राष्ट्रपति भवन की छत में ऐसा क्या था कि एकटक देखते रहे ईरान के प्रेसिडेंट
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और उनके साथ भारत आया ईरानी डेलिगेशन जब राष्ट्रपति भवन पहुंचा, तो कैमरों की नजर सिर्फ मेहमानों पर नहीं थी।
पेजेश्कियान जैसे ही भारत के राष्ट्रपति भवन के एक भव्य हॉल में दाखिल हुए, उनकी नजर अचानक ऊपर उठी। वह कुछ पल के लिए वहीं रुक गए… और करीब 25 सेकेंड तक एकटक हॉल की छत को देखते रहे।
एकाएक वहां मौजूद लोगों के कैमरे भी ऊपर उठ गए।
क्लिक… क्लिक… क्लिक…
आखिर छत पर ऐसा क्या था, जिसने ईरान के राष्ट्रपति और उनके पूरे डेलिगेशन का ध्यान अपनी ओर खींच लिया?
हॉल की छत पर गढ़ी गई 200 साल पुरानी कहानी
इस सवाल का जवाब हॉल की छत पर छिपी करीब दो सदियों पुरानी कहानी में मिलता है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान 18वें BRICS समिट में हिस्सा लेने भारत आए थे। इसी दौरान 12 सितंबर को उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की।
जगह थी नई दिल्ली का रायसीना हिल स्थित राष्ट्रपति भवन।

नजर आएगी फारस की झलक, भव्यता
लेकिन पेजेश्कियान के लिए यह सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात की जगह नहीं थी। जिस हॉल में भारत और ईरान के रिश्तों की एक नई तस्वीर ली जा रही थी, उसकी छत पर दो सदियों पुराना फारस यानी आज का ईरान पहले से मौजूद था।
यह है राष्ट्रपति भवन का अशोक मंडप।

नाम भारतीय है, लेकिन इस हॉल की छत और दीवारों पर नजर डालें, तो यहां फारस की शाही और दुनिया की झलक साफ दिखाई देती है।
कभी यही जगह स्टेट बॉलरूम हुआ करती थी। आज यहां विदेशी देशों के राजदूत राष्ट्रपति के सामने अपने देश की ओर से मिला आधिकारिक नियुक्ति-पत्र सौंपते हैं- यानी वह दस्तावेज, जिसके जरिए वे भारत में अपने देश के औपचारिक प्रतिनिधि के तौर पर जिम्मेदारी संभालते हैं। राजकीय भोज से पहले विदेशी और भारतीय प्रतिनिधिमंडलों के औपचारिक परिचय की रस्म भी यहीं होती है। लेकिन अशोक मंडप की असली कहानी फर्श से नहीं, छत से शुरू होती है।

छत के बीचोबीच बनी पेंटिंग क्यों है खास?
छत के ठीक बीचोबीच चमड़े पर बनी एक विशाल पेंटिंग है। इसमें फारस के काजार वंश के दूसरे शासक फतह अली शाह काजार घोड़े पर सवार होकर शेर के शिकार के दृश्य में नजर आते हैं। उनके आसपास उनके 22 बेटे और दो सहायक भी नजर आते हैं।
करीब 5.20 मीटर लंबी और 3.56 मीटर चौड़ी यह पेंटिंग सिर्फ एक शाही पेंटिंग नहीं, बल्कि अपने समय की ईरानी सत्ता और वैभव का विजुअल दस्तावेज है।
दिलचस्प बात यह है कि फतह अली शाह ने यह पेंटिंग इंग्लैंड के जॉर्ज चतुर्थ को भेंट की थी। इसके बाद इस पेंटिंग ने एक लंबा सफर तय किया।

लंदन से भारत का सफर
ब्रिटिश शासन के दौरान वायसराय इरविन के कार्यकाल में इसे लंदन की इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी से भारत लाया गया और तत्कालीन स्टेट बॉलरूम की छत पर स्थापित कर दिया गया।
और इस पेंटिंग में एक ऐसा असर है, जिसे कमरे में खड़े होकर ही महसूस किया जा सकता है।
अशोक मंडप के किसी भी कोने से फतह अली शाह की आंखों की ओर देखिए-ऐसा लगता है जैसे उनकी नजर सीधे आप पर टिकी हो। हालांकि, इस विशाल पेंटिंग को छत के बीच अकेला छोड़ना लेडी विलिंग्डन को पसंद नहीं आया। इसके बाद इतालवी कलाकार टोमासो कोलोनैलो को बुलाया गया।

फारसी भाषा भी आएगी नजर
कोलोनैलो ने 12 भारतीय कलाकारों के साथ मिलकर पेंटिंग के आसपास पूरी छत पर जंगल की थीम को आगे बढ़ाया। छत पर चार और शिकार की पेंटिंग बनाई गई और फारसी भाषा में अभिलेख भी जोड़े गए।
दीवारों पर शाही जुलूस के दृश्य हैं। छत पर पेंटिंग सीधे बनाई गई है, जबकि दीवारों पर बड़े-बड़े कैनवास लगाए गए।
पूरे हॉल की छत और दीवारों पर यह काम जून 1932 में शुरू हुआ और अक्टूबर 1933 में पूरा हुआ। कोलोनैलो ने इस फ्रेस्को पर कहीं अपना हस्ताक्षर भी छोड़ा है, जिसे आज भी गेस्ट पेंटिंग में खोज सकते हैं।
अशोक मंडप की कहानी सिर्फ छत तक सीमित नहीं
यहां छह बेल्जियन कांच के झूमर हैं। संगमरमर की दीवारें और पिलर इस पूरे हॉल को एक अलग रंग देते हैं, जबकि फर्श और छत की समृद्ध सजावट इसकी भव्यता को और बढ़ाती है।
फारसी संस्कृति की मौजूदगी सिर्फ छत पर ही खत्म नहीं होती।

फारसी कवि निजामी गंजवी वो पेंटिग
दक्षिणी मेहराब के पीछे फारसी कवि निजामी गंजवी की ऑयल पेंटिंग है। 12वीं सदी के इस कवि को प्रेम और वीरता की कहानियां लिखने वाले फारसी साहित्य के बड़े कवियों में गिना जाता है
उत्तरी मेहराब के पीछे पारंपरिक फारसी वेशभूषा में एक महिला की ऑयल पेंटिंग है। उसके हाथ में एक सजावटी बर्तन है और सिर पर मुकुट है।
While attending the BRICS summit in India, President @drpezeshkian toured the Iranian Hall, a historic chamber dating back to the reign of Fath-Ali Shah Qajar, located within India's Presidential Palace. pic.twitter.com/a2e39CTz5h
— IRNA News Agency ☫ (@IrnaEnglish) September 12, 2026
दरअसल, जिस हॉल को आज अशोक मंडप कहा जाता है, वह कभी स्टेट बॉलरूम था। इसकी छत पर मौजूद काजार शासक फतह अली शाह की विशाल फारसी पेंटिंग और हॉल में मौजूद फारसी कला की वजह से इसे ईरानी मीडिया में ‘Iranian Hall’ भी कहा जा रहा है, हालांकि राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक इसका नाम अशोक मंडप ही है।”

32 मीटर लंबा फारसी शैली का कालीन
हॉल में इसके अलावा फारसी शैली का विशाल कालीन है- करीब 32 मीटर लंबा और 20 मीटर चौड़ा। इसे तैयार करने में कथित तौर पर 500 बुनकरों ने दो साल काम किया था।
यानी अशोक मंडप सिर्फ राष्ट्रपति भवन का एक भव्य हॉल नहीं है।
यह एक ऐसी जगह है, जहां छत पर फारस का शाही दृश्य है, दीवारों पर राजसी जुलूस हैं, मेहराबों के पीछे फारसी साहित्य और संस्कृति की झलक है।