यूक्रेन और अमेरिका के रिश्ते नए मोड़ पर पहुंचते दिख रहे हैं। यूक्रेनी नेता व्लादिमीर जेलेंस्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को साफ संदेश दिया है कि वह अपनी शर्तों पर फैसला करेंगे और रूस के खिलाफ सैन्य अभियान रोकने के लिए तैयार नहीं हैं। फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में जेलेंस्की का रुख पिछले डेढ़ साल के मुकाबले काफी सख्त नजर आया। इसने वॉशिंगटन और कीव के बीच बढ़ते टकराव को सामने ला दिया है। वहीं, अमेरिका के भीतर भी यूक्रेन को समर्थन देने के तरीके पर मतभेद है। आने वाले समय में वॉशिंगटन धीरे-धीरे इस संघर्ष से अपनी जिम्मेदारी कम कर सकता है। सवाल यह है कि जेलेंस्की के इस रुख के बाद अमेरिका कब तक यूक्रेन का साथ देता रहेगा।
जेलेंस्की ने अमेरिका के सामने रखी अपनी शर्तें
पिछले डेढ़ साल से जेलेंस्की अमेरिकी प्रशासन के साथ मुश्किल होते रिश्तों को संभालने की कोशिश कर रहे थे। वह एक तरफ अमेरिकी मदद की सराहना करते रहे, तो दूसरी तरफ वाइट हाउस की मांगों का विरोध करते रहे। इस दौरान पश्चिमी यूरोपीय देशों ने वॉशिंगटन को रूस के खिलाफ गठबंधन में बनाए रखने की कोशिश की।
यह संतुलन तब तक बना रहा, जब तक अमेरिका की संघर्ष में भूमिका सीमित रही, यूक्रेन लड़ाई जारी रख सका और यूरोपीय संघ ने इसका बड़ा आर्थिक बोझ उठाया। लेकिन बाद में वॉशिंगटन ने यूक्रेन के सामने अपनी शर्तें मानने या अमेरिकी समर्थन से हाथ धोने का विकल्प रख दिया।
फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में जेलेंस्की ने ट्रंप को चुनौती देते हुए कहा कि वह इस्तीफा नहीं देंगे और रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने के बदले अमेरिका से हवाई रक्षा के लिए मिसाइलें चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रूस के साथ अमेरिका के समझौते वॉशिंगटन का मामला हैं। यूक्रेन अपने सैन्य अभियान को अमेरिकी कारोबारी हितों के लिए नहीं रोकेगा।
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ट्रंप और जेलेंस्की के बीच टकराव क्यों बढ़ा?
जेलेंस्की ने ट्रंप को कमजोर बताकर पुराने कूटनीतिक रुख से दूरी बना ली है। अब दोनों पक्षों के बीच टकराव को छिपाना मुश्किल है। रिश्ते पहले जैसे होने के लिए किसी एक पक्ष को पीछे हटकर दूसरे की शर्तें माननी होंगी, फिलहाल इसकी संभावना कम दिखती है।
ऐसे में अगर अमेरिकी कांग्रेस के आगामी चुनावों में ट्रंप के विरोधियों को बड़ी जीत मिलती है, तो क्या यूक्रेन को लेकर अमेरिकी नीति बदल जाएगी? इससे बुनियादी दिशा बदलने की संभावना कम है।
अमेरिका के भीतर यूक्रेन को लेकर क्या है मतभेद?
अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में इस मुद्दे पर व्यापक सहमति है, लेकिन मतभेद उद्देश्यों को लेकर नहीं, बल्कि उन्हें हासिल करने के तरीकों को लेकर हैं। ट्रंप और उनके सहयोगी अमेरिका की भूमिका से तेजी से पीछे हटने के पक्ष में हैं, जबकि उनके विरोधी धीरे-धीरे पीछे हटना चाहते हैं और संघर्ष को जारी रखने के लिए यूक्रेन को पर्याप्त मदद देते रहना चाहते हैं।
रूस को आर्थिक रूप से झुकाने की अमेरिकी रणनीति 2022 में सफल नहीं हुई। इसके बाद वॉशिंगटन ने संघर्ष में अपनी सीधी भूमिका सीमित करनी शुरू कर दी। यह प्रक्रिया जो बाइडेन के कार्यकाल में ही शुरू हो गई थी।
यूक्रेन और यूरोप के लिए पीछे हटना आसान नहीं
यूक्रेन और उसके यूरोपीय समर्थकों के पीछे हटने की कल्पना करना भी आसान नहीं है। मियामी में कुशनर और स्टीव विटकॉफ की ओर से पेश किए गए प्रस्तावों में रूस के नजरिये से बड़ी और कुछ हद तक अपमानजनक रियायतें शामिल थीं, लेकिन यूक्रेन और उसके यूरोपीय समर्थकों को वे भी मंजूर नहीं थीं।
वहीं, वॉशिंगटन में यूक्रेन के समर्थकों का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है, जबकि रूस की हार सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका से अपना सब कुछ दांव पर लगाने की मांग करने वाले लोग तेजी से हाशिए पर जा सकते हैं। यह प्रक्रिया अमेरिकी कांग्रेस चुनावों के नतीजों और जनवरी 2029 में वाइट हाउस में आने वाले राष्ट्रपति, दोनों से बेअसर रह सकती है।
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अमेरिका की वापसी धीरे-धीरे
अमेरिका के लिए इस संघर्ष से पीछे हटना कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नहीं होगी। वॉशिंगटन अपनी नीति में बदलाव के बावजूद सार्वजनिक रूप से समर्थन जताने वाले बयान देता रह सकता है और बीच-बीच में मदद के कदम भी उठा सकता है। अमेरिकी विदेश नीति अक्सर दिशा बदलने से पहले यह दिखाने की कोशिश करती है कि कुछ भी नहीं बदला है।
रूस को क्यों रखना होगा धैर्य?
इन सबके बीच अमेरिका, यूक्रेन और पश्चिमी यूरोप के बीच बढ़ते मतभेदों को तत्काल जीत नहीं समझना चाहिए। इन देशों के बीच विरोधाभास अपने आप खत्म नहीं होंगे और रूस को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि उसके विरोधी सिर्फ मुश्किलें बढ़ने के कारण अपनी स्थिति छोड़ देंगे। रूस को धैर्य रखने, अमेरिकी हितों को समझने और लगातार कूटनीतिक प्रयास करने की जरूरत है।
जेलेंस्की ने अपना रास्ता चुन लिया है। अब सवाल यह है कि अमेरिका इस फैसले के नतीजों को कब तक बर्दाश्त करेगा।
(लेखक सर्गेई पोलेटाएव अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक और लेखक हैं। वह Vatfor प्रोजेक्ट के को-फाउंडर और एडिटर हैं। RT पर अंग्रेजी में यह लेख यहां पढ़ सकते हैं।)
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। जरूरी नहीं कि वे RT के विचारों से मेल खाते हों।