भारत के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का डिफेंस पैक्ट पर साफ कहा है कि हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते है। RT India की हेड ऑफ न्यूज रुनझुन शर्मा के साथ बातचीत में उन्होंने 'इनर रशिया एंड द वर्ल्ड' शो में कई अहम बातें बताईं। उन्होंने इस समझौते के मायने बताए, पाकिस्तान को क्या फायदा मिल सकता है और यह भी कि भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष की स्थिति में इन देशों की भूमिका क्या हो सकती है।
सवाल: जनरल, मैं आपसे 'मक्का पैक्ट' के जरिए पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के एक साथ आने पर बात करना चाहती हूं, जो अब लागू हो चुका है। कुछ लोग इसे 'इस्लामिक नाटो' भी कह रहे हैं। क्या यह नई दिल्ली के लिए सिरदर्द है?
जवाबः हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। यह तीन देशों का मिलाप है। इनमें से हर देश की अपनी ताकत है। तुर्किये जहां तकनीक में मजबूत है तो वहीं सऊदी अरब के पास पैसा है और पाकिस्तान इस पैक्ट में शामिल एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है, और यह 'इस्लामिक नाटो' शब्द इसलिए भी सामने आया है, क्योंकि इसमें एक क्लॉज है कि एक-दूसरे की मदद कैसे की जाएगी और एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा।
इसलिए यह स्पष्ट रूप से हमें इस समझौते को बहुत करीब से और विभिन्न स्तरों पर देखने के लिए मजबूर करता है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्तर पर, कूटनीति के स्तर पर और सैन्य स्तर पर कि यह तुर्किये और पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों को कैसे प्रभावित करेगा। बेशक, यह एक अलग बात है कि सऊदी अरब के साथ हमारे संबंध उतने ही अच्छे हैं। इसलिए ऐसा नहीं है कि सऊदी अरब भारत पर हमला करने जा रहा है।
भारत-सऊदी संबंधों पर कही बड़ी बात
उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि इसके बावजूद मैं बहुत दावे से तो यह नहीं कह सकता कि सऊदी अरब हमारे खेमे में है, लेकिन हां उसके साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं और वे बने रहेंगे। लेकिन इस समझौते से पाकिस्तान को तुर्किये की नवीनतम सैन्य तकनीक उसके ड्रोन, उसके एंटी-मिसाइल सिस्टम तक पहुंच मिल गई है, जिसके लिए वह जाना जाता है। इसके जरिये पाक को सऊदी अरब से वित्तीय सहायता भी मिलेगी, जो उनकी खस्ताहाल सेना के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
इसलिए ये अप्रत्यक्ष लाभ हैं जो खासकर पाकिस्तान और उसकी सेना के लिए फायदेमंद साबित होंगे। इसलिए हमें इस समझौते के विभिन्न पहलुओं को बहुत करीब से देखना होगा। उन्होंने अपनी कुछ सेनाएं सऊदी अरब में तैनात कर दी हैं, तो इससे क्षेत्रीय गतिशीलता कैसे बदलेगी, यह भी एक ऐसा पहलू है जिस पर हमें नजर रखनी होगी। जैसा कि मैंने कहा, हमें इसे अलग-अलग स्तरों पर देखना होगा।
सवालः तो जनरल यानी आप इस बात से चिंतित नहीं हैं कि मान लीजिए, भगवान न करे, भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो जाए, तो आपको नहीं लगता कि ये तीनों देश भारत की सीमाओं पर भारत के खिलाफ एकजुट हो जाएंगे?
जवाबः “नहीं, वह एकजुटता मैदान में सैनिकों को उतारने के रूप में नहीं होगी। इसकी संभावना बहुत कम है। इस गठबंधन और सहयोग के तहत, तुर्किये खुफिया जानकारी प्रदान करेगा, वे नए वेपन सिस्टम मुहैया कराएंगे और सऊदी अरब अपने कूटनीतिक रसूख का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित करने के लिए कहेगा कि यदि कोई संघर्ष होता है, तो उसका अंत जल्द से जल्द हो सके। पाकिस्तान को इसी तरह का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलेगा, लेकिन कोई भी देश किसी तीसरे देश से लड़ने के लिए अपनी सेना या सैनिकों को दूसरे देश में नहीं भेजेगा। मुझे लगता है कि यह कल्पना बहुत असंभावित है।”
सवालः अब बांग्लादेश ने भी मक्का पैक्ट में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है। यह क्या चल रहा है? लोग इसी वजह से इसे 'इस्लामिक नाटो' कह रहे हैं।”
जवाबः “वे कहते हैं कि राजनीति अजीब दोस्त बनाती है, लेकिन धर्म तो और भी अजीब दोस्त बनाता है। यह कल्पना करना कि एक पर हमला सभी पर हमला है, और यह सोचना कि यदि बांग्लादेश इस गठबंधन में शामिल हो जाता है और भारत-पाकिस्तान के बीच कुछ होता है, तो बांग्लादेश एक दूसरा मोर्चा खोल देगा? वह देश जिसे हमने आजाद कराया, वह हमें इस तरह से जवाब देगा?
यह वास्तव में कुछ ऐसा है जिस पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हमें यह देखने के लिए इंतजार करना होगा कि क्या वहां के लोगों में अच्छी सूझबूझ बनी रहती है और वे अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के बजाय अपने दीर्घकालिक हितों को समझते हैं।”
पूरा इंटरव्यू आप RT India पर जरूर देखें।