अमेरिका और इजरायल ने भले ही एकसाथ मिलकर ईरान के खिलाफ जंग की शुरुआत की, लेकिन क्या दोनों के रणनीतिक हित एकसमान हैं? क्या दोनों का मकसद एक है? ये सवाल इसलिए क्योंकि आठ महीने से जारी जंग के बीच एक बार फिर से बड़े सैन्य टकराव का खतरा बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी मीडिया की हालिया रिपोर्ट्स की मानें तो अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर नए हमलों की संभावित योजना तैयार की है। इन हमलों को 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद अंजाम दिया जा सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर को कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान चला सकता है। फ्लोरिडा में एक रैली के दौरान ट्रंप ने कहा, “हम एक और छोटा 'Epic Fury' ऑपरेशन चला सकते हैं।” हालांकि, ट्रंप ने इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी।
बता दें, ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को अमेरिका ने ‘Epic Fury’ नाम दिया है। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमले शुरु किए थे। जवाब में ईरान ने उन खाड़ी देशों को निशाना बनाया, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
अमेरिका-इजरायल के रणनीतिक हित अलग?
इंटरनेशनल अफेयर्स एक्सपर्ट अनुराधा चेनॉय ने RT से बातचीत में बताया था कि अमेरिका और इजरायल ने भले ही एकसाथ हमले शुरू किए थे, लेकिन दोनों के रणनीतिक हित अलग-अलग हैं। युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने हमला तो किया, लेकिन वह तनाव को बहुत ज्यादा बढ़ाना नहीं चाहता था, क्योंकि उसकी प्राथमिकता तेल को बचाना, उस पर नियंत्रण हासिल करना और अपनी कंपनियों के हितों को सुरक्षित रखना था।
चेनॉय ने RT इंडिया से बातचीत में इसका एक उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका जब ईरान से सीजफायर को लेकर बातचीत कर रहा था, उसी दौरान इजरायल ने ईरान के फार्स तेल ठिकानों पर हमले कर दिए थे। इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि उन्हें भी इसकी जानकारी नहीं थी।
ट्रंप की बात पर किसी को यकीन नहीं हुआ, क्योंकि लगातार अपने बयान बदलते रहते हैं। कभी कुछ कहते हैं, अगले ही पल उससे अलग बात कहने लगते हैं। इसकी सच्चाई तो हम नहीं जानते, लेकिन एक बात कह सकते हैं कि इस जंग में अमेरिका और इजरायल के रणनीतिक हित एक समान नहीं हैं।
ईरान युद्ध के दौरान कई बार अमेरिका और इजरायल आमने-सामने भी दिखे हैं, चाहे ईरान के साथ समझौते की बात हो या फिर लेबनान में सैन्य कार्रवाई की। इस साल जून में CBS न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा था कि अमेरिका और इजरायल करीबी साझेदार हैं, लेकिन उनके हित हमेशा एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
क्या और गहराएगा संकट?
ईरान युद्ध लगातार लंबा खिंच रहा है। सीजफायर हुआ, लेकिन अगले ही पल टूट गया। समझौते की कोशिशें भी परवान नहीं चढ़ पाई हैं। ऐसे में नए सिरे से हमले की तैयारी की खबरों ने दुनिया की चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं। दरअसल, ईरान युद्ध की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद है। यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव का असर लाल सागर में बाब अल मंदेब स्ट्रेट पर भी दिख रहा है।
इसकी वजह से पूरी दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, युद्ध के शुरुआती छह महीनों में सऊदी अरब का रोजाना तेल उत्पादन 70 लाख बैरल से भी कम रहा, जबकि युद्ध से पहले प्रतिदिन उत्पादन 1 करोड़ बैरल से ज्यादा था।
EIA के आंकड़े बताते हैं कि युद्ध से पहले, 27 फरवरी को ब्रेंट क्रूड का स्पॉट प्राइस 71.32 डॉलर प्रति बैरल था, जो 20 अक्टूबर को बढ़कर 115.22 डॉलर प्रति बैरल हो गया। इस तरह युद्ध से पहले के मुकाबले कीमत में करीब 61.6% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अगर अमेरिका और इजरायल फिर हमला करते हैं, तो ईरान चुप नहीं बैठेगा। उसने कड़ी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दे दी है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसेन रेजाई ने कहा है कि नए हमले की स्थिति में ईरान खाड़ी के सात देशों तक तेल ठिकानों, अंडरसी केबल, डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी सुविधाओं को निशाना बना सकता है।
ईरानी मीडिया के मुताबिक, रेजाई ने कहा कि अगर संघर्ष फिर शुरू होता है तो ईरान के पास पहले से ज्यादा व्यापक योजना है। दूसरी तरफ, यमन के हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब के तेल ठिकानों, एयरपोर्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहे हैं।
इंटरनेशनल अफेयर्स एक्सपर्ट अनुराधा चेनॉय के मुताबिक, कतर और यूएई समेत कई खाड़ी देशों ने 'फोर्स मेज्योर' घोषित किया है। इसका मतलब है कि गंभीर आपात स्थिति के कारण वे तेल की सप्लाई से जुड़े समझौतों की शर्तें पूरी नहीं करेंगे। तेल कारोबार के बड़े अनुबंधों में आम तौर पर ऐसी स्थिति से निपटने के लिए फोर्स मेज्योर का प्रावधान होता है।
चेनॉय के मुताबिक, सऊदी अरामको ने भी ऐसा ही किया था। सितंबर में सऊदी की तेल कंपनी अरामको ने अपनी पाइपलाइन पर हमले के बाद यूरोप की दो रिफाइनरियों को कच्चे तेल की सप्लाई करने से मना कर दिया था। ऐसे में साफ है कि ईरान युद्ध की आग भड़की तो एक बार फिर से तेल का संकट गहरा सकता है।