मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच जिस 'मुस्लिम NATO' की चर्चा पिछले कुछ समय से हो रही थी, अब उसकी पहली परीक्षा शुरू हो गई है। 5 अक्टूबर को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने रियाद में मक्का डिफेंस अलायंस की इमरजेंसी बैठक हुई। बैठक में पाकिस्तान और तुर्किये ने कहा कि सऊदी की मदद के लिए वो सैन्य मदद भेजने को तैयार हैं।
हालांकि बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में यह नहीं बताया गया कि कितने सैनिक, कौन से हथियार या कौन सी मिलिट्री यूनिट्स सऊदी भेजी जाएंगी।
यह फैसला ऐसे समय हुआ है, जब यमन में सऊदी समर्थित बलों ने हूतियों के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान 'ऑपरेशन डॉन ऑफ यमन' शुरू किया है। सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन हवाई हमलों के जरिए यमनी सरकारी बलों को समर्थन दे रहा है और लाल सागर के प्रमुख समुद्री रास्ते बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
सरकारी बलों ने यमन के धुबाब और मोखा समेत कई इलाकों में बढ़त का दावा किया है। हालांकि हूतियों ने इन दावों को खारिज किया है। इसी दौरान हूतियों ने सऊदी अरब में एयरपोर्ट, तेल ठिकानों और सैन्य प्रतिष्ठानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों के दावे किए हैं।
इन सबके बीच सबकी नजर अब पाकिस्तान और तुर्किए पर है कि ये दोनों देश सऊदी अरब की मदद के लिए क्या करेंगे।
क्या पाकिस्तान-तुर्किये सीधे हूतियों से लड़ेंगे?
मिडिल ईस्ट के जानकारों का कहना है कि फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स के सीनियर फेलो डॉ. फज्जुर रहमान सिद्दिकी ने RT हिंदी से बात करते हुए कहा कि तुर्किये और पाकिस्तान की मदद का मतलब जरूरी नहीं कि दोनों देशों की सेनाएं यमन में जाकर हूतियों से लड़ें।
वह कहते हैं, 'रियाद में हुई तीनों देशों की बैठक के कई संदेश हैं।
- अगर कोई पक्ष एक तय सीमा से आगे बढ़ेगा और हालात बहुत गंभीर होंगे, तो ये देश कार्रवाई कर सकते हैं।
- मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर व्यवस्था के तौर पर पेश करना है।
- तीनों देशों को यह दिखाना है कि वे एकजुट हैं और इस समझौते के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार कर रहे हैं।'
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी स्थानीय मीडिया से बात करते हुए कहा है कि फिलहाल तुर्किये और पाकिस्तान की सेनाएं 'सपोर्टिव रोल' में हैं और कॉम्बैट ऑपरेशन सऊदी सैनिक कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तान की ओर से रिकॉनिसेंस यानी निगरानी में मदद की जा रही है।
तुर्किये के सामने सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?
सऊदी की सैन्य मदद करने के मामले में तुर्किये के सामने एक कानूनी पेच है। संयुक्त बयान में साफ लिखा है कि सैन्य बलों की तैनाती तीनों देशों के 'राष्ट्रीय कानूनों' के मुताबिक होगी। तुर्किये में विदेश में सेना भेजने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी होती है। इसलिए अभी यह साफ नहीं है कि तुर्की सऊदी अरब को किस तरह की सैन्य क्षमता देगा और क्या इसमें जमीनी सैनिक शामिल होंगे।
तुर्की की जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट गोनुल तूल ने इसी मुद्दे को उठाया है।
एक्स पर उन्होंने लिखा, 'मक्का डिफेंस समझौते को अभी तक तुर्किये की संसद ने मंजूरी नहीं दी है। तुर्किये के कानून के मुताबिक, विदेश में सैनिकों की तैनाती के लिए संसद की मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे में कम से कम फिलहाल तुर्किये की भूमिका जमीनी सैनिक भेजने के बजाय दूसरी सैन्य क्षमताएं उपलब्ध कराने तक सीमित रहने की संभावना ज्यादा है।'
सऊदी की सैन्य मदद के संबंध में तुर्किये के विदेश मंत्री हकान फिदान का हालिया बयान भी देखने लायक है। सोमवार को उन्होंने कहा कि यमन मुद्दे का हल निकालने के लिए सऊदी अरब काफी सकारात्मक है। उनके मुताबिक तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने यमन और सऊदी अरब के बीच विवाद को बातचीत और शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने के तरीकों पर चर्चा की है।
क्या सऊदी अरब को मिल गया अंतरराष्ट्रीय कवच?
अमेरिका सऊदी अरब का ऐतिहासिक सिक्योरिटी गारंटर रहा है लेकिन हूतियों के मामले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाथ खड़े कर दिए। सऊदी अरब ने अमेरिका से हूतियों के खिलाफ सैन्य मदद मांगी। लेकिन ट्रंप ने कहा कि हूतियों ने खुद अमेरिका को फोन कर कहा है कि वे उससे लड़ना नहीं चाहते और वॉशिंगटन इस जंग में शामिल न हो।
इन हालातों में पाकिस्तान और तुर्किये सऊदी अरब के साथ आने की बात कह रहे हैं। मध्य पूर्व मामलों के विश्लेषक सामी हम्दी का मानना है कि अभी यह देखना बाकी है कि तुर्किये या पाकिस्तान यमन में सीधे हिस्सा लेते हैं या नहीं। तुर्किये के लिए संसद की मंजूरी जरूरी है, जबकि पाकिस्तान अपनी भूमिका को सऊदी अरब की सीमा के भीतर रक्षा तक सीमित रख सकता है।
सामी हम्दी ने एक्स पर लिखा, 'यमन में तुर्किये या पाकिस्तान सीधे तौर पर शामिल होंगे या नहीं, यह अभी देखना बाकी है। संभव है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का मकसद मक्का अलायंस के संयुक्त बयान के जरिए तुर्किये और पाकिस्तान को सीधे यमन की लड़ाई में उतारना रहा ही न हो। तत्काल मकसद शायद इस अभियान को एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा छतरी देना है, जो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप देने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे।'
वह कहते हैं कि अगर सऊदी अरब अकेले हूतियों के खिलाफ कार्रवाई करता है, तो उस पर सवाल उठ सकते हैं। लेकिन तीनों देश मिलकर आगे बढ़ते हैं, तो उसी कार्रवाई को मिलकर की गई रक्षा कार्रवाई बताया जा सकता है।
पाकिस्तान के जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट अली के. चिश्ती कहते हैं, ‘मक्का अलायंस रातों-रात नहीं बना। अगस्त में इस पर हस्ताक्षर हुए, सितंबर में हूतियों के यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब पर कब्जे के बाद इसकी परीक्षा हुई और 5 अक्टूबर को सऊदी समर्थित बलों के यमन में अभियान शुरू करने के साथ यह सक्रिय हो गया।'
मक्का पैक्ट एक्टिव होने से पावर बैलेंस बदल जाएगा?
डॉ. फज्जुर रहमान सिद्दिकी के मुताबिक, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का डिफेंस अलायंस से मिडिल ईस्ट का शक्ति संतुलन बदल जाएगा। इसे फिलहाल डिटरेंस यानी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
उनके मुताबिक, 'फिलहाल इसे एक डिटरेंस यानी प्रतिरोधक व्यवस्था के तौर पर देखा जा सकता है। तीनों देश अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए विकल्प बढ़ाना चाहते हैं। यह अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा ढांचे को पूरी तरह बदलने की कोशिश नहीं, बल्कि सुरक्षा के दूसरे रास्ते तैयार करने की कोशिश है।'
मक्का बैठक को ईरान कैसे देख रहा?
मक्का गठबंधन का एक अहम पहलू ईरान भी है। हूतियों को ईरान का समर्थन हासिल है, हालांकि तेहरान हूतियों के सैन्य अभियानों को सीधे नियंत्रित करने से इनकार करता है। मक्का अलायंस ऐसे समय में एक्टिव हुआ है जब यमन की लड़ाई में हूती सऊदी अरब को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं।
डॉ. रहमान कहते हैं, 'ईरान इस समझौते की सीमाओं को समझता है। उसे पता है कि पाकिस्तान और तुर्किये किस हद तक इसमें शामिल हो सकते हैं और उनकी अपनी सीमाएं क्या हैं। इसलिए फिलहाल ईरान की ओर से कोई बहुत आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं आई है। मेरे हिसाब से आने वाले समय में यह गठबंधन सैन्य तौर पर उस तरह एक्टिव नहीं होने जा रहा है, जैसा इसकी चर्चा हो रही है।'
वह कहते हैं कि कूटनीतिक स्तर पर तीनों देश साथ आ सकते हैं, राजनीतिक समर्थन दे सकते हैं या खुफिया और दूसरी तरह की मदद कर सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान या तुर्किये का सीधे ईरान के खिलाफ लड़ाई में उतरना बेहद मुश्किल है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह पूरी कहानी?
भारत के लिए इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा मतलब तेल और समुद्री व्यापार से जुड़ा है। ईरान के खिलाफ अमेरिका के युद्ध की वजह से दुनिया का प्रमुख व्यापारिक रास्ता होर्मुज स्ट्रेट पहले से ही बंद है जिससे तेल-गैस का संकट देखने को मिला है।
यमन में लड़ाई बढ़ने और हूतियों के सऊदी अरब पर हमले तेज होने से बाब अल-मंदेब और लाल सागर की सुरक्षा पर असर पड़ रहा है। बाब-अल-मंदेब से समुद्री व्यापार का 10% हिस्सा गुजरता है।
फज्जुर रहमान कहते हैं-
वह कहते हैं कि इसका असर भारतीय जहाजों और उन पर काम करने वाले क्रू पर भी पड़ता है। मौजूदा तनाव में भारतीय नाविकों और शिपिंग कंपनियों के लिए खतरा बढ़ गया है।
भारत के पास ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत हैं, लेकिन मध्य-पूर्व से आने वाले तेल, गैस और उर्वरक आपूर्ति को कम समय में पूरी तरह बदलना आसान नहीं है। वैकल्पिक रास्तों की दूरी, समय, शिपिंग और इंश्योरेंस लागत जैसे कई फैक्टर इसमें शामिल होते हैं।
फज्जुर रहमान कहते हैं कि भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए सबसे अहम बात यही है कि इस संकट को जल्द खत्म किया जाए। कूटनीतिक बातचीत, मध्यस्थता और वार्ता के जरिए तनाव कम करने की कोशिश होनी चाहिए, क्योंकि जो देश सीधे इस युद्ध का हिस्सा नहीं हैं, वे भी इसकी वजह से आर्थिक और सुरक्षा संबंधी नुकसान झेल रहे हैं।