वेनेजुएला के तेल और खासकर हैवी क्रूड को दुनिया के केवल कुछ ही हिस्सों में रिफाइन किया जा सकता है। दुनिया के उन चुनिंदा जगहों में एक भारत भी है जहां वेनेजुएला के हैवी क्रूड को रिफाइन किया जा सकता है।
ये कहना है अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का। रूबियो भारत दौरे पर आए हुए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री ने मंगलवार को भारत को रिफाइनिंग का सुपरपावर कहा। वेनेजुएला के क्रूड को लेकर अमेरिका की ऐसी क्या मजबूरी है कि वो भारत को रिफाइनरी का सुपरपावर कहने को मजबूर हो गया है।
मुंबई के बाद रूबियो गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस की रिफाइनरी का दौरा करेंगे। इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में रूबियो ने कहा कि वेनेजुएला में तेल और कच्चे तेल (खासकर 'हैवी क्रूड') का प्रॉडक्शन तेजी से बढ़ने वाला है। वेनेजुएला के क्रूड को दुनिया के केवल कुछ ही हिस्सों में रिफाइन किया जा सकता है।
रूबियो ने इस बात पर जोर देकर कहा कि दुनिया की उन चुनिंदा जगहों में से एक भारत (और रिलायंस) भी है, जहां वेनेजुएला के इस 'हैवी क्रूड' को रिफाइन किया जा सकता है। ऐसे में सवाल है कि आखिर वेनेजुएला के तेल में ऐसा क्या है जिसे दुनिया के चुनिंदा जगहों पर रिफाइन किया जा सकता है।
वेनेजुएला के तेल में ऐसा क्या है?
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार है। ओपेक (OPEC) और यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के डेटा के अनुसार, वेनेजुएला के पास लगभग 303 से 304 अरब बैरल कच्चा तेल मौजूद है। ये दुनिया के कुल प्रमाणित भंडार का लगभग 17% से 18% हिस्सा है।
वेनेजुएला ने 2011 के आसपास सऊदी अरब को पीछे छोड़कर आधिकारिक रूप से पहला स्थान हासिल किया था। हालांकि, इसका 70% से अधिक हिस्सा एक्स्ट्रा-हैवी क्रूड (Extra-Heavy Crude) और बिटुमेन (Bitumen) के रूप में है। ये मुख्य रूप से ओरिनोको बेल्ट (Orinoco Oil Belt) में पाया जाता है।
यह तेल सामान्य हल्के क्रूड या स्वीट क्रूड ऑयल जैसा नहीं होता है। यह नॉर्मल टेंपरेचर पर लिक्विड रूप में बहने के बजाय डामर (Tar/Asphalt) या गाढ़े शीरे जैसा चिपचिपा होता है।
इसमें सल्फर (गंधक) की मात्रा 3% से 4.5% तक होती है, जिससे यह 'खट्टा' (Sour) क्रूड माना जाता है। इसमें वैनेडियम (Vanadium) और निकल (Nickel) जैसी हैवी मेटल्स के साथ-साथ नाइट्रोजन की मात्रा काफी अधिक होती है। इसमें कार्बनिक एसिड (Naphthenic acid) अधिक होते हैं। इससे इसका टोटल एसिड नंबर (TAN) ऊंचा रहता है। यह अत्यधिक संक्षारक (Corrosive) नेचर का होता है।
वेनेजुएला क्रूड की रिफाइनिंग मुश्किल क्यों?
वेनेजुएला के हैवी क्रूड का फिजिकल और केमिकल स्ट्रक्चर ऐसा है कि दुनिया की अधिकांश साधारण रिफाइनरियां इसे प्रोसेस ही नहीं कर सकतीं। वेनेजुएला के हैवी क्रूड इसलिए चुनिंदा रिफाइनरियों में ही प्रोसेस हो पाता है क्योंकि वह बहुत हैवी/एक्स्ट्रा-हैवी और सॉर (सल्फर-युक्त) है। इसमें एस्फल्टीन, मेटल्स और सल्फर अधिक होते हैं। इसे सामान्य रिफाइनरी में सीधे डालना लगभग असंभव है।
इसलिए इसे पहले पतला करना (dilution) या अपग्रेड करना पड़ता है। इसे पाइपलाइनों में बहाने के लिए नेफ्था (Naphtha) या हल्के क्रूड के साथ मिलाना पड़ता है। सामान्य रिफाइनरियां केवल हल्के और कम सल्फर वाले कच्चे तेल को ही प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की जाती हैं। वेनेजुएला के क्रूड को साफ करने के लिए रिफाइनरी में विशेष अत्याधुनिक ढांचा चाहिए।
हाई NCI: रिफाइनरी की जटिलता मापने का पैमाना 'Nelson Complexity Index' कहलाता है। वेनेजुएला के तेल को रिफाइन करने के लिए कम से कम 10 या उससे अधिक NCI वाली रिफाइनरी की आवश्यकता होती है। पेट्रोलियम रिफाइनरी की तकनीकी क्षमता और उसकी सेकेंडरी कन्वर्जन कैपेसिटी को प्राइमरी डिस्टिलेशन कैपिसिटी की तुलना में मापने का एक पैमाना है।
डिलेड कोकिंग यूनिट्स : वेनेजुएला के हैवी क्रूड में भारी कार्बन अवशेष (Residue) ज्यादा होते हैं। इसलिए रिफाइनरी में 'कोकर' (Delayed Coker / Flexicoker) का होना अनिवार्य है।
हाइड्रो-ट्रीटिंग यूनिट : अत्यधिक सल्फर और भारी धातुओं को हटाने के लिए भारी मात्रा में हाइड्रोजन और बड़े डि-सल्फराइजेशन प्लांट्स की जरूरत होती है। इसलिए यहां महंगे और स्पेशल कैटालिस्ट का यूज करना पड़ता है।
संक्षारण-रोधी (Corrosion-resistant) मेटल्स : एसिडिक और सल्फर-युक्त होने के कारण यह साधारण पाइपों और डिस्टिलेशन कॉलम को गला सकता है। इसलिए रिफाइनरी में हाई-ग्रेड स्टेनलेस स्टील और विशेष मिश्र धातुएं (alloys) लगी होनी चाहिए।
क्रूड कितने तरह का होता है?
दुनिया भर में कॉमर्शियल रूप से 150 से अधिक अलग-अलग प्रकार (Grades/Blends) के कच्चे तेल (Crude Oil) का बिजनेस होता है। केमिकल और फिजिकल क्लासिफिकेशन के आधार पर ग्लोबल एनर्जी इंडस्ट्रीज कच्चे तेल को मुख्य रूप से दो प्रमुख पैमानों घनत्व (Density / API Gravity) और सल्फर के आधार पर तय होता है। साथ ही, इनके मेल से बनने वाले चार प्रमुख प्रकारों में बांटा जाता है।
API ग्रेविटी अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) का पैमाना है, जो बताता है कि तेल पानी की तुलना में कितना भारी या हल्का है। इसके आधार पर तेल को निम्न कैटेगरी में बांटा जाता है।
- हल्का (Light): API > 31.1°
- मध्यम (Medium): 22.3°≤ API≤ 31.1°
- भारी (Heavy): 10°≤ API ≤ 22.3°
- एक्स्ट्रा-हैवी : API ≤ 10°
सल्फर की मात्रा
स्वीट क्रूड- सल्फर 0.5% से कम
खट्टा क्रूड- सल्फर 0.5% से अधिक
ग्लोबल मार्केट में कैसे बिकता है क्रूड
ग्लोबल मार्केट में क्रूड के दाम तीन प्रमुख मानक से तय होते हैं।
1. Brent Crude: उत्तरी सागर (नॉर्वे/यूके) से निकलने वाला लाइट-स्वीट तेल; दुनिया के लगभग दो-तिहाई तेल सौदों का मूल्य इसी के आधार पर तय होता है।
2. WTI (West Texas Intermediate): अमेरिका का अत्यंत हल्का और मीठा तेल; ग्लोबल फ्यूचर्स ट्रेडिंग का प्रमुख आधार।
3. Dubai/Oman Crude: मध्य पूर्व का मीडियम-खट्टा तेल; यह एशिया और खाड़ी देशों के तेल मूल्य निर्धारण का पैमाना है।
अमेरिका को जामनगर की जरूरत क्यों हैं?
दुनिया में खासतौर से अमेरिका डीजल की किल्लत और तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। अमेरिका में नवंबर में मिड टर्म चुनाव भी होने वाले हैं। खास बात है कि इस चुनाव से पहले ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी हैं।
ऐसे में अमेरिका अब अपने यहां डीजल की कीमतें कम करने में जुटा है। अमेरिका वेनेजुएला के क्रूड के जरिये अपने यहां कीमत करने के प्लान पर आगे बढ़ रहा है। खास बात है कि दुनिया की कई रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को रिफाइन नहीं कर सकती हैं।
भारत में जामनगर रिफाइनरी के पास इतनी क्षमता है कि वह वेनेजुएला के हैवी क्रूड को रिफाइन कर सकती है। इसलिए अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ी है। इसलिए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्कियो रूबियो जामनगर पहुंचे हैं।
रिलायंस ने ग्लोबल मार्केट में तेल की कमी के बीच अपना एक्सपोर्ट काफी बढ़ाया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में जामनगर से यूरोप भेजे गए डीजल की मात्रा करीब 40 से 50 लाख बैरल तक पहुंच गई थी। यह पिछले 10 महीनों का सबसे ज्यादा था।
इसी दौरान भारत से ब्राजील को भी डीजल की सप्लाई बढ़ी। दुनिया के बाजार में भारत से डीजल की सप्लाई बढ़ती है, तो इससे डीजल की कीमतों को कम करने में मदद मिल सकती है। अमेरिकी विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रूबियो के जामनगर दौरे की यह अहम वजह है।
भारत के पास नायरा (Nayara) जैसी रिफाइनरियां भी हैं, जो जामनगर रिफाइनरी के पास ही एक बड़ी रिफाइनरी है। इसमें रूसी कंपनी की हिस्सेदारी रही है। अमेरिका यह देखने की कोशिश कर रहा है कि क्या वह खुले तौर पर भारत को चुनौती दिए बिना रूसी तेल को भारत आने से रोक सकता है और वेनेजुएला से इंपोर्ट बढ़ा सकता है।
ध्यान देने की बात ये है कि वेनेजुएला से बेचा जाने वाला सारा कच्चा तेल अमेरिका के खाते में जाता है, वेनेजुएला सरकार के खाते में नहीं। ऐसे में यह अमेरिका के हितों के ज्यादा अनुकूल है।
रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी क्यों खास है?
रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी की क्षमता 7 करोड़ टन साल की है। जामनगर की रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा एक ही जगह पर बना रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स है। यह कॉम्प्लेक्स अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकता है। यहां रोजाना करीब 14 लाख बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता है।
साथ ही, दुनिया भर के बाजारों में रिफाइंड प्रोडक्ट सप्लाई कर सकता है। यहां कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं, जिन्हें भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों में भेजा जाता है।
रिलायंस एक बड़ा कच्चा तेल इंपोर्टर है। कंपनी डीजल, एविएशन फ्यूल और दूसरे पेट्रो प्रोडक्ट का एक जरूरी एक्सपोर्टर है। इसके कमर्शियल फैसले तेल प्रोड्यूसर को हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले कंज्यूमर्स से जोड़ते हैं। 2022 में यूक्रेन संघर्ष और अमेरिका के ईरान पर हमले और होर्मुज स्ट्रेट से तेल सप्लाई में रुकावट के बाद से जामनगर की अहमियत बढ़ गई है।
भारत की दूसरी कई रिफाइनरियों के मुकाबले जामनगर रिफाइनरी की खासियत यह है कि यहां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को भी प्रोसेस किया जा सकता है। जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कंपनी Kpler के मुताबिक, अक्टूबर में भारत आने वाले वेनेजुएला के तेल की मात्रा बढ़कर करीब 4.65 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच सकती है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, इन तेलों के टैंकर सिक्का बंदरगाह जाने के लिए रजिस्टर हुए हैं और यह बंदरगाह जामनगर रिफाइनरी के लिए काम करता है।
कब-कब खुले बिजनेस से कूटनीति के दरवाजे
अमेरिका की तरफ से रिलायंस के जामनगर रिफाइनरी का दौरा कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब बिजनेस के जरिये कूटनीति हुई है। बिजनेस ने पहले भी भारतीय कूटनीति में अहम भूमिका निभाई है। 1973 के तेल संकट के बाद, हिंदुजा परिवार ने ईरान के साथ अपने व्यावसायिक संबंधों का इस्तेमाल दिल्ली और तेहरान के बीच सुलह कराने के लिए किया था।
1998 के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद, दिल्ली ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के साथ बातचीत का रास्ता खोलने के लिए हिंदुजा परिवार की मदद ली थी।
वॉशिंगटन के साथ भारत के संबंधों में आ रही मुश्किलों को दूर करने में अमेरिकी कंपनियों ने भी अहम भूमिका निभाई है। 1990 के दशक में, जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियों ने अमेरिका में भारत के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए समर्थन जुटाने में मदद की। वहीं दूसरी ओर, बीजिंग भी लंबे समय से वॉशिंगटन के साथ तनाव कम करने के लिए अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर रहा है।