरा विश्व युद्ध शुरू कर सकता था

बाद में कई नौसैनिकों ने गवाही दी कि कमांडर सवित्स्की ने परमाणु टॉरपीडो इस्तेमाल करने की तैयारी कर ली थी। अगर वह टॉरपीडो छोड़ा जाता, तो अमेरिकी बेड़े पर परमाणु हमला होता. अमेरिका जवाबी हमला करता और शायद कुछ ही घंटों में दुनिया परमाणु युद्ध में धकेल दी जाती लेकिन ठीक उसी समय पनडुब्बी में मौजूद एक व्यक्ति ने इतिहास बदल दिया।

वह व्यक्ति जिसने दुनिया बचा ली

पनडुब्बी में वरिष्ठ अधिकारी Vasily Arkhipov भी मौजूद थे। उन्होंने स्थिति को अलग नजरिए से देखा। आर्खिपोव को लगा कि अमेरिकी जहाज हमला नहीं कर रहे, बल्कि चेतावनी देने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने घबराए हुए कमांडर को शांत किया। उन्होंने परमाणु टॉरपीडो लॉन्च करने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने सुनिश्चित किया कि विनाशकारी आदेश आगे न पहुंचे। कुछ मिनटों के भीतर दुनिया की किस्मत बदल गई। जहां परमाणु युद्ध शुरू हो सकता था, वहां संवाद शुरू हुआ। 

तनाव बना रहा, लेकिन युद्ध टल गया। दुनिया को सालों तक पता ही नहीं चला। अगले दिन B-59 वापस लौटने लगी। सोवियत अड्डे पर पहुंचने के बाद एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने चालक दल से कहा, ‘हमें तो उम्मीद ही नहीं थी कि तुम लोग जिंदा वापस आओगे.’ हैरानी की बात यह है कि उस समय दुनिया को इस घटना की पूरी जानकारी नहीं थी। अमेरिकी जनता को भी नहीं पता था कि वे परमाणु हमले से कितने करीब पहुंच चुके थे। कई दशक बाद दस्तावेज सामने आए, तब दुनिया को पता चला कि मानव इतिहास का शायद सबसे खतरनाक क्षण समुद्र की गहराइयों में घटा था।

आखिर संकट खत्म कैसे हुआ?

आखिरकार दोनों पक्ष पीछे हटे। ख्रुश्चेव ने क्यूबा से सोवियत परमाणु मिसाइलें हटाने पर सहमति जताई। इसके बदले केनेडी ने वादा किया कि अमेरिका दोबारा क्यूबा पर हमला नहीं करेगा। साथ ही तुर्की में तैनात अमेरिकी जुपिटर मिसाइलों को भी हटाया गया। इसके बाद मॉस्को और वॉशिंगटन के बीच सीधा हॉटलाइन संपर्क स्थापित किया गया, ताकि भविष्य में गलतफहमियां युद्ध में न बदल जाएं।

इतिहास का सबसे बड़ा सबक

क्यूबा मिसाइल संकट सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह याद दिलाता है कि कई बार दुनिया का भविष्य किसी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या सेना के नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के फैसले पर टिका होता है जिसका नाम इतिहास की किताबों में शायद ही कभी प्रमुखता से लिखा जाता है। 1962 में दुनिया को बचाने वाला व्यक्ति न कोई राष्ट्रपति था, न कोई प्रधानमंत्री। वह एक नौसैनिक अधिकारी था, जिसने घबराहट की जगह विवेक को चुना।

अगर वासिली आर्खिपोव उस दिन कुछ और फैसला लेते, तो शायद आज हम कुछ और कहानी पढ़ रहे होते।