सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसा मामला पहुंचा है, जो भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। पार्टी बदलने के ट्रेंड को हमेशा के लिए प्रभावित कर सकता है।
हां, देश की सबसे बड़ी अदालत ने सोमवार को इस बात की जांच करने पर सहमति जताई है कि अगर किसी विधायक या सांसद के अपनी मर्जी से इस्तीफा देने के कारण होने वाले उपचुनाव में वह फिर से चुनाव लड़ने आते हैं, तो क्या उन्हें पिछले इलेक्शन में हुए चुनाव आयोग का पूरा खर्च देना चाहिए?
वो मामला, जहां से सवाल उठा
वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जे. बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच को बताया कि AIADMK के टिकट पर तमिलनाडु विधानसभा के लिए चुने गए छह लोगों ने चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद मई-जून में इस्तीफा दे दिया और TVK में शामिल हो गए।
इनमें से दो लोगों ने इस्तीफा दिया, जिसके कारण उपचुनाव हुए। इन उपचुनावों में वे फिर से जीतकर आए, लेकिन इस बार TVK (सीएम विजय की पार्टी) के उम्मीदवार के रूप में।
सुप्रीम कोर्ट से अपील
याचिकाकर्ता के. सुथन की ओर से पेश, सीनियर एडवोकेट आलम ने कहा कि कोर्ट को यह जांच करनी चाहिए कि क्या अपनी मर्जी से इस्तीफा देने वाले किसी विधायक या सांसद को पांच साल तक राज्य या संसदीय चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और इस्तीफा देकर दल बदलने वाले AIADMK के उन छह विधायकों को नोटिस जारी किया है।
'मतलब' के लिए इस्तीफे का चलन
हां, विधायकों का सत्ताधारी दल में शामिल होने और अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए सीट से इस्तीफा देने का चलन बढ़ा है।
इसी के संदर्भ में याचिकाकर्ता ने ऐसे विधायी उपाय की मांग की है, जिससे चुने गए प्रतिनिधियों की वित्तीय जवाबदेही तय करने के लिए एक तंत्र बनाया जा सके।
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याचिकाकर्ता का कहना है कि यह उन प्रतिनिधियों पर लागू होगा जो बिना किसी कानूनी रूप से मान्य और ठोस कारण के अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे देते हैं। इसमें 'चुनाव व्यय सुरक्षा' (Election Expenditure Security) लागू करना भी शामिल है, जिससे इसके कारण होने वाले उपचुनावों का खर्च वसूला जा सके।