2003 में सद्दाम हुसैन की सरकार गिराने के लिए इराक में दाखिल हुई अमेरिकी सेना अब पूरी तरह इराक से बाहर हो गई है। 2011 में अमेरिका ने अपनी सेना वापस बुला ली थी, लेकिन 2014 में ISIS के बड़े हिस्से पर कब्जे के बाद इराकी सरकार के बुलावे पर अमेरिकी नेतृत्व वाली सैन्य मुहिम फिर शुरू हुई।
30 सितंबर 2026 को आखिरी अमेरिकी सैनिकों की विदाई के साथ इराक में दो दशक से ज्यादा लंबे अमेरिकी सैन्य अध्याय का यह चरण खत्म हो गया।
अमेरिकी सैनिकों की विदाई के साथ ही इराक की सुरक्षा व्यवस्था, कुर्द क्षेत्र की सुरक्षा, ISIS के खिलाफ खुफिया सहयोग और ईरान समर्थित शिया मिलिशिया समूहों पर सरकार के कंट्रोल की परीक्षा भी शुरू हो गई है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सैनिकों के इराक से हटने के पांच बड़े असर सामने आ सकते हैं।
1. ईरान समर्थित मिलिशिया का दबदबा बढ़ सकता है
इराक में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी लंबे समय से ईरान समर्थित हथियारबंद समूहों के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा रही है। इन संगठनों का कहना है कि वे हथियार और अपनी अलग कमान अमेरिकी सैनिकों की वजह से रखते हैं।
इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने पहले 30 सितंबर तक सभी हथियारबंद समूहों को अपने हथियार राज्य को सौंपने की बात कही थी लेकिन यह समयसीमा अब जून 2027 तक बढ़ा दी गई है। कुछ समूहों ने हथियार राज्य को सौंपने की इच्छा जताई है, लेकिन ईरानी मिलिशिया ने इसका विरोध किया है।
एक्सर्ट्स का कहना है कि अमेरिका के जाने के बाद इन मिलिशिया पर कंट्रोल करना इराक के लिए बड़ी चुनौती होगी।
RT हिंदी से बात करते हुए मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार, रक्षा विश्लेषक कमर आगा ने कहा
वह कहते हैं कि इराक के शिया मिलिशिया खुद को ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' का हिस्सा मानते हैं और अलग-अलग समूहों के साथ मिलकर कार्रवाई करते हैं।
हालांकि, इराक में पूर्व अमेरिकी राजदूत डगलस सिलिमन की राय थोड़ी अलग है। उनका मानना है कि अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद ईरान समर्थित मिलिशिया का हथियार रखने का बहाना खत्म हो जाएगा।
इराक स्थित न्यूज ब्रॉडकास्टर Rudaw से बात करते हुए डगलस सिलिमन ने कहा, 'अमेरिकी सेना की वापसी से मिलिशिया के पास हथियार रखने का एक बड़ा राजनीतिक बहाना खत्म हो जाता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे अपने ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल बंद कर देंगे। इससे सिर्फ इन हमलों की राजनीतिक कीमत बदल सकती है।'
अमेरिका स्थित थिंक टैंक अरब स्टेट गल्फ इंस्टिट्यूट में लिखे एक लेख में एक्सपर्ट येरेवन सईद कहते हैं, 'अगर इराकी मिलिशिया अपनी कार्रवाई से देश को किसी क्षेत्रीय युद्ध में खींचते हैं, तो उन्हें रोकने की जिम्मेदारी सीधे इराकी सरकार पर होगी। खासकर सऊदी अरब में पाइपलाइन पर हुए हमले जैसे मामलों में सरकार को सिर्फ स्थानीय कमांडर पर कार्रवाई के बजाय यह पता लगाना होगा कि आदेश किसने दिया और उसे किसने मदद पहुंचाई।'
2. इराक में ईरान का प्रभाव और ज्यादा अहम हो सकता है
अमेरिका की मौजूदगी इराक में सिर्फ सैन्य ताकत नहीं थी, बल्कि वह ईरान और इराकी राजनीति के बीच एक तरह का शक्ति-संतुलन भी थी। अमेरिकी सैनिकों के जाने से यह संतुलन कमजोर हो सकता है।
ईरान और उसके सहयोगी मिलिशिया समूह अमेरिकी वापसी को अपनी जीत के तौर पर देख रहे हैं। इराक में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी खत्म होने से ईरान समर्थित समूहों के लिए राजनीतिक और सुरक्षा क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाने की गुंजाइश बन सकती है।
थिंक टैंक चैथम हाउस के रेनड मंसूर का कहना है, 'अमेरिकी सेना की वापसी के बाद इराक में ईरान का प्रभाव और अहम हो सकता है। 2003 में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद से ईरान इराक में सबसे प्रभावशाली बाहरी ताकत के रूप में उभरा है।'
3. कुर्दिस्तान सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर सकता है
अमेरिकी वापसी को लेकर सबसे ज्यादा चिंता इराक के उत्तरी कुर्द क्षेत्र में दिखाई दे रही है। समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक, हालिया अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान कुर्द क्षेत्र में 1,000 से ज्यादा ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ा। इस दौरान अमेरिकी डिफेंस सिस्टम ने इस क्षेत्र की काफी रक्षा की।
कुर्द अधिकारियों ने अमेरिकी सैनिकों की विदाई और एयर डिफेंस सिस्टम के हटने को लेकर चिंता जताई है।
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट की एलिजाबेथ डेंट के मुताबिक, अमेरिकी और गठबंधन सेनाओं के एयर डिफेंस सिस्टम हटने के बाद एरबिल के पास ड्रोन और मिसाइल हमलों से निपटने की क्षमता में बड़ा ऑपरेशनल गैप पैदा होगा। उन्होंने कहा कि कुर्द क्षेत्र को एरबिल, सुलेमानिया, ऊर्जा और नागरिक बुनियादी ढांचे और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा के लिए बहुस्तरीय और मोबाइल कम दूरी के एयर डिफेंस की जरूरत होगी।
पूर्व अमेरिकी राजदूत डगलस सिलिमन ने भी कहा है कि इराकी सेना के पास अभी मजबूत एयर डिफेंस क्षमता नहीं है। कुर्दिस्तान और इराक के दूसरे हिस्से ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के प्रति संवेदनशील रह सकते हैं। वो कहते हैं कि एक तरह से कुर्द क्षेत्र की सुरक्षा की छतरी हट गई है।
अमेरिकन यूनिवर्सिटी की ग्लोबल कुर्दिश इनिशिएटिव के एक हालिया एक्सपर्ट पैनल में एक्सपर्ट माइकल नाइट्स ने बताया कि अमेरिकी वापसी के बाद कुर्द क्षेत्र को हथियारों, प्रशिक्षण और सुरक्षा सहयोग के लिए बगदाद के रास्ते से गुजरना पड़ सकता है।
वहीं एलिजाबेथ डेंट ने कहा कि अमेरिका, यूरोपीय देशों और क्षेत्रीय साझेदारों से मदद लेकर कुर्दिस्तान अपनी एयर डिफेंस क्षमता मजबूत कर सकता है, हालांकि इसके लिए इराक की भूमिका भी अहम होगी।
4. ISIS कमजोर है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
अमेरिका 2014 में ISIS यानी इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अभियान के लिए वापस इराक आया था। आज ISIS के पास पहले जैसी जमीन या सैन्य ताकत नहीं है। उसके लड़ाके मुख्य रूप से स्लीपर सेल और छोटे विद्रोही नेटवर्क के रूप में मौजूद हैं।
कमर आगा कहते हैं
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइस के रिसर्च सेंटर मिडिल ईस्ट सेंटर से जुड़े विशेषज्ञ कमरान पलानी का कहना है कि कुर्दिस्तान में इस्लामिक स्टेट तुरंत बड़े खतरे के रूप में वापस आ जाएगा, यह कहना सही नहीं होगा।
हालांकि, वो कहते हैं कि अमेरिकी सैनिकों के साथ-साथ अमेरिकी खुफिया, निगरानी, लॉजिस्टिक और काउंटर टेररिज्म सपोर्ट भी इराक को कम होगा और इसका असर सुरक्षा पर पड़ सकता है।
कमर आगा कहते हैं, 'अमेरिकी सैनिकों की संख्या अब पहले के मुकाबले काफी कम रह गई थी। करीब 4,500 अमेरिकी सैनिक थे, लेकिन उनकी भूमिका सिर्फ सैनिकों की मौजूदगी तक सीमित नहीं थी। वे इंटेलिजेंस और दूसरी तरह की सुरक्षा सहायता भी उपलब्ध करा रहे थे। इसलिए उनकी वापसी के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इराक इस कमी को कैसे पूरा करता है।'
5. अमेरिका-इराक रिश्ते का सैन्य से रणनीतिक दौर शुरू होगा
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सैनिकों की विदाई के बाद अमेरिका-इराक के रणनीतिक रिश्तों में मजबूत आ सकती है। पूर्व अमेरिकी राजदूत डगलस सिलिमन के मुताबिक, अमेरिकी मदद और सहयोग इराकी और कुर्द सुरक्षा बलों के साथ जारी रह सकता है, लेकिन जमीन पर अमेरिकी सैनिक नहीं होंगे।
कमर आगा कहते हैं, 'अमेरिका और इराक के रिश्ते अब किस दिशा में जाते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के रिश्ते सिर्फ सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं हैं। अमेरिका और इराक के बीच बिजनेस, ऊर्जा और तेल के क्षेत्र में भी संबंध हैं। मौजूदा इराकी सरकार ने अमेरिकी कंपनियों के साथ कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट किए हैं। इसलिए आगे अमेरिका की कोशिश इन राजनयिक और कारोबारी रिश्तों को मजबूत करने की हो सकती है।'
वो कहते हैं कि इराक धार्मिक और जातीय रूप से विविध देश है। यहां शिया और सुन्नी मुसलमानों के साथ बड़ी कुर्द आबादी और ईसाई, तुर्कमान, यजीदी समेत कई दूसरे समुदाय रहते हैं। अलग-अलग समुदायों की अपनी राजनीतिक और सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इराक की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिति किस दिशा में जाएगी, यह काफी हद तक बगदाद के इन अलग-अलग हितों को संतुलित करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।