
अफगानिस्तान की INSIDE STORY: काबुल में कदम रखते ही भ्रम टूटता है
दिल्ली से काबुल की इंटरनैशनल फ्लाइट। आपका यह सफर कुछ अलग है, इसका अहसास आपको प्लेन में अपनी सीट लेते-लेते होने लगता है। इंटरनैशल फ्लाइट, वह भी इतनी खाली-खाली! पहली नजर में यह चीज आपका ध्यान खींचती है। यह अफगानिस्तान के उस खालीपन का अहसास दिला जाता है, जिसे अमेरिका 5 साल पहले उजाड़ हालत में छोड़ गया था। अफगानिस्तान में चीजें इतनी आसान नहीं हैं। वहां की जमीन पर कदम रखते ही यह पता लगने लगता है। काबुल शुरुआत में किसी दूसरे दक्षिण एशियाई शहर जैसा लगता है। लेकिन धीरे-धीरे आपका भ्रम टूटता है। अमेरिका के जाने के बाद पिछले 5 साल से अफगानिस्तान में तालिबान का शासन है। खासतौर से विदेशी पत्रकारों के लिए काफी पाबंदियां हैं। एक पत्रकार का तालिबान के आला लोगों तक सीधे पहुंच जाना, इतना आसान नहीं है। यह एक चुनौतीपूर्ण यात्रा के जैसा है, जिसमें आपको कागजी मंजूरियों और तलाशियों के कई चरणों से गुजरना पड़ता है। और यह बेहद सब्र का काम है।
काबुल की सड़कों पर दूसरे मुल्कों से अलग तीन खास फर्क आपको महसूस होते हैं। पहला- सड़कों पर अधिकतर पुरुष ही दिखाई पड़ते हैं। महिलाएं मुश्किल से नजर आती हैं। दूसरा- ट्रैफिक सिग्नल हो या तमाम चेक पॉइंट्स, वहां तालिबान पुलिस और ट्रैफिक पुलिस के लोग मुस्तैद दिखते हैं। उनके पास बड़ी-बड़ी बंदूकें हैं। जितनी बड़ी रैंक, उतनी बड़े बंदूकें। इसमें कई बंदूकें अमेरिकन हैं। और आपके जेहन से यह बात फिर टकराती है कि बरसों तक जंग में धकेल दिए गए मुल्क के हाथ में क्या थमा दिया गया है। कैसे जंग की उस छाया से अभी तक यह मुल्क बाहर नहीं निकल पाया है।

और तीसरी चीज जो दिखती है, वह है गरीबी। और यह हर मोड़ पर बहुत साफ झलकती है। जंग ने ‘काबुलीवाला’ के इस दिलदार और हंसते-खेलते मुल्क को वक्त से काफी पीछे धकेल दिया है। अमेरिका के लौटने के बाद अफगानिस्तान को मिलने वाली विदेशी मदद भी सूख गई। अफगानिस्तान एक ऐसी जगह है, जहां प्राकृतिक आपदाएं बहुत आती हैं। हाल में कई ऐसी घटनाएं घटीं। पाकिस्तान के साथ संघर्ष अलग चल रहा है। पाकिस्तान और ईरान, दोनों तरफ से लोगों को वापस धकेला जा रहा है। और ये संख्या लाखों में है। तालिबान ने उन लोगों को अंदर ले लिया है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है।
परमिशन, परमिशन और परमिशन का दौर…
अफगानिस्तान में आपको उसके हिसाब से ढलना पड़ता है। जर्नलिस्ट वीजा होने पर भी ऐसा नहीं है कि आप सीधे कैमरा निकालकर शूट करने लगें। इसके लिए मंजूरी चाहिए। प्रशासनिक अफसरों और मिनिस्ट्री से यह परमिशन लेटर मिलते हैं। और सब्र की नई यात्रा यहां से शुरू होती है।

एक परमिशन लेटर, दूसरा परमिशन लेटर, तीसरा, चौथा परमिशन… यह सिलसिला चलता है। लेकिन जो एक बात दिल को छूती है, वह है इस पूरे प्रोसेस में तालिबानी अधिकारियों की विनम्रता। परमिशन लेटर लेकर जब आप शूट के लिए निकलते हैं, तो आपको पता चलता है कि यह काफी नहीं है। हर एरिया का एक अलग परमिशन लेटर जुटाना होता है। और कई बार यह सब कुछ बहुत थकाऊ लगने लगता है। अफगानिस्तान की इस यात्रा में मेरे पहले कुछ दिन तो इसी में निकल गए कि कितने लेटर लेने हैं और कहां-कहां से लेने हैं। एक पत्रकार के तौर पर मैंने कई सारे देशों में काम किया है, लेकिन अफगानिस्तान का लैंडस्केप बिल्कुल अलग है। एक पत्रकार के तौर पर काफी चैलेंजिंग भी।
तलाशी, तलाशी, तलाशी…
अफगानिस्तान में परमिशन की तरह तलाशियों का भी लंबा दौर चलता है। तालिबान अधिकारी हर कदम पर आपकी जांच करते हैं। तलाशी ली जाती। तलाशी एक ऐसा शब्द था, जो काफी बार आपके कानों में पड़ता है। कदम-कदम पर तलाशी होती है। चाहे आप अपने होटल में ही क्यों न जा रहे हों। तलाशी, तलाशी, तलाशी... । हालांकि, इसमें सभी अधिकारी बेहद विनम्र नजर आते हैं। तलाशी लेने के बाद उनके शब्द होते- आप खफा मत होइए। यह हमारी ड्यूटी है। यह अच्छा लगता है। और उनकी चिंता समझ भी आती है। एक ऐसा देश जो इतने साल जंग में रहा हो, उससे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह आपको शक की नजर से न देखे।

काबुल के बाहर अनछुई सी खूबसूरती
काबुल के बाहर हर प्रांत में जाने के लिए आपको अलग-अलग परमिशन लेटर की जरूरत होती है। काबुल से आगे बढ़ने पर हर प्रांत बहुत ही खूबसूरत दिखते हैं। कुदरत मानो ठहर गई हो। बिल्कुल अनछुए से। ये वो जगहें हैं, जहां लोगों ने 40 साल जंग देखी। इसके जख्म दिखते हैं। सड़कें इतनी अच्छी नहीं हैं। विकास मानो कहीं पीछे छूट गया हो।
अफीम की जगह अब राजमा और भुट्टा
अफगानिस्तान का अजरा जिला। काबुल से करीब 100 किलोमीटर दूर यह जिला अफगानिस्तान-पाकिस्तान बॉर्डर के पास पड़ता है। अजरा कभी अफीम की खेती के लिए बदनाम था। अमेरिका जब तक अफगानिस्तान में रहा, अजरा दुनिया में अफीम का कटोरा बना रहा। गजब बात यह कि पिछले पांच साल में तालिबान ने इस जिले में अफीम की खेती लगभग खत्म करवा दी। इतने सालों में अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय जो नहीं कर पाया, या शायद करना ही नहीं चाहता था, तालिबान ने वह कर दिया। आखिर यह हुआ कैसे? तालिबानी अधिकारियों ने बताया कि इसके लिए काफी सख्ती की गई। लोगों से कहा कि अफीम उगाने पर शरिया कानून के हिसाब से सजा मिलेगी। शुरुआत में मुश्किलें आईं, लेकिन अब धीरे-धीरे अजरा के खेतों में ज्वार, राजमा और भुट्टे की फसलें लहलहा रही हैं। हालांकि, पहले अगर किसान 8000 अफगानी कमाते थे, तो अब घटकर 1000 अफगानी ही रह गए हैं।
तालिबान के शासन में कितना बदला अफगानिस्तान
जंग ने भले ही अफगानिस्तान को बहुत पीछे धकेल दिया हो। तालिबान के कानून पिछली सदी जैसे लगते हों, लेकिन जंग के बाद जो एक चीज बदली हुई दिखती है कि लोग कम से कम बम की दहशत में नहीं हैं। इस मुल्क ने 40 साल जंग झेली है। इसमें 20 साल अमेरिका के साथ चली जंग थी। पहले डर होता था कि कहीं ऊपर से बम न गिर जाए। लेकिन कम से कम अब ऐसा नहीं है। मैं बहुत सारे इलाकों में गई, जहां नाटो बेस थे। वहां बड़ी संख्या में कब्रें ही कब्रें दिखाई देती हैं। यूएस ऑपरेशन और दूसरे हमलों में न जाने कितने लोगों ने जानें गंवाईं।

एक दूसरी बात। वेस्टर्न मीडिया में अक्सर अफगानिस्तान की एक अलग तस्वीर पेश की जाती रही है। जैसे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। लेकिन सवाल यह कि क्या इसका जिम्मेदार सिर्फ तालिबान है? इसके बारे में कोई बात नहीं करता कि उनका जो बैंकिंग सेक्टर है उस पर काफी प्रतिबंध लगे हैं। बहुत सारी फ्रीज संपत्तियां हैं, जो पश्चिमी बैंकों में पड़ी हैं। वो अफगान लोगों का पैसा है, लेकिन अमेरिका नहीं दे रहा। लेकिन अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लगाना अमेरिकी ट्रिक है। तालिबान की अपनी पॉलिसी भी एक बड़ा फैक्टर है। उन्होंने जिस तरह से शरिया लागू किया हुआ है, उसमें लोन देना हराम है। बैंक आसानी से लोन भी नहीं देते हैं। लोगों के पास विकल्प बहुत कम हैं। वे दूसरे देशों से ट्रेड नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि बैंकिंग सिस्टम नहीं है। बहुत कुछ हवाला के जरिए कर रहे हैं, लेकिन उससे कुछ खास नहीं हो पाता है। दूसरे देश ऐसे कारोबार क्यों करना चाहेंगे?
दुनिया से बात करना चाहता है तालिबान
मैं तालिबान के कई सीनियर लीडरों से मिलीं। उनके इंटरव्यू किए। मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद, सूचना मंत्री, डेप्युटी मिनिस्टर... उन्होंने मेरे सवालों के अच्छे से जवाब दिए। उन्होंने मुझे सवाल पूछने की आजादी दी। उन्होंने बताया कि वे लड़ाई नहीं चाहते हैं, शांति चाहते हैं, सिर्फ अपने लिए नहीं पूरे क्षेत्र के लिए। वे भारत, रूस और चीन से दोस्ती बढ़ाना चाहते हैं। यहां तक कि वे अमेरिका से भी कोई दुश्मनी नहीं रखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि अमेरिका का दूतावास वहां खुल जाए। साथ-साथ अफगानिस्तान की एंबेसी भी यूएस में खुले। उनसे बात करके ऐसा लगा कि यह ऐसा तालिबान है, जो दुनिया से संवाद करना चाहता है। वह अलग-थलग नहीं रहना चाहता है।
अफगानिस्तान से ग्राउंड रिपोर्ट यहां देखिए।