फ्रांस में आग, यूरोप में चिंगारी, पश्चिमी देशों की पॉलिसी कैसे खुद पर पड़ने लगी भारी?

फ्रांस में भड़का विरोध अब यूरोप के दूसरे देशों तक फैलने लगा है। शनिवार को फ्रांस के अलावा पुर्तगाल, बेल्जियम और इटली समेत कई देशों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के साथ आर्थिक राहत की मांग की।

फ्रांस में हफ्तों से जारी हिंसा शनिवार को इतनी ज्यादा हिंसक हो गई, जिसने उसके कई ऐतिहासिक शहरों, इमारतों और सार्वजनिक संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया। इस राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन ने फ्रांस में लिमोजेस शहर का 143 साल पुराना ऐतिहासिक टाउन हॉल भी जलाकर खाक हो गया। इस आगजनी में इमारत का बेल टावर भी ढह गया। सड़क पर उतरे 5.5 लाख से अधिक लोगों और पुलिस के बीच भयानक झड़पें हुईं।

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े, गिरफ्तारियां की और उन्हें काबू में करने का प्रयास किया। विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों की यह आग अकेले फ्रांस को ही नहीं जला रही, बल्कि इसकी चिंगारी बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली, अल्बानिया, स्पेन, ऑस्ट्रिया, जर्मनी और आयरलैंड जैसे यूरोपीय देशों को भी सुलगा रही है। आइये जानते हैं कि फ्रांस से लेकर यूरोप तक में हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की यह आग इतनी भयानक क्यों होती जा रही है और इसकी वजहें क्या हैं?

फ्रांस और यूरोप में क्यों बढ़ रहा असंतोष?

जाने-माने रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ कमर आगा ने आरटी हिंदी से बातचीत में फ्रांस से लेकर यूरोप के अन्य देशों में फैली हिंसा, आगजनी, विरोध और असंतोष के पीछे 5 प्रमुख वजहें बताई हैं।

बेरोजगारी

कमर आगा ने कहा कि यूरोपीय देशों में बेरोजगारी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। वहां के स्थानीय लोगों को सबसे ज्यादा इसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ज्यादातर लोगों को कभी 15 दिन, कभी एक महीने, कभी 2 महीने या कभी 6 महीने की जॉब मिलती है। इसके बाद वह फिर बेरोजगार हो जाते हैं। जबकि महंगाई और खर्च बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं। अस्थाई नौकरियों से यूरोपियन लोगों का रोजमर्रा का जीवन चलाना मुश्किल हो गया है। इसलिए अपनी सरकारों के खिलाफ उनमें भयानक असंतोष बढ़ता जा रहा है।

लिविंग स्टैंडर्ड

कमर आगा ने कहा कि यूरोपीय लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड यानी जीवनयापन शैली काफी ऊंची है, जिसकी भरपाई अस्थाई नौकरियों से नहीं की जा सकती। उनके रहन-सहन के स्तर, उनकी जरूरत की चीजें और जीवन शैली के मुकाबले इनकम बहुत कम है। कम आय और अधिक खर्च यानी स्टैंडर्ड लाइफ की वजह से उनका मैनेजमेंट गड़बड़ हो रहा है। इस वजह से असंतोष बढ़ रहा है।

इकोनॉमिक क्राइसिस

यूरोप के देशों में इस वक्त इकोनॉमिक क्राइसिस चल रही है। इसकी कई वजहें हैं। पहला कारण ऊर्जा का महंगा होना है। युद्ध के कारण ऊर्जा की सप्लाई बाधित हो गई। इससे पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें आसमान छूने लगीं। यूरोपीय देशों में इससे प्रोडक्शन कीमतें काफी ज्यादा बढ़ गई, ट्रांसपोर्टेशन चार्ज भी अधिक हो गया। इसका असर हुआ कि प्रोडक्शन घटने लगा। इकोनॉमी कमजोर होने लगी।

बढ़ती महंगाई

यूरोपीय देशों में ईंधन की कीमतों बढ़ने से जब प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ी तो ये सामान यूरोप समेत दूसरे देशों में महंगे बिकने लगे। ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने से रोजमर्रा की जरूरत वाली वस्तुओं के दाम भी आसमान छूने लगीं। खाने-पीने और रसोई के इस्तेमाल वाली चीजें महंगी हो गई हैं। इसके अलावा घरेलू जरूरत की चीजें, इलेक्ट्रॉनिक सामान, लग्जरी आइटम, कारें आदि सबकुछ महंगे हो गए। इससे यूरोपीय लोगों का बजट बिगड़ गया। उनके सामने भारी आर्थिक संकट पैदा हो गया। वे लोग महंगाई और बेरोजगारी से तंग आ गए हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि सस्ते लेबर और कच्चे माल की चाह में यूरोप और पश्चिम की ज्यादातर इंडस्ट्रियां भारत, चीन, वियतनाम समेत अन्य देशों में शिफ्ट हो गईं। इससे यूरोपीय लोगों की मुश्किलें बढ़ने लगीं।

Foreign Expert
अब तक टेक्नोलॉजी पर पश्चिमी देशों की मोनोपोली थी। ग्लोबल साउथ में बहुत गरीबी थी। मगर अब ग्लोबल साउथ में कई देश काफी संपन्न हो चुके हैं। उन देशों की डिपेंडेंसी अब यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों पर से कम हो रही है। यूरोपीय कंपनियां अब ग्लोबल साउथ शिफ्ट हो रही हैं। वहां मैन्युफैक्चरिंग घट गई है। इसका असर इकोनॉमी पर पड़ा है। इससे लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड भी प्रभावित हुआ है। 
कमर आगा
कमर आगा
रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञ


यूरोपीय देशों की पॉलिसी

कमर आगा ने कहा कि यूरोपीय देशों की बनाई पॉलिसी अब खुद ही उनके लिए भारी पड़ने लगी है। ज्यादातर यूरोपीय सरकारें पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के हित में काम करती हैं, उन्हीं के लिए पॉलिसी बनाती हैं। इससे यूरोपीय लोगों का जीवन उलझता जा रहा है। जबकि उनका लिविंग स्टैंडर्ड बहुत हाई हो चुका है। वह अब उससे नीचे समझौता नहीं कर सकते। छोटे-मोटे काम वह कर नहीं सकते और बड़े काम करने के लिए कंपनियों को दूसरे देशों से सस्ते और अच्छे लोग मिल जाते हैं। इससे यूरोप में बेरोजगारी बहुत ज्यादा बढ़ रही है।

अमेरिका तक बेरोजगारी को संभाल नहीं पा रहा है। इसलिए लोगों का गुस्सा सरकार के प्रति बढ़ रहा है। इनकी पॉलिसी की वजह से बहुत सी यूरोपियन कंपनियां दूसरे देशों में सस्ती लेबर और सुविधाओं की चाह में पलायन कर गईं। उसका असर अब स्थानीय लोगों पर पड़ रहा है। लोगों में अब बहुत जागरूकता आ चुकी है। अब वे इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए पब्लिक सड़कों पर उतर रही है।

फ्रांस में भारी कर्ज और आर्थिक संकट का कौन जिम्मेदार?

पेरिस के वकील फिलिप डुवोयले ने RT इंडिया से बातचीत में कहा कि सविनय अवज्ञा (यानी जनता की बगावत) ने आखिरकार राष्ट्रपति मैक्रों के राजनीतिक करियर को दांव पर लगा दिया है। यह दो तरीकों से सामने आ रहा है।  सड़क पर होने वाले दंगों और अगले चुनाव में पड़ने वाले कानूनी वोटों के जरिए। मुझे लगता है कि राष्ट्रपति मैक्रों बहुत चुप हैं और वह फ्रांस में भारी कर्ज, आर्थिक संकट और इन सब चीजों से जुड़ी इस तबाही की स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। वह पिछले नौ साल से राजनीति चला रहे हैं और इसकी एक कीमत चुकानी ही पड़ती है। अब लगता है कि हमारे सामने इन सभी दंगों और विरोध प्रदर्शनों के बाद मैक्रों के राष्ट्रपति पद की असलियत को लेकर एक बड़ी राजनीतिक बहस छिड़ेगी। क्या उन्हें अभी पद छोड़ देना चाहिए या छह महीने इंतजार करना चाहिए? यही अगला सवाल होगा।”

फ्रांस और यूरोप का भविष्य क्या है?

कमर आगा ने कहा कि मौजूदा हालत को देखते हुए फ्रांस और यूरोप का भविष्य बहुत ज्यादा गड़बड़ लग रहा है। अभी यह विरोध और असंतोष लोगों में और भी ज्यादा बढ़ेगा। यूरोपीय देशों ने लंबे समय से अपनी पॉलिसी नहीं बदली है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी पॉलिसी में भी बदलाव की मांग उठ रही है। यूरोपीय देशों का काफी पैसा अब हथियारों पर खर्च हो रहा है। इस वजह से पब्लिक भड़की हुई है।

उसे लग रहा है कि उनके टैक्स और मेहनत का पैसा हथियारों में लगाया जा रहा है। जो पैसा उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी दूर करने में इस्तेमाल हो सकता है, वह अनचाहे युद्धों और हथियारों में झोंका जा रहा है। यूरोप के लिए अपनी पॉलिसी बदलना इतना जल्द आसान नहीं है। इसलिए अभी यह विरोध प्रदर्शन आगे बढ़ेगा। मौजूदा लीडरों से लोगों को अब उम्मीद नहीं रह गई है। वह परिवर्तन चाहते हैं। जनता को लग रहा है कि उनकी सरकारें जनहित में काम नहीं कर रही हैं। इसलिए वे अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर हैं।

डेमोग्राफिक चेंज भी यूरोप को कर रहा अस्थिर

वरिष्ठ पत्रकार अशोक उपाध्याय ने कहा कि यूरोप में डेमोग्राफी का चेंज होना भी अस्थिरता की वजह है। कुछ विशेष ग्रुप के लोग अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए अराकता फैला रहे हैं। इसके लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। 

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यूरोप में महंगाई बढ़ गई है और दूसरी तरफ लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड बहुत हाई है। उनकी लग्जरियस लाइफ को महंगाई के साथ बेरोजगारी भी डिस्टर्ब कर रही है। इसके अलावा फ्रांस समेत यूरोपीय देशों में डेमोग्राफिक बदलाव की वजह से हिंसा और अराजकता बढ़ रही है। 
अशोक उपाध्याय
अशोक उपाध्याय
वरिष्ठ पत्रकार और विदेश मामलों के जानकार

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इमीग्रेशन को जिम्मेदार ठहराया है

फ्रांस में कैसे हुई विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत

फ्रांस में शनिवार और रविवार को हजारों लोग सड़कों पर उतरे। उनकी मुख्य मांग आर्थिक राहत और शिक्षा में सुधारों को लेकर थी। इस आंदोलन की शुरुआत पिछले महीने पेरिस के पास क्रिटेइल के एक हाई स्कूल में शिक्षकों की कमी और खराब स्कूली सुविधाओं को लेकर हुई थी। शुरुआत में यह छात्रों का प्रदर्शन था, लेकिन अब इसमें असमानता और बढ़ती महंगाई के खिलाफ आम लोग भी शामिल हो गए हैं। फ्रांस सरकार के 2027 के प्रस्तावित बजट और सार्वजनिक खर्च में कटौती के विरोध मजदूर संगठन भी इस प्रदर्शन से जुड़ गए हैं।

यहां हुई हिंसा

पश्चिम-मध्य फ्रांस के लिमोजेस शहर में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने 19वीं सदी के टाउन हॉल में आग लगा दी। राजधानी पेरिस, मार्सिले, रेन्नेस, टूलूज़ और एंजेर्स शहर में भी हिंसक झड़पें हुईं।


प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकॉर्नु ने बताया कि देश भर में 1,200 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। एपी न्यूज के अनुसार रविवार को कुल गिरफ्तार लोगों की संख्या 1800 से ज्यादा हो गई। इस दौरान 150 पुलिसकर्मी और आंदोलनकारी घायल हुए हैं। कई दफ्तरों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।

सरकार की प्रतिक्रिया

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने और लोगों व संपत्ति का सम्मान करने की अपील की है। अधिकारियों ने इन हिंसक घटनाओं के लिए “अल्ट्रा-लेफ्ट” समूहों को जिम्मेदार ठहराया है। बढ़ते सार्वजनिक कर्ज के कारण फ्रांस पर दबाव बढ़ गया है।

बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में भी प्रोटेस्ट

बढ़ती महंगाई के खिलाफ शनिवार को फ्रांस के अलावा यूरोप के कई देशों में सड़कों पर लाखों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। फ्रांस के अलावा बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में प्रदर्शन हुए। इससे यूरोपीय संघ (EU) की सरकारों पर दबाव बढ़ गया है।

बेल्जियम

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में छात्र यूनिवर्सिटी में फीस बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और वाटर कैनन चलाए। पुलिस का आरोप था कि प्रदर्शनकारियों ने उनपर पत्थर फेंके और आग लगाई। लिएज शहर में भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच काफी झड़पें हुईं।

पुर्तगाल

पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में 10 हजार से अधिक लोगों ने महंगाई, कम वेतन और बड़े शहरों में आवास न मिलने के खिलाफ मार्च निकाला। पुर्तगाल में 2017 के बाद से घरों की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं। संसदीय मामलों के मंत्री कार्लोस आब्रेउ अमोरीम ने कहा कि सरकार सड़कों के शोर के आगे नहीं झुकेगी।

इटली

इटली के मिलान में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसा में बदल गया। नकाबपोश उपद्रवियों ने पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकने शुरू कर दिए और बैरिकेड्स को आग के हवाले कर दिया। पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इस झड़प में कम दो पुलिसकर्मी घायल हुए और लगभग 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, जिनमें कई नाबालिग हैं।

इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलानी ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा, “प्रदर्शन करना अधिकार है, हमारे शहरों को आग के हवाले करना नहीं।” मिलान के मेयर ग्यूसेप साला ने कहा कि प्रदर्शन के कारण तो समझ में आते हैं, लेकिन कानून प्रवर्तन पर हिंसा और शहर को नुकसान पहुंचाना बिल्कुल भी जायजा नहीं है।

अन्य देशों में

स्पेन में 23 सितंबर से एक बुजुर्ग महिला की बेदखली से शुरू हुआ आंदोलन काफी तेज हो गया है। अभी गत 8 अक्टूबर को 50 से अधिक शहरों में एक साथ प्रदर्शन हुए थे। आवास का किराया बहुत महंगा हो गया है। इससे 11 नवंबर को देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया गया है। वहीं ग्रीस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में सितंबर अक्टूबर में सरकार के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन और रैलियां आयोजित हो चुकी हैं।


दूसरे देशों में भी फैल सकता है आंदोलन

यूरोपीय देशों में शिक्षा के बजट में कम फंड जारी करना, बढ़ती महंगाई, इकोनॉमिक क्राइसिस, ऊर्जा और तेल की बढ़ती कीमतें, युवाओं के भविष्य की अनिश्चितता और बेरोजगारी जैसी वजहों से लोगों का असंतोष बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। ऐसे में यह आशंका का जाहिर की जा रही है कि कि आने वाले महीनों में कई और देशों में यह आंदोलन तेज हो सकता है। इसने स्पेन, फ्रांस, इटली और पोलैंड में होने वाले चुनावों के मद्देनजर इस आशंका को काफी ज्यादा बढ़ा दिया है।