ट्रंप ने क्यों दौड़ाए 4 देशों में अपने ये 3 दूत? समझिये पूरी जियोपॉलिटिक्स

तेल की बढ़ती कीमतों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में ट्रंप युद्धों से निकलने और तेल की आपूर्ति सुरक्षित करने की कोशिश में जुटे हैं। रूस से भारत तक रिश्तों को साधने के साथ अमेरिका ईरान और यूक्रेन संघर्ष का समाधान भी तलाश रहा है।

ईरान युद्ध और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने अमेरिका में तेल और ऊर्जा की कीमतें बढ़ा दी हैं। रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाने वाला अमेरिका अब मॉस्को के साथ बड़ी तेल डील कर रहा है, ताकि तेल-गैस की कीमतों और महंगाई को काबू में रखा जा सके। लेकिन ईरान युद्ध ट्रंप के लिए अब भी बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। न अमेरिका इस संघर्ष से आसानी से निकल पा रहा है और न ही अपने मकसद हासिल कर पा रहा है।

दूसरी ओर, नवंबर के पहले हफ्ते में होने वाले मिडटर्म चुनाव ट्रंप की नीतियों और प्रशासन के कामकाज की परीक्षा लेने वाले हैं। भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते भी अमेरिका के लिए चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर ट्रंप की क्या मजबूरी, रणनीति या कूटनीति है, जिसके तहत उन्होंने अपने तीन प्रमुख दूतों को एक साथ चार देशों में भेज दिया है?

ट्रंप के 3 दूत 4 देशों में क्या करने गए?

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने तीन दूतों को एक साथ 4 देशों में भेजा है। इसमें पाकिस्तान के आर्मी चीफ और सीडीएफ आसिम मुनीर, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो शामिल हैं। मार्को रूबियो जहां भारत दौरे पर हैं तो वहीं उनके विशेष दूत विटकॉफ यूक्रेनी नेता व्लादिमीर जेलेंस्की से मिलने के बाद अब बुधवार को रूस पहुंच चुके हैं। रूस में वह राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात करने वाले हैं। जबकि ट्रंप ने पाकिस्तान के आर्मी चीफ मुनीर को अपना दूत बनाकर मंगलवार को ईरान भेजा था, जहां उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री से लेकर प्रमुख सैन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की।

रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने RT हिंदी से बातचीत में कहा कि पाकिस्तान अमेरिका का पपेट बनकर घूम रहा है। उसने बहुत कोशिश की ईरान-अमेरिका में शांति वार्ता कराने की। मगर सफल नहीं हो पाए। वह चाहते थे कि इसमें सफल होने के बाद वह अमेरिका से कुछ ग्रांट हासिल कर लेंगे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ मुनीर अभी भी इसीलिए परेशान हैं कि किसी तरह डील हो जाए और उनको इसका क्रेडिट मिल जाए। ताकि वह इसके बदले अमेरिका से कुछ ले सके। इधर ईरान से भी तेल और ऊर्जा हासिल कर सकें। मगर अमेरिका पाकिस्तान को सिर्फ इस्तेमाल कर रहा है। ट्रंप के निर्देश पर चलते-चलते उसने सऊदी और ईरान से भी अपने रिश्ते खराब कर लिए हैं। बावजूद इसके, वह अमेरिका अपना दूत बनाकर भेज रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार और जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अशोक उपाध्याय ने कहा कि ट्रंप ने ईरान में मुनीर को अपना संदेशवाहक बनाकर भेजा है। वह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम शांति चाहते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि अमेरिका सारी सीमाएं लांघ चुका है। उसने पहले खामेनेई को मारा, फिर उनके सभी अहम ठिकानों पर बम गिराए, आम लोगों को मारा। अब ईरान अमेरिका की शर्तों पर कोई समझौता क्यों करेगा? होर्मुज भी उनके लिए मुद्दा है। अमेरिका इस ब्लॉकेड को चाहकर भी खुलवा नहीं पाया है। ईरान का उस पर पूरा नियंत्रण कायम है। अमेरिका का कोई भी मंसूबा पूरा नहीं हो पाया है। ईरान ने उनको कड़ी चुनौती दी है। हूती अब सऊदी पर हमले कर रहे हैं। इस तरह ईरान ने अमेरिका को उलझाए रखा है। उससे बाहर निकलने के लिए अमेरिका ये सब नया दांव खेल रहा है।

चारों देश ट्रंप के मकसद से कनेक्टेड

कमर आगा ने कहा कि ट्रंप ने जिन 4 देशों में इन दूतों को भेजा है वह अमेरिका को एक दूसरे से कहीं न कहीं कनेक्ट कर रहे हैं। चाहे रूस-यूक्रेन का मुद्दा हो, ईरान का मसला हो या फिर भारत-अमेरिका का हो। अमेरिका ने हाल ही में रूस से तेल डील की है। ईरान में जंग लड़ते उसकी हालत खस्ता है। इसलिए वह अब यूक्रेन की मदद करने की स्थिति में नहीं है। इसलिए उन्होंने विटकॉफ को यूक्रेन और रूस भेजा है। ट्रंप अब चाहते हैं कि रूस-यूक्रेन संघर्ष खत्म हो, जिससे अमेरिका को आसानी से तेल मिलता रहे। वह ईरान संघर्ष का भी समाधान चाहते हैं। जबकि भारत के साथ अब रिश्ते सुधारना चाहते हैं। उन्होंने भारत पर हर तरह का दबाव डालकर, टैरिफ लगाकर और धमकी देकर देख लिया कि उस पर कुछ असर होने वाला नहीं है। 

वहीं अशोक उपाध्याय ने कहा कि अमेरिका ने ही पहले यूक्रेन को हथियार दिए। पैट्रियोट मिसाइलें दीं। अब जब उन्हें रूसी तेल की जरूरत पड़ी तब जाकर पैट्रियोट देने से मना किया। जबकि पहले रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए। रूसी तेल पर सेकेंड्री टैरिफ भी लगाया। ताकि भारत, चीन जैसे देश उसका तेल न खरीदें, लेकिन इसके बावजूद उसका तेल बिकता रहा। अब ट्रंप अपनी जरूरतों के अनुसार रणनीति के तहत यह सब दिखावा कर रहे हैं। उन्होंने अपने दूत विटकॉफ को यूक्रेन और रूस इसलिए भेजा है कि हाल ही में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने कहा था कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी सबसे ज्यादा रूस-यूक्रेन मुद्दे को समझते हैं। अब ट्रंप चाह रहे कि इसका क्रेडिट उनके खाते में जाए।

मुख्य मुद्दा “तेल”

कमर आगा ने कहा कि यह जो कुछ भी हो रहा है, वह सब “ऑयल वार” की वजह से है। अमेरिका का मुख्य निशाना तेल है। वह तेल पर अपना नियंत्रण चाहता है, लेकिन अभी रूस और ईरान में फंस गया है। पहले अमेरिका ने सोचा था कि यूक्रेन से लड़ते-लड़ते रूस कमजोर हो जाएगा और वहां रिजीम बदल जाएगा और उनके समर्थन वाली सरकार हो जाएगी, जिसके जरिये वह रूस के तेल और रेयर अर्थ मिनरल पर एक तरह से अपना अधिकार जमा लेंगे। इसी तरह उन्होंने ईरान में सोचा था कि उनके सुप्रीम लीडर को मारकर रिजीम बदल देंगे। फिर ईरान के तेल पर अमेरिका का कंट्रोल हो जाएगा। उन्होंने वेनेजुएला में नियंत्रण तो पा लिया, लेकिन वह रूस और ईरान में ऐसा नहीं कर सके और न ही भविष्य में कभी कर पाएंगे। इसलिए अब उन्होंने भारत और रूस को मुख्य रूप से चुना है, जो उन्हें इस संकट से उबार दे।

वहीं अशोक उपाध्याय कहते हैं कि अमेरिका हमेशा पहले अपना हित देखता है। अभी उसे तेल की जरूरत है, तो उसने रूस से भी दोस्ती कर ली। तेल को रिफाइन करवाना है तो अब भारत से भी रिश्ते सुधारना चाह रहा। लेकिन उसका कोई भी स्टैंड स्थायी नहीं है। अमेरिका सब कुछ कूटनीति और रणनीति के तहत करता है।

इकोनॉमिक संकट और महंगाई

कमर आगा ने कहा कि अमेरिका यूक्रेन को हथियार और सैन्य मदद देने में बहुत खर्च कर चुका है। इधर ईरान युद्ध में उसके 40 से 50 बिलियन डॉलर उड़ चुके हैं। इससे अमेरिका की आर्थिक हालत बहुत खराब हो चुकी है। तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि से महंगाई बहुत अधिक हो गई है। इसलिए ट्रंप अब ऐसे हर उपाय कर रहे हैं जो उन्हें इस संकट से उबार दे। अमेरिका ने कई देशों पर टैरिफ और बैन लगाए। इससे भी उनका काम बनता नहीं दिखा। ट्रंप को जब लगा कि अब रूसी तेल के बिना काम नहीं बनेगा, तो उन्होंने मॉस्को के साथ डीजल की डील कर ली। ताकि महंगाई पर थोड़ा अंकुश लग सके।

जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अशोक उपाध्याय ने कहा कि अमेरिका में डीजल और गैसोलीन का भारी संकट है। उसकी अर्थव्यवस्था डगमगा रही है। महंगाई बढ़ रही है। चुनाव सिर पर हैं। इसलिए अपने देश के लोगों को बरगलाने के लिए सब कुछ अच्छा और मैनेज होता हुआ दिखाना चाहते हैं। ट्रंप चाह रहे कि अमेरिकी लोग उन पर भरोसा कर सकें कि सबकुछ ठीक होने वाला है।

मिडटर्म चुनाव हारने का डर

कमर आगा ने कहा कि ट्रंप को पता है कि वह मिडटर्म पोल बुरी तरह से हार रहे हैं। इसके पहले वह हर उपाय कर लेना चाहते हैं, जिससे उनको चुनाव में कुछ भी फायदा पहुंच सके। वे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम खत्म करना चाहते थे, लेकिन तेहरान इसके लिए नहीं मान रहा था। अब उसने कह दिया है कि अपना एनरिच यूरेनियम का कतरा भी ईरान से बाहर नहीं भेजेगा। ईरान अब युद्ध से डर नहीं रहा, बल्कि वह अमेरिका से मजबूती से लड़ रहा है। ईरान ने युद्ध में अपनी स्थिति अब बहुत मजबूत कर ली है।

इधर अमेरिका के पचासों हजार सैनिक युद्ध में डिप्लॉय किए गए हैं। इतने बड़े डिप्लॉयमेंट में अमेरिका को रोजाना कई मिलियन डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। अमेरिका के सैन्य जनरल तक अब कहने लगे हैं कि वह युद्ध नहीं जीत पाएंगे। इसलिए ट्रंप चाहते हैं कि कुछ डील हो जाए। भारत के साथ भी वह रिश्तों में बैलेंस करना चाहते हैं। क्योंकि भारत से तनावपूर्ण रिश्तों का असर मिड-टर्म पोल में पड़ सकता है। वहां काफी संख्या में भारतीय भी रहते हैं। बहुत से अमेरिकी भी ट्रंप पर भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ने के चलते खफा हैं। इसके अलावा उन्हें वेनेजुएला का तेल भी रिफाइन करवाना है, जो भारत ही कर सकता है।

अशोक उपाध्याय ने कहा कि विभिन्न सर्वे में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग घटी है। वह चुनाव हारते हुए दिख रहे हैं। अमेरिकी लोग उनसे काफी खफा हैं, क्योंकि वह बढ़ती महंगाई और रोजमर्रा की वस्तुओं के बढ़ते दामों से परेशान हैं। युवा बेरोजगार हैं। उन्होंने सोचा था कि अप्रवासियों को हटाकर अमेरिकी लोगों को रोजगार दिलाएंगे, लेकिन उनमें वह टैलेंट नहीं है। जिससे कंपनियां उनको हायर करें। ट्रंप की सारी नीति फेल हो चुकी है।

भारत से क्या चाहते हैं ट्रंप?

कमर आगा ने कहा कि ट्रंप ने रुबियो को भारत इसलिए भेजा है कि वह चाहते हैं नई दिल्ली हथियारों से लेकर तेल तक जो डील अब तक रूस से करता आया है, उसे अब वह अमेरिका के साथ करे। ट्रंप चाहते हैं कि भारत रूस से दूरी बनाए और क्वॉड में वह चीन के खिलाफ अमेरिकी एजेंडे में उसका साथ दे। मगर भारत ऐसा कभी नहीं करेगा। रूस भारत का पुराना और सबसे भरोसेमंद साथी है। 

इसके अलावा ट्रंप का फोकस रिलायंस की रिफायनरी पर भी है, जो वेनेजुएला के भारी तेल को रिफाइन कर सकती है। ट्रंप की पॉलिसी है कि पहले वह धमकी, ब्लैकमेलिंग और प्रतिबंध से लेकर रिजीम चेंज जैसे हथकंडे किसी देश को झुकाने के लिए अपनाते हैं, जब सफल नहीं होते तो उसके साथ संबंध को सामान्य बनाने में लग जाते हैं। ट्रंप को पता होना चाहिए कि दुनिया बदल रही है। मल्टीपोलर वर्ल्ड बन चुका है। अमेरिका की स्वीकार्यता कम हो रही है।

दूसरी बात यह भी है कि अमेरिका भारत से अपनी शर्तों पर चाहता है। इसलिए नहीं हो पा रही है। भारत तो कब से चाहता है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील हो। इसकी वजह यह भी है कि डॉलर मजबूत है। अभी उसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई तात्कालिक विकल्प भी नहीं है। अब लोकल करेंसी में भी काम शुरू हो रहा है, मगर डॉलर की बादशाहत जब तक रहेगी, वह देशों को धमकाता रहेगा। अगर वह किसी देश पर बैन लगा देता है तो एक तरह से वह देश अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम से बाहर हो जाता है। फिर कोई भी खरीद-बिक्री किसी देश के साथ करना उसके लिए मुश्किल हो जाता है। यही अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार है।

अशोक उपाध्याय कहते हैं कि ट्रंप ने अपने विदेश मंत्री मार्को रूबियो को कई वजहों से भारत भेजा है। हाल ही में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी की बहुत तारीफ की थी। यूरोपीय देशों में भी प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकार्यता बहुत अधिक है। ट्रंप को अब लगने लगा है कि वह पीएम मोदी या भारत को इग्नोर करके अपना ही काम खराब करेंगे। रूस से तेल खरीदने पर उन्होंने भारत पर जो बैन लगाए, उसका अमेरिकी लोगों में भी गलत संदेश गया। जबकि भारत पर इसका कोई बड़ा असर नहीं हुआ। हमारी इकोनॉमी और जीडीपी ग्रोथ दोनों बढ़ रही हैं। उनको समझ में आ गया है कि भारत को झुकाया नहीं जा सकता। इसलिए अब रिश्ते सुधारना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि भारत के साथ ट्रेड डील हो जाए और भारत वेनेजुएला से ज्यादा तेल खरीदे और उसे अपने यहां रिफाइन भी करे।