चार रातें और अधूरा प्रेम... मॉस्को में जब रूस की कहानी भारत की जुबान में उतरी
'यह एक अद्भुत रात थी, ऐसी रात जैसी सिर्फ जवानी में ही हो सकती है।'
रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की के उपन्यास वाइट नाइट्स (White Nights) की शुरुआत कुछ इसी भाव से होती है। एक ऐसी रात से, जिसमें आसमान तारों से भरा है, मन में अनगिनत कल्पनाएं हैं और अकेलेपन के बीच भी जिंदगी से उम्मीद बाकी है। लेकिन इस कहानी का असली जादू रात की खूबसूरती में नहीं, उस मुलाकात में है जो एक अकेले इंसान की दुनिया बदल देती है।
10 अक्टूबर को मॉस्को में इसी कहानी पर आधारित हिंदी म्यूजिकल प्ले ‘चांदनी रातें’ का मंचन हुआ। ओवरसीज बिहार एसोसिएशन (OBA) और जवाहरलाल नेहरू कल्चरल सेंटर (JNCC), भारतीय दूतावास के सहयोग से आयोजित इस प्रस्तुति को मुंबई के रंगमंच समूह ‘आरंभ’ ने पेश किया। नाटक का निर्देशन पूर्वा नरेश ने किया। मॉस्को के बाउमन मॉस्को स्टेट टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कॉन्सर्ट हॉल में हुई इस प्रस्तुति ने एक रूसी साहित्यिक रचना को हिंदी के जरिए नए दर्शकों तक पहुंचाया है।

इस आयोजन की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं कि मॉस्को में हिंदी नाटक हुआ। दिलचस्प बात यह है कि कहानी रूस की है, उसकी संवेदनाएं दुनियाभर के लोगों से जुड़ती हैं और उसे पेश करने का माध्यम हिंदी है। यानी एक लेखक, एक कहानी और एक भाषा के जरिए दो संस्कृतियों के बीच संवाद का मौका बना।
एक अकेला आदमी, जो अपनी कल्पनाओं में जीता है
1848 में प्रकाशित White Nights दोस्तोयेव्स्की की शुरुआती चर्चित रचनाओं में से एक है। दोस्तोयेव्स्की की कहानी रूस के सेंट पीटर्सबर्ग शहर में घटती है। गर्मियों में यहां वाइट नाइट्स का अनोखा नजारा दिखाई देता है। रात में भी आसमान पूरी तरह अंधेरा नहीं होता, सूरज मुश्किल से डूबता है और हल्की रोशनी देर तक बनी रहती है। इसी धुंधली रोशनी के बीच कहानी का नायक रहता है। एक युवक, जिसे ‘ड्रीमर’ कहा गया है। वह शर्मीला और अकेला है। उसके दोस्त नहीं हैं, लोगों से मेलजोल कम है और उसकी ज्यादातर जिंदगी कल्पनाओं में गुजरती है।
एक रात उसकी मुलाकात नास्तेंका नाम की लड़की से होती है, जो नहर के किनारे रो रही है। जब एक शराबी आदमी उसे परेशान करने लगता है, तो युवक उसकी मदद करता है। इस घटना से दोनों के बीच बातचीत शुरू होती है। अगले चार दिनों तक उनकी मुलाकातें होती हैं। नास्तेंका उसे अपनी जिंदगी के बारे में बताती है और युवक को लगता है कि आखिरकार उसे कोई ऐसा मिल गया है, जिसके साथ वह अपना अकेलापन बांट सकता है।
लेकिन नास्तेंका की जिंदगी में कोई और भी है। वह एक ऐसे व्यक्ति से प्यार करती है, जो शहर छोड़कर गया था और जिसके लौटने का वह इंतजार कर रही है। युवक धीरे-धीरे नास्तेंका से प्रेम करने लगता है, मगर उसके मन में अपने लिए ऐसी ही भावना होने की उम्मीद नहीं कर पाता।
चार रातें, एक इंतजार और अधूरा प्रेम
White Nights की कहानी चार रातों और उसके बाद आने वाली सुबह के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है। हर मुलाकात के साथ दोनों के बीच अपनापन बढ़ता है। नास्तेंका भी अपने जीवन की कहानी सुनाती है। वह एक ऐसे व्यक्ति का इंतजार कर रही है, जिसने उससे लौटने का वादा किया था। एक साल बीत चुका है, लेकिन वह वापस नहीं आया। युवक नास्तेंका की बात सुनता है और उसकी मदद करने की कोशिश करता है। वह उसके पुराने प्रेमी तक संदेश पहुंचाने में भी मदद करता है। लेकिन इस दौरान उसके भीतर एक दूसरी कहानी जन्म ले रही होती है। वह नास्तेंका से प्रेम करने लगता है।
यहां कहानी की सबसे मार्मिक स्थिति पैदा होती है। युवक जानता है कि नास्तेंका किसी और का इंतजार कर रही है, फिर भी उसके साथ बिताए पल उसे उम्मीद देते हैं। दूसरी ओर, नास्तेंका उसे अपना भरोसेमंद दोस्त मानती है। उसे इस बात का अंदाजा नहीं कि जिस व्यक्ति से वह अपने प्रेम की बातें कर रही है, उसका दिल भी उसके लिए धड़कने लगा है। चौथी रात तक इंतजार और बेचैनी दोनों के लिए मुश्किल हो जाते हैं। नास्तेंका का प्रेमी लौटता नहीं, तो युवक अपने मन की बात कह देता है। कुछ पल के लिए लगता है कि शायद अब दोनों एक-दूसरे के साथ नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं। लेकिन तभी नास्तेंका का पुराना प्रेमी सामने आ जाता है। वह उसके पास चली जाती है।
युवक फिर अकेला रह जाता है।
इस कहानी का दुख सिर्फ इतना नहीं कि उसे प्रेम नहीं मिला। दुख यह भी है कि जिस मुलाकात ने उसे जिंदगी से जुड़ने की उम्मीद दी थी, वही मुलाकात उसे फिर उसके अकेलेपन के सामने खड़ा कर देती है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि उन चार रातों में उसने कुछ पाया ही नहीं?
दोस्तोयेव्स्की इस सवाल का आसान जवाब नहीं देते। कहानी का नायक दुखी है, लेकिन उसके जीवन में आए उन कुछ पलों की अहमियत खत्म नहीं हो जाती। शायद यही वजह है कि यह कहानी आज भी पाठकों को छूती है।

प्रेम का मतलब सिर्फ किसी को पा लेना नहीं
हम प्रेम की कहानियों में अक्सर एक तयशुदा अंत खोजते हैं। दो लोग मिले, प्रेम हुआ और आखिरकार वे साथ हो गए। लेकिन जिंदगी हमेशा इस ढांचे में नहीं चलती। कई बार कोई रिश्ता हमारे जीवन में बहुत कम समय के लिए आता है, फिर भी हमें अपने बारे में कुछ ऐसा सिखा जाता है जो लंबे समय तक साथ रहता है। White Nights इसी अधूरेपन की कहानी है। इसका नायक नास्तेंका को नहीं पा पाता, लेकिन उसके साथ बिताए समय में वह अपनी भावनाओं को पहचानता है। वह पहली बार किसी के सामने खुलता है। वह सिर्फ कल्पनाओं में नहीं, वास्तविक जीवन में भी एक संबंध का अनुभव करता है।
यही इस कहानी की खूबसूरती और उसकी तकलीफ दोनों हैं। किसी के लिए हमारे मन में प्रेम हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उस व्यक्ति के मन में भी वैसी ही भावना हो। और कभी-कभी किसी के जीवन में हमारी भूमिका उस भूमिका से अलग होती है, जिसकी हम उम्मीद करते हैं।
जब रूसी कहानी हिंदी के मंच पर पहुंची
किसी साहित्यिक रचना को मंच पर लाना सिर्फ उसके कथानक को दोहराना नहीं होता। नोवल में लेखक पाठक के मन तक पहुंचने के लिए शब्दों, विचारों और वर्णन का सहारा ले सकता है। रंगमंच पर यही काम कलाकारों की आवाज, शरीर, संगीत, रोशनी और मंच की गतिविधियों से होता है।
’चांदनी रातें’ की प्रस्तुति में इसी बदलाव की गुंजाइश दिखाई देती है। नाटक की कहानी चार रातों के दौरान प्रेम, इंतजार और अकेलेपन के बीच आगे बढ़ती है। इसकी प्रस्तुति में भारतीय शास्त्रीय संगीत और पूर्वी यूरोपीय संगीत के रंगों के साथ नृत्य और हिंदी कविता को भी जोड़ा गया। कहानी को ‘ड्रीमर’, प्रेम करने वाली स्त्री और एक मौन दर्शक के नजरिए से देखने की कोशिश इसके भावनात्मक पहलुओं को अलग-अलग तरह से सामने लाती है।
नाटक में ‘ड्रीमर’ की भूमिका भारतीय एक्टर मंत्रा ने निभाई, जबकि नास्तेंका के किरदार में शरवरी देशपांडे नजर आईं। पूर्वा नरेश के निर्देशन में तैयार इस प्रस्तुति ने हिंदी भाषा के जरिए एक रूसी कहानी को मंच पर जीवंत किया।
यहां हिंदी महज संवाद बोलने का माध्यम नहीं रह जाती। वह एक दूसरी संस्कृति की कहानी को समझने और उससे भावनात्मक रिश्ता बनाने का रास्ता बनती है। दर्शक भले ही सेंट पीटर्सबर्ग की गलियों से परिचित न हों, लेकिन अकेलेपन, इंतजार और प्रेम की उलझनों को समझने के लिए उन्हें किसी खास शहर की जानकारी की जरूरत नहीं है।
’रूसी और भारतीयों का दिल एक जैसा धड़कता है’
’चांदनी रातें’ में ‘ड्रीमर’ का किरदार निभाने वाले अभिनेता मंत्रा के लिए रूस में भारतीय नाटक पेश करना एक खास अनुभव रहा है। वह कहते हैं कि रूसी और भारतीय लोगों की भावनाएं एक-दूसरे से काफी मिलती हैं। रूस आने का यह उनका चौथा साल है और हर बार उन्हें दोनों देशों के लोगों के बीच यह समानता महसूस हुई है। मंत्रा इससे पहले रूस में शेक्सपियर के मैकबेथ, महाराष्ट्र की लावणी और शेक्सपियर के एक नाटक का हिंदी रूपांतरण भी पेश कर चुके हैं। उनके मुताबिक, रूसी दर्शकों ने इन प्रस्तुतियों को पसंद किया। मंत्रा का अनुभव बताता है कि भाषा और भौगोलिक दूरी के बावजूद रंगमंच ऐसी कहानियां सामने ला सकता है, जिनकी भावनाओं से अलग-अलग संस्कृतियों के लोग जुड़ सकें।
भारत और रूस के रिश्तों में संस्कृति की जगह
रूस में भारत के राजदूत विनय कुमार ने ‘चांदनी रातें’ के मंचन को भारत-रूस के गहरे साहित्यिक और सांस्कृतिक रिश्तों की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की White Nights भारत में भी काफी मशहूर है और इस कहानी पर आधारित हिंदी नाटक का रूस में मंचन दोनों देशों के बीच साझा संवेदनाओं को सामने लाता है। उनके मुताबिक, कार्यक्रम में मौजूद भारतीय मूल के दर्शकों और रूसी मित्रों ने इस कहानी से जुड़ाव महसूस किया।
विनय कुमार ने यह भी कहा कि भारत और रूस के संबंधों की बुनियाद सिर्फ व्यापार, निवेश, रक्षा या विज्ञान-तकनीक तक सीमित नहीं है। इसके पीछे दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क और मजबूत सांस्कृतिक रिश्तों की लंबी परंपरा है। उन्होंने लियो टॉल्स्टॉय और महात्मा गांधी के संबंधों, रूस में निकोलस रोरिक की कला तथा योग और आयुर्वेद की लोकप्रियता का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन इस साझा विरासत को और मजबूत बनाते हैं।
यह बात महत्वपूर्ण है। देशों के रिश्ते सिर्फ सरकारी समझौतों या आर्थिक लेन-देन से नहीं बनते। किताबें, फिल्में, संगीत और रंगमंच भी लोगों को एक-दूसरे के करीब लाते हैं। जब कोई रूसी दर्शक हिंदी में पेश की गई कहानी से जुड़ता है, या भारतीय दर्शक रूसी लेखक के पात्र में अपने जीवन की झलक देखता है, तो संस्कृति दोनों समाजों के बीच एक साझा जमीन तैयार करती है।
भारतीय सिनेमा में भी White Nights की कहानी की गूंज सुनाई देती है। राज कपूर की फिल्म छलिया (1960) और संजय लीला भंसाली की सांवरिया (2007) का जिक्र इस रूसी कहानी के भारतीय संदर्भ में किया जाता है। दिलचस्प यह है कि दोस्तोयेव्स्की की कहानी साहित्य से निकलकर भारतीय सिनेमा तक पहुंची और अब हिंदी रंगमंच के जरिए मॉस्को में पेश की गई। एक रूसी लेखक की कहानी को भारतीय कलाकारों ने हिंदी में मंच पर उतारा। यह सफर दिखाता है कि प्रेम, इंतजार और अकेलेपन जैसी भावनाएं भाषाओं और सरहदों से परे जाकर भी लोगों से जुड़ सकती हैं।

कहानी खत्म होती है, उसका एहसास नहीं
’चांदनी रातें’ का मॉस्को में मंचन कई स्तरों पर मायने रखता है। यह दोस्तोयेव्स्की की कहानी को नए दर्शकों तक ले जाता है, हिंदी रंगमंच की पहुंच को दूसरे देश तक बढ़ाता है और भारत-रूस के सांस्कृतिक रिश्तों को एक ठोस उदाहरण देता है। लेकिन इस पूरे अनुभव के केंद्र में आखिरकार वही अकेला युवक और नास्तेंका हैं। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि इंसान को हमेशा बड़ी घटनाओं की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक मुलाकात, कुछ बातचीत और थोड़ी-सी उम्मीद भी जिंदगी में गहरा बदलाव ला सकती है।
हर प्रेम कहानी का अंत साथ रहने में नहीं होता। कुछ कहानियां हमें यह समझाकर खत्म होती हैं कि किसी के करीब आने का अनुभव भी अपने आप में एक उपलब्धि है, भले ही वह रिश्ता हमेशा के लिए न रहे। दोस्तोयेव्स्की ने लगभग दो सदी पहले जिस अकेलेपन और उम्मीद को शब्द दिए थे, वह आज भी हमारे आसपास मौजूद है। मॉस्को में हिंदी में प्रस्तुत ‘चांदनी रातें’ इसी बात की याद दिलाती है कि भाषाएं अलग हो सकती हैं, कहानियों के रूप बदल सकते हैं, लेकिन मनुष्य की कुछ भावनाएं समय और सरहदों से आगे निकल जाती हैं।