
400 साल पहले अस्त्राखान में कैसे बसा भारतीयों का संसार? कहानी रूस के 'इंडियन स्ट्रीट' की
वोल्गा नदी जब कैस्पियन सागर में उतरने से पहले सैकड़ों धाराओं में बंटती है, तो उसके डेल्टा में एक शहर उभरता है- अस्त्राखान। आज रूस के दक्षिण में बसा यह शहर अपने बंदरगाह, मछली बाजार और कैस्पियन सागर के रास्तों के लिए जाना जाता है। लेकिन कभी यही शहर एक ऐसी कहानी का गवाह था, जिसके किरदार रूस के नहीं, हजारों किलोमीटर दूर भारत से आए व्यापारी थे।
सदियों पहले, जब न रेल थी, न हवाई जहाज और न ही आज जैसी सीमाओं के पार आसान आवाजाही- भारत के व्यापारी लंबी और मुश्किल कारोबारी राहें पार करते हुए वोल्गा नदी के किनारे तक पहुंचे। मारवाड़ी, सिंधी और पंजाबी कारोबारी यहां आए, बसे और धीरे-धीरे उन्होंने अपना ऐसा व्यापारिक संसार खड़ा कर लिया कि अस्त्राखान की पहचान रूस में भारतीय कारोबारियों की एक अहम मंजिल के रूप में बन गई।
आज उन भारतीय व्यापारियों की मौजूदगी के निशान इतिहास की किताबों, पुराने अभिलेखों और शहर की कुछ इमारतों में मिलते हैं। लेकिन भारत से इतनी दूर रूस के इस शहर तक ये व्यापारी पहुंचे कैसे? उन्होंने वहां क्या कारोबार किया? और आखिर ऐसा क्या था अस्त्राखान में, जिसने भारतीयों की कई पीढ़ियों को अपने यहां रोक लिया?
ये कहानी है वोल्गा के किनारे रचे गए भारत और रूस के उस रिश्ते की, जिसकी नींव आधुनिक कूटनीति से सदियों पहले व्यापार के रास्ते रखी गई थी।
अस्त्राखान और भारतीय व्यापारियों की आमद
इतिहासकार स्टीफन फ्रेडरिक डेल (Stephen Frederic Dale) ने अपनी किताब Indian Merchants and Eurasian Trade 1600–1750 में इस भारतीय समुदाय और यूरेशियाई व्यापार में उनकी भूमिका का विस्तार से जिक्र किया है। अस्त्राखान में मौजूद यह समुदाय दरअसल उस बड़े भारतीय व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा था, जो उस दौर में कंधार, इस्फहान, बुखारा और मध्य एशिया के दूसरे शहरों तक फैला हुआ था।
RT हिंदी ने यह जानने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के महाराजा अग्रसेन कॉलेज के प्रिंसिपल और अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट प्रोफेसर संजीव तिवारी से बात की।
प्रोफेसर संजीव तिवारी बताते हैं कि अस्त्राखान में भारतीय व्यापारियों की संगठित उपस्थिति को मुख्यतः 17वीं शताब्दी की शुरुआत और मध्य से जोड़कर देखा जाता है। चेक इतिहासकार मिचेल वानर के अध्ययन में 1636 को भारतीय व्यापारिक समुदाय के स्पष्ट प्रमाणों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
इतिहासकार स्टीफन डेल का तर्क है कि उत्तर भारत के व्यापारी परिवारों ने 16वीं और 17वीं शताब्दी में अपने व्यापारिक एजेंटों को बहुत दूर-दराज के बाजारों तक भेजना शुरू किया। इस नेटवर्क में ईरान, मध्य एशिया, काकेशस और रूस तक के बाजार शामिल थे।
इतिहासकार स्कॉट लेवी (Scott Levi) भी भारतीय व्यापारिक समुदाय को इसी व्यापक ट्रांस रीजनल नेटवर्क के रूप में देखते हैं, जिसमें व्यापारी केवल वस्तुओं की खरीद-बिक्री नहीं करते थे, बल्कि क्रेडिट मनी-चेंजिंग और फाइनेंसिंग में भी सक्रिय थे।
ऐसे में अस्त्राखान में भारतीयों की उपस्थिति को किसी अचानक हुए प्रवासन की तरह नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिमी भारतीय व्यापारिक नेटवर्क के धीरे-धीरे उत्तर की ओर विस्तार के रूप में समझना अधिक सही कहा जा सकता है।
अस्त्राखान का भूगोल क्यों खास?
भारत से हजारों किलोमीटर दूर अस्त्राखान ही भारतीय व्यापारियों के लिए इतना महत्वपूर्ण केन्द्र क्यों बना? इस सवाल का जवाब का छिपा है अस्त्राखान के भूगोल में।
वोल्गा के किनारे हिंदुस्तानी बाजार
भारत और रूस के बीच अस्त्राखान के रास्ते होने वाला व्यापार इतना महत्वपूर्ण माना जाता था कि 20 मई 1647 को रूसी सम्राट ने एक फरमान जारी करके रूस में रह रहे भारतीय व्यापारियों की व्यक्तिगत और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी दी। बाद में 1722 में पीटर द ग्रेट ने भी इस सुरक्षा व्यवस्था की पुष्टि की।
रूसी प्रशासन भारतीय कारोबारियों को विशेष सुविधाएं भी देता था। 18वीं सदी के मध्य तक भारतीय व्यापारियों को इंडियन ट्रेडिंग कंपाउंड में दुकान के लिए सालाना केवल 12 रूबल किराया देना पड़ता था और उन्हें कई करों व शुल्कों से छूट मिली हुई थी। ये सिर्फ दुकानें नहीं थीं। यह एक ऐसा व्यापारिक परिसर था जहां भारत, मध्य एशिया और रूस की व्यापारिक दुनिया एक-दूसरे से मिलती थी।
भारतीय व्यापारी क्या बेचते थे?
अस्त्राखान कस्टम्स के 1773 के दस्तावेजों से पता चलता है कि भारतीय व्यापारी वहां मुख्य रूप से रेशम और कपड़े, आभूषण, मोती, चावल, अगरबत्ती और मसालों का व्यापार किया करते थे। समय के साथ ये व्यापारिक रिश्ते सिर्फ सामान के लेन-देन तक सीमित नहीं रहे। भारतीय व्यापारी सिर्फ माल बेचने वाले कारोबारी नहीं थे। पुराने रूसी अभिलेखों में भारतीय कारीगरों और मजदूरों का भी उल्लेख मिलता है।
अस्त्राखान की ‘इंडियन स्ट्रीट’
आज अस्त्राखान की Volodarskogo Street पर मौजूद एक पुरानी इमारत को इंडियन ट्रेड कंपाउंड (Indian Trade Compound) के नाम से जाना जाता है। इसकी कहानी 17वीं सदी तक जाती है। बाद में 1809 में इसे शास्त्रीय शैली में दोबारा बनाया गया था।
कभी इस इलाके की पहचान इतनी मजबूत थी कि सड़क को ही “इंडियन स्ट्रीट” कहा जाता था। अस्त्राखान में भारतीय व्यापारियों का संगठित परिसर उनकी स्थायी उपस्थिति का महत्वपूर्ण प्रमाण है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह परिसर केवल आर्थिक सुविधा नहीं था। ऐसे स्थान डायस्पोरा कम्युनिटी के लिए सामाजिक सुरक्षा, धार्मिक पहचान और पारिवारिक नेटवर्क बनाए रखने का माध्यम भी होते थे।

रूसी लेखक निकोले नेपोम्न्याश्ची ने इस पुराने भारतीय बाजार की तस्वीर खींची थी। उन्होंने लिखा था कि- यहां की गलियां स्थानीय लोगों को एक बिल्कुल अलग दुनिया में ले जाती थीं, जहां अगरबत्ती और मसालों की खुशबू, रेशम, सोने और कीमती पत्थरों की चमक नजर आती थी।
यानी वोल्गा के किनारे बसे इस रूसी शहर में कभी ऐसी गली थी, जहां भारत की व्यापारिक संस्कृति की झलक मिलती थी।
अस्त्राखान में गाय की होती थी पूजा
भारतीय व्यापारियों के लिए व्यापार और धार्मिक पहचान अलग-अलग चीजें नहीं थीं। वे जहां भी स्थायी रूप से बसते थे, वहां अपने धार्मिक जीवन के लिए कुछ व्यवस्था बनाने का प्रयास करते थे। यही वजह है कि अस्त्राखान में भी भारतीय मर्चेंट्स की धार्मिक गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं।
एक अंग्रेज यात्री फॉर्स्टर ने भी ऐसे भारतीयों के बारे में लिखा, जो भारत से अस्त्राखान तक धार्मिक गतिविधियों के लिए पहुंचे थे। उनके विवरण में बौद्ध, हिंदू और पारसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
एक आर्मेनियाई व्यापारी ने अस्त्राखान में मौजूद भारतीयों को “गाय की पूजा करने वाले” लोगों के रूप में वर्णित किया था। इससे संकेत मिलता है कि वहां रहने वाले भारतीयों में हिंदुओं की संख्या काफी थी।
रूसी नाम, भारतीय पहचान
अस्त्राखान में सिर्फ व्यापार नहीं फला-फूला, बल्कि भारतीय समुदाय का स्थानीय समाज से मेलजोल भी बढ़ा। भारतीय व्यापारी लोकल समुदाय का हिस्सा बनने लगे। रूसी और स्थानीय समुदायों के साथ वैवाहिक रिश्ते भी स्थापित हुए। रूसी ऐतिहासिक विवरणों में ऐसी महिलाओं का उल्लेख मिलता है, जो महंगे भारतीय परिधान, साड़ियां और चूड़ियां पहनती थीं।
समय के साथ कुछ भारतीय व्यापारी स्थानीय समाज के साथ पारिवारिक सम्बन्धों में भी जुड़े। विशेष रूप से तातार महिलाओं (तातार समुदाय- वोल्गा क्षेत्र और रूस के आसपास सदियों से रहने वाला एक प्रमुख तुर्किक-भाषी समुदाय था) से विवाह के उल्लेख इस बात की ओर संकेत करते हैं कि डायस्पोरा और लोकल सोसाइटी के बीच सामाजिक सीमाएं पूरी तरह कठोर नहीं थीं।
समय बीतने के साथ कुछ भारतीय परिवार स्थानीय समाज में इस तरह घुलने-मिलने लगे कि उनके नाम और पहचान भी बदलने लगी।
1740 के दशक के दस्तावेजों में ऐसे भारतीयों के नाम मिलते हैं, जिन्हें इतिहासकार “रशियनाइज्ड इंडियंस” यानी रूसी समाज में काफी हद तक घुल-मिल चुके भारतीयों के रूप में देखते हैं। कुछ के नामों के साथ इवानोव और फ्योदोरॉव जैसे रूसी उपनाम जुड़े दिखाई देते हैं।
स्टीफन फ्रेडरिक डेल के शोध में मुल्तान के रामदास झासुएव और सिंध के तालाराम अलीमचंदोव जैसे नाम भी सामने आते हैं। यह इतिहास का वह हिस्सा है, जहां व्यापार सिर्फ सामानों का आदान-प्रदान नहीं रहता बल्कि वह लोगों, परिवारों और संस्कृतियों को भी एक-दूसरे से जोड़ देता है।

फिर क्यों मिट गया यह भारतीय व्यापारिक संसार?
लेकिन यह कहानी हमेशा ऐसी नहीं रही। 18वीं शताब्दी के दौरान भी अस्त्राखान का भारतीय समुदाय महत्वपूर्ण था, लेकिन उसके पुराने व्यापारिक आधार धीरे-धीरे बदलने लगे। चेक इतिहासकार मिचेल वानर के अनुसार, 18वीं शताब्दी में भारतीय व्यापारियों की आर्थिक गतिविधियों में उतार-चढ़ाव आया और 1740 के दशक के बाद कई परिस्थितियां उनके लिए विपरीत होती गईं।
तमाम रिसर्च के आधार पर प्रोफेसर संजीव इसके तीन कारण बताते हैं-
एक कारण पर्शिया और सेंट्रल एशिया की राजनीतिक अस्थिरता थी। भारतीय व्यापारी जिन कारवां रुट्स पर निर्भर थे, उनकी सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता में परिवर्तन का सीधा प्रभाव व्यापार पर पड़ता था।
दूसरा कारण रूसी आर्थिक नीति में बदलाव था। रूस धीरे-धीरे अपने घरेलू व्यापारिक वर्ग और अधिक नियंत्रित कमर्शियल सिस्टम को विकसित कर रहा था। इससे पुराने विदेशी व्यापारियों को मिले विशेषाधिकार पर दबाव पड़ा।
तीसरा कारण खुद भारतीय डायस्पोरा के भीतर परिवर्तन था। कुछ व्यापारी स्थानीय समाज में शामिल हुए, कुछ दूसरे बाजारों की ओर गए और कुछ कमर्शियल नेटवर्क्स धीरे-धीरे कमजोर हो गए।
ऐसे ही कई कारणों के चलते 1820 के दशक की शुरुआत तक अस्त्राखान में भारतीय कारोबारियों का पुराना विशेषाधिकार लगभग खत्म हो चुका था। कई दुकानें बंद होने लगीं और पुराने व्यापारी स्थानीय समाज में समाहित होते गए।
आखिरकार 1840 में भारतीय ट्रेडिंग कंपाउंड स्थायी रूप से बंद कर दिया गया।
इसी दौर में भारतीय उपमहाद्वीप में मुगलों के राजनीतिक प्रभाव का पतन और ब्रिटिश पावर का विस्तार हो रहा था। पारंपरिक भारतीय उत्पादन और व्यापारिक केंद्रों पर उसका गहरा असर पड़ रहा था। यानी एक तरफ रूस में भारतीय व्यापारिक नेटवर्क सिमट रहा था और दूसरी तरफ भारत में भी आर्थिक-सामाजिक संरचना तेजी से बदल रही थी।

आज बची है सिर्फ एक इमारत और कई कहानियां
अस्त्राखान में आज वह पुराना इंडियन ट्रेड कंपाउंड एक आवासीय इमारत के रूप में मौजूद है। समय के साथ उसमें कई निर्माण और बदलाव हुए, जिन्होंने उसकी मूल शक्ल को काफी हद तक बदल दिया। लेकिन इमारत की दीवारें अब भी एक ऐसे दौर की गवाही देती हैं, जब वोल्गा के किनारे बसे रूसी शहर में भारत के कारोबारी अपनी दुकानें चलाते थे, मध्य एशिया से सामान मंगाते थे, रूसी और तातार समाज से रिश्ते बनाते थे और अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को हजारों किलोमीटर दूर भी जीवित रखते थे।
कभी अस्त्राखान की पहचान बनी “इंडियन स्ट्रीट” आज इतिहास का एक अध्याय है। फिर भी भारत और अस्त्राखान का रिश्ता पूरी तरह अतीत नहीं हुआ है। 20वीं सदी में अस्त्राखान क्षेत्र और गुजरात के बीच सिस्टर-स्टेट संबंध बने। सिस्टर-स्टेट संबंध यानी दो अलग-अलग क्षेत्रों या देशों के समुदायों के बीच एक दीर्घकालिक साझेदारी, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना है।
एक पुराने रिश्ते की नई कड़ी
इस रिश्ते को नई दिशा उस समय मिली, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। नवंबर 2001 में उन्होंने पहली बार आधिकारिक तौर पर अस्त्राखान का दौरा किया। उस समय वह तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मॉस्को गए थे। इसी दौरान गुजरात और अस्त्राखान क्षेत्र के बीच पांच साल के सहयोग समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। यह समझौता रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में हुआ था।

मोदी ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद प्रधानमंत्री बनने पर भी इस रिश्ते को याद रखा। रूसी मीडिया के मुताबिक, जुलाई 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन के साथ अपनी पहली मुलाकात में मोदी ने गुजरात और अस्त्राखान के रिश्ते का जिक्र किया।
उन्होंने कहा था कि “गुजरात में लोगों को महसूस होता है कि अस्त्राखान हमारे बहुत करीब है।”
मोदी ने अस्त्राखान की अपनी यात्रा का एक दिलचस्प अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वहां एक पुस्तकालय में उन्हें भारत से संबंधित पुराने इतिहास और दस्तावेज देखने को मिले। भारत से हजारों किलोमीटर दूर रूस के एक शहर में भारतीय इतिहास से जुड़े दस्तावेज देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। इसी अनुभव ने उन्हें यह महसूस कराया कि अस्त्राखान और गुजरात के बीच केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव भी है।
कहने का मतलब ये कि सदियों पहले जिन भारतीय व्यापारियों ने कारवां मार्गों और समुद्री रास्तों को पार करके वोल्गा के डेल्टा तक अपनी पहुंच बनाई थी, उन्होंने शायद यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उनकी कहानी सदियों बाद भारत-रूस संबंधों के इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय बनेगी।
वोल्गा के किनारे आज भी वह पुरानी इमारत खड़ी है, मानो याद दिलाती हो कि भारत और रूस की कहानी सिर्फ आधुनिक कूटनीति से शुरू नहीं हुई। इसके कुछ अध्याय उन दिनों के हैं, जब व्यापारी नक्शों की सीमाओं से कहीं आगे जाकर रिश्ते और कारोबार बनाया करते थे।