ब्राजील चुनाव में अमेरिका Vs ब्रिक्स कैसे? नतीजे आने के बाद भी सरकार नहीं बनी

ब्राजील के चुनाव नतीजों में न तो राष्ट्रपति लूला और न ही उनके प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो को स्पष्ट बहुमत मिला है। अब 25 अक्टूबर के रनऑफ में नए राष्ट्रपति का फैसला होगा। खास बात यह है कि चुनाव नतीजा यह भी तय करेगा कि देश BRICS और ग्लोबल साउथ की तरफ रहेगा या अमेरिका के ज्यादा करीब जाएगा।

ब्राजील में 4 अक्टूबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ गए हैं, लेकिन देश को अभी नया राष्ट्रपति नहीं मिला है। मुकाबला मौजूदा राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा और दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो बोल्सोनारो के बीच है। फ्लावियो को करीब 47 फीसदी और लूला को 45 फीसदी वोट मिले हैं। किसी भी उम्मीदवार को 50 फीसदी से ज्यादा वोट नहीं मिले, इसलिए अब 25 अक्टूबर को दोनों के बीच सीधा मुकाबला होगा।

ब्राजील के नियमों के मुताबिक, राष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार को वैध वोटों का 50 फीसदी से ज्यादा हासिल करना होता है। इसलिए अभी मौजूदा सरकार ही काम करती रहेगी।

25 अक्टूबर के रनऑफ के बाद नए राष्ट्रपति की प्रक्रिया शुरू होगी और कार्यकाल जनवरी में शुरू होगा। ब्राजील में राष्ट्रपति की औपचारिक शपथ 5 जनवरी को होती है।

अब समझिए ये राष्ट्रपति चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हैं और पूरी दुनिया की नजर इस तरफ क्यों है?

नतीजे तय करेंगे ब्राजील की विदेश नीति

ब्राजील चुनाव का असर सिर्फ देश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। राष्ट्रपति बदलने के साथ देश की विदेश नीति की दिशा भी बदल सकती है, क्योंकि लूला के कार्यकाल में ब्राजील ने BRICS, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ रिश्तों को मजबूत करते हुए अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। लूला ने बहुपक्षीय मंचों और ग्लोबल साउथ में ब्राजील की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया है।

इसके उलट, फ्लावियो बोल्सोनारो ने अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करने, चीन पर निर्भरता कम करने और BRICS में ब्राजील की सदस्यता की समीक्षा तक की बात कही है।

जानकारों का कहना है यह ब्राजील के लिए यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है बल्कि इससे यह भी तय होगा कि आने वाले सालों में ब्राजील की विदेश नीति क्या रहेगी।

अमेरिका स्थित थिंक टैंक क्विंसी इंस्टिट्यूट के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट तृता पारसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ब्राजील की विदेश नीति में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और बहुपक्षवाद को संवैधानिक आधार मिला हुआ है।

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लूला के बाद अगर फ्लावियो सरकार इस रुख से हटकर अमेरिका के ज्यादा करीब जाती है, तो इसका असर सिर्फ ब्राजील के विदेश संबंधों पर नहीं, बल्कि BRICS, ग्लोबल साउथ और वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
तृता पारसी
तृता पारसी
क्विंसी इंस्टिट्यूट के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट

ब्रुकिंग्स के वरिष्ठ एक्सपर्ट टेड पिकोन के मुताबिक, ब्राजील का चुनाव सिर्फ देश की घरेलू राजनीति की दिशा तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय कर सकता है कि ग्लोबल साउथ में ब्राजील बहुपक्षवाद को मजबूत करने के लिए अपनी कूटनीतिक ताकत लगाता रहेगा या अमेरिका के साथ ज्यादा द्विपक्षीय और लेन-देन आधारित रिश्तों की ओर बढ़ेगा।

लूला की नीति: BRICS और ग्लोबल साउथ पर जोर

लूला की विदेश नीति का आधार किसी एक महाशक्ति के खेमे में जाना नहीं, बल्कि अलग-अलग ताकतों के साथ रिश्ते रखते हुए ब्राजील की रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना है। उनके मौजूदा कार्यकाल में ब्राजील ने अमेरिका और चीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखे हैं।

साथ ही BRICS, G20 और दूसरे बहुपक्षीय मंचों के जरिए ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश की है।

लूला सरकार ने राष्ट्रीय हित को देखते हुए अमेरिका और चीन, दोनों देशों के साथ अपने रिश्तों को बैलेंस करने की कोशिश की है।

चीन लंबे समय से ब्राजील का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ब्राजील के सोयाबीन, कच्चे तेल और लौह अयस्क जैसे प्रमुख निर्यात का बड़ा बाजार है। 2025 में चीन ने ब्राजील से करीब 100 अरब डॉलर का सामान खरीदा, जो ब्राजील के कुल निर्यात का लगभग 29 फीसदी था। इसलिए चीन के साथ आर्थिक रिश्ते अचानक कम करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

लूला की सरकार चीन के साथ व्यापार के अलावा तकनीक और निवेश में भी सहयोग बढ़ा रही है। मई 2025 में उनकी चीन यात्रा के दौरान करीब 20 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे, जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)से जुड़ा सहयोग भी शामिल था। साथ ही लूला अमेरिका से भी तकनीक और निवेश लेने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रंप के साथ लूला के तनावपूर्ण रिश्ते

अमेरिका के साथ लूला के रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे। डोनाल्ड ट्रंप ने ब्राजील और लूला की नीतियों को लेकर कई बार सार्वजनिक तौर पर तीखी टिप्पणी की। 2022 में ट्रंप ने लूला को कट्टर वामपंथी बताते हुए उन्हें 'Lunatic' यानी 'मूर्ख' तक कह दिया था।

2025 में दोनों नेताओं के बीच तनाव तब और बढ़ गया, जब ट्रंप ने फ्लावियो बोल्सोनारो के पिता और पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई को लेकर ब्राजील की आलोचना की।

लूला ने इसका जवाब देते हुए कहा कि ब्राजील एक संप्रभु देश है और उसकी न्यायपालिका के मामलों में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इसके बाद विवाद सीधे व्यापार तक पहुंच गया। जुलाई 2025 में ट्रंप ने ब्राजील से अमेरिका आने वाले सामान पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान किया।

ट्रंप ने इसे ब्राजील की व्यापार नीतियों के साथ-साथ बोल्सोनारो से जुड़े मामले से जोड़ा। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी कंपनियों को लेकर लूला का व्यवहार सही नहीं है। लूला ने टैरिफ को अनुचित बताया और कहा कि अगर अमेरिका एकतरफा तरीके से टैरिफ बढ़ाता है तो ब्राजील इसका जवाब देगा।

हालांकि, टैरिफ विवाद के बावजूद लूला ने अमेरिका से बातचीत का रास्ता बंद नहीं किया। उन्होंने कहा कि ब्राजील बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन देश की संप्रभुता और अपने आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगा।

फ्लावियो का झुकाव अमेरिका की ओर

फ्लावियो बोल्सोनारो की विदेश नीति का रुख लूला से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। वह चीन पर ब्राजील की निर्भरता कम करने, BRICS की भूमिका की समीक्षा करने और अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करने की बात कर चुके हैं।

उन्होंने अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग, ड्रग तस्करी के खिलाफ अमेरिकी पहल में भागीदारी और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते जैसे प्रस्तावों की बात की है। मई में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से व्हाइट हाउस में मुलाकात भी की थी।

अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स के एक लेख में कहा गया कि फ्लावियो के पिता जायर बोल्सोनारो ने भी राष्ट्रपति रहते हुए अमेरिका के साथ करीबी संबंध बनाने की कोशिश की थी। अगर फ्लावियो चुनाव जीतते हैं, तो ब्राजील ट्रंप प्रशासन की क्षेत्रीय सुरक्षा पहल ‘शील्ड ऑफ द अमेरिकाज’ में शामिल होने की कोशिश कर सकता है। लूला इस पहल में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं।

लेख में कहा गया कि चुनाव में कोई भी जीते, अगली सरकार के लिए अमेरिका और चीन दोनों के साथ रिश्ते बनाए रखना जरूरी होगा, खासकर आर्थिक वजहों से।

क्या BRICS छोड़ देगा ब्राजील?

फ्लावियो ने BRICS को लेकर आलोचनात्मक रुख दिखाया है और समूह से बाहर निकलने की संभावना पर भी बात की है।

अमेरिका के जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट और पत्रकार डैनी हेइफोंग ने एक्स पर लिखा, 'अगर बोल्सोनारो जीतते हैं, तो ब्राजील एक नव-उपनिवेश बन जाएगा। BRICS का ‘B’ यानी ब्राजील भी अस्थिरता के दौर में पहुंच जाएगा।'

उन्होंने लिखा कि अमेरिका के घटते साम्राज्यवादी प्रभाव की भरपाई के लिए बनाई जा रही नई ‘मुनरो डॉक्ट्रिन’ फिलहाल पूरे पश्चिमी गोलार्ध में कुलीनतंत्र को तेजी से मजबूत कर देगी। उनके मुताबिक, लैटिन अमेरिका में यह कट्टर विचारधाराओं का दौर है।

जहां तक ब्राजील के ब्रिक्स छोड़ने का सवाल है, ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूट के लेख में लिखा गया कि ब्राजील का ब्रिक्स से निकलना इतना आसान नहीं है। इसकी बड़ी वजह चीन के साथ ब्राजील की आर्थिक निर्भरता है। चीन से व्यापार खत्म करना या बड़े पैमाने पर कम करना ब्राजील के लिए आर्थिक रूप से महंगा साबित हो सकता है। यहां तक कि फ्लावियो ने भी चीन के साथ आर्थिक रिश्ते बनाए रखने की बात कही है।

जायर बोल्सोनारो चीन के आलोचक रहे, लेकिन उनके शासनकाल में भी दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ता रहा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर फ्लावियो की सरकार आती भी है तो ब्राजील का ब्रिक्स देशों, खासकर चीन से पूरी तरह दूरी बनाना आसान नहीं होगा। अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ सकती है, लेकिन चीन के साथ व्यापार और निवेश के रिश्ते ब्राजील की विदेश नीति को संतुलित रखने के लिए मजबूर करेंगे।