इजरायल के चुनाव नतीजों का असर सिर्फ देश की नई सरकार के गठन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पश्चिम एशिया की राजनीति, ईरान के साथ टकराव और अरब देशों के साथ इजरायल के रिश्तों पर भी चर्चा तेज होगी। हालांकि, जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट खीवराज जांगिड़ का मानना है कि इजरायल में प्रधानमंत्री कोई भी बने, उसकी सुरक्षा नीति में बड़े बदलाव की गुंजाइश कम है। वहीं, चुनाव में अरब पार्टियों के बेहतर प्रदर्शन से देश की घरेलू राजनीति में उनकी हिस्सेदारी और मुद्दों को ज्यादा जगह मिल सकती है।
सरकार बदले या PM, इजरायल की सुरक्षा नीति में बदलाव मुश्किल
खीवराज जांगिड़ के मुताबिक, इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बने रहें या उनकी जगह कोई दूसरा नेता आए, देश की सुरक्षा नीति लगभग वैसी ही रहने की संभावना है। इसकी वजह यह है कि नेतन्याहू के विरोधी नेता भी हमास, फिलिस्तीनी मुद्दे और ईरान को लेकर काफी हद तक उनके जैसी ही रणनीतिक सोच रखते हैं। उनका कहना है कि इजरायल के राजनीतिक नेतृत्व में इस बात को लेकर व्यापक सहमति है कि देश को आने वाले लंबे समय तक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में सैन्य ताकत बढ़ाने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर बना रहेगा।
जांगिड़ के मुताबिक, इसलिए चुनाव नतीजों से ईरान, हमास और फिलिस्तीनी मुद्दे पर इजरायल के रुख में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
अरब पार्टियों के उभार से इजरायल की घरेलू राजनीति में क्या बदलेगा?
इजरायल के चुनाव में अरब पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 19 सीटें हासिल की हैं। अरब नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट को 11 और राअम पार्टी को 8 सीटें मिली हैं। 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद में अरब पार्टियों का यह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। इस नतीजे से इजरायल की राजनीति में अरब अल्पसंख्यकों की भागीदारी और उनके मुद्दों को नई जगह मिलने की संभावना बढ़ी है।
जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट खीवराज जांगिड़ इसे इजरायल की लोकतांत्रिक व्यवस्था और वहां रहने वाले अरब अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके मुताबिक, इजरायल के बाहर अरब देशों के साथ उसके रिश्तों में तनाव और टकराव की स्थिति रही है, लेकिन देश के भीतर अरब नागरिकों को वोट देने, चुनाव लड़ने और राजनीतिक व्यवस्था में बराबरी का अवसर मिलना एक अहम पहलू है।
जांगिड़ के मुताबिक, इसका दूसरा बड़ा असर यह होगा कि इजरायल की राजनीति में अरब अल्पसंख्यकों के मुद्दों को अब ज्यादा जगह मिलेगी। पहले यहूदी पार्टियों के बीच राजनीतिक मतभेदों में अरब समुदाय के सवालों को उतनी अहमियत नहीं मिलती थी। लेकिन अरब पार्टियों की मजबूत मौजूदगी से यह स्थिति बदल सकती है। उन्होंने कहा कि अरब समुदाय के शहरों की स्थिति, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकते हैं। इससे अरब अल्पसंख्यकों को अपनी समस्याएं राजनीतिक मंच पर उठाने और उनके समाधान के लिए दबाव बनाने का अवसर मिलेगा।
नेतन्याहू की कमजोर स्थिति ट्रंप के लिए कितना बड़ा झटका?
जांगिड़ का मानना है कि इस चुनाव में नेतन्याहू को उम्मीद के मुताबिक नुकसान नहीं हुआ है। चुनाव से पहले ऐसी संभावना जताई जा रही थी कि नेतन्याहू की पार्टी को इससे भी कम सीटें मिल सकती हैं। उन्होंने इसकी तीन प्रमुख वजहें बताईं।
- पहली, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के लिए प्रधानमंत्री रहते हुए नेतन्याहू ने राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं ली।
- दूसरी, पिछले करीब तीन वर्षों में इजरायल कई मोर्चों पर संघर्ष में उलझा रहा, लेकिन इसके बावजूद हमास गाजा में कायम है और ईरान की चुनौती भी बनी हुई है।
- तीसरी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल को राजनीतिक नुकसान हुआ है। कई यूरोपीय देशों ने उससे दूरी बनाई है और सऊदी अरब के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके बावजूद नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है। हालांकि, उनके गठबंधन को बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं मिलीं और वह 53 सीटों पर सिमट गया।
जांगिड़ के मुताबिक, नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति का अमेरिका की घरेलू राजनीति, खासकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति पर सीधा असर पड़ने की संभावना नहीं है।
जांगिड़ के मुताबिक, अमेरिका का इजरायल की राजनीति पर असर पड़ता है, लेकिन इजरायल की राजनीति का अमेरिका पर वैसा असर नहीं होता। इसलिए नेतन्याहू की सीटें घटने या उनकी सरकार बदलने से ट्रंप की अमेरिकी राजनीति में स्थिति पर सीधा असर पड़ने की संभावना नहीं है।