इजरायल चुनाव: सबसे ज्यादा सीटें जीतना काफी नहीं, सरकार बनाने का असली पेच क्या?

इजरायल का चुनाव सिर्फ प्रधानमंत्री चुनने की कवायद नहीं है। यहां पार्टी को मिले वोट और उम्मीदवारों की सूची में उनकी जगह तय करती है कि कौन संसद पहुंचेगा। यही सिस्टम चुनाव के बाद गठबंधन और सत्ता का गणित भी बदल देता है।

इजरायल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। 2023 हमास हमले, गाजा और लेबनान में सैन्य कार्रवाई और ईरान के साथ संघर्ष के बाद यह पहला आम चुनाव है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए इसे बड़ा इम्तिहान माना जा रहा है।

27 अक्टूबर को होने वाला चुनाव 2019 के बाद इजरायल का छठा राष्ट्रीय चुनाव होगा। हालांकि, 38 साल में पहली बार चुनाव संसद के पूरे कार्यकाल के अंत में हो रहा है। वहीं, 1973 के बाद पहली बार कोई मौजूदा सरकार नेसेट का पूरा कार्यकाल पूरा करने के बाद चुनाव का सामना करेगी।

नेतन्याहू के सामने बड़ी चुनौती

इजरायल में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे हैं। वह करीब 19 साल तक प्रधानमंत्री रह चुके हैं। लेकिन इस बार उनकी राह आसान नहीं मानी जा रही।

हमास हमले ने उनकी सुरक्षा नीति और नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं। देश में हमास, हिज्बुल्लाह और ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को काफी समर्थन मिला है। इसके बावजूद नेतन्याहू के नेतृत्व पर लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है। धर्म और राज्य से जुड़े मुद्दों पर उनकी सरकार की नीतियां भी कई मतदाताओं को पसंद नहीं हैं।

आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि इजरायल में चुनाव कैसे होते हैं, वहां सरकार कैसे बनती है और यह व्यवस्था भारत से कितनी अलग है।

इजरायल में कैसे होता है चुनाव?

भारत की तरह इजरायल में भी संसदीय लोकतंत्र है। यहां संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।

इजरायल में आम तौर पर हर चार साल में चुनाव होते हैं। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में समय से पहले भी चुनाव कराए जा सकते हैं।

यहां मतदाता किसी उम्मीदवार को सीधे वोट देने के बजाय राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। इसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली कहा जाता है। इसमें पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में संसद में सीटें मिलती हैं।

मसलन, किसी पार्टी को कुल वैध वोटों का 10 फीसदी हिस्सा मिलता है, तो उसे 120 में से करीब 12 सीटें मिल सकती हैं।

लेकिन हर पार्टी को संसद में सीटें पाने के लिए एक न्यूनतम सीमा पार करनी होती है। इसे इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड कहते हैं। इजरायल में यह सीमा 3.25 फीसदी है। 

चुनाव के बाद पार्टियां अपने सांसदों की संख्या और दूसरे दलों के समर्थन के आधार पर सरकार बनाने की कोशिश करती हैं। चूंकि किसी एक पार्टी के लिए अपने दम पर बहुमत हासिल करना मुश्किल होता है, इसलिए इजरायल में आम तौर पर गठबंधन सरकार बनती है।

कैसे बनती है सरकार?

चुनाव के नतीजे आने के बाद राष्ट्रपति सभी प्रमुख दलों से बातचीत करते हैं। इसके बाद वह उस नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं, जिसके पास जरूरी समर्थन जुटाने की सबसे ज्यादा संभावना होती है। यह जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी को ही पहला मौका मिले।

सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नेता को गठबंधन तैयार करने के लिए 42 दिन तक का समय मिल सकता है। इसके बाद उसे नेसेट में अपनी सरकार के समर्थन में बहुमत साबित करना होता है। जरूरी समर्थन मिलने पर सरकार बनती है और प्रधानमंत्री अपना मंत्रिमंडल गठित करते हैं।

इजरायल में सांसद कैसे चुने जाते हैं?

यहां एक अहम सवाल उठता है। जब मतदाता उम्मीदवार के बजाय पार्टी को वोट देते हैं, तो सांसद कौन बनता है?

दरअसल, चुनाव से पहले हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक सूची जारी करती है। इसे पार्टी लिस्ट कहते हैं। इस सूची में उम्मीदवारों का क्रम पहले से तय होता है।

मान लीजिए, किसी पार्टी को चुनाव में 20 सीटें मिलती हैं। ऐसे में उसकी सूची में पहले 20 नंबर पर मौजूद उम्मीदवार संसद पहुंचेंगे। अगर पार्टी को सिर्फ 8 सीटें मिलती हैं, तो सूची के पहले 8 उम्मीदवार सांसद बनेंगे।

चुनाव में कौन-कौन हैं प्रमुख दावेदार?

नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन का मुकाबला चार प्रमुख विपक्षी दलों के गठबंधन से है। विपक्ष की ओर से पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल हैं। उनकी नई पार्टी ‘याशर’ (Yashar) सर्वे में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को कड़ी टक्कर देती दिख रही है।

विपक्षी खेमे में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड के नेतृत्व वाला ‘टुगेदर’ गठबंधन, एविगडोर लिबरमैन की ‘यिस्राएल बेतेनु’ और यायर गोलान की ‘डेमोक्रेट्स’ पार्टी भी शामिल हैं।

नेतन्याहू के खेमे में दक्षिणपंथी मंत्री इतामार बेन-ग्विर और बेजलेल स्मोट्रिच अहम नेता हैं। अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों का समर्थन भी सरकार बनाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसके अलावा, अरब समुदाय के समर्थन वाली पार्टियां ‘राम’ (Ra’am) और ‘जॉइंट लिस्ट’ भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। ऐसे में चुनाव के बाद सरकार किसकी बनेगी, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा खेमा दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटा पाता है।

न्यूज वेबसाइट वाला (Walla) के एक सर्वे के मुताबिक, नेतन्याहू विरोधी जायनिस्ट खेमे को कुल 54 सीटें मिलने का अनुमान है। ‘रिजर्विस्ट्स’ पार्टी की 4 सीटें भी इसमें जुड़ती हैं, तो यह संख्या 58 तक पहुंच सकती है। वहीं, नेतन्याहू समर्थक खेमे को 48 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब समुदाय के समर्थन वाली ‘जॉइंट लिस्ट’ और ‘राम’ को मिलाकर 14 सीटें मिल सकती हैं।

इस सर्वे के मुताबिक, विपक्षी खेमे को बढ़त जरूर है, लेकिन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा अभी भी दूर है।

इजरायल का चुनावी सिस्टम भारत से कितना अलग?

भारत और इजरायल, दोनों में संसदीय लोकतंत्र है। लेकिन चुनाव कराने का तरीका अलग है।

भारत की संसद में दो सदन हैं- लोकसभा और राज्यसभा। वहीं, इजरायल में सिर्फ एक सदन है, जिसे नेसेट कहा जाता है। भारत में लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटें हैं, जबकि इजरायल की संसद में 120 सीटें हैं।

सबसे बड़ा अंतर वोट देने के तरीके में है। भारत में मतदाता अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार को वोट देते हैं। जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह सीट जीत जाता है। इसके उलट, इजरायल में मतदाता पार्टी को वोट देते हैं। पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात में उन्हें संसद में सीटें मिलती हैं।

दोनों देशों की व्यवस्था में एक और अंतर है। भारत में राज्यों की अपनी सरकारें और विधानसभाएं हैं, जबकि इजरायल में भारत जैसी राज्य सरकारों और विधानसभाओं की व्यवस्था नहीं है।

हालांकि, एक समानता भी है। दोनों देशों में सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।

यह भी पढ़ें- होर्मुज में असुरक्षा बढ़ने की वजह अमेरिका-इजरायल, तेहरान में स्पष्ट बोले लावरोव