
30 साल बाद जब रूस ने हिमालय की गोद से खोज निकाला अपना गुमनाम योद्धा
गेहूं की फसल कट चुकी थी। घर के आंगन में चारों ओर गेहूं की बालियां बिखरी थीं। सफेद बालों वाला एक बुजुर्ग किसान गेहूं कूट रहा था… उधर, पूरे गांव में खबर फैल चुकी थी कि विदेश से बड़े अधिकारी आए हैं सीधे गजेंद्र सिंह के घर।
वो साल 1975 था। रास्ते मुश्किल थे, कनेक्टिविटी न के बराबर थी और नेपाल सीमा से सटे इस दूरस्थ गांव तक पहुंचना किसी अभियान जैसा था। लेकिन उस दिन सोवियत संघ के राजदूत और उनके साथ आए अधिकारी दिल्ली से 500 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करके उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ के छोटे से गांव बड़ालू, सिर्फ एक व्यक्ति से मिलने पहुंचे थे।
वह कोई मंत्री नहीं था, न कोई राजनयिक, न कोई बड़ा उद्योगपति। वह था- एक साधारण किसान।
वही किसान, जिसने एक भारतीय सैनिक के रूप में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हजारों किलोमीटर दूर युद्धभूमि में सोवियत रेड आर्मी तक हथियार, गोला-बारूद और रसद पहुंचाकर नाजी जर्मनी के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। उसके साहस को सोवियत संघ ने अपने प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द रेड स्टार’ से नवाजा था। तीन दशक बाद भी रूस उसे भूला नहीं था। यही इस कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू है।
दरअसल, भारत और रूस की दोस्ती केवल सरकारों, रक्षा समझौतों और कूटनीति से नहीं बनी। उसकी नींव उन गुमनाम सैनिकों ने भी रखी है, जिनके नाम इतिहास की किताबों में शायद बड़े अक्षरों में नहीं लिखे गए, लेकिन जिनकी बहादुरी दोनों देशों के रिश्तों की बुनियाद बन गई। बड़ालू के नायब सूबेदार गजेंद्र सिंह चंद उन्हीं अनदेखे नायकों में से एक थे।

वो जज़्बा, जिसके लिए मिला रूस का सैन्य सम्मान
1942 में पूरी दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की आग में झुलस रही थी। नाजी जर्मनी की सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। उसी समय रॉयल इंडियन आर्मी सप्लाई कोर (RIASC), जिसे अभी इंडियन आर्मी सर्विस कोर (ASC) नाम से जाना जाता है, के जवान गजेंद्र सिंह चंद की तैनाती इराक के बसरा और बाद में खानाकिन में हुई।
उनका काम बंदूक उठाकर मोर्चे पर लड़ना नहीं था बल्कि उससे भी अधिक जोखिम भरा था। छह टन भारी ट्रकों में हथियार, गोला-बारूद, राशन और सैन्य सामग्री लेकर ईरान के रास्ते सोवियत संघ की ओर बढ़ना था। तपते रेगिस्तान, बर्फीले पहाड़ी दर्रे, दुश्मन के हमले और हर मोड़ पर मौत का खतरा।
प्रसिद्ध रूसी लेखक और बुद्धिजीवी लियोनिद मित्रोखिन ने अपनी किताब ‘फ्रेंड्स ऑफ सोवियत यूनियन’ में गजेंद्र से अपनी बातचीत के बारे में भी लिखा है। बकौल गजेंद्र, ‘हमें बताया गया था कि अगर रूसी मोर्चा टूट गया, तो दुश्मन भारत की ओर बढ़ सकता है। इसलिए यह सिर्फ रूस की नहीं, भारत की सुरक्षा की भी लड़ाई थी।’
उनके लिए यह सिर्फ ड्यूटी नहीं थी। यह फासीवाद के खिलाफ इंसानियत की लड़ाई थी। मौत सामने खड़ी थी लेकिन उन्होंने घर लौटने से इनकार कर दिया।
1943 की एक रात। अंधेरे में युद्ध सामग्री उतारी जा रही थी। अचानक दुश्मन की संगीन (बंदूक/राइफल के आगे लगी लंबी छुरी) उनकी बाईं जांघ में धंस गई। उन्हें बसरा के सैन्य अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने सलाह दी कि इलाज के लिए भारत भेज दिया जाए लेकिन गजेंद्र सिंह ने साफ शब्दों में मना कर दिया।
‘मेरे साथी मोर्चे पर हैं। ऐसे समय मैं उन्हें छोड़कर घर नहीं जा सकता। ठीक होते ही वापस अपनी यूनिट में लौटूंगा।’
24 दिन अस्पताल में रहने के बाद वह फिर उसी खतरनाक रास्ते पर लौट गए। इसी जज़्बे की बदौलत उन्हें रूस के एक प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान से नवाजा गया।
दूसरा विश्वयुद्ध सिर्फ मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों की परीक्षा नहीं ले रहा था, उससे कहीं बड़ी परीक्षा उन परिवारों की थी, जो हर दिन किसी चिट्ठी, किसी खबर या किसी दस्तक का इंतजार करते थे। गजेंद्र सिंह चंद का परिवार भी उन्हीं में से एक था।
RT हिंदी गजेंद्र सिंह के परिवार तक पहुंचा, उनके पोते कमलेश चन्द से बात की। वह बताते हैं कि उन्होंने अपने दादा को कभी देखा ही नहीं। उनकी पहचान सिर्फ उन किस्सों से बनी, जो पिता, चाचा और गांव के बुजुर्ग सुनाया करते।

जब परिवार ने मान लिया मृत, पत्नी जीने लगी विधवा का जीवन
युद्ध के दौरान छह-सात वर्षों तक गजेंद्र सिंह की कोई खबर घर नहीं पहुंची। उस दौर में न मोबाइल थे, न नियमित डाक व्यवस्था। धीरे-धीरे परिवार ने उम्मीद छोड़ दी और उन्हें मृत मान लिया गया। घर में उनका श्राद्ध कर दिया गया। उनकी पत्नी ने विधवा का जीवन स्वीकार कर लिया, लेकिन इतिहास ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था।
1946 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और गजेंद्र सिंह अपने साथियों के साथ गांव लौटे, तब उन्हें देखकर परिवार भी पहचान नहीं पाया। वर्षों की लड़ाई, मुश्किल हालात और वक्त ने उनका चेहरा पूरी तरह बदल दिया था।
युद्ध से लौटने के बाद भी गजेंद्र सिंह ने सेना की सेवा जारी रखी। अपने अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर वह नायब सूबेदार बने और 1960 में सेवानिवृत्त हुए।
सेना से रिटायर होकर उन्होंने गांव की राजनीति में भी कदम रखा। प्रधान का चुनाव लड़ा और जीते। इसके बाद उन्होंने एक पुल निर्माण का ठेका भी लिया, लेकिन यह फैसला आर्थिक रूप से भारी पड़ गया। काम में नुकसान हुआ और कभी युद्ध का सम्मानित नायक आर्थिक तंगी से जूझने लगा। गांव के लिए वह अब एक साधारण किसान थे। लेकिन दुनिया के दूसरे छोर पर, सोवियत संघ उन्हें अब भी भूला नहीं था।

उस दिन रूस अपने नायक की तलाश में पहाड़ पहुंचा था
1975 में उस दिन पिथौरागढ़ जिले का छोटा-सा गांव बड़ालू अचानक सुर्खियों में आ गया था। दूरदराज के गांवों में खबर फैल चुकी थी कि कुछ विदेशी मेहमान एक बुजुर्ग किसान से मिलने आ रहे हैं। वे कोई पर्यटक नहीं थे। उनमें सोवियत संघ के राजदूत बी.एस. माल्तसेव और प्रसिद्ध रूसी लेखक लियोनिद मित्रोखिन शामिल थे, जो उस भारतीय सैनिक की तलाश में दिल्ली से पांच सौ किलोमीटर से अधिक का कठिन सफर तय करके यहां पहुंचे थे, जिसने तीन दशक पहले रेड आर्मी की मदद में अपनी जान दांव पर लगा दी थी।
दिन-रात ट्रकों के काफिले के साथ चले गजेंद्र
मित्रोखिन ने अपनी किताब ‘Friends of Soviet Union’ में इस यात्रा का बेहद मार्मिक वर्णन किया है। वह लिखते हैं, ‘दिल्ली से पिथौरागढ़ तक का रास्ता जगह-जगह टूटा हुआ और बेहद कठिन था, लेकिन यह यात्रा उन्हें इसलिए आसान लगी क्योंकि उन्हें बार-बार उन भारतीय सैनिकों की याद आ रही थी, जिन्होंने 1942 से 1944 के बीच इससे कहीं अधिक दुर्गम और जानलेवा रास्तों से होकर काकेशस मोर्चे तक युद्ध सामग्री पहुंचाई थी।’
वह रास्ता लगभग तीन हजार मील लंबा था। तपते रेगिस्तान, बर्फ से ढके सात हजार फीट ऊंचे दर्रे, गहरी घाटियां और ऐसा मौसम, जहां तापमान कभी 130 फॉरेनहाइट तक पहुंच जाता तो कभी शून्य से 40 डिग्री नीचे चला जाता। इन्हीं रास्तों पर गजेंद्र सिंह और सूबेदार नारायण राव निक्कम दिन-रात ट्रकों के काफिलों के साथ चलते रहे, ताकि हथियार और रसद समय पर सोवियत रेड आर्मी तक पहुंच सके।
मित्रोखिन लिखते हैं कि ‘जब वे बड़ालू पहुंचे, तो उनके सामने कोई युद्ध नायक जैसी छवि नहीं थी। गेहूं की फसल कट चुकी थी। घर-आंगन में हर तरफ गेहूं की बालियां फैली थीं और उम्रदराज गजेंद्र सिंह हाथ में मूसल लिए गेहूं कूट रहे थे। युद्ध के मैदान का वह नायक अब पहाड़ की मिट्टी में घुल-मिलकर एक सामान्य ग्रामीण की जिंदगी जी रहा था।
लेकिन जैसे ही गांव में खबर फैली कि रूस के राजदूत उनके घर आए हैं, पूरा बड़ालू मानो मेले में बदल गया।
गांव में खबर फैली थी, ‘अंग्रेज’ आए हैं
उस दिन के सुने-सुनाए किस्सों को याद करते हुए गजेंद्र सिंह के पोते कमलेश चंद मुस्कुराते हैं।
“हमारे गांव में लोगों ने कहा कि कुछ ‘अंग्रेज’ आए हैं। उस समय गांव वालों के लिए हर विदेशी अंग्रेज ही होता था।” कमलेश बताते हैं कि राजदूत के साथ आए दल में एक व्यक्ति के हाथ में कैमरा था। उस दौर में कैमरा गांव के लोगों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था।
“उन्होंने पूरे गांव की तस्वीरें खींचीं। शायद पहली बार गांव के लोगों ने कैमरा इतने करीब से देखा था। लगभग हर परिवार की फोटो ली गई थी। आज भी कई घरों में वो तस्वीरें संभालकर रखी हुई हैं।” एक छोटे से पहाड़ी गांव के लिए वह सिर्फ एक राजनयिक यात्रा नहीं थी, बल्कि ऐसी याद थी, जिसे पीढ़ियां आज भी सुनाती हैं।

‘रेड स्टार’ को जिंदगी का सबसे बड़ा सम्मान बताया
गजेंद्र सिंह अक्सर कहा करते थे कि सेना में उन्हें छह पदक मिले, लेकिन ‘ऑर्डर ऑफ द रेड स्टार’ उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान था। वह याद करते थे, ‘1944 में इटली में हमारी यूनिट थी, जब कमांडिंग ऑफिसर ने बताया कि सोवियत सरकार ने मुझे और सूबेदार एन.आर. निक्कम को ‘ऑर्डर ऑफ द रेड स्टार’ से सम्मानित करने का फैसला किया है। उस दिन जितना गर्व महसूस हुआ, वैसा फिर कभी नहीं हुआ।’ तीस साल बाद जब सोवियत दूतावास से उन्हें सम्मान समारोह का निमंत्रण मिला, तो वैसा ही गर्व एक बार फिर से महसूस हुआ।
वह कहते थे, ‘आज भी मुझे यही लगता है कि दुनिया ने इतने वर्षों बाद भी मेरे छोटे-से योगदान को याद रखा। यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है। मैंने सिर्फ एक सैनिक का कर्तव्य निभाया था। युद्ध के समय वही कर्तव्य सबसे बड़ा धर्म बन जाता है।’ उनके लिए यह कोई असाधारण उपलब्धि नहीं थी।

2 मई को बड़ालू पहुंचने के कुछ दिन बाद, 9 मई 1975 को नई दिल्ली स्थित सोवियत दूतावास में गजेंद्र सिंह चंद और सूबेदार नारायण राव निक्कम के सम्मान में विशेष समारोह आयोजित किया गया। रूसी लेखक लियोनिद मित्रोखिन ने अपनी किताब में लिखा है कि उस समारोह का सबसे बड़ा आकर्षण गजेंद्र सिंह चंद थे- वही भारतीय सैनिक, जिन्हें 1944 में सोवियत संघ ने अपने प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द रेड स्टार’ से नवाजा था।
सम्मान समारोह खत्म हुआ। समाचारों की सुर्खियां भी धीरे-धीरे फीकी पड़ गईं। गजेंद्र सिंह चंद फिर अपने गांव लौट आए। उन्होंने बाकी जीवन उसी सादगी से बिताया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। 1988 में बड़ालू में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
रूस ने भुलाया नहीं
कमलेश चंद बताते हैं कि 2020 में उनके परिवार को रूस की ओर से Victory Day Parade में शामिल होने का निमंत्रण मिला था। परिवार के अधिकांश सदस्य नहीं जा सके, लेकिन वह और उनके पिता जंग बहादुर चंद (सीमा सुरक्षा बल के पूर्व जवान) जाने की तैयारी कर चुके थे। बाद में किसी कारणवश वे नहीं जा पाए। भारतीय सेना के कुछ अफसर रूस गए थे। फिर 2022 में भारतीय सेना ने दोबारा परिवार से संपर्क किया।
इस बार आग्रह था कि गजेंद्र सिंह चंद का ‘ऑर्डर ऑफ द रेड स्टार’ पदक Army Service Corps (ASC) के बेंगलुरु स्थित संग्रहालय में सुरक्षित रखा जाए।
शुरुआत में परिवार इसके लिए तैयार नहीं था। लेकिन बाद में भारतीय सेना और रूस की वायुसेना के अधिकारियों के अनुरोध पर उन्होंने यह ऐतिहासिक पदक सौंप दिया। विजय दिवस समारोह के दौरान इसे रूस में प्रदर्शित कर उस भारतीय सैनिक को श्रद्धांजलि दी गई, जिसने युद्ध के सबसे कठिन दौर में रेड आर्मी का साथ निभाया था। आज वह पदक बेंगलुरु स्थित ASC Museum में है।

रूसी सैनिकों की एक छाप, जो जिंदगी भर साथ रही
लियोनिद मित्रोखिन से बातचीत में गजेंद्र सिंह ने कहा था कि रूसी सैनिकों ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। भाषा अलग थी। बातचीत ईरानी दुभाषियों के माध्यम से होती थी, लेकिन उन्हें हमेशा लगता था कि सैनिकों के चेहरे ही सबसे बड़ी भाषा होते हैं। ‘उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था, अपनापन था और अपनी मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने का जज़्बा था।’ तबरेज (ईरान) में उन्होंने पहली बार महिलाओं को हथियारों के साथ चौकियों पर पहरा देते देखा।
‘वे मुझे साधारण महिलाएं नहीं लगीं। वे साक्षात दुर्गा का रूप थीं। उसी दिन मुझे विश्वास हो गया कि जिस देश की महिलाएं भी मातृभूमि की रक्षा के लिए हथियार उठा लें, उस देश को कोई ताकत हरा नहीं सकती।’