इजरायल में फिर चुनाव या जोड़-तोड़ की सरकार? अब ये 3 ऑप्शन

इजरायल के चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर रह गया है। विपक्ष के पास उन्हें सत्ता से हटाने का गणित है, लेकिन अरब पार्टियों के साथ गठबंधन और दक्षिणपंथी सहयोगियों के विरोध जैसी चुनौतियां भी हैं। ऐसे में अब सिर्फ 3 ऑप्शन नजर आ रहे हैं।

इजरायल के चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनकी लिकुड पार्टी संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी धार्मिक पार्टियों के साथ मिलकर भी वह बहुमत के आंकड़े तक पहुंचती नहीं दिख रही। दूसरी ओर, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास भी अपने दम पर सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें नहीं हैं। सवाल है कि अब क्या होगा?

इजरायल की 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। अब तक करीब 90.4% वोटों की गिनती के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं, गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलने की संभावना है। अरब पार्टियों को मिलाकर 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इस तरह विपक्षी गठबंधन और अरब पार्टियों के पास कुल 67 सीटों का गणित बनता है। हालांकि, अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर विपक्ष के भीतर मतभेद हैं। इसलिए नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर होने के बावजूद सरकार बनाने की दौड़ से बाहर नहीं हुआ है। अभी स्पेशल कैटेगरी के वोटों की गिनती बाकी है और अंतिम आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को आने की उम्मीद है।

इस चुनाव ने इजरायल की राजनीति के सामने वही पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया है। क्या नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए उनके विरोधी एक साथ आ पाएंगे या आपसी मतभेदों का फायदा उठाकर वह एक बार फिर सरकार बनाने में कामयाब हो जाएंगे?

पहला सीन: अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बना सकते हैं आइजेनकोट

नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का सबसे सीधा रास्ता आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास है। लेकिन इस रास्ते की सबसे बड़ी शर्त है अरब पार्टियों का समर्थन हासिल करना। चुनाव के बाद उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, आइजेनकोट के नेतृत्व वाले यहूदी विपक्षी दलों के पास लगभग 48 सीटें हैं। बहुमत के लिए उन्हें कम से कम 13 और सीटों की जरूरत होगी। अरब पार्टियों के पास अनुमानित 19 सीटें हैं। अगर ये पार्टियां विपक्ष को समर्थन देती हैं, तो नेसेट में नेतन्याहू विरोधी खेमे का आंकड़ा 61 से ऊपर पहुंच सकता है।

यह गणित देखने में आसान है, लेकिन राजनीतिक रूप से काफी मुश्किल है।

अरब पार्टियों में राआम पार्टी (Ra'am Party) और जॉइंट लिस्ट (Joint List) शामिल हैं। राआम के नेता मंसूर अब्बास पहले भी इजरायल में सरकार बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा रह चुके हैं। 2021 में उनकी पार्टी ने उस गठबंधन को समर्थन दिया था, जिसने नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर दिया था। इससे यह साबित हुआ था कि अरब पार्टियों का समर्थन इजरायल की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

इस बार भी अरब पार्टियां नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए सहयोग का संकेत दे चुकी हैं। जॉइंट लिस्ट ने कहा है कि वह नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए राजनीतिक सहयोग करने को तैयार है। वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने भी अरब पार्टियों को विपक्षी खेमे का हिस्सा मानने की वकालत की है। लेकिन विपक्ष के भीतर ही इस प्रस्ताव का विरोध है।

आइजेनकोट के संभावित सहयोगियों में शामिल नफ्ताली बेनेट और अविग्दोर लिबरमैन अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर सरकार के पक्ष में नहीं रहे हैं। ऐसे में आइजेनकोट के सामने चुनौती सिर्फ अरब पार्टियों को साथ लाने की नहीं, बल्कि अपने ही खेमे को इस समझौते के लिए तैयार करने की है।

क्या अरब पार्टियों के बिना भी बन सकती है सरकार?

एक दूसरा रास्ता अल्पमत सरकार का है। इसमें आइजेनकोट के नेतृत्व वाले दल सरकार बना सकते हैं, जबकि अरब पार्टियां सरकार में शामिल हुए बिना महत्वपूर्ण विधायी फैसलों पर उनका समर्थन करें। इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था में सरकार बनाने के लिए हर स्थिति में 61 सांसदों का सीधे मंत्रिमंडल का हिस्सा होना जरूरी नहीं है। अल्पमत सरकार भी काम कर सकती है, बशर्ते वह संसद में महत्वपूर्ण फैसलों के लिए पर्याप्त समर्थन जुटा सके और अपना बहुमत खोने की स्थिति से बची रहे।

इस व्यवस्था में अरब पार्टियों को सरकार में मंत्री पद लेने की जरूरत नहीं होगी। वे बजट या विश्वास से जुड़े अहम फैसलों पर विपक्षी सरकार का साथ दे सकती हैं। लेकिन यहां भी वही राजनीतिक अड़चन है। लिबरमैन जैसे नेता इस विकल्प का विरोध कर चुके हैं। वहीं, अरब पार्टियां अपने समर्थन के बदले नीतिगत रियायतें मांग सकती हैं। ऐसे में समझौते की शर्तें तय करना आसान नहीं होगा।

इस विकल्प की सबसे बड़ी ताकत इसका संसदीय गणित है, जबकि सबसे बड़ी कमजोरी विपक्षी दलों के बीच भरोसे की कमी है। नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के मुद्दे पर एकजुट होना और लंबे समय तक साथ सरकार चलाना दो अलग-अलग बातें हैं।

दूसरा सीन: नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच बन सकती है राष्ट्रीय एकता की सरकार

अगर अरब पार्टियों के समर्थन से विपक्षी सरकार बनाने का रास्ता बंद होता है, तो दूसरी संभावना राष्ट्रीय एकता की सरकार है।

इस विकल्प में नेतन्याहू अपनी पार्टी लिकुड और अपने मौजूदा सहयोगियों के साथ सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें आइजेनकोट के खेमे या उसके किसी सहयोगी दल को अपने साथ लाना होगा। राष्ट्रीय एकता की सरकार का मतलब है कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वाले दल किसी साझा राजनीतिक या राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए मिलकर सरकार बनाएं। इजरायल में ऐसी व्यवस्था पहले भी देखने को मिली है। 2020 में नेतन्याहू और बेनी गैंट्ज के बीच सत्ता साझा करने का समझौता हुआ था। हालांकि, वह सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकी और दिसंबर 2020 में संसद भंग होने के बाद मार्च 2021 में फिर चुनाव हुए।

इस बार भी ऐसी सरकार बनने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। नेतन्याहू के लिए यह रास्ता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बहुमत के लिए जरूरी सीटें हासिल करने की कोशिश में अपने विरोधियों को साथ आने का प्रस्ताव दे सकते हैं। लेकिन विपक्ष के सामने सवाल होगा कि क्या वह उसी नेता के साथ सरकार बनाए, जिसे सत्ता से हटाने के वादे के साथ चुनाव लड़ा गया था?

क्या नेतन्याहू अपने कट्टर सहयोगियों को छोड़ेंगे?

राष्ट्रीय एकता की सरकार का सबसे बड़ा पेच नेतन्याहू के मौजूदा सहयोगी दल हैं।

उनके गठबंधन में अति-दक्षिणपंथी दलों के अलावा अति-रूढ़िवादी धार्मिक पार्टियां भी शामिल हैं। इनमें इतामार बेन-ग्विर और बेजलेल स्मोट्रिच के नेतृत्व वाले दलों के साथ शास और यूनाइटेड तोराह जूडिज्म जैसी पार्टियां शामिल हैं। विपक्ष अगर नेतन्याहू के साथ सरकार बनाने पर विचार करता है, तो वह मौजूदा गठबंधन की संरचना में बदलाव की मांग कर सकता है। इसमें किसी अति-दक्षिणपंथी दल को बाहर रखने या अति-रूढ़िवादी धार्मिक पार्टियों की कुछ मांगों पर पुनर्विचार करने की शर्त शामिल हो सकती है।

ऐसी सरकार बनने पर इजरायल की नीतियों में कुछ बदलाव की गुंजाइश हो सकती है। खासकर सेना में अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों की भर्ती और सरकार की अंतरराष्ट्रीय छवि से जुड़े मुद्दे गठबंधन वार्ता में अहम हो सकते हैं।

इजरायल में लंबे समय से अति-रूढ़िवादी समुदाय के कई पुरुषों को सैन्य सेवा से छूट मिलती रही है। इस छूट को लेकर विवाद है। विपक्ष के कुछ नेता चाहते हैं कि सैन्य सेवा के नियमों में बदलाव किया जाए। दूसरी ओर, धार्मिक पार्टियां इस मामले में अपने समुदाय के हितों की रक्षा करना चाहती हैं।

यही वजह है कि राष्ट्रीय एकता की सरकार का समझौता केवल मंत्रियों के पद बांटने तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें यह तय करना होगा कि सरकार की नीतियां किस दिशा में जाएंगी और नेतन्याहू अपने मौजूदा सहयोगियों की किन मांगों से पीछे हट सकते हैं।

नेतन्याहू के लिए यह रास्ता कितना फायदेमंद है?

नेतन्याहू के लिए इस विकल्प का फायदा यह होगा कि उन्हें सरकार से बाहर होने का जोखिम कम करने का एक और मौका मिल सकता है। अगर विपक्षी दलों में अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर सहमति नहीं बनती, तो कुछ दल राष्ट्रीय एकता की सरकार के विकल्प पर विचार कर सकते हैं। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है।

आइजेनकोट के समर्थकों ने नेतन्याहू को हटाने के लिए वोट दिया है। अगर उनकी पार्टी नेतन्याहू के साथ सरकार बनाती है, तो उनके वोटर्स नाराज हो सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय एकता की सरकार की संभावना इस बात पर निर्भर करेगी कि नेतन्याहू अपने मौजूदा सहयोगियों को कितना साथ रख पाते हैं और विपक्ष को क्या राजनीतिक रियायतें देने के लिए तैयार होते हैं।

यह विकल्प नेतन्याहू को सत्ता में बने रहने का रास्ता दे सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें अपने राजनीतिक सहयोगियों और नीतिगत प्राथमिकताओं पर समझौता करना पड़ सकता है।

तीसरा सीन: किसी को बहुमत नहीं तो फिर होंगे चुनाव

हां, अगर न तो विपक्ष अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बना पाया और न ही नेतन्याहू राष्ट्रीय एकता की सरकार के लिए जरूरी समझौता कर सके, तो इजरायल में फिर चुनाव की नौबत आ सकती है। यह कोई नई स्थिति नहीं होगी।

इजरायल पिछले कुछ वर्षों में बार-बार ऐसे राजनीतिक गतिरोध का सामना कर चुका है, जिसमें किसी भी गठबंधन के लिए बहुमत जुटाना मुश्किल हो गया था।

अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच इजरायल में पांच बार संसदीय चुनाव हुए।

अप्रैल 2019 और सितंबर 2019 के चुनावों के बाद कोई भी पक्ष सरकार बनाने में सफल नहीं हुआ। मार्च 2020 के चुनाव के बाद नेतन्याहू और बेनी गैंट्ज के बीच साझा सरकार बनी, लेकिन वह भी टिक नहीं सकी। मार्च 2021 में आठ दलों के गठबंधन ने नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर दिया।

नवंबर 2022 में हुए चुनाव के बाद नेतन्याहू फिर सत्ता में लौट आए। इस इतिहास से साफ है कि इजरायल में सबसे बड़ी पार्टी बनना और स्थिर सरकार बनाना अलग-अलग बातें हैं।

2019 से 2022 के बीच क्या हुआ था?

2019 के अप्रैल चुनाव में नेतन्याहू सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाए। इसके बाद सितंबर में दोबारा चुनाव हुए। इस बार भी किसी पक्ष के पास बहुमत नहीं था। मार्च 2020 में तीसरे चुनाव के बाद नेतन्याहू और गैंट्ज ने सत्ता साझा करने का समझौता किया। लेकिन बजट और गठबंधन से जुड़े मतभेदों के कारण यह व्यवस्था भी टूट गई। मार्च 2021 में फिर चुनाव हुए। इस बार नेतन्याहू विरोधी दलों ने अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद मिलकर सरकार बनाई। नफ्ताली बेनेट प्रधानमंत्री बने और बाद में यायर लैपिड ने पद संभाला।

हालांकि, यह गठबंधन भी एक साल से कुछ अधिक समय तक चला। संसद भंग होने के बाद नवंबर 2022 में फिर चुनाव हुए और नेतन्याहू ने दक्षिणपंथी तथा धार्मिक दलों के साथ मिलकर सरकार बना ली। इससे साफ मालूम चलता है कि इजरायल की राजनीति में गठबंधन की संभावनाएं बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती हैं कि अलग-अलग दल किसी एक मुद्दे पर कितनी देर तक साथ रह सकते हैं।

दोबारा चुनाव हुए तो नेतन्याहू को क्या फायदा होगा?

अगर मौजूदा राजनीतिक बातचीत नाकाम होती है और नए चुनाव कराने पड़ते हैं, तो नेतन्याहू को तुरंत प्रधानमंत्री पद छोड़ना जरूरी नहीं होगा।

नई सरकार के शपथ लेने तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं। इससे उन्हें राजनीतिक रूप से कुछ समय मिल सकता है। दूसरी ओर, विपक्ष को अपनी एकजुटता बनाए रखनी होगी और यह तय करना होगा कि अगली बार भी वही गठबंधन जारी रहेगा या उसकी रणनीति बदली जाएगी।

लेकिन यह जरूरी नहीं कि नए चुनाव नेतन्याहू के पक्ष में ही जाएं। मतदाता उन्हें और उनकी सरकार को लेकर क्या सोचते हैं, विपक्ष किस तरह अभियान चलाता है और अरब पार्टियों के समर्थन का सवाल कैसे उठता है, ये सभी कारक नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए नए चुनाव नेतन्याहू के लिए राहत का मौका भी हो सकते हैं और एक नया राजनीतिक जोखिम भी।

नेतन्याहू की राजनीतिक ताकत भी समझिए

बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनका राजनीतिक करियर तीन दशकों से ज्यादा लंबा है। वह 1996 से 1999 तक प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद 2009 में सत्ता में लौटे और 2021 तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहे। नवंबर 2022 के चुनाव के बाद उन्होंने फिर सरकार बनाई। उनकी राजनीतिक ताकत का एक बड़ा आधार गठबंधन की राजनीति को साधने की क्षमता रही है। इजरायल की संसद में 120 सीटें हैं। यहां किसी एक पार्टी के लिए 61 सीटें जीतना मुश्किल होता है। इसलिए सरकार बनाने के लिए पार्टियां मिलकर गठबंधन करती हैं या दूसरी पार्टियों का समर्थन लेती हैं।

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन जाए, तब भी उसे सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों की जरूरत पड़ सकती है। यही व्यवस्था उन्हें अपने सहयोगियों के साथ गठबंधन बनाकर सत्ता में बने रहने का अवसर देती रही है। लेकिन गठबंधन की यही राजनीति उनकी कमजोरी भी बनती रही है। छोटे सहयोगी दल अपनी मांगों पर अड़ जाएं, तो सरकार बनाने या चलाने में मुश्किल पैदा हो सकती है। 2019 के चुनाव के बाद सैन्य भर्ती से जुड़े विवाद में अविग्दोर लिबरमैन और अति-रूढ़िवादी धार्मिक दलों के बीच मतभेद गठबंधन बनाने में बाधा बने थे।

इस बार भी नेतन्याहू के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें अपने मौजूदा सहयोगियों को साथ रखना है और साथ ही विपक्षी खेमे से किसी दल को अपने पक्ष में लाने की संभावना भी तलाशनी है।

अरब पार्टियों की ताकत चुनौती क्यों है?

इस चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन अहम है। अनुमानों के मुताबिक, राआम पार्टी और जॉइंट लिस्ट को मिलाकर लगभग 19 सीटें मिल सकती हैं। यह संख्या उन्हें सरकार बनाने की बातचीत में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में ला सकती है। अरब पार्टियों का समर्थन विपक्ष के लिए बहुमत तक पहुंचने का रास्ता खोल सकता है। लेकिन इजरायल की राजनीति में यह मुद्दा विवादास्पद है। विपक्ष के कुछ दल अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने या उनके समर्थन पर निर्भर रहने के खिलाफ हैं। इसलिए अरब पार्टियों की बढ़ी हुई सीटें अपने आप में सरकार बदलने की गारंटी नहीं हैं। उनकी असली ताकत इस बात में है कि क्या वे विपक्षी दलों को एक साझा समझौते तक पहुंचने के लिए मजबूर कर सकती हैं।

नेतन्याहू के लिए भी यह एक अहम राजनीतिक मुद्दा है। अगर वह विपक्षी दलों के बीच अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर मतभेद बनाए रखने में सफल होते हैं, तो उनके विरोधियों के लिए सरकार बनाना कठिन हो सकता है।

अब आगे क्या होगा?

अगले चरण में इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। चुनाव के बाद राष्ट्रपति सभी निर्वाचित दलों से सलाह-मशविरा करते हैं और उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का मौका देते हैं, जिसके पास संसद में बहुमत जुटाने की सबसे मजबूत संभावना हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही अपने आप प्रधानमंत्री बन जाएगा। सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की क्षमता अहम होती है।

वहां चुने गए उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलते हैं। जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकता है। अगर पहला उम्मीदवार सफल नहीं होता, तो दूसरे उम्मीदवार को मौका मिल सकता है। सभी प्रयास नाकाम होने की स्थिति में नए चुनाव का रास्ता खुल सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह लग सकते हैं। अगर दलों के बीच बातचीत लंबी खिंचती है, तो राजनीतिक अनिश्चितता और बढ़ सकती है।

नेतन्याहू हारे नहीं, बस राह आसान नहीं

इजरायल के चुनाव में अभी सबसे अहम बात यह है कि किसी भी खेमे के पास अपने दम पर सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें नहीं हैं। नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर है, जबकि विपक्ष को सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों के समर्थन या किसी दूसरे बड़े राजनीतिक समझौते की जरूरत होगी।

पहला रास्ता विपक्ष को सत्ता तक पहुंचा सकता है, लेकिन उसके लिए अरब पार्टियों को लेकर अपने ही सहयोगियों की आपत्तियां दूर करनी होंगी। दूसरा रास्ता नेतन्याहू को राष्ट्रीय एकता की सरकार बनाने का मौका दे सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें अपने मौजूदा सहयोगियों और विपक्षी दलों के बीच संतुलन बनाना होगा। तीसरा रास्ता नए चुनाव का है, जो राजनीतिक गतिरोध को आगे बढ़ा सकता है।

नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सीटों की कमी नहीं, बल्कि यह है कि उनके विरोधी आपसी मतभेदों के बावजूद एक साझा विकल्प तैयार कर पाते हैं या नहीं। फिलहाल चुनावी नतीजों ने नेतन्याहू की सत्ता पर सवाल खड़ा किया है, लेकिन उनकी राजनीतिक पारी का अंत तय नहीं किया है। अंतिम फैसला इस बात से होगा कि इजरायल की बंटी हुई राजनीति में कौन सबसे पहले 61 सांसदों का समर्थन जुटा पाता है।