हाशिए से 'किंगमेकर' तक: कौन हैं इजरायल की अरब पार्टियां, 4 साल में कैसे बढ़ीं 80% सीटें?

इजरायल की अरब पार्टियों को 2022 में मिली 10 सीटों के मुकाबले 2026 के चुनाव में 18 सीटें मिली हैं। यानी चार साल में उनकी सीटों में 80% की बढ़ोतरी हुई है। इस उभार ने इजरायल की राजनीति में उनकी भूमिका को अहम बनाया है। अब सवाल है कि हाशिए से उभरकर ये पार्टियां सत्ता के समीकरण में 'किंगमेकर' कैसे बनीं?

इजरायल की राजनीति में एक लकड़ी और लकड़ियों के गट्ठर वाली कहावत सटीक बैठती है। अलग-अलग चुनाव लड़ने पर जिन अरब पार्टियों का असर सीमित रहता था, वही एकजुट होकर अब सत्ता के समीकरण बदलने की ताकत रखती हैं। 2026 के चुनाव के शुरुआती रुझानों में इन पार्टियों को करीब 18 सीटों पर बढ़त मिलने की बात सामने आई है। दूसरी ओर, बेंजामिन नेतन्याहू और उनके विरोधी गादी आइजेनकोट, दोनों के लिए बहुमत का आंकड़ा चुनौती बना हुआ है। ऐसे में अरब पार्टियों की एकजुटता उन्हें सरकार बनाने की कोशिशों में किंगमेकर की भूमिका के करीब ले आई है। आखिर इजरायल की अरब पार्टियों का यह सफर कैसे शुरू हुआ और वे इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं? 

2026 के इजरायल संसदीय चुनाव में अरब पार्टियों की एकजुटता ने बेंजामिन नेतन्याहू के लगातार 7वीं बार प्रधानमंत्री बनने के रथ पर लगभग रोक लगा दी है। हालांकि अभी अंतिम रिजल्ट घोषित नहीं हुआ है, लेकिन शुरुआती रुझानों में करीब 18 सीटों की लीड के साथ अरब पार्टियां बड़ी किंग मेकर बनकर उभरी हैं। अरब पार्टियों की एकजुटता की वजह से उन्हें हासिल हुई यह ताकत दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गई है। आइए जानते हैं कि इजरायल में अरब पार्टियों का उदय कैसे हुआ। इजरायल की आजादी से लेकर 2026 तक अरब पार्टियों ने अपना सफर यहां तक कैसे तय किया?


कैसे हुई अरब पार्टियों की शुरुआत?

इजरायल में 1948 की विस्थापन त्रासदी में लाखों फिलिस्तीनी अरब नागरिक लाखों की संख्या में यहीं रह गए थे, जो अब इजरायल की मौजूदा आबादी में करीब 21 फीसदी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। 1948 से 1970 के दशक में बनी अरब पार्टियां काफी कमजोर रही हैं। उनका राजनीतिक संघर्ष कई अहम चरणों से गुजरा है। इसकी शुरुआत कम्युनिस्ट पार्टी तक सीमित गतिविधियों से हुई, जिसका मकसद विस्थापन की नीतियों के बीच फिलिस्तीनियों की मौजूदगी को बचाए रखना था। बाद में राष्ट्रवादी और इस्लामिक धाराओं का उदय हुआ, जिन्होंने अरब समाज के भीतर शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया।

इजरायली कम्युनिस्ट पार्टी बनी पहली धुरी

इजरायली कम्युनिस्ट पार्टी अरब संसदीय राजनीति की पहली धुरी बनी। इस पार्टी ने इजरायली सैन्य शासन का मुकाबला करने और डटे रहने की रणनीति के तहत 1949 में पहली बार 'नेसेट' चुनावों में हिस्सा लिया था। 1976 के 'लैंड डे' विद्रोह के बाद इसी से 'डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर पीस एंड इक्वेलिटी' (Hadash) का उदय हुआ। यह एक ऐसा मंच बना, जिसने कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों को दो-राष्ट्र समाधान और पूर्ण नागरिक समानता के सिद्धांतों पर एकजुट किया।

1970 के दशक में बनी 'अबना अल-बलाद'

1970 के दशक में इजरायल में एक और अरब पार्टी बनी, जिसे 'अबना अल-बलाद'(देश के बेटे) के रूप में जाना गया। इस पार्टी का जन्म एक युवा राष्ट्रवादी आंदोलन की धारा के रूप में हुआ। यह आंदोलन राष्ट्रवादी विचारधारा और 'पॉपुलर फ्रंट' से प्रभावित था और इसने इजरायली चुनावों में हिस्सा लेने का कड़ा विरोध किया। यह आंदोलन ऐतिहासिक रूप से पूरी फिलिस्तीनी धरती पर एक एकल लोकतांत्रिक राज्य के समाधान की मांग करता है। मगर इसका संगठनात्मक दायरा घट चुका है, फिर भी यह वर्तमान अरब संसदीय गठबंधनों के खिलाफ एक मजबूत आलोचनात्मक आवाज बनी है।

इस्लामिक मूवमेंट का उदय

1970 के दशक के अंत में शेख अब्दुल्ला निम्र दरवेश की अगुवाई में इस्लामिक मूवमेंट के उदय ने वामपंथ के दबदबे को बड़ी चुनौती दी। शुरुआत में यह आंदोलन धार्मिक प्रचार और सामाजिक कार्यों पर केंद्रित था। 1996 तक यह दो गुटों में बंट गया: 'दक्षिणी गुट', जिसने इजरायली संसद में हिस्सा लेने का निर्णय लिया और दूसरा 'उत्तरी गुट', जिसका नेतृत्व शेख राएद सलाह ने किया। उत्तरी गुट ने नेसेट की वैधता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 2015 में इजरायली सरकार ने इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया।


'नेशनल डेमोक्रेटिक असेंबली' (Balad)

1995 में 'नेशनल डेमोक्रेटिक असेंबली' (Balad) पार्टी ऐसी ताकत के रूप में उभरी जो इजरायली पहचान अपनाने को खारिज करती है और अपनी राष्ट्रीय पहचान पर कायम रहती है। यह इजरायल को “उसके सभी नागरिकों का देश” बनाने की मांग करती है। इसकी स्थापना आजमी बशारा ने की थी। वर्तमान में सामी अबू शहादा इसके लीडर हैं।

1990 के दशक में बनी Ra'am

1996 में 'यूनाइटेड अरब लिस्ट' (Ra'am) का गठन हुआ, जिसका मौजूदा नेतृत्व मंसूर अब्बास कर रहे हैं। यह एक व्यावहारिक दृष्टिकोण रखती है, जो इजरायल में रहने वाले फिलिस्तीनियों के बीच काफी बहस का विषय है। यह दृष्टिकोण केवल 'प्रतिनिधित्व' के बजाय वास्तविक 'प्रभाव' पर फोकस करता है। इसका मकसद अरब पार्टियों को इजरायली गठबंधन सरकारों में 'किंगमेकर' बनाना है। ताकि नागरिकों के अधिकार और बजट हासिल किए जा सकें, भले ही इससे दैनिक बहसों में फिलिस्तीनी मुद्दे के राष्ट्रीय पहलू पर जोर थोड़ा कम हो जाए।

'अरब मूवमेंट फॉर चेंज' (Ta'al)

साल 1996 में एक और अरब पार्टी का उदय हुआ। इसके लीडर अहमद तीबी हैं। Ta'al पार्टी एक ऐसी धारा का प्रतिनिधित्व करती है, जो राजनीतिक व्यावहारिकता और मजबूत राष्ट्रीय भाषा का मिश्रण है। यह आंदोलन आमतौर पर 'जॉइंट लिस्ट' जैसे गठबंधन सूचियों के भीतर काम करता है, जहां यह 2026 के आगामी चुनावों की तैयारी करते हुए अरब नागरिकों की दैनिक जरूरतों और उनकी फिलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।

साल 2015 में आया जॉइंट लिस्ट का दौर

2014 में थ्रेशहोल्ड 3.25% बढ़ाए जाने के बाद चार पार्टियां यानी हदाश, बलाद, ता'अल और रा'अम एकजुट हो गईं। इन्होंने जॉइंट लिस्ट के तौर पर चुनाव लड़ा। लिहाजा 2015 के चुनाव में पहली बार जॉइंट लिस्ट के बैनर तले एकजुट होकर अरब पार्टियों ने 13 सीटें जीत लीं। इसके साथ ही वह नेसेट की तीसरी बड़ी पार्टी बन गईं।

1977 से 2026 तक अरब पार्टियों का नेसेट चुनाव में प्रदर्शन इस प्रकार रहा-

यानी Ra'am पार्टी 2021 में पहली बार इजरायल सरकार का हिस्सा बनी। अब 2026 के चुनाव में भी अरब पार्टियां जॉइंट लिस्ट के तहत चुनाव लड़ रही हैं। इसमें Hadash, Ta'al, Balad और Ra'am पार्टी शामिल हैं। अब तक के रुझानों में Ra'am करीब 6 सीटों पर और Hadash, Ta'al व Balad लगभग 12 सीटों पर लीड कर रही हैं।

मौजूदा प्रमुख अरब पार्टियां और उनके लीडर

अरब पार्टियांलीडर
सामी अबू शेहादेहBalad party (National Democratic Assembly)
अहमद तिबीTa’al party (Arab Movement for Change)
मंसूर अब्बासRa’am (United Arab List)
ऐमन ओदेहHadash (Democratic Front for Peace and Equality)

2026 में किंगमेकर बनने की राह पर अरब पार्टियां

साल 2026 के नेसेट चुनाव में पहली बार अरब पार्टियां किंगमेकर बनने की राह पर हैं। वजह साफ है कि अब तक सामने आए रुझानों में न तो बेंजामिन नेतन्याहू के ब्लॉक को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है और न ही गादी आइजेन कोट को। दोनों ही ब्लॉक बहुमत से दूर रह गए हैं। ऐसे में अरब पार्टियों का रोल सरकार बनाने में सबसे अहम साबित हो सकता है।