ट्रंप के दबाव में क्यों आए यूरोपीय देश, अपना डीजल रिजर्व जारी करने पर हुए सहमत; क्या होगा असर?

G7 देश अगले चार महीनों में एक-दूसरे को 10 करोड़ बैरल तक डीजल और कच्चे तेल जारी करने पर सहमत हुए हैं।

ईरान युद्ध और होर्मुज ब्लॉकेड के चलते मिडिल-ईस्ट के तेल एक्सपोर्ट पर आए संकट ने दुनिया में ऊर्जा की भारी किल्लत पैदा कर दी है। यह युद्ध अभी खत्म होते नहीं दिख रहा है, लिहाजा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय देशों को अपना ऑयल रिजर्व मार्केट में जारी करने का दबाव डालना शुरू किया था, जिस पर आखिरकार यूरोपीय संघ सहमत हो गया है। ट्रंप ने एक पोस्ट के जरिये कहा, “यूरोप ने अपने भारी स्टॉक वाले डीजल ऑयल की एक बड़ी मात्रा जारी करने पर अभी-अभी सहमति जताई है। यह प्रक्रिया तुरंत शुरू हो जाएगी।”

ट्रंप के इस पोस्ट के कुछ ही देर बात फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी अपना बयान जारी किया और कहा कि जी7 देश अगले 4 महीने में 10 करोड़ बैरल तक डीजल और तेल का रिजर्व जारी करेंगे। डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय संघ पर ऑयल रिजर्व जारी करने के लिए यह दबाव क्यों डाला था, ईयू इसके लिए तैयार क्यों नहीं रहा था और बाद में वह कैसे राजी हो गया। अब यूरोपीय देशों के इस फैसले का वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा के संकट को किस तरह स्थिर करने में मदद कर पाएगा, आइये पूरा मामला समझते हैं।

मैक्रों ने क्या कहा?

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के अनुसार, फ्रांस होर्मुज स्ट्रेट से ऊर्जा आपूर्ति को बाहर निकालने में मदद करने के लिए सहयोग जारी रखने पर सहमत हुआ है। उन्होंने कहा कि G7 देश अगले चार महीनों में एक-दूसरे को 10 करोड़ (100 मिलियन) बैरल तक डीजल और कच्चे तेल मुहैया कराएंगे। मैक्रों ने कहा, “होर्मुज स्ट्रेट से शिपमेंट की निकासी को आसान बनाने में मदद के लिए लगातार तालमेल बनाकर काम करने पर सहमति बनी है। G7 सदस्य इस बात पर सहमत हुए हैं कि आपस में डीजल निर्यात पर “कोई प्रतिबंध” नहीं लगाया जाएगा।

मैक्रों ने कहा, "मैंने वैश्विक ऊर्जा स्थिति पर चर्चा करने के लिए अभी-अभी G7 नेताओं को एकजुट किया। हम पेट्रोलियम उत्पादों, विशेष रूप से डीजल की कीमतों को कम करने में मदद के लिए सहयोग करने पर सहमत हुए हैं। हमने कई निर्णय लिए हैं-

अमेरिका के लिए क्यों जरूरी था यूरोप का डीजल रिजर्व

वाइट हाउस ईंधन की कीमतों को कम करने का रास्ता तलाश रहा था और काफी समय से अपने यूरोपीय सहयोगियों पर उनके डीजल रिजर्व को जारी करने का दबाव बना था। क्योंकि डीजल एक तरह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। यह ट्रकों और खेती की उपकरणों सहित अन्य भारी मशीनों को चलाता है, और जब ईंधन महंगा होता है, तो आम उपभोक्ताओं के लिए भी चीजें महंगी हो जाती हैं।

अमेरिका खासकर जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों से अपने आपातकालीन भंडार से लगभग 10 करोड़ बैरल डीजल जारी करने की मांग कर रहा था। जिसके लिए अब यूरोपीय देश राजी हो गए हैं। फ्रांस ने यूरोप के आपातकालीन भंडार से 5 करोड़ बैरल डीजल और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के सदस्यों से अतिरिक्त 5 करोड़ बैरल कच्चा तेल जारी करने का प्रस्ताव रखा था।

अमेरिका क्यों बना रहा था दबाव?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में 'सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स' विभाग के प्रोफेसर शांतेश कुमार कहते हैं कि ईरान युद्ध, मिडिल-ईस्ट संकट और रूस-यूक्रेन के चलते अमेरिका की आर्थिक स्थिति पर बहुत बड़ा दबाव और संकट पैदा हो गया है। यूरोप और पश्चिमी देशों में ऊर्जा की कीमतें सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। क्योंकि अमेरिका और यूरोप के उद्योगों को ही ऊर्जा की सबसे ज्यादा जरूरत है। उनकी ऊर्जा सप्लाई सबसे ज्यादा मिडिल ईस्ट से ही हो रही थी।

ट्रंप ने माना ईरान युद्ध लंबा चलेगा

उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन बाधित होने से ऊर्जा की कमी का असर पश्चिमी देशों के उद्योगों के प्रोडक्शन और कीमतों पर पड़ रहा है। प्रोडक्ट महंगे हो रहे हैं और ट्रांसपोर्टेशन का खर्च भी ईंधन की कमी से बढ़ रहा है। यूरोपीय देशों पर डीजल रिजर्व जारी करने के लिए बनाया गया यह दबाव साफ बताता है कि ट्रंप खुद मान रहे हैं कि ईरान युद्ध अभी लंबा चलेगा। ऐसे में अमेरिका को अपनी आर्थिक स्थिति को स्थिर रखने के लिए और मिड-टर्म इलेक्शन से पहले महंगाई को बहुत ज्यादा बेकाबू होने से रोकने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। ट्रंप इसीलिए यूरोप पर दबाव बना रहे थे, क्योंकि उनके पास बहुत ऑयल रिजर्व है।

यूरोपीय संघ का डीजल रिजर्व जारी करने से क्या होगा?

प्रोफेसर शांतेश कुमार सिंह ने कहा कि पिछले कई महीने से होर्मुज की लगातार नाकेबंदी और उसके बाद बाब-अल-मंदेब समेत अन्य चोकपॉइंट बंद होने से ऊर्जा संकट पूरी दुनिया में गहरा गया है। सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों ने पूरे मिडिल ईस्ट के तेल एक्सपोर्ट को लगभग रोक दिया है। इसका असर दुनिया पर तो है ही, लेकिन सबसे बड़ा प्रभाव अमेरिका और यूरोपीय देशों पर पड़ रहा है। क्योंकि इससे उनकी इकोनॉमी पर दबाव बढ़ रहा है, ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं, इससे महंगाई भी तेज हो रही है। अब उस पर काफी नियंत्रण हो सकेगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में मदद मिलेगी

ऐसे में अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को संभालना चुनौती बन गया था। ट्रंप को लगा कि अगर इसे नहीं संभाला गया तो इसका असर अमेरिका अर्थव्यवस्था पर तो होगा ही, यह उनके मिड-टर्म चुनाव को भी बिगाड़ सकता है। अब अगर यूरोपीय देशों का ऑयल रिजर्व बाजार में आ जाता है तो कुछ समय के लिए अमेरिका समेत वैश्विक इकोनॉमी को नियंत्रित करने ऊर्जा की कीमतों में स्थिरता लाने में मदद मिल सकती है। इसका फायदा अमेरिका और यूरोपीय संघ दोनों को होगा। साथ ही वैश्विक बाजार में भी ऊर्जा की कीमतों में स्थिरता आएगी। महंगाई कंट्रोल होगी। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।

यूरोपीय संघ क्यों हुआ मजबूर?

पहले यूरोपीय देश ट्रंप के इस प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे, क्योंकि युद्ध की अनिश्चितता के चलते वह अपने ऑयल रिजर्व को बचाकर रखना चाहते थे। प्रोफेसर शांतेश ने कहा कि ट्रंप ने उन्हें बताया होगा कि मिड-टर्म इलेक्शन के बाद वह कुछ रास्ता निकाल लेंगे, क्योंकि यह युद्ध अब रूस-यूक्रेन की तरह हो जाएगा। यानी कुछ न कुछ ऑयल एक्सपोर्ट भी होता रहेगा। पूरी तरह से वह बंद नहीं हो सकता। किसी न किसी रास्ते से अभी भी कुछ न कुछ तेल और गैस का टैंकर निकाला जा रहा है। इसी तरह आगे भी निकलेगा।

Foreign Expert
यूरोपीय देशों की इकोनॉमी पर भी ईंधन के दाम बढ़ने से प्रेसर आ रहा था। महंगाई बढ़ रही थी। उनके उद्योगों को महंगी ऊर्जा मिलने से प्रोडक्ट की कीमत बढ़ रही थी, उनके प्रोडक्ट दूसरे देशों में जाते हैं, जिसका ट्रांसपोर्टेशन चार्ज भी बढ़ रहा था। इसलिए यूरोपीय संघ ने सोचा कि ऑयल रिजर्व को जारी करके फिलहाल वह अपनी इकोनॉमी को बचा सकते हैं और महंगाई को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं।
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
शांतेश कुमार सिंह, प्रोफेसर जेएनयू
विदेश मामलों के एक्सपर्ट

एक बात और भी है कि जिस तरह से ब्रिक्स के जरिये ग्लोबल साउथ ने एकजुटता का संदेश दिया है, उससे पश्चिम को घबराहट है। इसलिए ट्रंप ने यूरोपीय संघ को भी एकजुट होने के लिए कहना शुरू किया है। उनको पता है कि अगर वह ग्लोबल नॉर्थ पर नियंत्रण खो दिए तो दुनिया पर से अमेरिका का प्रभाव खत्म हो जाएगा। इसलिए यह अमेरिका के साथ यूरोपीय देशों की भी मजबूरी बन गई थी। पश्चिमी देश अपने प्रभाव को दुनिया के बाकी देशों पर बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए ऐसा कर रहे हैं।