एवरेस्ट के चर्चित ग्रीन बूट की अनसुनी कहानी, जो 30 साल से बर्फ में दबा है

एवरेस्ट के चर्चित ग्रीन बूट की अनसुनी कहानी, जो 30 साल से बर्फ में दबा है

ग्रीन बूट्स का शव पिछले 30 सालों से एवरेस्ट के डेथ जोन में पड़ा है। अबतक माना जाता था कि ये शव आईटीबीपी के हेड कॉन्स्टेबल त्सेवांग पल्जोर का है लेकिन कुछ समय पहले ही पता चला कि ये शव लांस नाइक दोरजे मोरुप का है। आईटीबीपी अब इस शव को नीचे लाने की तैयारी में है।
राधाराधा Published

मई 22, साल 2013! बीस साल की पर्वतारोही प्रियंका मोहिते और उनकी टीम एवरेस्ट की चोटी चढ़ रही थी। उनकी मंजिल अभी 400 मीटर दूर थी। तभी प्रियंका की नजर एक डेड बॉडी पर पड़ी। साथ चल रहे शेरपा बोल पड़े कि इसी सीजन में चढ़ाई करने आया था और कल ही इसकी मौत हुई है। प्रियंका ने उस दिन एवरेस्ट पर जो डेड बॉडी देखी, वो इकलौती नहीं थी। एवरेस्ट पर ऐसी सैकड़ों डेड बॉडीज बर्फ में दफन हैं, जिन्हें वापस लाना बहुत मुश्किल है। इन्हीं में से एक है एवरेस्ट की सबसे मशहूर डेड बॉडी- ‘ग्रीन बूट्स।’

मई 1996 में एवरेस्ट पर आए तूफान में आठ पर्वतारोहियों की मौत हुई थी, जिनमें भारत की इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) के तीन जवान भी शामिल थे। उन्हीं में से एक थे हेड कॉन्स्टेबल त्सेवांग पल्जोर, जो चढ़ाई के दौरान हरे रंग के कोफलाख बूट्स पहने हुए थे।

10 मई 1996 को पल्जोर और उनकी टीम के दो और साथी जिनमें से एक का नाम दोरजे मोरुप था, उतरते वक्त एक भयंकर बर्फीले तूफान में फंस गए। तीनों पर्वतारोही पूरी रात समुद्र तल से 8,500 मीटर यानी करीब 27,900 फीट की ऊंचाई पर ‘डेथ जोन’ में फंसे रहे।

एवरेस्ट का डेथ जोन 8,000 मीटर की ऊंचाई से शुरू होता है। यहां हवा में समुद्र तल के मुकाबले सिर्फ एक-तिहाई ऑक्सीजन होती है, इसलिए शरीर खुद को इस माहौल के अनुसार ढाल नहीं पाता और यहां हर पल जान का खतरा बना रहता है। पर्वतारोही यहां जितनी जल्दी हो सके, चढ़ाई पूरी कर नीचे लौटने की कोशिश करते हैं।

एवरेस्ट का डेथ जोन समुद्र तल से 8,000 मीटर की ऊंचाई से शुरू होता है। Photo: RT Hindi/ Special ArrangementRT

30 साल पहले त्सेवांग पल्जोर अपने दो अन्य साथियों के साथ इसी डेथ जोन में फंस गए थे। उनके पास न कोई सुरक्षित ठिकाना था, न ही बचने का कोई रास्ता।

अगली सुबह पहुंची जापानी टीम लेकिन…

पर्वतारोही और बीएसएफ के एक अधिकारी, जिन्हें मीडिया से बात करने की इजाजत नहीं थी, ने नाम न छापने की शर्त पर आरटी हिंदी को बताया कि अगली सुबह जापान की एक टीम उसी रास्ते से एवरेस्ट की चोटी की तरफ गई थी।

उन्होंने बताया, 'मेरे एवरेस्ट मिशन में एक ऐसा शेरपा भी था जो उस समय जापानी टीम के साथ था। उसने मुझे बताया था कि रात को आए तूफान में फंसे लोग जिंदा थे लेकिन भीषण ठंड की वजह से उनके हाथ-पैर बुरी तरह जम चुके थे और उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।'

अधिकारी ने आगे बताया, 'मेरे शेरपा ने ग्रीन बूट्स की पूरी कहानी मुझे सुनाई थी। जब जापानी टीम उन तीनोंं के पास पहुंची तो उनकी हालत बहुत खराब थी। एक को तो हैल्युशिनेशन हो गया था यानी उसे पता ही नहीं था कि वो कौन है, क्या चल रहा है उसके आसपास। और जिस ग्रीन बूट्स की बात हो रही है, वो तो मरने ही वाला था, मेरे शेरपा ने उसे पानी दिया था।’

शेरपा ने बताया था कि उन तीन लोगों में से एक तो कैंप 4 के पास पहुंच गया था। कैंप 4 समुद्र तल से 8,300 मीटर की ऊंचाई पर है।

बीएसएफ अधिकारी के मुताबिक, 'शेरपा का कहना था कि वो कैंप 4 के पास पहुंचा था और वहीं बैठा हुआ था। जब उसने हमें दूर से आते देखा तो चिल्लाते हुए खाई में नीचे छलांग लगा दी। उसे बुरी तरह हैल्युशिनेशन हो रखा था।’

जापानी टीम ने नीचे कैंप में आकर तीनों की हालत की खबर दी थी। तब इस बात को लेकर बड़ा विवाद हुआ था कि जापानी टीम ने तीन भारतीयों की मदद क्यों नहीं की।

कुछ समय बाद, दूसरे पर्वतारोहियों को उसी रास्ते के किनारे एक छोटी सी गुफा में जमी हुई डेड बॉडी दिखी, जिसके पैरों में चमकीले हरे रंग के बूट थे। यही बॉडी आगे चलकर ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से मशहूर हुई।

ग्रीन बूट एवरेस्ट पर लैंडमार्क बन गया

ग्रीन बूट्स नॉर्थ-ईस्ट रिज रूट पर एक ऐसा लैंडमार्क बन गया, जिसे तिब्बत की ओर से चढ़ने वाला हर पर्वतारोही पिछले करीब दो दशकों तक पार करता रहा। यह गुफा समुद्र तल से 8,500 मीटर यानी करीब 27,900 फीट की ऊंचाई पर है, जो डेथ जोन के भीतर आती है।

तिब्बत की तरफ से एवरेस्ट की चोटी तक जाने का रास्ताRT© rt

एवरेस्ट फतह करने वाले लेखक जॉन क्राकाउर ने अपनी बेस्टसेलर किताब ‘इनटू थिन एयर’ में ग्रीन बूट्स के बारे में लिखा है, ‘डेड बॉडी ऐसे पड़ी हुई थी मानो कोई अपने पैरों को मोड़े झपकी ले रहा हो। उसने अपने चेहरे को एक लाल फ्लीस से ढक रखा था। जब वो माइनस 30 डिग्री में ठंड और तूफानी हवाओं के आगे हार गया होगा, तब शायद उसने आखिरी काम यही किया होगा।’

ग्रीन बूट्स का शव बरसों तक एवरेस्ट पर ‘मार्कर’ की तरह पड़ा रहा। 2014 में एक चाइनीज एक्सपेडिशन टीम ने इस बॉडी को वहां से हटाकर कम दिखने वाली जगह पर शिफ्ट कर दिया।

दिलचस्प बात ये है कि हाल ही में ITBP ने डीएनए टेस्टिंग के जरिए इस बॉडी की पहचान त्सेवांग पल्जोर की जगह दोरजे मोरूप के रूप में की है। यानी तीन दशकों से जिसे दुनिया त्सेवांग पल्जोर मानती आई थी, असल में वो कोई और था। अब ITBP ने अक्टूबर 2026 तक इस बॉडी को नीचे लाने की योजना बनाई है।

(दोरजे मोरूप की फाइल फोटो)

75 साल की पत्नी बोलीं- उन्हें देखे बिना आखिरी सांस नहीं लूंगी

जब यह खबर दोरजे मोरूप की पत्नी कोंचोक यांगस्किट तक पहुंची तो उनका 30 साल पुराना जख्म हरा हो गया. 75 साल की कोंचोक अब सुन नहीं पातीं और पति के पैसों से गुजर-बसर कर रही हैं।

उनके बेटे फुंचसोग दोरजे भारतीय सेना में हैं और उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि जबसे उनकी मां ने पिता के बारे में सुना है, वह लगातार रो रही हैं।

उन्होंने कागज पर अपनी बात लिखकर बेटे को दी जिसमें उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा लिखी है, ‘मैं उन्हें एक बार देखना चाहती हूं। उन्हें देखे बिना मैं आखिरी सांस नहीं लूंगी।’

ग्रीन बूट्स को वापस लाना कितना मुश्किल है?

एवरेस्ट की चोटी तक दो रास्तों से जाया जाता है, एक तिब्बत की तरफ से जिसे नॉर्थ-ईस्ट रिज कहा जाता है और दूसरा नेपाल वाला रास्ता, जिसे साउथ कोल कहा जाता है। तिब्बत की तरफ से एवरेस्ट तक जाने वाला रास्ता बेहद खतरनाक माना जाता है क्योंकि वहां पथरीली चट्टानों की चढ़ाई बहुत ज्यादा है। ऐसे में ग्रीन बूट्स को वापस लाना मुश्किल तो है, लेकिन कितना मुश्किल?

नेपाल के दिग्गज पर्वतारोही और गाइड कामी रीता शेरपा ने एवरेस्ट पर 32 बार सफलतापूर्वक चढ़ाई की है और इस कारनामे के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है। ‘एवरेस्ट मैन’ के नाम से मशहूर रीता शेरपा तिब्बत की तरफ से चार-पांच बार चढ़ाई के लिए गए हैं और एक बार चोटी तक भी पहुंचे हैं।

वो कहते हैं, ‘तिब्बत की तरफ से डेड बॉडी को नीचे लाना बहुत-बहुत मुश्किल होता है। चीन के नियंत्रण वाले इस हिस्से में एवरेस्ट पर चढ़ाई के नियम भी बहुत सख्त हैं। इस मिशन में उन्हें नेपाल के शेरपा, उनकी टीम को लाने की इजाजत नहीं मिल सकेगी। सबसे बड़ी बात तो चीन की तरफ से परमिट मिलना ही मुश्किल होता है।’

कामी रीता शेरपा का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। Photo: @kamiritasherpa/Instagram

चीन से परमिट लेना और मौसम की दिक्कतें

चीन ने इस एवरेस्ट सीजन (अप्रैल-मई तक का समय जब एवरेस्ट पर चढ़ाई का मौसम होता है) अपने तरफ के रास्ते को विदेशियों के लिए बंद कर दिया था। ऐसे में ऑफ सीजन में चीन से परमिट लेना कितना मुश्किल होने वाला है?

8,000 मीटर से ऊंची पांच चोटियां फतह करने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकीं प्रियंका मोहिते बताती हैं, ‘ग्रीन बूट्स को नीचे लाने के लिए तिब्बत की तरफ से जाना होगा, जहां पूरा कंट्रोल चीन का है। इस अभियान के सबसे मुश्किल हिस्सों में से एक है चीन से परमिशन लेना ताकि रास्ता खुल सके। अगर भारत चीन से परमिशन ले भी लेता है तो ऑफ सीजन में इस मिशन को पूरा करना मेरे हिसाब से बहुत मुश्किल होने वाला है।’

वो आगे कहती हैं, ‘मुझे नहीं पता वो अक्टूबर तक यह मिशन पूरा करने का क्यों सोच रहे हैं क्योंकि अभी से लेकर अक्टूबर तक का समय एवरेस्ट पर जाने के लिहाज से बिल्कुल भी सही नहीं है। मॉनसून में एवरेस्ट पर मौसम बहुत खतरनाक होता है और अक्टूबर तक सर्दियां शुरू हो जाएंगी वहां। मार्च, अप्रैल या मई में मौसम बेहतर होता है और रेस्क्यू मिशन के लिए वही महीने सही माने जाते हैं।’

एवरेस्ट के शिखर पर प्रियंका मोहिते। Photo- RT Hindi, Special ArrangementRT© rt

हालांकि, सितंबर के अंत से अक्टूबर की शुरुआत के बीच चढ़ाई के लिए एक छोटी विंडो मिलती है। इस दौरान कुछ रेस्क्यू मिशन किए जाते हैं और अगर तिब्बत की तरफ से भारत के लिए एवरेस्ट का रास्ता खुल जाए तो ग्रीन बूट्स को वापस लाया जा सकता है।

लेकिन इस दौरान मौसम बेहद अनिश्चित हो सकता है। कभी भी मौसम बिगड़ सकता है और तापमान तेजी से नीचे जाता है। ऐसे मौसम में अगर कोई रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जाए तो यह जीवित लोगों यानी शेरपाओं के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।

30 साल से बर्फ में धंसे शव का वजन कितना होगा?

नेपाल स्थित मकालू एडवेंचर इस तरह के कई रेस्क्यू अभियानों का हिस्सा रहा है। इसी साल जनवरी में इसके शेरपाओं ने नेपाल के बेहद सम्मानित पर्वतारोही और ट्रैकिंग गाइड फुर्बा ओंगेल शेरपा के शव को माउंट मकालू से रेस्क्यू किया था।

इसके अध्यक्ष और संस्थापक मोहन लमसाल ने आरटी हिंदी को बताया कि किसी डेड बॉडी को नीचे लाना एवरेस्ट पर सबसे रिस्की काम होता है। रेस्क्यू टीम को वो सभी खतरे झेलने पड़ते हैं, जिनका सामना एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पर्वतारोही करते हैं। इनमें हिमस्खलन, ऊपर से गिरती बर्फ और चट्टानें, खराब मौसम, फ्रॉस्टबाइट और ऊंचाई की वजह से होने वाली बीमारियां शामिल हैं।

मोहन लमसाल कहते हैं-

Mohan Lamsal
‘किसी भारी शव को उठाकर या रस्सियों के सहारे नीचे लाना काफी ज्यादा समय और मेहनत का काम है। कपड़े, जूते, हार्नेस, ऑक्सीजन सिलेंडर और शरीर पर जमी बर्फ की वजह से शव का वजन 150 किलो से भी ज्यादा हो सकता है।'
मोहन लमसाल
मोहन लमसाल
मकालू एडवेंचर, अध्यक्ष

वो आगे कहते हैं, 'सबसे बड़ी चिंता शेरपा टीम की सुरक्षा होती है। अगर मौसम या पहाड़ की स्थिति खतरनाक होने लगती है तो रेस्क्यू अभियान को टाल दिया जाता है या फिर पूरी तरह रद्द कर दिया जाता है। आखिर किसी एक शव को लाने के लिए और लोगों की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती।’

मोहन लमसाल के मुताबिक, ग्रीन बूट्स के शव को एवरेस्ट के ऊपरी हिस्से से नीचे लाने के लिए 6 से 8 अनुभवी शेरपाओं की टीम चाहिए होगी। इसके अलावा नीचे बने कैंपों में भी सपोर्ट स्टाफ को मदद के लिए तैयार रहना होगा जो मिशन की व्यवस्था संभालेंगे।

रेस्क्यू टीम को अपने साथ ऑक्सीजन सिलेंडर, रस्सियां और दूसरे जरूरी बचाव उपकरण भी ले जाने होंगे। वह कहते हैं, ‘बहुत सावधानी से योजना बनानी होगी क्योंकि इतनी ऊंचाई पर छोटी-सी गलती जानलेवा साबित हो सकती है।’

ग्रीन बूट्स को लाने में कितना खर्च आ सकता है?

अगर सबकुछ ठीक रहा तो ग्रीन बूट्स के शव को नीचे लाने में कितने दिन लग सकते हैं?

मोहन लमसाल बताते हैं, ‘अगर मौसम साथ दे, तो पहाड़ से शव को नीचे लाने का काम कुछ ही दिनों में पूरा हो सकता है। लेकिन उससे पहले काफी तैयारियां करनी पड़ती हैं। परमिट लेना, उपकरण जुटाना, ऑक्सीजन का इंतजाम करना, शेरपाओं की टीम तैयार करना और मौसम के अनुकूल होने का इंतजार करना। योजना बनाने से लेकर शव को वापस लाने तक पूरे अभियान में करीब 35 से 40 दिन लग सकते हैं।’

इतनी ऊंचाई से किसी डेड बॉडी को नीचे लाने में अच्छी-खासी रकम खर्च होती है। इस मिशन का खर्च कई बातों पर निर्भर करता है- जैसे शव किस जगह पर है, मौसम कैसा है, चढ़ाई का मौसम कौन-सा है, परमिट, ऑक्सीजन, जरूरी उपकरण और कितने शेरपाओं की जरूरत पड़ेगी।

मोहन लमसाल के मुताबिक, शव करीब 8,500 मीटर की ऊंचाई पर है, तो उसे नीचे लाने में लगभग एक करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है। अगर मिशन आगे चलकर मुश्किल होता है तो खर्च बढ़ भी सकता है।

RT© rt

एवरेस्ट पर पड़े हैं करीब 200 शव

ग्रीन बूट्स को वापस लाने का यह अभियान सफल होता है तो एवरेस्ट पर पड़े करीब 200 और शवों के परिवारवालों को नई उम्मीद मिल सकती है। प्रियंका मोहिते का मानना है कि भले ही ये मुश्किल और काफी खर्चीला है लेकिन एवरेस्ट पर जान गंवाने वालों को जमीन पर लाया जाना चाहिए, कम से कम उनके परिवारों के लिए।

वह कहती हैं, ‘अपना एवरेस्ट मिशन पूरा करके जब मैं काठमांडू लौटी तो मुझसे मिलने एक महिला पहुंची। उसकी गोद में चार-पांच महीने की बच्ची थी। वह मेरे पास आई और पूछने लगी कि क्या मैंने उनके पति को देखा था? वो किस हालत में थे... बार-बार वो मुझसे यही सवाल कर रही थी। उन्हें पता था कि मैं भी उसी तारीख के आसपास शिखर पर गई थी जब उनके पति गए थे। मैं उन्हें क्या जवाब देती?’

वो कहती हैं, ‘हर डेड बॉडी को एवरेस्ट की ऊंचाई से नीचे आने का हक है, मैं तो यही मानती हूं। मैंने देखा है, उन परिवारों का दर्द जिनके अपने एवरेस्ट पर गए और उन्होंने वहीं दम तोड़ दिया। ग्रीन बूट्स को भी नीचे लाया जाना चाहिए और इसलिए भी क्योंकि 30 साल बाद उसकी असली पहचान हो पाई है। उनके परिवार के लिए उन्हें नीचे जरूर लाना चाहिए।’