बचपन में कभी शीशे या मैग्निफाइंग ग्लास से सूरज की रोशनी को मोड़कर किसी खास जगह पर डालने की कोशिश आपने भी की होगी। अब सोचिए, अगर यही काम अंतरिक्ष में लगे बड़े-बड़े शीशे करने लगें और रात के घने अंधेरे में धरती के किसी हिस्से तक सूरज की किरणें पहुंचने लगें तो? मलबे में फंसे लोगों को तलाशती रेस्क्यू टीम हो या दूर-दराज के इलाके में चल रहा कोई काम, आसमान से मिलने वाली यह रोशनी काफी मददगार हो सकती है।
सुनने में फिल्मी लगता है, लेकिन एक विदेशी स्पेस टेक्नोलॉजी स्टार्टअप इसी विचार को हकीकत में बदलने की कोशिश कर रहा है। कंपनी की योजना अंतरिक्ष में शीशे लगे सैटेलाइट तैनात करने की है, जो सूरज की रोशनी को धरती के चुनिंदा इलाकों की तरफ मोड़ सकें। इस योजना के लिए भारत की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) के रॉकेट इस्तेमाल किए जा सकते हैं। लेकिन अंतरिक्ष में लगे ये शीशे काम कैसे करेंगे? क्या इनसे रात में दिन जैसा उजाला हो सकेगा? और क्या पहले भी ऐसे प्रयोग किए जा चुके हैं? आइए, आसान भाषा में समझते हैं पूरा प्लान।
पूरा प्लान समझ लीजिए
कैलिफोर्निया की कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल (Reflect Orbital) ने भारत की निजी रॉकेट कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस से दो रॉकेट लॉन्च का समझौता किया है। कंपनी की घोषणा के मुताबिक, पहला सैटेलाइट स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, दूसरे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए कंपनी के तैयार किए जा रहे विक्रम-1U रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा।
इस साझेदारी में स्काईरूट की भूमिका सैटेलाइट को अंतरिक्ष तक पहुंचाने की होगी, जबकि रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल शीशों (Reflect Orbital Mirrors) के जरिए धरती पर रोशनी पहुंचाने वाली तकनीक विकसित कर रही है। कंपनी का लक्ष्य धरती पर करीब पांच किलोमीटर तक फैले क्षेत्र में नियंत्रित रोशनी पहुंचाना है। इसके संभावित इस्तेमाल में आपदा के दौरान सर्च और रेस्क्यू अभियान, दूर-दराज के औद्योगिक इलाकों में काम और सौर ऊर्जा पैदा करना शामिल हैं।
अब समझिए अंतरिक्ष में शीशा क्या करेगा?
इसे समझने के लिए किसी साइंस लैब में जाने की जरूरत नहीं है। बस धूप में रखे एक शीशे की कल्पना कीजिए। शीशे पर सूरज की किरणें पड़ती हैं और वह उसे दूसरी दिशा में रिफ्लेक्ट कर देता है। अब सोचिए कि ऐसा ही एक बड़ा शीशा अंतरिक्ष में लगा हो और वह सूरज की रोशनी को धरती के किसी खास हिस्से की तरफ मोड़ सके।
यही इस प्लान का बुनियादी विचार है। सैटेलाइट पर लगे रिफ्लेक्टिंग शीशे (रोशनी लौटाने वाले शीशे) सूरज की किरणों की दिशा बदलेंगे, ताकि धरती के चुने हुए इलाके तक रोशनी पहुंचाई जा सके। इसके लिए सैटेलाइट की ऑर्बिट, सूरज की स्थिति और शीशे के कोण के बीच सही तालमेल जरूरी होगा।
क्या पूरी पृथ्वी पर रात खत्म हो जाएगी?
इस प्रक्रिया को समझने के लिए RT हिंदी ने साइंटिस्ट शशांक गर्ग से बात की। उनके मुताबिक, ये शीशे रोशनी बनाएंगे नहीं, बल्कि सूरज की मौजूद रोशनी को धरती तक पहुंचाने का जरिया बनेंगे। यानी रात में भी कुछ जगहों पर सूरज की रोशनी पहुंचाना संभव हो सकता है, बशर्ते अंतरिक्ष में सैटेलाइट की स्थिति इसके अनुकूल हो।
गर्ग के मुताबिक सैटेलाइट की स्थिति यहां अहम होगी। जब पृथ्वी सूरज और सैटेलाइट के बीच आ जाएगी, तो सैटेलाइट तक सीधी धूप नहीं पहुंच पाएगी और वह रोशनी रिफ्लेक्ट नहीं कर सकेगा। इसलिए इस तकनीक से रात के हर वक्त और हर जगह रोशनी पहुंचाना संभव नहीं होगा।
सैटेलाइट में लगे ये शीशे कैसे होंगे?
सैटेलाइट में लगे ये रिफ्लेक्टिंग शीशे क्या हमारे घरों में लगे शीशों जैसे होंगे? जवाब है नहीं… सैटेलाइट में हल्के और चमकदार रिफ्लेक्टिंग शीशे लगाए जाएंगे, जो सूरज की रोशनी को वापस रिफ्लेक्ट कर धरती के किसी खास हिस्से की तरफ मोड़ सकेंगे। इन्हें अंतरिक्ष में खोलकर बड़ा किया जा सकेगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा रोशनी रिफ्लेक्ट हो सके।
कहां-कहां हो सकता है इस्तेमाल?
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के मुताबिक इस तकनीक का एक अहम संभावित इस्तेमाल आपदा के दौरान हो सकता है। मान लीजिए, किसी पहाड़ी इलाके में भूस्खलन हुआ है। रात का अंधेरा है, मलबे में लोग फंसे हैं और बचाव दल को उनकी तलाश करनी है। ऐसी स्थिति में अगर अंतरिक्ष से उस इलाके में अतिरिक्त रोशनी पहुंचाई जा सके, तो रेस्क्यू टीम को काम करने में मदद मिल सकती है। बाढ़, भूकंप या दूरदराज के इलाकों में चल रहे खोज और बचाव अभियानों में भी यह तकनीक उपयोगी हो सकती है।
हालांकि, इसका वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि धरती तक कितनी रोशनी पहुंचेगी, वह कितनी देर तक उपलब्ध रहेगी और मौसम की स्थिति कैसी होगी। यानी यह बचाव अभियान में मददगार हो सकती है, लेकिन इसे रात में दिन जैसी रोशनी देने वाली व्यवस्था मानना जल्दबाजी होगी।
इसका दूसरा संभावित इस्तेमाल सौर ऊर्जा के क्षेत्र में है। सोलर पैनल सूरज की रोशनी से बिजली बनाते हैं, लेकिन रात में सूर्य की रोशनी नहीं मिलने के कारण सामान्य सोलर पैनल बिजली पैदा नहीं कर पाते। रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की योजना है कि अंतरिक्ष से रोशनी पहुंचाकर सोलर फार्म के काम करने का समय बढ़ाया जाए।
दूरदराज के निर्माण स्थलों और औद्योगिक इलाकों में भी रात के समय अतिरिक्त रोशनी की जरूरत पड़ती है। कंपनी की सोच में खेती जैसे संभावित इस्तेमाल भी शामिल हैं।
क्या दुनिया में पहले भी ऐसे प्रयोग हुए हैं?
अंतरिक्ष से धरती पर सूरज की रोशनी पहुंचाने के लिए रूस ने 1990 के दशक में ज्नाम्या (Znamya) प्रयोग किए थे। 1993 में करीब 20 मीटर चौड़े रिफ्लेक्टिंग पर्दे ने सूरज की रोशनी धरती तक पहुंचाई, जिसकी चमक लगभग पूर्णिमा के चांद जितनी थी।
इसके बाद 1999 में ज्नाम्या-2.5 प्रयोग और ज्नाम्या-3 योजना पर भी कोशिशें की गईं। नतीजे बहुत सफल नहीं रहे पर इन प्रयोगों ने तकनीक की संभावना दिखाई, लेकिन इसे व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल करने की चुनौतियां बरकरार रहीं।
क्या रात के अंधेरे से छेड़छाड़ के नुकसान भी होंगे?
रात में रोशनी पहुंचाने का विचार जितना दिलचस्प है, उतने ही सवाल इसके संभावित दुष्प्रभावों को लेकर भी हैं।
साइंटिस्ट गर्ग कहते हैं कि- धरती पर एक्सट्रा रोशनी से रात का आसमान ज्यादा चमकीला हो सकता है, जिससे दूरबीनों के जरिए तारों, दूर की आकाशगंगाओं और दूसरे खगोलीय पिंडों की स्टडी मुश्किल हो सकती है। इससे अंतरिक्ष की धुंधली वस्तुओं को देखना और उनकी तस्वीरें लेना भी प्रभावित हो सकता है।
एस्ट्रोनॉमर्स को चिंता है कि अंतरिक्ष से आने वाली अतिरिक्त रोशनी दूरबीनों से ली जाने वाली तस्वीरों को प्रभावित कर सकती है। इससे तारों, आकाशगंगाओं और दूसरे खगोलीय पिंडों की स्टडी मुश्किल हो सकती है।
रात का प्राकृतिक अंधेरा इंसानों और जीव-जंतुओं के लिए भी अहम है। कई पक्षियों और दूसरे जीवों का व्यवहार दिन और रात के चक्र से जुड़ा होता है। रात में अतिरिक्त रोशनी बढ़ने से उनकी बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, वातावरण में रोशनी बिखरने के कारण उसका असर उस क्षेत्र से बाहर भी पहुंच सकता है, जिसे रोशन करने की योजना बनाई गई है।
कंपनी का कहना है कि वह रोशनी को निर्धारित क्षेत्र तक सीमित रखने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन इस दावे को वास्तविक परिस्थितियों में परखना जरूरी होगा। तकनीक की सफलता सिर्फ रोशनी पहुंचाने से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय असर को नियंत्रित करने से भी तय होगी।
भारत और चीन का ‘आर्टिफिशियल सन’ इससे कैसे अलग है?
अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी धरती तक पहुंचाने की इस योजना की तुलना भारत और चीन के ‘आर्टिफिशियल सन’ यानी कृत्रिम सूरज के प्रयोगों से भी की जा सकती है। हालांकि, दोनों का मकसद बिल्कुल अलग है।
चीन का EAST और भारत का SST-1 जैसे टोकामक उपकरण परमाणु संलयन (न्यूक्लियर फ्यूजन) पर शोध के लिए बनाए गए हैं। इनमें बेहद गर्म प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्र की मदद से नियंत्रित किया जाता है। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि सूरज में होने वाली संलयन प्रक्रिया को धरती पर कैसे दोहराया जा सकता है और इससे ऊर्जा कैसे हासिल की जा सकती है।
आसान भाषा में समझें तो, रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का लक्ष्य सूरज की मौजूदा रोशनी को अंतरिक्ष से धरती के चुनिंदा इलाकों तक पहुंचाना है। वहीं, भारत और चीन के टोकामक प्रयोगों का मकसद संलयन प्रक्रिया को समझकर भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा हासिल करने की संभावनाएं तलाशना है। हालांकि, फ्यूजन से बड़े पैमाने पर व्यावसायिक बिजली बनाना अभी भी एक बड़ी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग चुनौती है।
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तो क्या रात में भी उगेगा सूरज?
फिलहाल नहीं। कम से कम प्राकृतिक सूरज की तरह तो नहीं। लेकिन अंतरिक्ष में शीशे लगाकर धरती के चुनिंदा इलाकों में कुछ समय के लिए अतिरिक्त रोशनी पहुंचाने का विचार अब व्यावसायिक परीक्षणों की दिशा में बढ़ रहा है।
अगर यह तकनीक कामयाब होती है, तो आपदा के वक्त बचाव अभियान से लेकर सौर ऊर्जा उत्पादन तक कुछ क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल संभव हो सकता है। आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इंसान अंतरिक्ष से धरती पर रोशनी ला सकता है या नहीं। सवाल यह भी है कि रोशनी की इस नई सुविधा और प्रकृति के अपने दिन-रात के चक्र के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।