ब्राजील के राष्ट्रपति चुनावों में लगातार चौथी बार जीत दर्ज करने वाले लूला द सिल्वा वैश्विक मंच पर सर्वाधिक चर्चित शख्सियत बन गए हैं। उनकी इस जीत ने जहां, राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों को बड़ा झटका दिया है तो वहीं इसने ब्रिक्स और भारत के लिए गुड न्यूज भी दी है। आइये एक्सपर्ट से जानते हैं कि भारत और ब्रिक्स देशों के लिए लूला की इस जीत के मायने क्या हैं और ट्रंप के लिए उनकी यह जीत झटका क्यों मानी जा रही है?
जीत के बाद लूला का बड़ा संदेश
”हम जिस ब्राजील का निर्माण करना चाहते हैं, वह एक ऐसा देश है जहां सम्मान के साथ हमारे बुजुर्गों की देखभाल हो, महिलाओं का आदर हो, और सभी लोगों को आजादी के साथ अपने धर्म और आस्था का पालन करने का अधिकार हो। सभी के अधिकारों की गारंटी देने वाली सरकार में मतभेदों का सम्मान हो। क्योंकि शासन करने का मतलब बिना किसी भेदभाव के 215 मिलियन ब्राजीलियाई लोगों की देखभाल करना है। सम्मान ही वह शुरुआती बिंदु होना चाहिए, जिससे हम मिलकर एक ऐसा ब्राजील बना सकें जो अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय हो।”
लूला की जीत का ट्रंप की नीतियों और जियोपॉलिटिक्स पर क्या असर?
भारत के पूर्व सचिव व राजनयिक कंवल सिब्बल ने कहा कि लूला द सिल्वा का फिर से राष्ट्रपति चुना जाना जियोपॉलिटिक्स के लिए बहुत मायने रखता है। उन्होंने कहा कि लूला के संबंध ट्रंप प्रशासन के साथ अच्छे नहीं रहे हैं। ट्रंप प्रशासन फ्लावियो बोल्सोनारो का खुलकर समर्थन कर रहा था और ब्राजील के चुनाव में दखल दे रहा था। लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े देश में अमेरिका-समर्थक सरकार बनाने की यह कोशिश, ट्रंप प्रशासन द्वारा 'मोनरो सिद्धांत' को फिर से लागू करने की नीति का एक अहम हिस्सा थी।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल स्टडीज विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अभिषेक श्रीवास्तव ने कहा कि ट्रंप बोल्सेनारो के परिवार को सपोर्ट कर रहे थे, क्योंकि लूला द सिल्वा की पॉलिसी मौजूदा अमेरिकी नीतियों का समर्थन नहीं करती। ट्रंप के खिलाफ लूला द सिल्वा अपने देश की ही नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती से बुलंद करते हैं। ट्रंप उनको पसंद नहीं करते हैं।
विदेश नीति विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि ब्राजील के राष्ट्रपति लूला द सिल्वा की शानदार चुनावी जीत हुई है। उन्होंने रिकॉर्ड चौथी बार पद संभाला है, जो उन्हें दुनिया के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले लोकतांत्रिक नेताओं में शामिल करता है। ट्रंप प्रशासन ने एक सैन्य अभियान में वेनेजुएला के मौजूदा राष्ट्रपति का अपहरण करने के अलावा, लैटिन अमेरिका में जाविएर मिलेई जैसे नव-रूढ़िवादी नेताओं का खुलकर समर्थन किया है, जबकि लूला के ब्राजील को निशाना बनाया है। इसलिए लूला की जीत ट्रंप की पॉलिसी के लिए झटका है।
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने कहा कि ट्रंप के लिए यह बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। क्योंकि सेंट्रल अमेरिका से लेकर लैटिन अमेरिकी देश तक ट्रंप की पॉलिसी से बहुत चिंतित थे। इसकी वजह यह थी कि अमेरिका इन देशों को कॉलोनी की तरह ट्रीट करता है। इन देशों में विकास नहीं होने देता। अगर कोई देश बोलता है तो अमेरिका ट्रेड पर बैन लगा देता है, धमकी देता है। लैटिन अमेरिका के बहुत छोटे-छोटे देशों में लूला की पॉलिसी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने, उद्योगों को बढ़ावा देने की है। वह ट्रंप की नीतियों के प्रबल विरोधी हैं। इसलिए उनकी जीत ट्रंप के लिए झटका है।
लूला की जीत के ब्रिक्स के लिए क्या मायने?
कंवल सिब्बल ने कहा कि अगर लूला हार जाते, तो ग्लोबल साउथ कमजोर हो जाता, क्योंकि लैटिन अमेरिका में ब्राजील ही ग्लोबल साउथ की सबसे मजबूत आवाज है। अगर ब्राजील में अमेरिका-समर्थित दक्षिणपंथी जीत जाते, तो ब्रिक्स भी कमजोर हो जाता। हालांकि, फ्लावियो बोल्सोनारो के पिता जायर बोल्सोनारो ने जीत दर्ज करने के बाद ब्रिक्स नहीं छोड़ा था, लेकिन आज ट्रंप प्रशासन का जैसा दबाव है, उसमें उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा सकता था।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल स्टडीज विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अभिषेक श्रीवास्तव ने RT हिंदी से बातचीत में कहा कि लूला एक विजनरी लीडर हैं, जो ग्लोबल साउथ के विजन में भरोसा करते हैं और वैश्विक मंच पर उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। वह ऐसे लीडर हैं, जो ग्लोबल साउथ की परेशानियों को समझते हैं।
चाहे टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर का मुद्दा, फाइनेंस, सप्लाई चेन या यूएनएससी रिफॉर्म का मुद्दा हो, वह ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती से उठाते हैं। लूला दा सिल्वा ब्रिक्स की पॉलिसी को मजबूती से सपोर्ट करते हैं। इसलिए उनका जीतना ब्रिक्स के लिए फायदेमंद हैं। अब ब्रिक्स के ग्लोबल साउथ एजेंडे और विकास को और मजबूती मिलेगी।
ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि लूला की जीत ब्रिक्स (BRICS) समूह के लिए एक बड़ी सफलता है, जिसका ब्राजील एक संस्थापक सदस्य है। लूला के नेतृत्व में, ब्राजील ने मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के अधिक इस्तेमाल और ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के साथ गहरे संबंधों की पुरजोर वकालत की है। अगर फ्लावियो बोलसोनारो जीत जाते, तो ब्राजील संभवतः अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा ढांचों के करीब चला जाता और ब्रिक्स में अपनी भागीदारी कम कर देता या उससे बाहर हो जाता। इस प्रकार, लूला की जीत ब्राजील की स्वतंत्र विदेश नीति को बचाए रखती है और इसे ट्रंप की जबरन दबाव बनाने वाली एकतरफा नीतियों के खिलाफ एक मजबूत ढाल बनाती है।
कमर आगा ने कहा कि लूला की जीत से ब्रिक्स के लिए बहुत अहम है। अब आने वाले समय में ब्रिक्स में लोकल करेंसी में ट्रेड होना, ब्रिक्स बैंक में फंडिंग को बढ़ावा देना, बिक्स के ग्लोबल साउथ के विकास एजेंडे को आगे बढ़ाने जैसे कार्यों में तेजी आएगी। ब्राजील ब्रिक्स का अहम सदस्य है। यह ब्रिक्स में भारत, रूस और चीन के साथ आधार स्तंभ है।
भारत के लिए गुड न्यूज क्यों?
कंवल सिब्बल ने कहा कि दोनों नेताओं के आपस में बहुत अच्छे सम्बंध हैं। ऐसे में भारत-ब्राजील अब मिलकर अपनी रणनीति को और मजबूती से आगे बढ़ा पाएंगे।
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने RT हिंदी से बातचीत में कहा कि लूला दा सिल्वा की यह जीत भारत, ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ तीनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। भारत और ब्राजील के रिश्ते बहुत अच्छे हैं। दोनों देशों के बीच करीब 15 बिलियन डॉलर का ट्रेड है। इसे 20 डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है।
लूला का जीतना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत और ब्राजील समान फॉरेन पॉलिसी को सपोर्ट करते हैं। उनमें बड़ी समानता है। दोनों ही देश मल्टीपोलर वर्ल्ड के समर्थक हैं। पीएम मोदी और लूला दा सिल्वा के व्यक्तिगत संबंध भी बहुत अच्छे हैं। इससे दोनों देशों के संबंधों को गहरा करने में और मदद मिलेगी।