कागज की जगह भारत पॉलिमर नोटों की तरफ क्यों बढ़ रहा है?

कागज की जगह भारत पॉलिमर नोटों की तरफ क्यों बढ़ रहा है?

भारत में पॉलिमर नोट की चर्चा ने एक बार फिर तब जोर पकड़ा जब 27 जुलाई को मॉनसून सत्र के दौरान लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने एक बयान दिया। उन्होंने बताया कि RBI ने ₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ पॉलिमर नोट फील्ड ट्रायल के लिए जारी करने का प्रस्ताव दिया था।
अपर्णा रांगड़अपर्णा रांगड़ Published

जरा सोचिए... आपकी जेब में रखा 10 रुपये का नोट अचानक बदल जाए। उसे हाथ में लेते ही एहसास हो कि ये कागज नहीं है। इसकी सतह कहीं ज्यादा स्मूद है जैसे पैकेजिंग टेप या लेमिनेशन फिल्म जैसा, लेकिन मजबूत भी। कहीं थोड़ा हल्की खुरदरी बनावट, कहीं सॉफ्ट.. इसे मोड़िए, मसल दीजिए, इसपर पानी गिरा दीजिए... फिर भी यह लगभग वैसा ही रहेगा। पैंट की जेब में रख धुल भी जाए तो भी नहीं... इसमें एक ट्रांसपेरेंट हिस्सा नजर आएगा, जिसमें बदलते रंग उभरते दिखेंगे जो सिर्फ रंग नहीं सिक्योरिटी फीचर का काम करेंगे। ये आम नोट नहीं, यही है पॉलिमर  बैंकनोट, जिसे आम लोग प्लास्टिक नोट भी कह रहे हैं। जो कुछ वक्त में भारत की हकीकत बन सकता है। और आपके हाथ में नजर आ सकता है। 

भारत में पॉलिमर  नोट की चर्चा ने एक बार फिर तब जोर पकड़ा जब 27 जुलाई को मॉनसून सत्र के दौरान लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने एक बयान दिया। उन्होंने  बताया कि RBI ने ₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ पॉलिमर नोट फील्ड ट्रायल के लिए जारी करने का प्रस्ताव दिया था। जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। 

इसके साथ ही भारत में पॉलिमर नोट का रास्ता खुल जाएगा। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी अपने एक बयान में बताया कि आरबीआई का लक्ष्य वित्त वर्ष 2028 की शुरुआत में  पॉलिमर करेंसी नोटों या प्लास्टिक नोटों को सर्कुलेशन में लाने का है और इसके लिए लगातार तैयारियां जारी हैं. 

क्या भारत से पहले पॉलिमर नोट कहीं और भी चलन में हैं? जवाब है हां... दुनिया के 60 से ज्यादा देशों ने पूरी या आंशिक रूप से पॉलिमर (प्लास्टिक) बैंकनोट अपनाए हैं। इस तकनीक की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में की थी और वह पॉलिमर नोट जारी करने वाला दुनिया का पहला देश बना। इसके बाद कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, न्यूजीलैंड, रोमानिया और वियतनाम सहित कई देशों ने भी अपनी करेंसी में पॉलिमर नोट शामिल किए। 

ऑस्ट्रेलियाई पॉलिमर नोट सैंपल, फोटो-रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलियाRT© RT Hindi

लेकिन क्या ये पॉलिमर प्लास्टिक ही होता है? 

पॉलिमर वह मूल पदार्थ (Material) है जिससे प्लास्टिक बनता है, लेकिन करेंसी बनाने के लिए जो पॉलिमर इस्तेमाल किया जाता है वो है- BOPP (Biaxially Oriented Polypropylene). यानी एक खास तरह का पॉलिमर। 

BOPP- पॉलिमर का एक खास और हाई-ग्रेड टाइप है। इसे दोनों दिशाओं में खींचकर (Biaxially Oriented) ज्यादा मजबूत, टिकाऊ और ट्रांसपेरेंट बनाया जाता है। ये समझिए कि अगर प्लास्टिक एक गाड़ी है तो BOPP- बुलेटप्रूफ गाड़ी है। एडवांस और अपग्रेडेड वर्जन।  यानी हर BOPP एक तरह का प्लास्टिक है, लेकिन हर प्लास्टिक BOPP नहीं होता।

₹10 और ₹20 के नोटों का ट्रायल ही क्यों? 

ऑल्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे बड़े देशों के साथ कई अन्य देश 100 %  पॉलिमर करेंसी के मॉडल पर चल रहे हैं यानी यहां करेंसी सिर्फ पॉलिमर नोट वाली ही चलती है। लेकिन इसके पीछे किसी भी देश के रिजर्व बैंक की लगभग एक सी सोच रही है। 

कैनेडियन डॉलर पॉलिमर नोट सैंपल, फोटो-बैंक ऑफ कनाडाRT© RT Hindi

हर साल करोड़ों रुपये खर्च करके नए नोट छापे जाते हैं। लेकिन RBI ने फिलहाल ₹10 और ₹20 के नोटों को पॉलिमर नोट के ट्रायल के लिए चुना है क्योंकि ये सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नोट हैं। रोज़ाना लाखों हाथों से गुजरने की वजह से ये जल्दी गंदे, फटते और खराब हो जाते हैं। यही कारण है कि सरकार ने पहले चरण में ₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी है। इन ट्रायल के नतीजों के आधार पर ही आगे बड़े पैमाने पर पॉलिमर नोटों को अपनाने पर फैसला लिया जाएगा। 

10 ka jote kharab kaise hota haiRT© RT Hindi

भारतीय रिजर्व बैंक अपनी क्लीन नोट नीति (Clean Note Policy) के तहत यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि आम जनता को अच्छी गुणवत्ता वाले बैंक नोट चलन में उपलब्ध हों। इसके तहत गंदे या पुराने नोटों को समय-समय पर चलन से हटाकर उनकी जगह नए नोट जारी करने पड़ते हैं। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था और नकदी का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे करेंसी प्रिंटिंग पर होने वाला खर्च भी बढ़ता जा रहा है। इसी चुनौती से निपटने के लिए पॉलिमर बैंकनोट लाने की जरूरत महसूस की गई। 

देश में ₹10 और ₹20 के कितने नोट चलन में? 

RBI की एनुअल रिपोर्ट 2025-26 के मुताबिक (https://www.rbi.org.in/Scripts/AnnualReportPublications.aspx?Id=1468 ) , 2025 से मार्च 2026 के अंत तक देश में बैंक नोटों के कुल चलन में मात्रा (Volume) के हिसाब से 10.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। नोटों की संख्या के हिसाब से ₹500 के नोटों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही, जबकि उसके बाद ₹10 के नोट सबसे ज्यादा संख्या में चलन में रहे। RBI के डाटा के मुताबिक ₹10 और ₹20 जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों का इस्तेमाल लगातार बड़ी मात्रा में हो रहा है। 

Denomination (₹)202420252026
₹102,49,5062,53,5902,75,652
₹201,33,9731,38,3981,40,527

पॉलिमर नोट कैसे अलग?

  • कम खराब होंगे: पॉलिमर नोट सामान्य कागज के नोटों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत होते हैं। ये जल्दी नहीं फटते और लंबे समय तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

  • पानी और नमी का असर कम: बारिश, पसीना, नमी और धूल-मिट्टी का इन पर कम असर पड़ता है, जिससे ये ज्यादा समय तक साफ और उपयोगी बने रहते हैं।

  • कम बार छापने पड़ेंगे: नोटों की उम्र बढ़ने से बार-बार नए नोट छापने की जरूरत घटेगी, जिससे लंबे समय में सरकार और RBI की लागत कम हो सकती है यानी प्रिंटिंग कॉस्ट कम होगी

  • बेहतर सुरक्षा: पॉलिमर नोटों में पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) विंडो, होलोग्राम और अन्य आधुनिक सिक्योरिटी फीचर जोड़े जा सकते हैं, जिससे उनकी नकली कॉपी बनाना काफी मुश्किल हो जाता है।

  • करेंसी मैनेजमेंट आसान: कम खराब होने वाले नोटों के कारण बैंकों और रिजर्व बैंक पर पुराने नोटों को वापस लेने और नए नोट जारी करने का बोझ भी घट सकता है (रिप्लेसमेंट प्रेशर)।

पॉलिमर  नोट समय की मांग है और करेंसी सिस्टम की जरूरत भी। लेकिन इस दिशा में भारत में अबतक क्या-क्या हुआ है? 

 

भारत में पॉलिमर नोट प्लान की टाइमलाइन- 

भारत में पॉलिमर नोटों की चर्चा नई नहीं है। इसकी शुरुआत 2009 में हुई, जब RBI ने पहली बार ₹10 के पॉलिमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट प्रस्तावित किया। इसके बाद सरकार और RBI ने कई वर्षों तक इसकी लागत, टिकाऊपन और सुरक्षा पहलुओं की स्टडी की और 2013 में पांच शहरों में फील्ड ट्रायल भी किए। इसके बाद 2014 में सरकार ने संसद में पायलट प्रोजेक्ट की जानकारी दी। 2017 में RBI ने फिर ट्रायल की योजना दोहराई, लेकिन आगे प्रगति नहीं हुई। हालांकि, इसके बाद यह योजना लंबे समय तक ठंडे बस्ते में रही। करीब एक दशक बाद 2026 में इस परियोजना ने फिर रफ्तार पकड़ी। पहले RBI ने पॉलिमर (BOPP) सब्सट्रेट की खरीद की प्रक्रिया शुरू की और फिर 27 जुलाई 2026 को सरकार ने ₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि फिलहाल देश के सभी कागजी नोटों को पॉलिमर नोटों से बदलने की कोई योजना नहीं है।

नकली नोटों के खिलाफ बड़ा हथियार

भारत में फिलहाल पॉलिमर नोटों को मुख्य रूप से सुरक्षा के नजरिए से नहीं देखा जा रहा है। RBI का फोकस अभी उनकी टिकाऊ क्षमता और लंबे समय में लागत कम करने पर है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पॉलिमर नोटों की सबसे बड़ी ताकत उनकी बेहतर सुरक्षा मानी जाती है। पारदर्शी सिक्योरिटी विंडो, उन्नत प्रिंटिंग तकनीक और कई स्तरों वाले सुरक्षा फीचर्स के कारण इनकी नकल करना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि कई देशों ने पॉलिमर नोटों को नकली नोटों (कॉउंटरफेट करेंसी) के खिलाफ एक प्रभावी हथियार के रूप में अपनाया है। 

पॉलिमर नोटों की नकल करना इतना मुश्किल क्यों है?

पॉलिमर नोट सिर्फ मजबूत ही नहीं होते, बल्कि सुरक्षा के मामले में भी कागजी नोटों से कई कदम आगे माने जाते हैं। इनमें ऐसी कई आधुनिक सुरक्षा तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनकी हूबहू नकल करना बेहद मुश्किल होता है।

इनमें ट्रांसपेरेंट सिक्योरिटी विंडो, मल्टी-लेयर प्रिंटिंग, रंग बदलने वाली विशेष स्याही (Colour-Shifting Ink), माइक्रोटेक्स्ट, उभरी हुई छपाई (Raised Tactile Printing), ऑप्टिकल मूवमेंट इफेक्ट्स, UV लाइट में दिखने वाले सुरक्षा फीचर और नोट के आगे-पीछे की सटीक प्रिंट रजिस्ट्रेशन जैसी अत्याधुनिक तकनीकें शामिल होती हैं।

यही मल्टी लेयर सिक्योरिटी पॉलिमर नोटों को नकली नोट बनाने वालों के लिए बड़ी चुनौती बना देती है। 

comparisonRT© RT Hindi

पॉलिमर नोट आने के साथ और क्या-क्या बदलेगा? 

सरकार के इस दिशा में बढ़ने के साथ कई सवाल और चुनौतियों को लेकर चिंताएं भी सामने आ रही हैं। जैसे- ट्रायल सफल रहा तो क्या कागजी 10 और 20 के नोट बंद हो जाएंगे? 

इसपर सरकार ने संसद में जवाब दिया कि पॉलिमर नोट मौजूदा कागजी नोटों के साथ ही चलेंगे। फिलहाल पूरी तरह कागजी नोटों को हटाने की कोई योजना नहीं है। पेपर नोट से पॉलिमर नोट पर जाने पर क्या ATM और कैश-हैंडलिंग मशीनों में भी बदलाव की जरूरत पड़ेगी? 

अबतक जो देश पॉलिमर नोट पर शिफ्ट हुए हैं, उनके हिसाब से ATM मशीनों को पूरी तरह बदलना जरूरी नहीं होता, लेकिन उन्हें नए नोट की फिजिकल खूबियों के अनुरूप अपडेट, टेस्ट और व्यवस्थित करना पड़ता है। ब्रिटेन के अनुभव में केंद्रीय बैंक ने मशीनों को पॉलिमर नोट के लिए अनुकूल बनाने की जरूरत बताई थी। 

ब्रिटेन में पेपर से पॉलिमर नोटों की ओर बदलाव के दौरान ATM और दूसरी कैश मशीनों को भी अपडेट करना पड़ा। नोट की अलग मोटाई, सतह और लचीलेपन के हिसाब से मशीनों के सॉफ्टवेयर, सेंसर्स, रोलर्स को टेस्ट किया गया। बैंक ऑफ इंग्लैंड ने नई करेंसी जारी करने से पहले मशीन निर्माताओं को स्पेसिमेन (सैंपल) नोट्स देकर टेस्टिंग कराई, ताकि ATM नोट को सही तरीके से पहचान, गिन और डिस्पेंस कर सकें। 

डिजिटल पेमेंट पर क्या असर?

डिजिटल पेमेंट को लेकर सरकार ने स्पष्ट किया है कि पॉलिमर नोट आने से डिजिटल पेमेंट पर क्या असर होगा, इसका आकलन ट्रायल और नियमित जारी होने के बाद ही किया जा सकेगा।

पॉलिमर नोट सिर्फ कागज की जगह प्लास्टिक लाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के पूरे करेंसी मैनेजमेंट सिस्टम को ज्यादा टिकाऊ, सुरक्षित और कुशल बनाने की कोशिश है। ₹10 और ₹20 से शुरू होने वाला यह ट्रायल अगर उम्मीदों पर खरा उतरता है, तो आने वाले समय में यह तय कर सकता है कि भारत की जेब में रखी करेंसी कैसी दिखेगी और कितने लंबे समय तक चलेगी। फिलहाल इसे बदलाव की शुरुआत समझिए, किसी बड़े बदलाव का ऐलान नहीं-क्योंकि सरकार ने साफ किया है कि कागजी नोट अपनी जगह बने रहेंगे। अब असली परीक्षा ट्रायल की है। क्या भारत भी ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की तरह पॉलिमर करेंसी की ओर बढ़ पाएगा।