यमन में एक बार फिर जंग का खतरा गहराता दिख रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान ने राजनीतिक बातचीत के जरिए रास्ता निकालने का प्रस्ताव दिया है।
सऊदी अरब इस अभियान के लिए एक लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को जुटाने पर विचार कर रहा है। पूरे सैन्य ऑपरेशन की कमान सऊदी अरब के हाथ में होगी और उसकी वायुसेना हवाई हमलों के जरिए अभियान को कवर देगी। अमेरिका पहले से ही यमन में सऊदी अभियानों के लिए खुफिया जानकारी उपलब्ध करा रहा है, जबकि कुछ क्षेत्रीय और यूरोपीय देश सैन्य सहायता दे रहे हैं। हालांकि, सऊदी अरब के सहयोगी देशों के सीधे तौर पर युद्ध अभियान में शामिल होने की उम्मीद नहीं है।
वहीं दूसरी तरफ ईरान के इस प्रस्ताव पर अगले हफ्ते रियाद में होने वाली मक्का समझौते की समिति की आपात बैठक में चर्चा हो सकती है।
हूतियों के खिलाफ सऊदी का सैन्य अभियान
सऊदी अरब के इस संभावित सैन्य अभियान का एक बड़ा मकसद पिछले महीने हूतियों की तेजी से बढ़ी पकड़ को खत्म करना है। इसके लिए सऊदी दो विकल्पों पर विचार कर रहा है।
- पहला, बाब अल-मंदेब के आसपास के इलाके में सीमित सैन्य कार्रवाई करना। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है।
- दूसरा, यमन के कई मोर्चों पर एक साथ बड़ा अभियान चलाना। इसमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ प्रांतों में भी एक साथ हमले किए जा सकते हैं।
सैन्य अभियान के दायरे को देखते हुए इसमें एक लाख से अधिक यमनी सैनिकों को जुटाया जा सकता है।
रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार कमर आगा के मुताबिक, ताकत और सैन्य बल के दम पर हूतियों को खत्म कर देना संभव नहीं है। 2015 से चल रहे इस युद्ध में 3.5 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या आम नागरिकों की है।
इसके साथ ही वह कहते हैं, “सऊदी अरब के पास एयर पावर जरूर है, लेकिन सिर्फ हवाई ताकत के जरिए इस लड़ाई को खत्म करना मुश्किल होगा। हूतियों के पास भी ड्रोन और मिसाइलों की क्षमता है। हूती लंबे समय से लड़ रहे हैं और उन्हें अपने इलाके में स्थानीय समर्थन भी हासिल है।”
एक तरफ होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से ऊर्जा संकट के साथ-साथ सप्लाई चेन भी बाधित है। दूसरी तरफ, पिछले महीने हूतियों ने मोखा बंदरगाह और बाब अल-मंदेब के पेरिम द्वीप पर कब्जा कर लिया था। हूतियों ने इस समुद्री रास्ते से सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के आने-जाने पर पाबंदियां भी लगा रखी हैं।
ईरान ने दिया बातचीत का सुझाव
इसी बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि ईरान ने हूतियों के साथ राजनीतिक बातचीत का सुझाव दिया है। इस प्रस्ताव पर अगले हफ्ते रियाद में होने वाली आपात बैठक में चर्चा होगी। यह बैठक मक्का रक्षा समझौते के तीन सदस्य देशों- सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच होगी।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि ईरान ने हूतियों और इराकी मिलिशिया से दूरी बना ली है। उन्होंने बताया कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी इस मामले को खत्म करना चाहते हैं।
सऊदी के सामने क्या चुनौतियां?
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, यमन के हूती विद्रोहियों के ऊर्जा ढांचे पर हमलों के चलते सऊदी अरब का तेल उत्पादन पिछले महीने तीन दशक से ज्यादा समय के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। पेरिस स्थित IEA ने बताया कि सऊदी अरब का तेल उत्पादन घटकर करीब 60 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन से ज्यादा था।
कमर आगा कहते हैं कि सऊदी अरब को सैन्य कार्रवाई के आर्थिक असर पर भी विचार करना होगा। इसके पीछे आगा तीन तर्क देते हैं:
- अगर सऊदी युद्ध में उतरता है, तो उसे भारी नुकसान हो सकता है। अगर तेल की सप्लाई कई महीनों तक बाधित रहती है, तो उसके लिए बड़ी आर्थिक समस्या खड़ी हो सकती है।
- सऊदी अरब दुनिया में तेल का एक बड़ा स्रोत है। वहां अस्थिरता का असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
- इसके अलावा, सऊदी अरब में इस्लाम के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल हैं, जहां हर साल लाखों लोग हज और उमरा के लिए पहुंचते हैं। इसलिए भी दुनिया के मुस्लिम देश नहीं चाहेंगे कि सऊदी अरब किसी बड़े संघर्ष में फंसे।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक, 2025 में सऊदी अरब ने रोजाना औसतन करीब 95-96 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन किया। इस उत्पादन के साथ वह अमेरिका और रूस के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल उत्पादक रहा।
पाकिस्तान ने सऊदी अरब में 30-40 हजार सैनिक भेजे
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच 7 अगस्त को 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' (Mecca Joint Defence Agreement) हुआ था। इसके तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
रॉयटर्स के मुताबिक, पाकिस्तान और तुर्की ने सऊदी अरब को सैन्य उपकरण मुहैया कराए हैं। सऊदी इन उपकरणों का इस्तेमाल यमन में कर रहा है। साथ ही पाकिस्तान ने सऊदी अरब में 30,000 से 40,000 सैनिक तैनात किए हैं। इनका काम सऊदी सीमा की सुरक्षा और मिसाइल-ड्रोन हमलों को रोकने में मदद करना है। पाकिस्तान ने साफ किया है कि उसके सैनिकों को यमन में लड़ाई के लिए भेजने का फैसला नहीं हुआ है।
पाकिस्तान ने सऊदी अरब को एयर डिफेंस सिस्टम, तोपें, ड्रोन और एंटी-ड्रोन उपकरण भी दिए हैं। पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों के साथ मिलकर यमनी बलों की मदद कर रहे हैं।
फ्रांस भी सऊदी अरब की मदद कर रहा है। वह लाल सागर के बंदरगाह शहर यानबू की सुरक्षा के लिए सैनिक और एयर डिफेंस सिस्टम भेज रहा है।
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