PDA, मुस्लिम वोट और AIMIM: अखिलेश-आजम की मुलाकात, 2027 से पहले का सियासी गणित समझिए

आजम खान से अखिलेश यादव की मुलाकात महज दो नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि 2027 से पहले एसपी के सियासी समीकरणों का संकेत भी है। सवाल है कि आजम की नाराजगी, मुस्लिम वोटों और ओवैसी की चुनौती के बीच यह मुलाकात कितना असर डालेगी।

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने गुरुवार, 22 अक्टूबर को रामपुर जेल में आजम खान से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। एक साल में यह उनकी तीसरी मुलाकात है। अखिलेश यादव करीब डेढ़ बजे रामपुर पहुंचे। उनका हेलीकॉप्टर जौहर यूनिवर्सिटी में बने हेलीपैड पर उतरा। यहां से वह कार से सीधे जेल रवाना हुए। उनके साथ कार में आजम खान के बड़े बेटे अदीब भी थे, हालांकि वह जेल के अंदर नहीं गए।

आजम खान से मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने कहा, “आजम थे, आजम हैं, आजम रहेंगे।”

आजम खान अपने बेटे अब्दुल्लाह आजम के साथ पैन कार्ड मामले में रामपुर जेल में बंद हैं। एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट ने उन्हें सात साल की सजा सुनाई है। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की है और राहत का इंतजार कर रहे हैं।

मुलाकात के बाद क्या बोले अखिलेश?

आजम खान से मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि उनके परिवार के साथ अन्याय हुआ है और उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी को शिक्षा और जौहर यूनिवर्सिटी की कोई चिंता नहीं है।अखिलेश ने कहा कि यूनिवर्सिटी को बर्बाद करने के लिए जानबूझकर साजिश रची गई। उनके मुताबिक, शायद ही किसी दूसरी सरकार या तानाशाही शासन ने शिक्षा के क्षेत्र को इतना नुकसान पहुंचाया हो।

अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी प्रमुख
“झूठे मुकदमों में किसी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। इसमें समय लग सकता है, देरी हो सकती है, लेकिन झूठे आरोप सच को हमेशा दबाकर नहीं रख सकते। सच यह है कि आजम खान और समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय की व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।”
अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी प्रमुख
अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी प्रमुख

अखिलेश यादव ने कहा कि उनकी बातचीत अच्छी हुई। उन्होंने आजम खान के जल्द स्वस्थ होने और उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद भी जताई।

यह मुलाकात क्यों अहम है?

अखिलेश यादव पर आरोप लगते रहे हैं कि वह आजम खान से मिलने से बचते हैं। इससे पहले 30 सितंबर को तजीन फातिमा और अदीब ने लखनऊ में अखिलेश से उनके आवास पर मुलाकात की थी। 

जब आजम खान जेल में थे, तब अखिलेश यादव उनसे सिर्फ एक बार मिले थे। यह मुलाकात 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुई थी।

जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद 5 अक्टूबर 2025 को अखिलेश रामपुर पहुंचे थे। वहां उन्होंने आजम खान और उनके परिवार से मुलाकात की थी। करीब एक महीने बाद, 7 नवंबर 2025 को आजम खान लखनऊ आए और अखिलेश यादव के आवास पर उनसे मिले। जेल से रिहाई के बाद प्रदेश की राजधानी की यह उनकी पहली यात्रा थी।

इससे पहले अखिलेश और आजम खान के बीच सब कुछ ठीक नहीं होने के कयास लगाए जा रहे थे। अब माना जा रहा है कि ताजा मुलाकात से इन अटकलों पर विराम लग सकता है।

उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
“अखिलेश यादव की इस मुलाकात के दो मकसद दिखाई देते हैं। पहला, यह संदेश देना कि उन्होंने आजम खान को छोड़ा नहीं है, वे उनके साथ हैं और उनकी चिंता करते हैं। दूसरा, अंदरखाने आजम के साथ समझदारी बनाए रखना और उनकी राय लेना। भले ही यह राय सार्वजनिक न हो, लेकिन मुलाकात का राजनीतिक एजेंडा यही होता है।”
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक

अखिलेश के 'PDA' के लिए आजम जरूरी?

अखिलेश यादव के सामने 2027 के विधानसभा चुनाव में बड़ी चुनौती है। वह PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले के जरिए चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे में PDA का ‘A’, यानी अल्पसंख्यक वोट बैंक, उनके लिए अहम है।

पार्टी के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक के खिसकने की आशंका के बीच अखिलेश की आजम खान से मुलाकात को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आजम प्रदेश के प्रमुख अल्पसंख्यक नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में इस मुलाकात को मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखने की अखिलेश की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
“चाहे मुलायम सिंह यादव रहे हों या अखिलेश यादव, मुस्लिम समुदाय ने उन्हें हमेशा अपना बड़ा नेता माना है। अखिलेश को किसी खास चेहरे की जरूरत नहीं है, लेकिन वे अपने पिता के पुराने साथियों का सम्मान करना जानते हैं। निर्णय हमेशा अखिलेश यादव ही लेते हैं और उन्होंने यह करके दिखाया भी है।”
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक

आजम का प्रदेश की 25 से 30 सीटों पर प्रभाव

2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की करीब 20 करोड़ आबादी में लगभग 20 प्रतिशत, यानी करीब चार करोड़ मुसलमान हैं। ऐसे में जेल में रहते हुए भी आजम अखिलेश के लिए दो कारणों से अहम हैं:

आजम खान का राजनीतिक प्रभाव मुख्य रूप से रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल में माना जाता है। रामपुर के अलावा मुरादाबाद, संभल, अमरोहा और बिजनौर जैसे जिलों में भी समाजवादी पार्टी की चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका अहम रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में मुरादाबाद मंडल की 27 सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 17 पर जीत दर्ज की थी। आजम ने भी जेल में रहते हुए रामपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीता था। हालांकि, उसी साल नफरती भाषण मामले में सजा के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई। बाद में इस मामले में उन्हें बरी कर दिया गया।

उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
“आजम खान की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है। वे एक बड़े नेता हैं और उनके समर्थक सिर्फ पश्चिमी यूपी ही नहीं, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश तक फैले हैं। यह अल्पसंख्यक समाज के लिए एक भावनात्मक मुद्दा भी है।”
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक

2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो 30 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी वाले 14 जिलों में NDA और समाजवादी गठबंधन के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली थी। इन जिलों की 75 सीटों में से NDA ने 38 और समाजवादी गठबंधन ने 37 सीटें जीती थीं। ऐसे में इन जिलों में बीजेपी को हराने के लिए समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम वोटरों को एकजुट रखना जरूरी है। इस लिहाज से आजम की भूमिका अहम हो जाती है।

सिन्हा कहते हैं, “आजम फिलहाल चुनाव हरवाने या जितवाने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वे जेल में हैं। अगर वे बाहर होते तो तस्वीर कुछ और हो सकती थी। उनके बयान चर्चा में रहते हैं और कई बार दोनों पक्षों पर असर डालते हैं। यहां तक कि रिवर्स पोलराइजेशन भी करा देते हैं। लेकिन जेल में रहने के चलते उनका सीधा चुनावी प्रभाव अभी जमीन पर उस रूप में नहीं दिखता।”

AIMIM कितना बड़ा फैक्टर?

2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। उसे कुल वोटों का करीब 0.5 प्रतिशत हिस्सा मिला और पार्टी के उम्मीदवारों को लगभग 4.5 लाख वोट मिले। इससे पहले, 2017 के चुनाव में पार्टी को महज 0.24 प्रतिशत वोट मिले थे।

हालांकि, कुछ सीटों पर AIMIM का प्रभाव दिखा था। जौनपुर की शाहगंज और बाराबंकी की कुर्सी सीट पर पार्टी ने हार-जीत के अंतर को प्रभावित किया था। शाहगंज में निषाद पार्टी ने सिर्फ 719 वोटों से जीत दर्ज की थी, जबकि AIMIM उम्मीदवार को 8 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। मुस्लिम वोटों के बंटवारे से समाजवादी पार्टी को नुकसान हुआ था। कुर्सी सीट पर भी ऐसा ही देखने को मिला था। इसके अलावा, मुबारकपुर सीट पर पार्टी के उम्मीदवार को 16 प्रतिशत वोट मिले थे।

हालांकि, उत्कर्ष सिन्हा का मानना है कि गठबंधन के मौजूदा दौर में ओवैसी यूपी में कोई बड़ा फैक्टर नहीं हैं। उनके मुताबिक, ओवैसी के पास इतना बड़ा वोट बैंक नहीं है कि वह इंडिया गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकें।

उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
“ओवैसी की पार्टी पहले भी चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन कभी एक प्रतिशत वोट शेयर से ऊपर नहीं जा पाई। वह उस दौर में भी असर नहीं डाल पाई, जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे। अब तो दोनों दल गठबंधन में हैं। ओवैसी के पास इतना वोट बैंक नहीं है कि वे चुनाव में ‘वोट कटवा’ साबित होकर इंडिया गठबंधन को बड़ा नुकसान पहुंचा सकें।”
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक

समाजवादी पार्टी के साथ मुस्लिम वोटर

CSDS-लोकनीति सर्वे के मुताबिक, 2022 में 79 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी (SP) को वोट दिया। 2017 में यह आंकड़ा 46 प्रतिशत था।

वहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले मुस्लिम मतदाताओं के बीच बीजेपी के समर्थन में मामूली बढ़ोतरी हुई। 2017 में पार्टी को 5 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे, जो 2022 में बढ़कर 8 प्रतिशत हो गए।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) के समर्थन में बड़ी गिरावट आई। 2017 में 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने BSP का समर्थन किया था, जबकि 2022 में यह घटकर 6 प्रतिशत रह गया। कांग्रेस को भी मुस्लिम मतदाताओं के बीच नुकसान हुआ। 2017 में जहां 19 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस का समर्थन किया था, वहीं 2022 में यह आंकड़ा घटकर 3 प्रतिशत रह गया।

उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
“इस बार उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं में काफी स्पष्टता है। अब यह भ्रम नहीं है कि वोट कांग्रेस को दें, बीएसपी को दें या एसपी को। बीएसपी अपने पूरे राजनीतिक इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में है। वहीं, इंडिया गठबंधन के तहत एसपी-कांग्रेस के साथ होने से मुस्लिम समुदाय के सामने कोई असमंजस नहीं बचा है। वोट बंटने की कोई गुंजाइश नहीं दिखती।”
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक
उत्कर्ष सिन्हा, राजनीतिक विश्लेषक

वहीं 2022 चुनावों में आधे से ज्यादा हिंदू मतदाताओं ने बीजेपी का समर्थन किया था। समाजवादी पार्टी को 26% हिंदू वोट मिले, जो 2017 के चुनाव में 18% थे। बहुजन समाज पार्टी (BSP) को 14% और कांग्रेस को 2% हिंदू मतदाताओं का समर्थन मिला।

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने प्रदेश की 403 सीटों में से 273 पर जीत दर्ज की थी। समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 125 सीटें मिलीं। कांग्रेस की सीटें सात से घटकर दो रह गईं, जबकि BSP को सिर्फ एक सीट मिली। यह पार्टी का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था।

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