'मक्का' के बाद पाकिस्तान-तुर्किये सहित 4 देशों की नई डिफेंस डील, 'बद्र' का भारत पर क्या असर?

पाकिस्तान और तुर्किये ने अब कतर और इंडोनेशिया के साथ मिलकर नया रक्षा समझौता किया है। इसका रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ाने के साथ सैन्य उपकरणों का संयुक्त उत्पादन करना है।

ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद मिडिल ईस्ट के देश अपनी रक्षा और सुरक्षा के लिए नए साझेदार तलाश रहे हैं। ईरान के हमलों के सामने अमेरिकी सुरक्षा की सीमाएं उजागर होने के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग पर जोर बढ़ रहा है। इस बदलते समीकरण में पाकिस्तान और तुर्किये भी अपनी भूमिका मजबूत करने में जुटे हैं। इसी कड़ी में पाकिस्तान और तुर्किये ने इंडोनेशिया और कतर के साथ मिलकर एक नया रक्षा समझौता किया है।

इसे 'बद्र समझौते' का नाम दिया गया है, जिसे सन् 624 में हुई 'बद्र की लड़ाई' के संदर्भ में रखा गया है। इस समझौते से क्या भारत को किसी तरह की चुनौती मिल सकती है या अमेरिका को मिडिल-ईस्ट में कोई रणनीतिक नुकसान हो सकता है। आइये पूरा मामला डिफेंस एक्सपर्ट से समझते हैं। पहले जानते हैं कि इस बद्र डील में क्या है?

बद्र डील की शर्तें

तुर्किये के रक्षा मंत्रालय के अनुसार पाकिस्तान, कतर, तुर्किये और इंडोनेशिया ने आपसी रक्षा सहयोग को बढ़ाने और अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए बुधवार को कतर की राजधानी दोहा में “बद्र समझौता ज्ञापन” पर हस्ताक्षर किया। इसे आपसी सहयोग को और ज्यादा गहरा करने व साझेदारी बढ़ाने के मकसद से किया गया है। मगर इस डील में सऊदी अरब शामिल नहीं है।

  1. हथियारों और उपकरणों का संयुक्त उत्पादन करना।
  2. सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना।
  3. तकनीक साझा करना और प्रशिक्षण देना।
  4. रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ाना।
  5. रणनीतिक सहयोग को मजबूत बनाना

इससे पहले हुई थी मक्का डिफेंस डील

इससे पहले पाकिस्तान और तुर्किये ने सऊदी अरब के साथ 7 अगस्त को सऊदी अरब में 'मक्का डिफेंस डील' की थी। इस रक्षा समझौते को इस्लामिक नाटो के तर्ज पर पेश किया गया था, जिसमें 'एक पर हमला सब पर हमला' माना गया। मगर अपने पहले ही लिटमस टेस्ट में यह डिफेंस डील फेल होती दिखी। यमन के हूती विद्रोही सऊदी अरब पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं, लेकिन रियाद को बचाने न तो पाकिस्तान गया और न ही तुर्की।

सऊदी के प्रमुख रक्षा सहयोगी अमेरिका ने भी हाथ खड़ा कर दिया। अब पाकिस्तान ने दिखावे के लिए सऊदी में अपनी कुछ सेना और भेजी, लेकिन हूतियों के खिलाफ सीधे तौर पर लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। अब पाकिस्तान और तुर्किये ने इस नई डिफेंस डील में इंडोनेशिया और कतर को शामिल किया है। शायद यही वजह है कि इस बार सऊदी अरब इससे दूर रहा है। आइए जानते हैं कि इस डील के असली मायने क्या हैं?

पाकिस्तान, तुर्किये, कतर इंडोनेशिया डील से क्या होगा?

भारतीय वायु सेना के एयर वाइस मार्शल (सेवानिवृत्त) और डिफेंस एक्सपर्ट ओपी तिवारी ने RT Hindi से बातचीत में कहा कि तुर्किये इस डील के माध्यम से अपने हथियारों को बेचने के लिए एक नया मार्केट तलाश रहा है। वह हथियार तो बनाता है, लेकिन उसके पास अभी खरीदार नहीं है। इसलिए वह कतर, इंडोनेशिया और पाकिस्तान को अपने हथियार बेचना चाहता है। अभी तक पाकिस्तान अमेरिका और चीन से हथियार खरीदता है। अब फर्क यह होगा कि वह तुर्किये से भी ड्रोन और अन्य कुछ सैन्य उपकरण खरीदेगा। बाकी उसके प्रमुख सप्लायर अमेरिका और चीन ही रहेंगे।

तुर्किये अपने वेपन मार्केट को मजबूत करना चाहता है। वह ऐसे देशों के साथ डिफेंस डील के नाम पर गेम खेल रहा है। सच्चाई यह है कि तुर्किये सिर्फ अपना उल्लू सीधा कर रहा है, क्योंकि उसने सऊदी के साथ जो मक्का डील की थी, उसमें इसने कोई मदद नहीं की। अब उसे अपने हथियार बेचने हैं। इसलिए वह ये सब कर रहा, अन्यथा उसे ऐसे डिफेंस डील में शामिल होने की जरूरत नहीं थी। क्योंकि तुर्की खुद नाटो का सदस्य है। 

भारत के लिए इस डील के क्या मायने?

डिफेंस एक्सपर्ट ओपी तिवारी ने कहा कि भारत को इस रक्षा समझौते से किसी भी तरह से चिंतित होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इस डील से उसको किसी तरह का कोई थ्रेट नहीं है। पाकिस्तान और तुर्की पहले से ही भारत के खिलाफ हैं। कतर से सामान्य व्यापारिक रिश्ते हैं। जबकि इंडोनेशिया का झुकाव भारत की ओर है। इंडोनेशिया अपने ज्यादा हथियार भारत से ही खरीदता है।

सैन्य स्तर पर भारत को किसी भी तरह से कोई चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसमें से कोई भी देश भारत से जंग लड़ने नहीं आ सकता। भारत के पास पर्याप्त क्षमता है कि वह पाकिस्तान और चीन दोनों फ्रंट को आसानी से हैंडल कर सकता है।

तुर्किये के लिए अहम क्यों है ये डील?

ओपी तिवारी ने कहा कि यह डील सबसे ज्यादा तुर्किये के लिए ही फायदेमंद है। क्योंकि उसके पास नाटो (NATO) की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। उसकी रक्षा उद्योग की क्षमता काफी मजबूत है। वह ईरान युद्ध के दौरान कतर सहित अन्य खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा मजबूत करने में मदद करता रहा है। इंडोनेशिया के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं। वह रक्षा उद्योग में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरा है। बता दें कि तुर्किये की कंपनियां हर साल अरबों डॉलर के सैन्य उपकरण निर्यात करती हैं, जिनमें ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम (वायु रक्षा प्रणाली) और बख्तरबंद गाड़ियां शामिल हैं।

कैसे काम करेगा समझौता ?

Defense Expert
बद्र डील भी मक्का डिफेंस डील की तरह सिर्फ दिखाने के लिए है। इससे तुर्किये को अपने हथियार बेचने के लिए एक छोटा मार्केट मिल जाएगा। वह अमेरिका के हथियारों का विकल्प नहीं बन सकता। भारत के लिए यह डील किसी तरह से खतरा नहीं है।
ओपी तिवारी,
ओपी तिवारी,
डिफेंस एक्सपर्ट

क्या तुर्किये बनेगा अमेरिका का विकल्प?

प्रोफेसर ओपी तिवारी ने कहा कि यह दूर-दूर तक संभव नहीं है। तुर्किये कभी अमेरिका का विकल्प नहीं बन सकता। अमेरिका बहुत बड़ा डिफेंस सप्लायर है। उसका मुकाबला कोई देश नहीं कर सकता है। तुर्किये उसके आगे बहुत छोटा देश है। इतना जरूर है कि छोटे-मोटे हथियार बेचने के लिए तुर्किये को इससे एक मार्केट मिल सकता है। तुर्किये इन देशों को कुछ एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइलें दे सकता है। क्योंकि अमेरिका से पैट्रियोट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।

पाकिस्तान को इससे क्या हासिल होगा?

ओपी तिवारी ने कहा कि भारत की बढ़ती ताकत और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में खलबली मची है। इसलिए वह दिखाने के लिए कभी मक्का डिफेंस डील तो कभी बद्र जैसी डील कर रहा है, जिसका भारत के लिए कोई मतलब नहीं है। इसे पाकिस्तान अपने लोगों को खुश करने के लिए कर रहा है क्योंकि उसके भी कई डिफेंस साझेदार हैं। उसने जो मक्का डील की थी, उसमें सऊदी को अभी कुछ सैनिक जरूर भेजे, लेकिन सीधे तौर पर हूतियों पर कोई एक्शन नहीं ले पा रहा। इसी तरह किसी अन्य देश पर हमला हुआ तो वह भी अकेले ही झेलेगा।