सोचिए, साल है 1871 यानी आज से ठीक 155 साल पहले… भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन है और रूस में है Tsar यानी जार का शासन। दोनों साम्राज्यों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध जरूर हैं, लेकिन मध्य एशिया में बढ़ती ताकत और प्रभाव को लेकर एक-दूसरे पर भरोसा बेहद कम है।
इसी दौर में ब्लैक सी के रूसी बंदरगाह ओडेसा (Odessa) से एक भाप से चलने वाला जहाज रवाना होता है। उसका नाम था नखिमोव (Nakhimoff) और उसकी मंजिल थी- बंबई (Bombay)।
मार्च 1871 में शुरू हुई यह यात्रा महज एक समुद्री सफर नहीं थी। इसके पीछे रूस की एक बड़ी कारोबारी महत्वाकांक्षा थी… भारत और एशिया के बाजारों तक सीधे पहुंचना, अपने जहाजों से व्यापार करना और ब्रिटिश तथा दूसरे यूरोपीय व्यापारिक नेटवर्क पर निर्भरता कम करना।
आखिर रूस ने उस दौर में बंबई का रास्ता क्यों चुना? नखिमोव भारत से क्या लेकर लौटा? और जब मध्य एशिया में रूस और ब्रिटेन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी, तब इस समुद्री व्यापार को किस नजर से देखा जा रहा था?
RT हिंदी ने इन सवालों को समझने के लिए नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रो. राजन कुमार से बात की।
नखिमोव की यात्रा के पीछे रूस की क्या योजना थी?
मार्च 1871 में करीब 3,200 टन क्षमता वाला रूसी जहाज नखिमोव ओडेसा से बंबई के लिए निकला। उस समय स्वेज नहर (Suez Canal) को खुले सिर्फ दो साल हुए थे। 1869 में शुरू हुई इस नहर ने यूरोप और हिंद महासागर के बीच समुद्री संपर्क को एक नया रास्ता दिया था।
इससे पहले यूरोप से भारत पहुंचने वाले जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) का लंबा चक्कर लगाना पड़ता था। स्वेज नहर ने भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) को लाल सागर (Red Sea) से जोड़कर इस दूरी और यात्रा समय को कम करने का रास्ता खोला।
रूस के लिए यह बदलाव खास मायने रखता था। ब्लैक सी के ओडेसा बंदरगाह से भूमध्य सागर, स्वेज नहर और लाल सागर होते हुए बंबई पहुंचना अब एक व्यावहारिक कारोबारी संभावना बन चुका था।
इस कोशिश में Russian Steam Navigation and Trading Company (ROPiT) की महत्वपूर्ण भूमिका थी। कंपनी को रूसी सरकार का समर्थन और सब्सिडी हासिल थी। 1871 में उसने भारत और चीन की ओर अपनी समुद्री सेवाओं को बढ़ाने की कोशिश की।
यानी नखिमोव की यात्रा कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं थी। इसके पीछे बाजार को समझने और व्यापार की संभावनाओं का आकलन करने की तैयारी भी थी।
भारत पहुंचने से पहले हुई थी पूरी तैयारी
रूस ने बंबई के बाजार की संभावनाएं समझने के लिए 1869 में ROPiT के एजेंट Egor Baranovskiy को भारत भेजा। उन्होंने बंबई और कलकत्ता में जहाजों, माल ढुलाई, व्यापारिक गतिविधियों और प्रतिस्पर्धी कंपनियों का अध्ययन किया। इस तरह नखिमोव की 1871 की यात्रा से पहले ही रूस ने भारत के साथ सीधे समुद्री व्यापार की संभावनाओं का आकलन शुरू कर दिया था।
रूस को भारत के कॉटन की जरूरत क्यों थी?
1861-1865 के अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान अमेरिका से कपास की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई, जिससे दुनिया की कपड़ा मिलों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़े। रूस की टेक्सटाइल इंडस्ट्री को भी कपास की जरूरत थी और भारत एक अहम विकल्प बनकर उभरा।
रूस की दिलचस्पी सिर्फ कपास तक सीमित नहीं थी। वह भारत से चाय, नील और मसाले जैसी वस्तुएं भी अपने बाजार तक पहुंचाना चाहता था।
नखिमोव भारत से क्या लेकर लौटा?
नखिमोव ओडेसा से कोयला लेकर बंबई पहुंचा, लेकिन वापसी में उसे भारतीय कपास और दूसरी वस्तुओं के रूप में बेहतर कारोबारी संभावनाएं मिलीं। ओडेसा के ब्रिटिश Consul-General Keith Abbott की 1873 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1872 की यात्राओं में जहाज हजारों गांठ कपास के अलावा नारियल तेल, अदरक, लौंग और गोंद लेकर लौटा।
हालांकि, व्यापार में एक बड़ी बाधा थी। रूस से भारत भेजे जाने वाले अनाज, ऊन और दूसरी वस्तुओं की भारतीय बाजार में सीमित मांग थी, जबकि रूस को भारतीय कपास की जरूरत थी। ऐसे में जहाज को भारत से लौटते वक्त माल तो मिलता था, लेकिन दोनों तरफ पर्याप्त कारोबार न होने से समुद्री सेवा को मुनाफे में चलाना मुश्किल था।
ब्रिटिश अधिकारी ने क्यों उठाए सवाल?
नखिमोव की यात्रा के पीछे रूस की कारोबारी महत्वाकांक्षा थी, लेकिन ब्रिटिश अधिकारी कैथ को इस व्यापार के फायदेमंद होने पर भरोसा नहीं था। उनकी चिंता का मुख्य कारण था कि क्या ओडेसा और बंबई के बीच नियमित समुद्री सेवा बिना सरकारी सहायता के मुनाफे में चल सकती है?
रूस से भारत भेजे जाने वाले माल की सीमित मांग और दोनों तरफ असंतुलित व्यापार के कारण जहाजों को पर्याप्त व्यावसायिक लाभ मिलने में कठिनाई हो सकती थी। लंबी समुद्री यात्रा में ईंधन, जहाज के संचालन और माल ढुलाई की लागत भी महत्वपूर्ण थी।
ऐसे में रूसी सरकार की सब्सिडी और यात्रा की दूरी के आधार पर मिलने वाली आर्थिक सहायता इस सेवा को चलाए रखने में मदद कर रही थी। ब्रिटिश आकलन का संकेत था कि अगर यह सहायता हटा दी जाए, तो व्यापार का टिकाऊ होना मुश्किल हो सकता है।
भारतीय चाय को लेकर भी थी कारोबारी उम्मीद
उस दौर में रूसी बाजार में चीनी चाय का दबदबा था, लेकिन भारतीय चाय भी उसे चुनौती दे सकती थी। एक ब्रिटिश अधिकारी को भारतीय चाय खास पसंद नहीं आई, लेकिन भारतीय कस्टम्स कमिश्नर का तर्क था कि कीमत और कम परिवहन समय के लिहाज से यह बेहतर विकल्प बन सकती है। उस समय चीन से मध्य रूस तक चाय पहुंचने में करीब 14 महीने लगते थे। ऐसे में सवाल सिर्फ चाय की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि उसकी कीमत और बाजार तक पहुंचने में लगने वाले समय का भी था।
रूस की कोशिश सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी
रूस ने अपने समुद्री व्यापार के विस्तार की योजना केवल बंबई तक सीमित नहीं रखी। इसी दौर में रूसी जहाज Tchikatcheff चीन भी गया और वहां से बड़ी मात्रा में चाय लेकर लौटा।
इस तरह रूस ब्लैक सी के बंदरगाहों को भारत और चीन के बाजारों से जोड़ने की संभावनाएं तलाश रहा था। उसका लक्ष्य एशियाई वस्तुओं तक सीधी पहुंच बनाना और अपने व्यापारिक नेटवर्क को मजबूत करना था।
लेकिन इन सेवाओं को अपेक्षित मुनाफा नहीं मिला। ब्रिटिश Consul-General की रिपोर्ट में सरकारी सहायता पर निर्भरता और व्यापार की व्यावसायिक व्यवहार्यता को लेकर संदेह सामने आया। अंततः भारत और चीन की ओर चलने वाली ये समुद्री सेवाएं 1876 तक बंद हो गईं।
हालांकि, इन सेवाओं का बंद होना इस बात का संकेत नहीं था कि भारत और रूस के बीच व्यापार की संभावना खत्म हो गई थी। शुरुआती प्रयासों ने यह जरूर दिखाया कि समुद्री संपर्क संभव है, लेकिन उसे नियमित और लाभदायक बनाने के लिए बाजार की मांग और माल ढुलाई के संतुलन को साधना जरूरी था।
व्यापार के पीछे थी Great Game की भू-राजनीति
अब सवाल यह है कि जब मध्य एशिया में रूस और ब्रिटेन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी, तब रूस की इस समुद्री पहल को कैसे देखा जाए?
1871 में दोनों साम्राज्यों के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध मौजूद थे। लेकिन मध्य एशिया और अफगानिस्तान में प्रभाव बढ़ाने की होड़ ने उनके रिश्तों में संदेह पैदा कर दिया था। यही प्रतिद्वंद्विता आगे चलकर ‘Great Game’ के नाम से मशहूर हुई।
ब्रिटेन को आशंका थी कि मध्य एशिया में रूस का बढ़ता प्रभाव उसके भारतीय साम्राज्य के हितों के लिए चुनौती बन सकता है। इसलिए रूस की गतिविधियों पर नजर रखना ब्रिटिश अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण था।
इसलिए नखिमोव की यात्रा को सीधे रूस की कोई रणनीतिक या सैन्य चाल मानना सही नहीं होगा। उपलब्ध विवरण इसे मुख्य रूप से व्यापार बढ़ाने और एशियाई बाजारों तक पहुंच बनाने की पहल के रूप में दिखाते हैं। हालांकि, उस दौर के राजनीतिक माहौल में इस तरह की कारोबारी गतिविधियां भी साम्राज्यों की निगरानी और आपसी संदेह से पूरी तरह अलग नहीं थीं।
बंबई क्यों बना इस कहानी का अहम केंद्र?
1870 के दशक में बंबई अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद कपास के कारोबार ने उसकी अहमियत और बढ़ा दी थी। स्वेज नहर खुलने के बाद यूरोप और बंबई के बीच भाप से चलने वाले जहाजों की आवाजाही के लिए भी नई संभावनाएं पैदा हुईं।
रूस के लिए बंबई तक पहुंचने का अर्थ था भारतीय कपास और दूसरी वस्तुओं की आपूर्ति के लिए एक नया रास्ता तलाशना। इससे यूरोपीय बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और अपने जहाजों के जरिए कारोबार बढ़ाने की संभावना बनती थी।
हालांकि, किसी नए समुद्री मार्ग का खुलना अपने आप में सफल व्यापार की गारंटी नहीं था। नखिमोव के अनुभव ने दिखाया कि बाजार की मांग, दोनों दिशाओं में माल की उपलब्धता और यात्रा की लागत उतने ही जरूरी थे जितना कि समुद्री संपर्क।
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नखिमोव की यात्रा की असली अहमियत क्या थी?
नखिमोव की 1871 की यात्रा बड़ी व्यापारिक सफलता नहीं बन सकी और भारत-चीन के लिए रूस की शुरुआती समुद्री सेवाएं 1876 तक बंद हो गईं। लेकिन इसने ओडेसा और बंबई के बीच सीधे समुद्री व्यापार की संभावनाओं को जरूर परखा। एक तरफ कपास, चाय और मसालों का कारोबार था, तो दूसरी तरफ रूस-ब्रिटेन के बीच Great Game की प्रतिद्वंद्विता। आज भारत-रूस संबंध रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष सहयोग के लिए जाने जाते हैं, लेकिन दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को समुद्र के रास्ते जोड़ने की कोशिशें करीब 155 साल पहले ही शुरू हो चुकी थीं।
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