सऊदी-हूतियों की जंग में अमेरिका की एंट्री के आसार, मिडिल ईस्ट में खुल सकता है नया मोर्चा

क्या अमेरिका की एंट्री से मिडिल ईस्ट में एक नया मोर्चा खुल जाएगा? होर्मुज के बाद क्या लड़ाई बाब-अल-मंदेब तक फैल जाएगी? इससे सबसे ज्यादा किसे फायदा होगा और दुनिया के लिए यह क्यों चिंता का विषय है?

सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष तेज होता जा रहा है। शनिवार को रियाद के मुख्य अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर यमन के हूती विद्रोहियों ने बड़ा हमला किया, जिसमें 12 लोगों की मौत हो गई और 300 से ज्यादा लोग घायल हो गए। हूतियों ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। यह लगातार दूसरा दिन था जब हूतियों ने रियाद को निशाना बनाया है।

सऊदी अरब और हूतियों के बीच बढ़ती लड़ाई में अमेरिका भी शामिल हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसके संकेत दिए हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने सऊदी के साथ अपनी एकजुटता दोहराई है। लेकिन मक्का समझौते का तीसरा सदस्य तुर्की अभी सीधे तौर पर संघर्ष में उतरने को लेकर असमंजस की स्थिति में है।

ऐसे में सवाल है कि क्या अमेरिका की एंट्री से मिडिल ईस्ट में एक नया मोर्चा खुल जाएगा? होर्मुज के बाद क्या लड़ाई बाब-अल-मंदेब तक फैल जाएगी? इससे सबसे ज्यादा किसे फायदा होगा और दुनिया के लिए यह क्यों चिंता का विषय है?

'यह 12 साल के जुल्म का जवाब है'

हमले के बाद सामने आए कई वीडियो में एयरपोर्ट से घना धुआं उठता दिखा। हालांकि, इन वीडियो की पुष्टि नहीं हुई है। RT से बातचीत में हूती आंदोलन के वरिष्ठ प्रवक्ता मोहम्मद अल-बुखैती ने सऊदी अरब पर यमन के नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि हूतियों के हमले सऊदी अरब की कार्रवाई का जवाब हैं।

इसके साथ ही उन्होंने कहा, “सऊदी सरकार से जुड़े हर बुनियादी ढांचे—चाहे सैन्य ठिकाने हों, एयरपोर्ट हों या बंदरगाह, पर हमारे हमले तब तक जारी रहेंगे, जब तक सऊदी नेतृत्व जंग और नाकेबंदी खत्म कर स्थायी शांति पर राजी नहीं हो जाता। हम यह बदले की भावना से नहीं, बल्कि शांति के लिए मजबूर करने के लिए कर रहे हैं।”

मोहम्मद अल-बुखैती, वरिष्ठ प्रवक्ता, हूती आंदोलन
“यह हमला यमन पर सऊदी अरब के 12 साल के हमलों का सीधा जवाब है, जिसमें हमारे एयरपोर्ट, बंदरगाह, स्कूल, अस्पताल, बाजार और शादी-अंतिम संस्कार के आयोजन स्थल तक तबाह कर दिए गए। आज वे कहते हैं कि एयरपोर्ट नागरिक ठिकाना है जिसे निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। हम सऊदी अरब को उसी की भाषा में जवाब दे रहे हैं।”
मोहम्मद अल-बुखैती, वरिष्ठ प्रवक्ता, हूती आंदोलन
मोहम्मद अल-बुखैती, वरिष्ठ प्रवक्ता, हूती आंदोलन

IRIB के मुताबिक, यमन की सशस्त्र सेनाओं ने ऐलान किया है कि सना एयरपोर्ट पर पिछले एक दशक से हो रही बमबारी के जवाब में अब रियाद एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरने वाली एयरलाइंस को पहले यमनी सशस्त्र बलों से अनुमति लेनी होगी।

ट्रंप का इशारा: अमेरिकी दखल की तैयारी?

इस संघर्ष में अमेरिका भी कूद सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए कि अमेरिका हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के सैन्य अभियानों में सीधे शामिल होने पर विचार कर रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति
“हम इस पर विचार कर रहे हैं। हमने अभी इस हमले के बारे में जाना है और जल्द ही कोई बड़ा फैसला लेंगे।”
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति

ट्रंप के इस बयान से अमेरिकी सैन्य भागीदारी की आशंका बढ़ गई है। अमेरिका पहले भी हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर चुका है। पिछले साल उसने समुद्री जहाजों पर हमलों को रोकने के लिए हूतियों के ठिकानों पर करीब तीन महीने तक बमबारी की थी।

लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा पेचीदा है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष जारी है, दूसरी तरफ सऊदी अरब और हूतियों के बीच लड़ाई तेज हो रही है। ऐसे में अमेरिका का यमन में नया सैन्य अभियान उसे मिडिल ईस्ट में एक और मोर्चे पर उलझा सकता है। यह भी सवाल है कि क्या वॉशिंगटन और रियाद लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई का जोखिम उठाना चाहेंगे।

जानकारों का मानना है कि यमन संघर्ष का कोई आसान हल नहीं है और सैन्य कार्रवाई से भी इसका समाधान निकलना मुश्किल है। हूती आखिरी दम तक लड़ने के लिए तैयार हैं। वहीं पिछले साल की कार्रवाई के बावजूद अमेरिका हूतियों पर दबाव बनाने में नाकाम रहा है।

मक्का समझौते का लिटमस टेस्ट

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का समझौता हुआ है। इस समझौते के मुताबिक, किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत थोड़ी अलग दिख रही है।

दो महीने बाद ही इस समझौते की परीक्षा हो रही है। हूतियों के मिसाइल और ड्रोन हमले सऊदी अरब के एयरपोर्ट और तेल ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में रियाद में हुई बैठक में मक्का रक्षा गठबंधन ने सऊदी अरब में सैन्य बलों की तैनाती जल्द करने पर सहमति जताई।

5 अक्टूबर 2026 को जारी मक्का रक्षा गठबंधन के संयुक्त बयान में कहा गया, “समिति ने सामूहिक रक्षा से जुड़ी प्रतिबद्धताओं को लागू करने की दिशा में तुरंत कदम उठाने का फैसला किया। इसके तहत तय सैन्य बलों और संसाधनों को सऊदी अरब में तेजी से तैनात करने के लिए जरूरी उपाय किए जाएंगे। यह तैनाती तय व्यवस्थाओं और सदस्य देशों के राष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक होगी। इसका मकसद सैन्य तैयारियों, आपसी तालमेल और खतरों का सामना करने की सामूहिक क्षमता को मजबूत करना है।”

पाकिस्तान साथ खड़ा, लेकिन असमंजस में तुर्की

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के साथ अपनी एकजुटता दोहराई है। पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी लगातार रियाद के संपर्क में हैं। पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि वह सऊदी अरब और उसके पवित्र स्थलों की हिफाजत में सऊदी के साथ खड़ा है।

कसवर क्लासरा, एडिटर-इन-चीफ, इस्लामाबाद टेलीग्राफ
“इससे साफ है कि इस्लामाबाद इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख पिछले कुछ महीनों में रियाद और इस्लामाबाद के बीच लगातार आते-जाते रहे हैं। सऊदी अरब की सुरक्षा और मक्का रक्षा समझौते को लेकर पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व एकमत हैं।”
कसवर क्लासरा, एडिटर-इन-चीफ, इस्लामाबाद टेलीग्राफ
कसवर क्लासरा, एडिटर-इन-चीफ, इस्लामाबाद टेलीग्राफ

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद के लिए पाकिस्तान ने वहां 30,000 से 40,000 सैनिक तैनात किए हैं। ये सैनिक सऊदी अरब की जमीनी सीमाओं की रक्षा करने के साथ-साथ ड्रोन और मिसाइलों को रोकने में भी मदद कर रहे हैं।

दूसरी तरफ तुर्की फिलहाल इस संघर्ष में सीधा दखल देने को लेकर असमंजस की स्थिति में है। विदेश मंत्री हकन फिदान ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की है कि यह सिर्फ एक 'रक्षात्मक समझौता' है और तुर्की किसी दूसरे मुल्क में हमला करने अपनी सेना नहीं भेजेगा। वहीं राष्ट्रपति एर्दोगन ने केवल खुफिया जानकारी, रसद (लॉजिस्टिक्स) या ड्रोन की मदद की बात कही है।

हकन फिदान, विदेश मंत्री, तुर्की
”मैं फिर जोर देकर कहना चाहता हूं कि यह एक रक्षा समझौता है। अगर इस समझौते में शामिल किसी देश पर हमला होता है, तो उसकी रक्षा में मदद के लिए उसके साथ खड़ा होना समझौते का हिस्सा है। यह किसी दूसरे देश पर हमला करने का समझौता नहीं है। दूसरे शब्दों में, तुर्की किसी अन्य देश की जमीन पर हमला करने के लिए अपनी सेना नहीं भेजेगा।”
हकन फिदान, विदेश मंत्री, तुर्की
हकन फिदान, विदेश मंत्री, तुर्की

इसके अलावा तुर्की की संसद ने अभी तक इस समझौते को मंजूरी भी नहीं दी है। वहां का मुख्य विपक्षी दल इसका कड़ा विरोध कर रहा है और उनका कहना है कि वे तुर्की के सैनिकों को 'यमन के रेगिस्तानों' में ट्रंप के किसी नए खेल का हिस्सा बनने नहीं देंगे।

पाकिस्तान और तुर्की को हूती की चेतावनी

हूती नेतृत्व ने पाकिस्तान और तुर्की को सऊदी अरब के साथ चल रहे सैन्य टकराव से पूरी तरह दूर रहने की सख्त चेतावनी दी है। हूतियों के सर्वोच्च नेता अब्दुल मलिक अल-हूती और वरिष्ठ अधिकारी मोहम्मद अल-बुखैती ने साफ किया है कि अगर दोनों देशों ने किसी भी रूप में सऊदी अरब का साथ दिया, तो इसे सीधे तौर पर जंग में शामिल होना माना जाएगा।

हूती आंदोलन के प्रमुख अब्दुल मलिक अल-हूती ने अंकारा और इस्लामाबाद के लिए कड़ा संदेश जारी करते हुए कहा, 

अब्दुल मलिक अल-हूती, हूती आंदोलन के प्रमुख
“सऊदी अरब सिर्फ अरब देशों को ही नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी जगत की ताकतों को इसमें खींचना चाहता है। उनका मकसद तुर्कों को फंसाना और पाकिस्तानियों को इस दलदल में खींचना है। वे दिन-रात उनसे मदद की गुहार लगा रहे हैं।”
अब्दुल मलिक अल-हूती, हूती आंदोलन के प्रमुख
अब्दुल मलिक अल-हूती, हूती आंदोलन के प्रमुख

वहीं, हूतियों के वरिष्ठ प्रवक्ता मोहम्मद अल-बुखैती ने कड़े शब्दों में आगाह किया कि सऊदी अरब को दी जाने वाली कोई भी अप्रत्यक्ष या परोक्ष मदद भी जंग में शामिल होने के बराबर मानी जाएगी। बुखैती ने दोहराया कि अगर अंकारा और इस्लामाबाद ने रियाद की मदद करने की हिमाकत की, तो उन्हें हूतियों की “लोहे की मुट्ठी” (Iron Fist) का सामना करना पड़ेगा।

इस तनाव का सबसे बड़ा फायदा किसे?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते इस टकराव के पीछे एक अहम कूटनीतिक पहलू भी सामने आ रहा है। कतर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अली अल-हेल का मानना है कि इस पूरे तनाव का सबसे बड़ा फायदा इजरायल को हो रहा है।

उनके मुताबिक, पहली नजर में यह हूतियों का हमला दिखता है, लेकिन हमें अन्य संभावनाओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

डॉ. अली अल-हेल, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, कतर यूनिवर्सिटी
“इजरायल इस अफरा-तफरी का पूरा फायदा उठा रहा है। सऊदी अरब को कमजोर करना और उसे लगातार लहूलुहान रखना सीधे तौर पर इजरायल के हित में है, ताकि रियाद दबाव में आकर आखिरकार इजरायल के साथ रिश्तों को सामान्य करने के लिए मजबूर हो जाए।”
डॉ. अली अल-हेल, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, कतर यूनिवर्सिटी
डॉ. अली अल-हेल, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, कतर यूनिवर्सिटी

होर्मुज के बाद बाब-अल-मंदेब भी बंद हुआ तो?

इस संघर्ष की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ सैन्य टकराव नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ने वाला असर भी है। पिछले महीने हूतियों ने मोखा बंदरगाह और बाब अल-मंदेब के पेरिम द्वीप पर कब्जा कर लिया था। हूतियों ने इस समुद्री रास्ते से सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के आने-जाने पर पाबंदियां भी लगा रखी हैं।

बाब अल-मंदेब दुनिया के अहम समुद्री रास्तों में से एक है। यह यमन और अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र के बीच स्थित है और लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने से तेल की सप्लाई के साथ-साथ एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच होने वाला व्यापार भी प्रभावित हो सकता है।

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की पहली छमाही में बाब अल-मंदेब से रोज औसतन 42 लाख बैरल कच्चा तेल, कंडेनसेट और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरे। यह दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले कुल तेल व्यापार का करीब 5.3% था।

2023 में इस रास्ते से रोज औसतन 93 लाख बैरल तेल गुजरता था, जो 2024 में घटकर 41 लाख बैरल और 2025 की पहली छमाही में करीब 42 लाख बैरल रह गया।

वहीं काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के मुताबिक, लाल सागर के समुद्री रास्ते से हर साल अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का 12–15% और दुनिया का करीब 30% कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है। इसमें अनाज, खाद, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स, गाड़ियों के पुर्जे और ऊर्जा से जुड़े सामान शामिल हैं।

न अमेरिका जंग को लंबा खींचना चाहता है, न सऊदी अरब

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पेंच यह है कि खुलकर जंग का एलान करने की बात तो हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि न तो अमेरिका और न ही सऊदी अरब किसी लंबी जंग में फंसना चाहते हैं। सऊदी अरब अपने आर्थिक विकास और बड़े प्रोजेक्ट्स को बचाना चाहता है, जो लगातार हूती मिसाइलों और ड्रोनों के निशाने पर हैं। वहीं अमेरिका भी जानता है कि यमन के इस दलदल में एक बार पैर रखने का मतलब है दशकों तक चलने वाला अंतहीन युद्ध।

हूतियों से संघर्ष के बीच सऊदी अरब का तेल उत्पादन पिछले महीने तीन दशक से ज्यादा समय के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। पेरिस स्थित IEA के मुताबिक सऊदी का तेल उत्पादन घटकर करीब 60 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन से ज्यादा था।

वहीं EIA के मुताबिक, 2025 में सऊदी अरब ने रोजाना औसतन करीब 95-96 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन किया। इस उत्पादन के साथ वह अमेरिका और रूस के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उत्पादक रहा।

दूसरी तरफ अमेरिका मिडिल ईस्ट में फिर से नहीं फंसना चाहेगा। हाल ही में अमेरिका ने इराक से अपनी सेना को पूरी तरह हटा लिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (DoD) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इराक युद्ध में 4,500 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए और लगभग 32,000 घायल हुए। अगर खर्च की बात करें तो ब्राउन यूनिवर्सिटी के आकलन के मुताबिक इराक और सीरिया में 2003 से 2023 की शुरुआत तक के अमेरिकी युद्ध अभियानों की लागत करीब 1.79 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई।

वहीं ईरान से युद्ध में भी उसे भारी नुकसान हुआ है। CRS के मुताबिक, 28 फरवरी से ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान में कम से कम 81 फिक्स्ड-विंग और रोटरी-विंग एयरक्राफ्ट गंवा चुका है या उन्हें भारी नुकसान पहुंचा है। इस सूची में लड़ाकू विमान, टैंकर, निगरानी विमान, ड्रोन और हेलिकॉप्टर शामिल हैं। सितंबर में आए एक अमेरिकी आकलन के मुताबिक, युद्ध पर अब तक कुल 43.6 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। मई में यह अनुमान 29 अरब डॉलर था। यानी कुछ ही महीनों में युद्ध की लागत काफी बढ़ गई है।

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