रूस में आज भी कैसे छाया हुआ है मिथुन के 'जिमी-जिमी' का जादू?

रूस में बॉलीवुड म्यूजिक का अलग ही क्रेज रहा है। राजकपूर की फिल्मों से लेकर मिथुन चक्रवर्ती के जिमी-जिमी को लेकर अलग ही नॉस्टेल्जिया है। तीन बार के ग्रैमी अवॉर्ड विनर रिकी केज ने इस बारे में दिलचस्प बातें बताईं।

नई दिल्ली। भारत और रूस के रिश्तों की गर्मजोशी से तो पूरी दुनिया वाकिफ है। इसके साथ ही रूस में बॉलीवुड फिल्मों और गानों को लेकर भी अलग ही क्रेज है। दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती का गाना जिमी जिमी... आज भी रूस में काफी पसंद किया जाता है। तीन बार ग्रैमी अवार्ड जीतने वाले संयुक्त राष्ट्र के गुडविल एंबेसडर रिकी केज ने इस गाने के दिल से जुड़ने की केमिस्ट्री समझाई। 'India, Russia & the World' के लेटेस्ट एपिसोड में RT इंडिया की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा ने उनसे बातचीत की। 

रिकी के साथ म्यूजिक, कल्चर और ग्लोबल इफेक्ट पर एक दिलचस्प चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि रूस में आज भी जिमी-जिमी... सॉन्ग क्यों इतना लोकप्रिय बना हुआ है। हाल में मिथुन दा रूस गए थे तो देखिए कैसे उनका स्वागत हुआ।

जिमी-जिमी का जादू

रूस के राजनयिक भी इस गाने को पसंद करते हैं। RT हिंदी के लॉन्च पर जब रूसी राजनयिक रोमन बाबुश्किन न्यूजरूम में आए थे तो उन्होंने बॉलीवुड गाने को पसंद किए जाने की बात बताई थी। अब रिकी केज ने एक दिलचस्प पहलू सामने रखा। 

वह कहते हैं कि वास्तव में इस जादू को समझाना या इसकी व्याख्या करना बहुत मुश्किल है। लोगों के साथ संगीत का अपना एक जुड़ाव होता है और यह पहले से नहीं जाना जा सकता कि कौन सा संगीत किस तरह के लोगों के साथ जुड़ जाएगा, यह कभी-कभी अलग ही लेवल का होता है।

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रिकी ने कहा कि कई बार जिस संगीत के बारे में आप सबसे कम सोचते हैं कि वह किसी से जुड़ेगा, वही असल में लोगों से जुड़ जाता है।

उन्होंने कहा कि 'जिमी जिमी' के साथ भी यही हुआ कि यह बस वहां के दर्शकों (ऑडियंस) से जुड़ गया और बहुत खूबसूरती से जुड़ा। इसकी कोई व्याख्या नहीं है।

उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए उदाहरण दिया कि जहां अधिकतर लोग आराम (रिलैक्स) करने के लिए सोलो पियानो, बांसुरी या कोई पारंपरिक संगीत सुनते हैं, वहीं वे खुद रिलैक्स होने के लिए हेवी मेटल संगीत सुनते हैं। हर किसी की अपनी संगीत शैली और पसंद होती है, और रूस के मामले में वे बस उस खास गाने ('जिमी जिमी') से पूरी तरह जुड़ गए।

संगीत में भारत-रूस की जुगलबंदी कैसे?

रिकी केज ने कहा कि रूस का वेस्टर्न क्लासिकल संगीत का इतिहास दुनिया के सबसे महान इतिहास में से एक रहा है, और रूस में दुनिया के कुछ सबसे महान संगीतकार हुए हैं। उन्होंने कहा कि रूस के पास म्यूजिक के क्षेत्र में ज्ञान का एक बड़ा भंडार है जिससे भारत सीख सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत में अपना कोई घरेलू आर्केस्ट्रा नहीं है और न ही कोई पेशेवर घरेलू क्वायर (choir) है जो दुनियाभर में घूमकर वेस्टर्न क्लासिकल संगीत पेश कर सके, जबकि रूस के पास ऐसे कई आर्केस्ट्रा और क्वायर हैं।

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उन्होंने कहा कि यह दोनों देशों के बीच एक बहुत अच्छा सेतु (bridge) बन सकता है। रिकी ने कहा कि अतीत में भी भारतीय संगीत कई बार रूस गया है, जहां भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों ने रूसी लोगों को भारतीय इम्प्रोवाइजेशनल फॉर्म्स, राग और पारंपरिक वाद्ययंत्र सिखाए हैं।

रूस भी अपने आर्केस्ट्रा को भारत ला सकता है और संभवतः वेस्टर्न क्लासिकल संगीत की एक ज्यादा मजबूत शिक्षा यहां दे सकता है।

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आज का मेनस्ट्रीम म्यूजिक तात्कालिक और नर्सरी राइम्स जैसी बेहद सरल धुनों पर आधारित हो गया है, जो 3 महीने में दिमाग से निकल जाता है। आज के संगीत में सदाबहार क्षमता कम हो गई है। यही कारण है कि 'जिमी जिमी' जैसा लंबा और स्थायी असर आधुनिक गीतों में नहीं दिखता है।
रिकी केज
रिकी केज
रिकी केज, 3 बार के ग्रैमी अवॉर्ड विनर

जिमी-जिमी जैसा दूसरा सॉन्ग क्यों नहीं?

केज ने कहा कि म्यूजिक सुनने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है। केज ने कहा कि पहले म्यूजिक रेडियो या टीवी पर बार-बार सुना जाता था, जिससे 10-15 बार सुनने के बाद वह श्रोता के दिल में स्थायी जगह बना लेता था। उन्होंने कहा कि आज यूट्यूब और स्पॉटिफाई जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर श्रोता गाने को केवल 10 सेकंड देते हैं।

रिकी ने कहा कि आज का मेनस्ट्रीम म्यूजिक तात्कालिक और नर्सरी राइम्स जैसी बेहद सरल धुनों पर आधारित हो गया है, जो 3 महीने में दिमाग से निकल जाता है। आज के संगीत में सदाबहार क्षमता कम हो गई है, खासकर जब आप मेनस्ट्रीम म्यूजिक की बात करते हैं ।  यही कारण है कि ‘जिमी जिमी’ जैसा लंबा और स्थायी असर आधुनिक गीतों में नहीं दिखता। 

इंडियन म्यूजिक के लिए क्या है जरूरी?

रिकी केज बताते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत ने वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक सीमाओं को सफलतापूर्वक तोड़ा है। वहीं, इंडियन मेनस्ट्रीम म्यूजिक (खासकर बॉलीवुड) अभी तक ग्लोबल कल्चरल बैरियर को बड़े पैमाने पर नहीं पार कर पाया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका या यूरोप में जब बड़े बॉलीवुड गायक कॉन्सर्ट करते हैं, तो वहां ज्यादातर भारतीय प्रवासी ही जुटते हैं।

उन्होंने दक्षिण कोरियाई संगीत 'के-पॉप' (जैसे BTS) का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके अंतरराष्ट्रीय कॉन्सर्ट्स में कोरियाई लोग अल्पसंख्यक होते हैं और स्थानीय अमेरिकी या यूरोपीय श्रोता मुख्य दर्शक होते हैं। भारत के मेनस्ट्रीम म्यूजिक को भी ऐसी ही पहुंच बनाने की जरूरत है।