ब्राजील में 80 साल के लूला का फिर जीतना ट्रंप के लिए झटका क्यों है?

ब्राजील में 80 साल के लूला द सिल्वा चौथी बार राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। उनकी जीत को ट्रंप की राजनीति के लिए झटके और BRICS में ब्राजील की सक्रिय भूमिका जारी रहने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

ब्राजील में 80 साल के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला द सिल्वा (Luiz Inácio Lula da Silva) ने दूसरे राउंड के चुनाव में बाजी पलट दी। वह चौथी बार सत्ता में वापसी कर चुके हैं। इससे पहले 4 अक्टूबर को हुए चुनाव में किसी उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था लेकिन पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो 47 फीसदी वोटों के साथ पहले स्थान पर रहे थे। लूला को तब महज 45 फीसदी वोट मिले थे।

रविवार को दूसरे दौर के चुनाव में उन्होंने फ्लावियो बोल्सोनारो को हरा दिया। खास बात यह है कि फ्लावियो को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन हासिल था। इस नतीजे को ट्रंप के लिए झटका माना जा रहा है। आइए समझते हैं। 

करीब 51.79 फीसदी वोट हासिल करने वाले लूला ने ऐसे वक्त में जीत दर्ज की है, जब ट्रंप प्रशासन टैरिफ के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बनाने की नीति अपना रहा है।

देखिए कैसे लूला के लाल रंग में रंगा ब्राजील-

ब्राजील के चुनाव आयोग के मुताबिक, करीब 99.98 फीसदी मतों की गिनती के बाद लूला को 51.79 फीसदी यानी 6.42 करोड़ से ज्यादा वोट मिले, जबकि फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.22 फीसदी यानी करीब 5.98 करोड़ वोट मिले।

ब्राजील की राजनीति और लूला का जादू

इस जीत के साथ लूला ने ब्राजील की राजनीति में अपना रिकॉर्ड और मजबूत कर लिया है। वह वर्कर्स पार्टी के नेता हैं और पहले 2003 से 2010 तक देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं। यह कार्यकाल पूरा होने के बाद वह कुल 16 साल सत्ता में रह चुके होंगे। ब्राजील के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी नेता के लिए यह एक बड़ा रिकॉर्ड होगा।

खास बात यह है कि 1989 में देश में सीधे राष्ट्रपति चुनाव की वापसी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब कोई उम्मीदवार पहले दौर में दूसरे स्थान पर रहने के बावजूद अंतिम मुकाबला जीतकर राष्ट्रपति बना है।

जीत के बाद लूला ने एक्स पर लिखा, 'ब्राजील की जनता, लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे युवाओं और वोट देने के साथ-साथ अपने देश का भविष्य बचाने के लिए भरपूर कोशिश करने वाले हर व्यक्ति का मैं दिल से आभार व्यक्त करता हूं।'

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आप सभी ने मुझे भावुक कर दिया है और मेरी उम्मीदों को फिर से मजबूत किया है। यह जीत उन लोगों की है, जो भरोसा करते हैं, संघर्ष करते हैं और एक ज्यादा न्यायपूर्ण, संप्रभु और लोकतांत्रिक ब्राजील बनाने की कोशिश कभी नहीं छोड़ते। बहुत-बहुत धन्यवाद, ब्राजील! यह जीत हमारी है। यह ब्राजील की जनता की जीत है!
लूला डा सिल्वा
लूला डा सिल्वा
ब्राजील के राष्ट्रपति

'हम पिछलग्गू नहीं' जीतते ही लूला का ट्रंप पर निशाना

चुनाव जीतने के बाद लूला ने कहा, 'ब्राजील किसी का पिछलग्गू देश नहीं है।' उन्होंने कहा कि उनके चुनाव अभियान ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किए विदेशी हस्तक्षेप को हराया है। लूला ने कहा, 'हमने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किए गए विदेशी हस्तक्षेप को हराया। हम देश चलाने का तरीका बदलेंगे और फैसले लेने की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी बढ़ाएंगे।'

एक अन्य पोस्ट में लूला ने वर्कर्स पार्टी (PT Brasil) की एक पोस्ट साझा की, जिसमें लिखा था, 'या तो मातृभूमि को आजाद रखो या ब्राजील के लिए मर मिटो!'

लूला की जीत के मायने समझिए

यह नतीजा केवल ब्राजील की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है। इसके तार अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों, चीन के बढ़ते प्रभाव, ग्लोबल साउथ की राजनीति और BRICS के भविष्य से भी जुड़े हैं।

चुनाव में लूला का मुकाबला ऐसे उम्मीदवार से था, जिसे ट्रंप समर्थक दक्षिणपंथी राजनीति के करीब माना जाता है।

ऐसे में फ्लावियो की हार को लैटिन अमेरिका में ट्रंप की राजनीतिक सोच के लिए झटके के तौर पर देखा जा सकता है।

पूर्व डिप्लोमैट और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर का कहना है कि लूला की जीत ब्राजील को नई ताकत देगी। एक्स पर उन्होंने लिखा, ‘मजदूरों और गरीबों के हितों की लगातार आवाज उठाने वाले नेता के रूप में उनकी सत्ता में वापसी से ब्राजील में सामाजिक समावेश, आर्थिक न्याय और गरीबी के खिलाफ लड़ाई को नई ताकत मिलेगी।

हार के बाद फ्लावियो का 2 घंटे एक्स्ट्रा वाला आरोप

दूसरे दौर का यह चुनाव काफी कड़वाहट भरा रहा। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए। लूला के चुनावी खेमे का आरोप था कि स्थानीय अधिकारियों ने जानबूझकर उन इलाकों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सीमित कर दिया, जहां उन्हें ज्यादा समर्थन हासिल था। लूला ने भी कई मेयरों पर लोगों को वोट डालने से रोकने की कोशिश करने का आरोप लगाया और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी।

विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश क्रिस्टियानो जानिन ने देशभर में वोटिंग का समय दो घंटे बढ़ाने का आदेश दिया। जानिन पहले लूला के निजी वकील रह चुके हैं। हालांकि, यह आदेश वोटिंग के निर्धारित शाम 5 बजे के समय के बाद आया, जब कई मतदान केंद्र बंद हो चुके थे और उनकी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें सील कर दी गई थीं।

बोल्सोनारो ने आरोप लगाया कि मतदान का समय दो घंटे बढ़ाकर ‘खेल के नियम बदल दिए’। उन्होंने कहा, 'यह कोई सामान्य बात नहीं है... यह अस्वीकार्य है।'

ट्रंप के लिए क्यों झटका है लूला की जीत?

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला की जीत ट्रंप के लिए इसलिए झटका मानी जा रही है, क्योंकि इससे लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अमेरिका के करीबी दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो के आने की संभावना खत्म हो गई है।

फ्लावियो के उलट लूला ने ब्राजील की संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अमेरिकी दबाव का विरोध करते हुए कहा था कि ब्राजील किसी का पिछलग्गू देश नहीं है। दोनों देशों के बीच टैरिफ और व्यापार को लेकर तनाव भी बना हुआ है।

लूला और ट्रंप के बीच तनाव की एक बड़ी वजह व्यापार है। अमेरिका ने 2025 में ब्राजील के कई उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए थे। अमेरिका और ब्राजील के बीच व्यापार के साथ-साथ ब्राजील के महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच को लेकर भी मतभेद रहे हैं।

अमेरिका के भारतीय मूल के डेमोक्रेट सांसद रो खन्ना ने लूला की जीत को लेकर एक्स पर लिखा कि उनकी जीत कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई में एक कामयाबी है।

उन्होंने लिखा, 'दुनियाभर में लोग कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। ब्राजील में लूला की जीत के साथ उन्हें एक और कामयाबी मिली है। सत्तावादी नेता हमेशा लोकतंत्र पर हमला करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जनता की ताकत के सामने उनकी नहीं चल सकती। ट्रंप को चुनाव के नतीजों का सम्मान करना चाहिए और ब्राजील के चुनावों को कमजोर करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।'

शशि थरूर कहते हैं, ‘इसका असर अमेरिका के साथ ब्राजील के रिश्तों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि वॉशिंगटन ने खुले तौर पर लूला के प्रतिद्वंद्वी का समर्थन किया था। व्यापार और टैरिफ को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव जारी रह सकता है।'

वह कहते हैं कि 'हालांकि, लूला की स्वतंत्र विदेश नीति में राष्ट्रीय संप्रभुता को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि किसी के आगे झुकने को। ब्राजील ने सामाजिक प्रगति, लोकतंत्र की मजबूती और वैश्विक सहयोग का रास्ता चुना है। लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के बीच यह नतीजा ऐतिहासिक है और ज्यादातर लोगों की उम्मीदों के उलट भी है।’

BRICS के लिए लूला की जीत के मायने

BRICS में ब्राजील के साथ भारत, चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका और कई अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। लूला ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि वैश्विक फैसले लेने वाली संस्थाओं में विकासशील देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। वह व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने और सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन को आसान बनाने के भी समर्थक हैं।

वहीं, फ्लावियो ने BRICS में ब्राजील की सदस्यता पर सवाल उठाए थे और आरोप लगाया था कि लूला इस समूह का इस्तेमाल अमेरिका को चुनौती देने के लिए करते हैं।

लूला की जीत से BRICS में ब्राजील की सक्रिय भूमिका जारी रहने की संभावना है, जिससे ट्रंप की उस रणनीति को चुनौती मिल सकती है, जिसमें वह अमेरिकी आर्थिक प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं।

अमेरिका की विदेश नीति के जानकार पत्रकार बेन नॉर्टन ने एक्स पर लिखा कि लूला की जीत ब्रिक्स के लिए बेहद अहम है।

एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'लूला चीन और ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों के साथ ब्राजील की साझेदारी को और मजबूत करेंगे। वह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में बदलाव की मांग भी जारी रखेंगे और दुनिया में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देंगे। यही रुख वॉशिंगटन को नाराज करता है।'

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इस जीत का असर दुनिया की राजनीति पर भी पड़ेगा, खासकर BRICS पर। लूला के फिर से राष्ट्रपति बनने से ब्राजील दुनिया के बड़े देशों के बीच ताकत का संतुलन बनाने और किसी एक देश के दबदबे को कम करने की कोशिशों को आगे बढ़ा सकता है। इससे BRICS को विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से लेकर दुनिया के बड़े फैसले लेने वाली संस्थाओं में बदलाव की मांग उठाने में मदद मिल सकती है।
शशि थरूर
शशि थरूर
पूर्व डिप्लोमैट और वरिष्ठ कांग्रेस नेता

हालांकि, तनाव के बावजूद अमेरिका और ब्राजील के बीच करीबी व्यापारिक रिश्ते हैं जिसे लूला आगे बढ़ाने पर जोर देते रहे हैं।

लूला BRICS को अमेरिका के खिलाफ सैन्य या राजनीतिक गठबंधन भी नहीं बनाना चाहते हैं। अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस की अगस्त 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, लूला सरकार ने BRICS को उभरते देशों के बीच सहयोग का मंच बताया है और उसे अमेरिका-विरोधी समूह के रूप में पेश करने का विरोध किया है।

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) में एक्सपर्ट ओलिवर स्टुएनकेल ने ब्राजील की नीति को 'मल्टी-अलाइनमेंट' यानी सभी बड़ी शक्तियों के साथ रिश्ते बनाए रखने की रणनीति बताया।

उन्होंने कहा कि ब्राजील के लिए अमेरिका, चीन, रूस, भारत और यूरोप जैसे देशों के साथ संबंध बनाए रखना जरूरी है और BRICS इस रणनीति का एक अहम हिस्सा है। ऐसे में लूला के सामने चुनौती BRICS में ब्राजील की भूमिका मजबूत करने के साथ-साथ अमेरिका और दूसरे व्यापारिक साझेदारों के साथ रिश्तों में संतुलन बनाए रखने की भी होगी।