मानवाधिकार के नाम पर प्रेशर पॉलिटिक्स, जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र को दिखाया आईना

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार के मुद्दे पर चुनिंदा देशों को निशाना बनाने और राजनीतिक दबाव के लिए हथियार के रूप में इसके इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। इस बीच एक अहम सवाल खड़ा होता है कि क्या मानवाधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संस्थान अलग-अलग देशों के मामलों में समान रवैया अपनाते हैं?

संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत ने मानवाधिकार के मुद्दे पर चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के ट्रेंड्स पर सवाल उठाए हैं। भारत ने स्पष्ट कहा कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या किसी देश को चुनकर निशाना साधने के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए। भारत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय और स्वतंत्र विशेषज्ञों ने भारत में हालिया प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और हिरासत में लिए गए लोगों के साथ कथित दुर्व्यवहार पर चिंता जताई थी। ऐसे में भारत का कड़ा रुख मानवाधिकारों के नाम पर UN के दोहरे रवैये को उजागर करता है।

मानवाधिकारों पर भारत ने UN को क्या सुनाया?

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में जबरन या अनैच्छिक रूप से लापता मामलों पर चर्चा के दौरान विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने भारत का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों को राजनीतिक दबाव या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के मुताबिक, ताम्रकार ने भारतीय संविधान और देश की स्वतंत्र संस्थाओं का जिक्र करते हुए कहा कि देश में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कई व्यवस्थाएं मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसके अलावा स्वतंत्र न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग, मीडिया और नागरिक समाज भी जवाबदेही सुनिश्चित करने में भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जहां कानून का शासन कायम है। किसी व्यक्ति के लापता होने के आरोपों पर न्यायिक हस्तक्षेप और कानूनी राहत के रास्ते उपलब्ध हैं।

UN में भारतीय विदेश मंत्रालय की उप सचिव
मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के औजार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) जैसी कानूनी व्यवस्था के जरिए किसी भी कथित गुमशुदगी के मामले में राहत देने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
बरखा ताम्रकार
बरखा ताम्रकार
UN में भारतीय विदेश मंत्रालय की उप सचिव

भारत में प्रदर्शनों पर चिंता, यूरोप के मामलों में कहां गई वो सख्ती?

अक्टूबर 2026 में भारत में हुए प्रदर्शनों के दौरान कथित पुलिस ज्यादती और बड़े पैमाने पर हिरासत में लिए जाने के मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) और स्वतंत्र विशेषज्ञों ने चिंता जताई। विशेषज्ञों ने बल प्रयोग की निष्पक्ष जांच कराने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल के इस्तेमाल को रोकने की मांग की थी। भारत सरकार ने इन टिप्पणियों को अपने आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए खारिज किया था।

इस मामले ने एक अहम सवाल खड़ा किया है कि क्या मानवाधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संस्थान अलग-अलग देशों के मामलों में समान रवैया अपनाते हैं? भारत में पुलिस कार्रवाई पर सार्वजनिक चिंता जताने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका को लेकर यह सवाल उठाया जा सकता है कि फ्रांस, बेल्जियम, इटली और अल्बानिया समेत दूसरे देशों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में भी क्या इसी स्तर की तत्परता दिखाई जाती है? वहीं, यूरोप में हुए प्रदर्शनों पर संयुक्त राष्ट्र ने हल्के अंदाज में चिंता जताते हुए एक मामूली सा बयान जारी कर दिया।

बलूचिस्तान से अमेरिका तक, मानवाधिकारों पर पश्चिम का रवैया सवालों के घेरे में

मानवाधिकार के मुद्दे पर भारत को घेरने में संयुक्त राष्ट्र (UN) और पश्चिमी देशों की सक्रियता अक्सर चर्चा में रहती है। भारत में प्रदर्शनों, पुलिस कार्रवाई या नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं चिंता जताती हैं और सरकार से जवाब मांगती हैं। लेकिन जब इसी तरह के सवाल पश्चिमी देशों के अपने यहां या उनके करीबी देशों में उठते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया की तीव्रता और प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े होते हैं। फ्रांस समेत यूरोप के कई देशों में हिंसक प्रदर्शन और आगजनी, अमेरिका में हिंदू मंदिरों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं और पाकिस्तान के बलूचिस्तान में लंबे समय से जारी मानवाधिकार संकट इस बहस के अहम उदाहरण हैं।

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अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हमले, चिंता कितनी व्यापक?

अमेरिका में हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। इन घटनाओं ने धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हिंदू समुदाय के खिलाफ नफरती गतिविधियों और हमलों पर भी चिंता जताई जाती रही है। संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर धार्मिक स्थलों पर हमलों को लेकर सामान्य चिंता व्यक्त की गई ना कि सरकार से सवाल किए गए।

ऐसे में यह सवाल भी प्रासंगिक है कि हिंदू समुदाय के खिलाफ हमलों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और पश्चिमी सरकारों की प्रतिक्रिया कितनी व्यापक और लगातार रहती है। भारत से जुड़े मामलों में तत्काल सार्वजनिक बयान देने वाली संस्थाओं से यह उम्मीद भी की जा सकती है कि वे अमेरिका समेत दूसरे देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के मामलों को समान गंभीरता से उठाएं।

बलूचिस्तान में गुमशुदगी और हिंसा, पाकिस्तान से मांगी जवाबदेही?

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी, हिरासत में कथित दुर्व्यवहार और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर लंबे समय से आरोप सामने आते रहे हैं। इस क्षेत्र में जारी संकट की गंभीरता को देखते हुए यह सवाल उठाया जाता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी रही है और क्या जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त दबाव बनाया गया है।

भारत का संदेश: मानवाधिकार राजनीतिक दबाव का हथियार न बनें

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत की ओर से विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने कहा कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। अगर किसी देश में हुई घटना पर तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया दी जाती है, तो दूसरे देशों में सामने आने वाले समान मामलों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जानी चाहिए। मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता का अर्थ यही है कि उनकी रक्षा के मानदंड राजनीतिक हितों, रणनीतिक साझेदारियों या भौगोलिक सीमाओं के आधार पर नहीं बदलने चाहिए।