रूस से आया मेरा दोस्त! 500 साल पहले आए निकितिन की कहानी

रूस से आया मेरा दोस्त! 500 साल पहले आए निकितिन की कहानी

500 साल से भी पहले एक रूसी व्यापारी घोड़े और व्यापार की तलाश में भारत आया, लेकिन उसकी यात्रा इतिहास में 15वीं सदी के भारत की अनोखी तस्वीर दर्ज कर गई। भारत के बाजारों से लेकर धर्म, युद्ध और रोजमर्रा की जिंदगी तक- सब कुछ एक विदेशी मुसाफिर की डायरी में कैद हो गया।
अपर्णा रांगड़अपर्णा रांगड़ Published

“यहां लोग गाय को “माता” कहते हैं, भोजन से पहले हाथ-पैर और मुंह धोते हैं, गोबर के उपले बनाते हैं और उनसे खाना पकाते हैं। वे अपने चेहरों और शरीर पर भस्म लगाते हैं। मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं।”

ये आज के भारत का वर्णन नहीं है। ये उस भारत की तस्वीर है, जो 500 साल से भी ज्यादा पहले एक रूसी यात्री की आंखों से दुनिया के सामने आई थी। उस यात्री का नाम था अफनासी निकितिन।

 निकितिन न कोई राजदूत थे, न सैनिक और न ही किसी धार्मिक मिशन पर निकले थे। वह एक रूसी व्यापारी थे। एक घोड़े, व्यापार की उम्मीद और सफर के दौरान अपने अनुभव लिखते जाने की आदत के साथ घर से निकले थे। लेकिन उन्हें शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि यह सफर उन्हें रूस से हजारों किलोमीटर दूर भारत तक ले जाएगा और भारत पर कुछ ऐसा लिखेंगे, जिसे सदियों बाद भी पढ़ा जाएगा।

उस समय की कल्पना कीजिए। 

न सोवियत संघ था, न भारत-रूस के बीच कोई राजनयिक रिश्ता। भारत में मुगल साम्राज्य का नामोनिशान तक नहीं था और बाबर का जन्म भी नहीं हुआ था। दिल्ली पर लोदी वंश का शासन था, जबकि दक्कन में बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य अपनी ताकत के दौर में थे।

और इसी दौर में, रूस के त्वेर  शहर से निकला एक व्यापारी वोल्गा नदी के रास्ते कैस्पियन सागर तक पहुंचा। फिर फारस की जमीन पार की, होर्मुज के विशाल बंदरगाह को देखा, हिंद महासागर पार किया और आखिरकार भारत के पश्चिमी तट पर पहुंच गया।

इतिहासकारों के अनुसार यह यात्रा 1468 के आसपास शुरू हुई और निकितिन ने भारत में कई साल बिताए। करीब तीन साल- एक ऐसे भारत में, जिसे उस समय के यूरोप और रूस की दुनिया बेहद दूर, अनजान और रहस्यमय मानती थी। इन तीन सालों में निकितिन सिर्फ भारत आए नहीं- उन्होंने भारत को देखा, समझने की कोशिश की और उसे अपने शब्दों में गढ़ा। 

उन्होंने चौल के समुद्री तट से लेकर दक्कन के अंदरूनी इलाकों तक यात्रा की। बाजारों में घोड़ों और रेशम का कारोबार देखा, बारिश में खेतों में काम करते किसानों को देखा, युद्ध में हाथियों को उतरते देखा, राजाओं और सैनिकों का जीवन दर्ज किया और भारतीयों के भोजन, पहनावे और धार्मिक परंपराओं को अपनी डायरी में उतार दिया।

निकितिन की यही यात्रा आगे चलकर ‘Voyage Beyond Three Seas’ यानी- ‘तीन समुद्रों के पार यात्रा’  के नाम से मशहूर हुई। एक ऐसा यात्रा-वृत्तांत, जिसमें 15वीं सदी का भारत किसी इतिहास की किताब के सूखे अध्याय की तरह नहीं, बल्कि एक जिंदा समाज की तरह दिखाई देता है।

(‘तीन समुद्रों के पार यात्रा’ किताब का कवर)

तो चलिए, करीब 500 साल पीछे चलते हैं…

उस रूसी व्यापारी के साथ, जो एक घोड़ा लेकर भारत आया था… और अपने साथ भारत की एक ऐसी कहानी लेकर लौटा, जिसे रूस आज भी याद करता है। 

लेकिन निकितिन भारत आए क्यों थे?

दरअसल ये कहानी किसी राजकीय आदेश से शुरू नहीं हुई थी। शुरुआत व्यापार से हुई थी।

RT हिंदी ने इस संबंध में नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रो. राजन कुमार से बात की। 

Prof Rajan Kumar on why Nikitin came to India
निकितिन का भारत आने का मकसद सिर्फ घूमना या भारत को देखना नहीं था। वह एक रूसी व्यापारी के तौर पर भारत में व्यापार की संभावनाएं तलाशने आए थे। उनकी यात्रा दक्कन के बहमनी साम्राज्य तक पहुंची, जहां उन्होंने घोड़ों के कारोबार समेत व्यापार से जुड़ी कई चीजों को करीब से देखा।
राजन कुमार
राजन कुमार
प्रोफेसर, JNU

यही फैसला उन्हें उन इलाकों तक ले गया, जिनके बारे में उस समय रूस में बेहद कम जानकारी थी। भारत में घोड़ों के व्यापार ने भी उन्हें खास तौर पर आकर्षित किया। 15वीं सदी के दक्कन में अच्छी नस्ल के घोड़े सत्ता और युद्ध दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे और फारस और मध्य एशिया से घोड़ों का आयात होता था। यानी जिस यात्रा को निकितिन ने व्यापार के लिए शुरू किया था, वह धीरे-धीरे एक विशाल खोज और दस्तावेजी यात्रा बन गई।

(निकितिन की डायरी पर लिखी किताब की कॉपी, सोर्स: त्वेर रीजनल यूनिवर्सल साइंटिफिक लाइब्रेरी)

रूस से भारत तक रास्ता कैसा था?

आज मॉस्को से दिल्ली की उड़ान कुछ घंटों में पूरी हो जाती है। निकितिन के समय भारत पहुंचना महीनों की जोखिम भरी यात्रा थी। त्वेर  से वोल्गा नदी के रास्ते नीचे उतरते हुए वह कैस्पियन सागर तक पहुंचे। वहां से दर्बंद, बाकू और फारस के रास्ते आगे बढ़े। फारस में उन्होंने कई शहरों को पार किया और आखिरकार होर्मुज पहुंचे।

अपनी किताब में निकितिन लिखते हैं- 

“तीन समुद्र पार की अपनी पापमय यात्रा का विवरण लिखा है: पहला, देबेंत या खवालिन सागर; दूसरा, हिन्द सागर या हिन्दुस्तान सागर और तीसरा काला सागर या स्तांबुल सागर।”

यही तीन समुद्र आगे चलकर उनकी यात्रा का नाम बन गए-’खोजेनिये ज़ा त्रि मोर्या’, यानी ‘तीन समुद्रों के पार यात्रा’। और यह सिर्फ समुद्र पार करने की कहानी नहीं थी। यह मध्यकालीन दुनिया के उन व्यापारिक नेटवर्कों की झलक भी देती है, जिनके जरिए रूस, मध्य एशिया, फारस, अरब और भारत एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

MAP (अफनासी निकितिन की 15वीं सदी की यात्रा का मार्ग, सोर्स:साइंटिफिक लाइब्रेरी ऑफ त्वेर स्टेट यूनिवर्सिटी)

होर्मुज को निकितिन ने कैसे बयां किया? 

होर्मुज उस समय हिंद महासागर के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाहों में था।

Nikitin On Hormuz
“होर्मुज एक बड़ा बंदरगाह है। यहां दुनिया के सभी भागों के लोग आते हैं और इसके बाजार में सभी तरह की वस्तुएं उपलब्ध हैं। पृथ्वी पर जो कुछ भी पैदा होता है, वह होर्मज में मिल सकता है।” इसी होर्मुज से भारत की यात्रा का अगला चरण शुरू हुआ।"
अफनासी निकितिन
अफनासी निकितिन
रूसी व्यापारी

“हमें समुद्र से मस्काट पहुंचने में दस दिन तथा मस्काट से देगा पहुंचने में चार दिन लगे। देगा से हम जलपोत से गुजरात के लिए रवाना हुए और गुजरात से खम्भात के लिए... खम्भात से हम चौल पहुंचे... और यहीं भारत देश है।”

निकितिन जब चौल पहुंचे, तो वहां के आम लोगों के पहनावे और उनके गोरे रंग को देखकर हैरान रह गए।

“और यहीं भारत देश है, जहां लोग नंगे घूमते हैं. स्त्रियां खुले सिर और वक्षस्थल पर बिना कोई वस्त्र धारण किये हुए जाती हैं... स्त्री-पुरुष सभी काले हैं. जहां कहीं भी मैं जाता था, लोगों का झुंड मेरे पीछे लग जाता था और वे मुझ श्वेत आदमी को बड़े आश्चर्य के साथ देखते थे.”

(अफनासी निकितिन, सोर्स:साइंटिफिक लाइब्रेरी ऑफ त्वेर स्टेट यूनिवर्सिटी)

भारत की धरती पर निकितिन के कदम कहां-कहां पड़े? 

भारत पहुंचने के बाद उनकी यात्रा सिर्फ तटीय इलाकों तक सीमित नहीं रही। चौल से वह अंदरूनी इलाकों की ओर बढ़े। पाली, उमरा और जुन्नार होते हुए दक्कन के भीतर पहुंचे। इसके बाद बीदर, कुलुनगीर और गुलबर्ग जैसे इलाकों का उल्लेख उनकी यात्रा में मिलता है।

जुन्नार में वह करीब दो महीने रहे और यहीं उन्होंने भारत के मॉनसून को बहुत करीब से देखा। निकितिन दरअसल उस समय की कृषि अर्थव्यवस्था को दर्ज कर रहे थे। वे बताते हैं कि ताड़ से ताड़ी निकाली जाती थी, घोड़ों को दाल खिलाई जाती थी और भारत में घोड़े कम पाले जाते थे, जबकि बैल और भैंसें परिवहन और खेती के काम आते थे।

(डायरी लिखते निकितिन, फोटो AI की मदद से बनाई गई है)RT

15वीं सदी का भारत एक रूसी मुसाफिर को कैसा दिखा?

यहीं उनकी किताब सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाती है। निकितिन ने राजाओं और सैनिकों से लेकर किसानों, बाजारों, भोजन, कपड़ों, महिलाओं, धार्मिक रीति-रिवाजों और त्योहारों तक को दर्ज किया। लेकिन इसे पढ़ते हुए एक बात याद रखना जरूरी है- यह 15वीं सदी के भारत को एक विदेशी यात्री की आंखों से देखने का दस्तावेज है। इसमें उस समय की वास्तविकताओं के साथ-साथ उनकी अपनी सांस्कृतिक धारणाएं और सीमाएं भी मौजूद हैं।

मसलन, भारतीय पहनावे का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं- 

“उनका राजा सिर पर फेटा बांधता है और धोती पहनता है... उनकी रानियां गले में दुपट्टा डालती हैं और साड़ी पहनती हैं।”

यानी एक रूसी व्यापारी पहली बार उन वस्त्रों और सामाजिक परंपराओं को दर्ज कर रहा था, जो उसके अपने देश से बिल्कुल अलग थीं। 

निकितिन ने जो लिखा उसे पूरे भारत का विवरण मानना सही है?

Prof Rajan on reliability
निकितिन की यात्रा मुख्य रूप से दक्कन के उस हिस्से तक सीमित थी, जो उस समय बहमनी सल्तनत के प्रभाव में था। इसलिए उनकी डायरी में जिन लोगों, परंपराओं, खान-पान, धार्मिक मान्यताओं, बाजारों और रोजमर्रा की जिंदगी का जिक्र मिलता है, वह 15वीं सदी के पूरे भारत की तस्वीर नहीं, बल्कि दक्कन और बहमनी साम्राज्य के उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक है।
राजन कुमार
राजन कुमार
प्रोफेसर, JNU

क्या निकितिन ने सिर्फ भारत की सुंदरता लिखी?

नहीं। उनकी डायरी में व्यापार, गरीबी, युद्ध, सत्ता और धर्म… सब दिखाई देता है। बीदर के बाजार का वर्णन करते हुए वे घोड़ों, रेशम, कमखाब और दूसरी वस्तुओं की बिक्री का जिक्र करते हैं। उन्होंने यह भी देखा कि घोड़े और हथियारों का व्यापार दक्कन की राजनीतिक शक्ति से कितना जुड़ा था। 

यह उनकी यात्रा का सबसे जटिल हिस्सा है। निकितिन ने हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की धार्मिक प्रथाओं को दर्ज किया। उन्होंने भोजन, उपवास, पूजा, अंतिम संस्कार और सामाजिक मेल-जोल जैसी चीजों का भी उल्लेख किया।

हिंदू धर्म, रीति-रिवाज और जीवनशैली को निकितिन ने कैसे देखा?

Nikitin On Hindus
लोग गाय को “माता” कहते हैं, भोजन से पहले हाथ-पैर और मुंह धोते हैं, गोबर के उपले बनाते हैं और उनसे खाना पकाते हैं. वे अपने चेहरों और शरीर पर भस्म लगाते हैं. मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं।
अफनासी निकितिन
अफनासी निकितिन

लेकिन अपनी इस यात्रा के दौरान क्या निकितिन को धार्मिक दबाव का सामना भी करना पड़ा?

हां। और यह उनकी यात्रा के सबसे नाटकीय हिस्सों में से एक है।

जुन्नार में उनका घोड़ा वहां के स्थानीय शासक खान ने ले लिया। जब उसे पता चला कि निकितिन मुस्लिम नहीं बल्कि रूसी ईसाई हैं, तो कथित तौर पर उनके सामने धर्म परिवर्तन की शर्त रखी गई। निकितिन अपने यात्रा-वृत्तांत में लिखते हैं- 

“मैं तुम्हारा घोड़ा वापस लौटा दूंगा और एक हजार अशर्फ़ियां दूंगा, बशर्ते कि तुम इस्लाम धर्म स्वीकार कर लो।”

निकितिन के अनुसार उन्हें कुछ दिनों की मोहलत दी गई। बाद में खुरासान के ख़्वाजा मुहम्मद ने हस्तक्षेप किया और उनका घोड़ा वापस मिल गया। इस पूरे प्रसंग में निकितिन का धार्मिक संघर्ष साफ दिखाई देता है। वह एक जगह लिखते हैं कि मुस्लिमों की नमाज़ और अपनी प्रार्थना के बीच वह खुद को किस तरह देख रहे थे।

वापस रूस लौटने पर क्या कहा? 

डाकुओं द्वारा धार्मिक किताबें लूट लिए जाने के बाद वे ईसाई त्यौहारों की तिथियां भूल गए थे. बीदर में मुस्लिम माहौल में रहते हुए उन्होंने अपने ईश्वर को याद करते हुए लिखा:

“अब मुझे ईसाई धर्म और ईसाई त्यौहारों के बारे में कुछ नहीं याद रहा... हे ईश्वर, तू दयालु है, तू मेरा प्रभु है... मैंने मुस्लिमों के साथ उपवास रखा है. मैं यह सोचते हुए रूस लौट रहा हूं कि मेरा धर्म विनष्ट हो गया है.”

जनवरी 1473 में निकितिन भारत से लौटते हुए फारस, आर्मेनिया और तुर्की होते हुए काला सागर के रास्ते क्रीमिया पहुंचे, जहां उन्हें तुर्की अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लूटा।  नवंबर 1474 में वे काफा (आज का फियोदोसिया) पहुंचे और 1474–75 की सर्दियों में अपनी यात्रा-वृत्तांत को अंतिम रूप दिया। वतन लौटते समय स्मोलेंस्क के पास उनकी मृत्यु हो गई; उनकी मौत की परिस्थितियां आज भी अज्ञात हैं।

यही वजह है कि तीन समुद्रों के पार यात्रा सिर्फ यात्रा-वृत्तांत नहीं रह जाती- यह एक ऐसे व्यक्ति की आंतरिक डायरी भी बन जाती है जो लगातार अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के बीच रह रहा था।

निकितिन के साथियों ने उनकी इस पूरी यात्रा की डायरी मॉस्को पहुंचाकर उच्च अधिकारियों को सौंप दीं। करीब पांच साल बाद, निकितिन के नोट्स को 1480 के दशक के क्रॉनिकल कलेक्शन में रूसी राज्य के आधिकारिक इतिहास में शामिल किया गया। 

19वीं सदी की शुरुआत में इतिहासकार निकोलाई करामज़िन ने ट्रिनिटी-सर्जियस मोनेस्ट्री के अभिलेखों में ट्रिनिटी क्रॉनिकल के भीतर निकितिन के नोट्स खोजे। इसके बाद 1817 में पहली बार उन्हें निकितिन के मूल शीर्षक “तीन समुद्रों के पार की यात्रा” (Voyage Beyond Three Seas) के नाम से प्रकाशित किया गया।

(निकितिन की डायरी के पन्ने, सोर्स: त्वेर रीजनल यूनिवर्सल साइंटिफिक लाइब्रेरी)

क्या निकितिन की नजर पूरी तरह निष्पक्ष थी?

निकितिन जो देख रहे थे, उसे अपने समय और अपनी संस्कृति के नजरिए से समझ रहे थे। इसलिए उनकी डायरी में पूर्वाग्रह भी दिखाई देते हैं।

Prof Rajan on Bias
‘ईसाई धर्म को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति, अपने धर्म और ईश्वर को दूसरे धार्मिक विश्वासों से ऊपर देखने का नजरिया और लोगों को लेकर उनकी धारणाएं उनके लेखन में नजर आती हैं। यानी निकितिन की डायरी को पढ़ते समय उनके अनुभवों के साथ-साथ उनकी नजर का चश्मा भी समझना जरूरी है।
राजन कुमार
राजन कुमार
प्रोफेसर, JNU

निकितिन की डायरी इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जाती है?

निकितिन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने भारत पर कोई किताब लिखने के इरादे से यात्रा नहीं की थी। वह रास्ते में जो कुछ देख रहे थे, उसे अपनी डायरी में दर्ज करते जा रहे थे। प्रो. राजन कुमार कहते हैं कि यही बात उनकी रचना को खास बनाती है। किसी लेखक की तरह उनके सामने पहले से कोई तय ढांचा या किताब लिखने की योजना नहीं थी, बल्कि वह अपने अनुभव और अपने नजरिए से चीजों को दर्ज कर रहे थे। यह एक व्यापारी की नजर से लिखा गया यात्रा-विवरण था। 

इसी वजह से उनके नोट्स मध्यकालीन भारत के व्यापार, कृषि, राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक जीवन और धार्मिक प्रथाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बने। बाद में इसका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

500 साल बाद भी निकितिन इतने जरूरी क्यों हैं?

क्योंकि उस दौर के भारत को एक रूसी यात्री की नजर से दर्ज करने वाला ऐसा दूसरा महत्वपूर्ण रूसी स्रोत आसानी से उपलब्ध नहीं है। 

Prof Rajan on first Russian claim
भारत और रूस के बीच व्यापारिक संपर्क निकितिन से पहले भी रहे होंगे-फारसी व्यापारियों और दूसरे व्यापारिक रास्तों के जरिए आवाजाही होती थी। लेकिन मध्यकालीन भारत पर रूसी भाषा में निकितिन की यह रचना अपने आप में एक दुर्लभ दस्तावेज बन जाती है।
राजन कुमार
राजन कुमार
प्रोफेसर, JNU

क्या यह कहानी सिर्फ किताब तक सीमित रही?

बिल्कुल नहीं। करीब पांच शताब्दियों बाद निकितिन की यात्रा फिर भारत और रूस के सांस्कृतिक रिश्ते का हिस्सा बनी। 1957 में सोवियत संघ और भारत ने मिलकर ‘परदेसी’ (Pardesi / Journey Beyond Three Seas) फिल्म बनाई। इसका निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास और वासिली प्रोनिन ने किया था। इसमें रूसी अभिनेता ओलेग स्ट्रिझेनोव ने निकितिन की भूमिका निभाई, जबकि नर्गिस ने चंपा का किरदार निभाया। पंडित पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी और पद्मिनी भी फिल्म का हिस्सा थे। फिल्म उस दौर में बनी जब भारत-सोवियत सांस्कृतिक रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे थे। इसे हिंदी और रूसी दोनों भाषाओं में बनाया गया। यानी जिस रूसी व्यापारी ने 15वीं सदी में भारत की यात्रा लिखी थी, उसकी कहानी 20वीं सदी में भारतीय और रूसी सिनेमा की साझा कहानी बन गई।

(परदेसी फिल्म का स्कीनग्रैब)

क्या आज भी निकितिन के कदमों के निशान भारत में मिलते हैं?

इसका जवाब सबसे दिलचस्प है-हां।

महाराष्ट्र के रेवदंडा में, जिसे ऐतिहासिक चौल से जोड़ा जाता है, निकितिन की स्मृति में 2000 में एक स्मारक बनाया गया। यही वह इलाका माना जाता है जहां उनके भारत में पहली बार उतरने की संभावना है। और फिर कहानी आगे बढ़ती है।

जुन्नार आज भी मौजूद है- ये वही इलाका है, जहां निकितिन ने मॉनसून के दौरान लगभग दो महीने बिताए थे और दक्कन के जीवन का वर्णन किया था।

केरल के कोझिकोड में भी निकितिन की स्मृति को सम्मान मिला। भारत में रूसी दूतावास की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक 2022 में कोझिकोड ने निकितिन की भारत यात्रा की 550वीं वर्षगांठ पर श्रद्धांजलि दी और वहां की एक सड़क का नाम अफनासी निकितिन के नाम पर रखा गया। 

केरल में अफनासी निकितिन के नाम पर सड़क© नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास

रूस ने निकितिन को कैसे जिंदा रखा है?

त्वेर की वोल्गा नदी के किनारे आज भी निकितिन की विशाल कांस्य प्रतिमा खड़ी है। 1955 में स्थापित यह स्मारक उसी नदी की तरफ देखता है, जिस रास्ते से कभी वह अपनी लंबी यात्रा पर निकले थे। इसकी खास बात ये भी है कि इस मूर्ति के उद्घाटन में K. P. S. Menon, जो उस समय सोवियत यूनियन में भारत के राजदूत थे, मौजूद थे। उन्होंने निकितिन को भारत और रूस के बीच शुरुआती संपर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा।

त्वेर की वोल्गा नदी के किनारे लगी निकितिन की कांस्य प्रतिमा)

आज तक निकितिन की “Voyage Beyond Three Seas” की 15वीं से 17वीं सदी की सात प्रतियां मिली हैं, जो रूस की बड़ी लाइब्रेरियों और आर्काइव्स में सुरक्षित हैं। इनमें रशियन स्टेट लाइब्रेरी, रशियन स्टेट आर्काइव ऑफ़ अन्सिएंट डाक्यूमेंट्स और रशियन नेशनल लाइब्रेरी शामिल हैं। 

(रूस का त्वेर शहर, सोर्स:साइंटिफिक लाइब्रेरी ऑफ त्वेर स्टेट यूनिवर्सिटी)

और भारत-रूस की दोस्ती की शुरुआत कहां खोजें?

भारत और रूस की दोस्ती की बात होती है तो अक्सर याद आता है- सोवियत दौर, नेहरू और ख्रुश्चेव, राज कपूर और आवारा।  इसे 1947 में शुरू करना भी अधूरा होगा और 1955 की नेहरू-ख्रुश्चेव मुलाकात से शुरू करना भी। क्योंकि ये रूसी व्यापारी अपनी डायरी के पन्नों में भारत से एक ऐसी तस्वीर लेकर लौटा, जिसे बाद की पीढ़ियों ने इतिहास की किताबों में पढ़ा। और निकितिन की यात्रा सिर्फ एक पुराने रूसी व्यापारी की कहानी नहीं रही। 

यह उस समय की कहानी बनी जब आधुनिक देशों के रिश्ते मौजूद नहीं थे, लेकिन लोगों की यात्राएं थीं, व्यापारिक रास्ते थे, समुद्र थे और एक-दूसरे को जानने की जिज्ञासा थी।