फ्रांस, स्पेन, बेल्जियम, जर्मनी... यूरोप सुलग रहा, मगर नेता जंग का डर दिखाने में क्यों लगे हैं?

यूरोप के कई देशों में इन दिनों महंगे किराए, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और सरकारी खर्च में कटौती के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं। वहीं फ्रांस, जर्मनी समेत यूरोपीय देश सेना और हथियारों पर खर्च बढ़ाने में लगे हैं।

'Macron’s government has to stop investing only in war...'

जंग में जनता की गाढ़ी कमाई झोंकने पर रोक लगाने की ये मांग फ्रांस के प्रदर्शनों में शामिल 19 साल के एक छात्र थियो की है। उसने अलजजीरा से बात करते हुए कहा- "फ्रांस के लोगों के पास संसाधनों की कमी है लेकिन सरकार युद्ध पर पैसा फूंक रही है। हम इससे तंग आ चुके हैं।

यूरोप के कई देश इस वक्त नागरिकों के प्रदर्शनों की वजह से खबरों में हैं। फ्रांस ही नहीं, जर्मनी, स्पेन और बेल्जियम समेत कई यूरोपीय देशों में भी लोग सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। कहीं लोग महंगे किराये के खिलाफ सड़कों पर हैं, कहीं छात्र स्कूलों और कॉलेजों की बदहाली को लेकर नाराज हैं, तो कहीं कर्मचारी नौकरियां जाने के डर से प्रदर्शन कर रहे हैं। सबकी एक ही मांग है- अच्छी जिंदगी और बेहतर भविष्य।

'पब्लिक को घर-नौकरी चाहिए, नेता हथियारों पर पैसा लुटा रहे'

प्रदर्शनों में शामिल लोगों का आरोप है कि नेताओं को महंगाई, बेरोजगारी, मकानों की कमी और कमजोर होती सार्वजनिक सेवाओं से ज्यादा चिंता हथियारों और सैन्य ताकत बढ़ाने की है। कई लोगों ने आरोप लगाया कि यूरोप के नेता जंग की तैयारी में जुटे हैं। कहीं सेना बढ़ाने की प्लानिंग हो रही है, कहीं हथियारों पर अरबों यूरो खर्च किए जा रहे हैं तो कहीं युवाओं को सेना में भर्ती करने की तैयारी चल रही है। और ये सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब यूरोप में आम लोग घर, नौकरी, अच्छी शिक्षा और महंगाई के अपने अधिकार को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

यूरोपीय सरकारें रूस से संभावित सैन्य खतरे के हवा-हवाई दावे करके रक्षा बजट बढ़ा रही हैं। लेकिन रूस लगातार कहता रहा है कि उसका यूरोपीय देशों पर हमला करने का कोई इरादा नहीं है। यूरोप की खुफिया एजेंसियों ने भी ऐसे किसी खतरे की बात नहीं कही है।

महंगे किराए से लोग परेशान... स्पेन की हालत देखिए

स्पेन में मकानों की बढ़ती कीमतों और आसमान छूते किरायों ने लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि कई लोगों के लिए अपनी कमाई से घर का किराया निकालना मुश्किल होता जा रहा है। पिछले एक दशक में किराये लगभग दोगुने हो गए हैं।

पिछले महीने मैड्रिड में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला को उस घर से निकाल दिया गया, जहां वह करीब 70 साल से रह रही थीं। इस घटना ने लोगों का गुस्से और भड़का दिया। मकानों के बेतहाशा किराये और सरकार की नीतियों से परेशान लोगों ने इसे संघर्ष का प्रतीक बना लिया।

इसके बाद स्पेन के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन हुए। मैड्रिड के बीचोंबीच लोगों ने विरोध शिविर भी लगाया। संसद से किरायेदारों को तत्काल राहत देने वाले प्रस्तावों को मंजूरी नहीं मिलने के बाद नाराजगी और बढ़ गई। पिछले वीकेंड करीब 50 शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए।

मैड्रिड में प्रदर्शन कर रहे लोगों में 26 साल के मार्कोस सैंज लाइब्रेरियन भी शामिल हैं। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पहले वह दोस्तों के साथ दो बेडरूम का फ्लैट 900 यूरो (करीब 98 हजार रुपये) महीने के किराये पर शेयर करते थे। लेकिन अब एक बेडरूम वाले फ्लैट का किराया 1,000 यूरो (लगभग 1.09 लाख रुपये) तक पहुंच गया है। राजधानी मैड्रिड में एवरेज मंथली सैलरी का ये लगभग आधा है।

सोलर पैनल लगाने का काम करने वाले 31 साल के जेवियर ने कहा, 'हम एक बुनियादी अधिकार की मांग कर रहे हैं- रहने के लिए अच्छा घर, स्थिरता और ऐसे हालात, जिससे हम एक बेहतर जिंदगी बना सकें। मेरी आधी तनख्वाह एक छोटे से कमरे का किराया भरने में चली जाती है।'

बेल्जियम में भी छात्र सड़कों पर

फ्रांस के पड़ोसी देश बेल्जियम में भी छात्रों ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार, महंगे ट्रांसपोर्टेशन और बढ़ती फीस के खिलाफ प्रदर्शन किया। लीज शहर में कुछ जगहों पर स्कूलों को बंद कराने के साथ ही तोड़फोड़, आगजनी की घटनाएं भी हुईं। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कई लोगों को गिरफ्तार किया। 

फ्रांस में सितंबर के मध्य में शुरू हुए छात्रों ने जब प्रदर्शन शुरु किए थे, तब ज्यादा  स्कूलों में शिक्षक नियुक्त करने, कक्षाओं में छात्रों की संख्या सीमित करने, जर्जर स्कूलों की मरम्मत कराने और पढ़ाई का बोझ घटाने जैसी मांगें उठाई गई थीं। अब इसका दायरा बढ़ गया है। अब शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, दमकलकर्मी और परिवहन कर्मचारी भी अपने वेतन, सरकारी खर्च में कटौती और पब्लिक सर्विस की बदहाली जैसी समस्याओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। 

छात्रों की नाराजगी की एक बड़ी वजह शिक्षकों की कमी है। फ्रांस की सरकार ने इस साल हजारों टीचर्स के पद खत्म कर दिए हैं। अगले साल भी इसी तरह की कटौती की योजना है। ऐसे में लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब स्कूलों में शिक्षकों की जरूरत है, तब सरकार पदों में कटौती क्यों कर रही है?

मंगलवार को देशभर में करीब 2.66 लाख लोगों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन सप्ताह के दौरान 6,500 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस दौरान सैकड़ों छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए। घायलों में 15 साल का एक छात्र भी था, जिसका हाथ पुलिस के ग्रेनेड से घायल होने के बाद काटना पड़ा। वहीं, रबर की गोली लगने से 16 साल के छात्र की एक आंख की रोशनी जाने की खबर भी आई।

प्रदर्शनों के दौरान हिंसा की घटनाएं भी हुईं। कुछ उपद्रवियों ने बसों में आग लगा दी, इमरजेंसी सर्विस के कर्मचारियों पर हमले किए और स्कूलों को नुकसान पहुंचाया। रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में 24 स्कूलों को जला दिया गया और उनमें तोड़फोड़ की गई।

महंगाई ज्यादा, कमाई कम

छात्र आंदोलन से पहले से ही फ्रांस में सरकारी कर्मचारियों के विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। कर्मचारी वेतन में कम बढ़ोतरी, सार्वजनिक सेवाओं में कटौती और ईंधन की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से सरकारी कर्मचारियों के वेतन में करीब 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसी अवधि में महंगाई दर 24 फीसदी तक पहुंच गई। यानी वेतन बढ़ने के बावजूद रोजमर्रा की चीजों पर खर्च का बोझ काफी बढ़ गया है।

ऐसे में सरकार के 54 अरब यूरो के बजट पैकेज ने नाराजगी और बढ़ा दी है। इसमें सरकारी खर्च घटाने और पेंशन व दूसरी सुविधाओं पर रोक लगाने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं।

प्रदर्शनकारी यूक्रेन को लगातार दी जा रही आर्थिक मदद पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि विदेश में युद्ध के लिए पैसा खर्च करने के बजाय देश में अस्पतालों, स्कूलों और आम लोगों को राहत देने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ लोग ईंधन पर टैक्स घटाने की भी मांग कर रहे हैं।

जर्मनी: खत्म हो रही नौकरियां लेकिन फोकस सेना बढ़ाने पर 

सितंबर के आखिर में जर्मनी के करीब 100 शहरों और कस्बों में 45 हजार से ज्यादा छात्रों ने अपनी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों की सबसे ज्यादा नाराजगी जर्मनी की सेना के विस्तार को लेकर थी। फ्रेडरिक मर्ज सरकार की योजना 2035 तक सक्रिय सैनिकों की संख्या बढ़ाकर 2.60 लाख से ज्यादा करने और करीब 2 लाख रिजर्व सैनिक तैयार करने की है। वह जर्मनी की सेना को यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना बनाना चाहते हैं। 

जर्मनी में युवाओं के लिए सैन्य सेवा से जुड़ी पंजीकरण प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। नेताओं ने कहा कि अगर स्वेच्छा से सेना में भर्ती होने वालों की संख्या पर्याप्त नहीं बढ़ी, तो अनिवार्य सैन्य सेवा का नियम फिर लागू किया जा सकता है। इससे नाराज जर्मनी के युवा सड़कों पर उतर आए।

जर्मनी में सैन्य सेवा से छूट मांगने वालों की संख्या भी बढ़ी है। इस साल के पहले आठ महीनों में 12 हजार से ज्यादा लोगों ने सैन्य सेवा में जाने से इनकार करते हुए छूट मांगी। यह संख्या पिछले पूरे साल के आंकड़े से तीन गुने से भी ज्यादा है।

दूसरी तरफ जर्मनी के ऑटोमोबाइल उद्योग में हजारों कर्मचारी छंटनी और कारखाने बंद होने की आशंका में प्रदर्शन कर रहे हैं। फॉक्सवैगन की योजना अपने अलग-अलग ब्रांडों में करीब एक लाख नौकरियां घटाने की है। दूसरी कंपनियां भी उत्पादन कम कर रही हैं या अपना बिजनेस दूसरे देशों में ले जा रही हैं।

जर्मनी की औद्योगिक मुश्किलों की एक वजह सस्ती रूसी ऊर्जा की आपूर्ति का बंद होना भी है। रूसी गैस की बदौलत जर्मन कंपनियों लंबे समय तक कम लागत पर उत्पादन करती रहीं। अब महंगी ऊर्जा, अमेरिकी टैरिफ और चीन की कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के कारण उद्योग पर दबाव बढ़ गया है।

जहां कारखानों और नौकरियों का संकट है, वहीं हथियार बनाने वाली कंपनियों के हालात अलग हैं। जर्मनी ने रक्षा बजट बढ़ाकर 108.2 अरब यूरो कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, फॉक्सवैगन के शेयर 2021 के अपने उच्चतम स्तर से 75 फीसदी से ज्यादा गिर चुके हैं, जबकि हथियार बनाने वाली कंपनी राइनमेटल के शेयरों में 2022 की शुरुआत से 1,100 फीसदी से ज्यादा उछाल आया है।

हथियारों पर खर्च बढ़ाने की होड़, जनता की कोई नहीं सुन रहा

यूरोप की सड़कों पर लोग अपनी परेशानियों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन नेताओं का ध्यान सेना और हथियारों पर है। फ्रांस में मंगलवार को जब हजारों लोग बेहतर जिंदगी और सरकारी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे, उसी दिन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने परमाणु मिसाइल टेस्टिंग की तस्वीर शेयर कीं। संदेश दिया कि फ्रांस को अपनी आजादी बनाए रखने के लिए इतना ताकतवर बनना होगा कि दूसरे देश उससे डरें।

जर्मनी में चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और नाटो प्रमुख मार्क रूटे को भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। पिछले हफ्ते एक समारोह में सैन्य गठबंधन को वेस्टफेलियन पीस प्राइज दिए जाने के दौरान लोगों ने उनके खिलाफ नारे लगाए।

रक्षा बजट क्यों बढ़ा रहा यूरोप?

यूरोपीय नेताओं को रूस का झूठा डर दिखाने की सोच अब बजट प्रस्तावों में भी दिख रही है। जर्मनी समेत यूरोपीय संघ के छह देशों ने अगले बजट में कटौती की मांग की है। आलोचकों का कहना है कि इससे किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को मिलने वाली मदद घट सकती है, जबकि सेना व हथियारों पर खर्च लगातार बढ़ता रहेगा।

रक्षा खर्च बढ़ाने के पीछे रूस से भविष्य में हमले का डर दिखाया जा रहा है। हालांकि रूस कई बार कह चुका है कि उसका यूरोपीय देशों पर हमला करने का कोई इरादा नहीं है। फिनलैंड के राष्ट्रपति ने भी कहा कि उनकी खुफिया एजेंसियों को रूस की ओर से फिलहाल किसी तत्काल सैन्य खतरे के संकेत नहीं मिले हैं।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब लोगों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो सरकारें उनकी समस्याओं के समाधान के बजाय हथियारों पर अरबों यूरो क्यों खर्च कर रही हैं?