'Himalayas! Here is the Abode of Rishis. Himalayas-Jewel of India. Himalayas-Treasure of the World. Himalayas-The Sacred Symbol of the Ascent'
ये शब्द उस रूसी कलाकार के थे, जिसके लिए हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक रहा। रूस में जन्मे इस कलाकार का भारत से प्रेम ऐसा था कि उन्होंने जिंदगी के आखिरी करीब दो दशक हिमाचल की कुल्लू घाटी में बिताए। यहीं के पहाड़ों को उन्होंने अपने कैनवास पर उतारा और यहीं की मिट्टी में हमेशा के लिए सो गए।
नाम है- निकोलस रोरिख (Nicholas Roerich)
निकोलस का भारत से जुड़ाव किसी एक यात्रा या खूबसूरत नजारे से शुरू नहीं हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपने पिता की लाइब्रेरी में भगवद्गीता पढ़ी और घर में लगी हिमालय की तस्वीर को रोज देखा। भारतीय दर्शन, प्राचीन ज्ञान और हिमालय के प्रति यही शुरुआती आकर्षण आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बन गया।
कला की दुनिया में उन्हें एक ऐसे रूसी चित्रकार, दार्शनिक, लेखक और खोजकर्ता के तौर पर याद किया जाता है, जिसने भारत और रूस के सांस्कृतिक रिश्तों को खास गहराई दी।
आज, 9 अक्टूबर को निकोलस रोरिख की जयंती है। रोरिख, जिन्हें उनके भारत प्रेम और कला की वजह से ‘भारत का रूसी नवरत्न’ भी कहा जाता है।
कहानी याद करना महज एक महान कलाकार को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस शख्स की कहानी को फिर से जानना भी है, जिसने हजारों किलोमीटर दूर रूस से आकर भारत को अपना लिया और अपनी कला के जरिए दोनों देशों के बीच दोस्ती का ऐसा पुल बनाया, जिस पर समय की सीमाएं भी असर नहीं डाल सकीं।
एक रूसी कलाकार, जिसे भारत ने अपना लिया
भारतीय कला जगत में नौ कलाकारों को उनकी असाधारण रचनात्मक विरासत के लिए खास पहचान मिली है। इन्हें अक्सर ‘नवरत्न’ कहा जाता है। इस सूची में राजा रवि वर्मा, रवींद्रनाथ टैगोर, जामिनी रॉय और अमृता शेरगिल जैसे नाम शामिल हैं। इस संदर्भ में रोरिख का जिक्र खास है, क्योंकि वह भारत में जन्मे कलाकार नहीं थे। वह रूस में पैदा हुए, लेकिन हिमालय और भारतीय दर्शन से उनका रिश्ता इतना गहरा हुआ कि उनकी पहचान भारत की सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ गई।
रोरिख की खासियत इस बात में है कि उन्होंने भारतीय कला और संस्कृति के साथ ऐसा गहरा जुड़ाव बनाया, जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाता है।
रोरिख का जन्म 9 अक्टूबर 1874 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुआ था। बचपन से ही उन्हें चित्रकला, इतिहास, पुरातत्व और प्राचीन सभ्यताओं में दिलचस्पी थी। उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई की और साथ ही इंपीरियल एकेडमी ऑफ आर्ट्स में चित्रकला सीखी। उनकी शुरुआती कला में रूसी इतिहास, प्राचीन वास्तुकला और लोक परंपराओं की झलक मिलती है। वह केवल चित्र बनाने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि संस्कृति को मानव सभ्यता की साझा धरोहर मानते थे।
भारत के प्रति उनका आकर्षण भी अचानक पैदा नहीं हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपने पिता की लाइब्रेरी से भगवद्गीता के बारे में पढ़ना शुरू किया। घर में हिमालय की एक तस्वीर भी थी, जिसने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। आगे चलकर भारतीय दर्शन, उपनिषदों, रामायण, महाभारत और बौद्ध साहित्य में उनकी रुचि बढ़ती गई। उनकी पत्नी हेलेना रोरिख ने भी इस बौद्धिक और आध्यात्मिक यात्रा में अहम भूमिका निभाई। दोनों ने मिलकर भारतीय विचार परंपराओं का अध्ययन किया और इनसे जुड़े विचार रोरिख की कला और लेखन में दिखाई देने लगे।
रूस से भारत तक: एक लंबी तलाश
1901 में हेलेना से शादी के बाद रोरिख की जिंदगी में एक ऐसा साथी आया, जिसने उनकी कलात्मक और आध्यात्मिक खोज को और गहरा किया। उनके दो बेटे हुए- जॉर्जी और स्वेतोस्लाव। परिवार के लिए कला, अध्ययन और यात्राएं जीवन का अहम हिस्सा बन गईं।
लेकिन रूस में राजनीतिक उथल-पुथल और 1917 की क्रांति के बाद हालात बदल गए। रोरिख परिवार अपनी जन्मभूमि से दूर हो गया। फिनलैंड और ब्रिटेन होते हुए वह अमेरिका भी पहुंचा। इसके बावजूद रोरिख का ध्यान लगातार पूर्वी दर्शन और हिमालय की ओर बना रहा।
1923 में रोरिख अपने परिवार के साथ भारत पहुंचे। इसके बाद उनकी यात्रा सिर्फ एक कलाकार की यात्रा नहीं रही, बल्कि मध्य एशिया और हिमालय की सभ्यताओं, धर्मों, भाषाओं और प्राचीन विरासत को समझने का एक बड़ा अभियान बन गई। उन्होंने भारत के विभिन्न सांस्कृतिक केंद्रों का दौरा किया और फिर हिमालय की ओर बढ़े।
1920 के दशक में रोरिख की मध्य एशियाई यात्रा काफी कठिन रही। दुर्गम पहाड़ों, खराब मौसम और तिब्बत में यात्रा संबंधी प्रतिबंधों के चलते उनके दल को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस अभियान ने उन्हें हिमालय और मध्य एशिया की कला, संस्कृति व इतिहास को करीब से जानने का मौका दिया।
इस यात्रा के दौरान उन्होंने सैकड़ों चित्र बनाए और अपने अनुभवों को किताबों में दर्ज किया। द हार्ट ऑफ एशिया और अल्ताई-हिमालय उनकी यात्राओं और विचारों को समझने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उनकी नजर में पहाड़ केवल भौगोलिक संरचनाएं नहीं थे। वे मानवीय चेतना, आध्यात्मिक खोज और सभ्यताओं के संवाद का प्रतीक थे।
कुल्लू की घाटी बनी उनका स्थायी घर
1928 में रोरिख परिवार हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी के नग्गर पहुंचा। पहाड़ों के बीच बसा यह शांत स्थान उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि कला और रिसर्च का केंद्र बन गया। यहां उन्होंने अपने परिवार के साथ करीब 20 साल बिताए- 1928 से 1947 तक।
नग्गर में रोरिख को वह वातावरण मिला, जिसकी तलाश उन्हें लंबे समय से थी। बर्फ से ढकी पर्वत चोटियां, बदलते मौसम, घाटियों के रंग और स्थानीय जीवन उनके चित्रों के अहम विषय बन गए। उनके कैनवास पर हिमालय कभी नीले और बैंगनी रंगों में दिखाई देता है, तो कभी लालिमा से भरे आसमान के नीचे किसी आध्यात्मिक संसार की तरह उभरता है।
रोरिख ने हिमालय के ऐसे चित्र बनाए, जिनमें पहाड़ों की खूबसूरती के साथ आध्यात्मिकता भी दिखाई देती है। भारत में हिमालय को ऋषियों, तपस्या और ज्ञान की भूमि माना जाता है। रोरिख ने इसी भावना को अपने चित्रों में उतारने की कोशिश की।
उन्होंने अपने जीवन में 7,000 से ज्यादा चित्र बनाए। इनमें हिमालय, बौद्ध धर्म, प्राचीन सभ्यताओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े विषय शामिल थे। उनकी कला की खास बात यह थी कि वह अलग-अलग देशों की संस्कृतियों में इंसानियत और शांति जैसे साझा मूल्यों को देखते थे।
एक कलाकार, जिसने कला को शांति से जोड़ा
रोरिख का योगदान केवल चित्रकला तक सीमित नहीं था। उन्होंने युद्ध और संघर्ष के दौरान सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया। उनका मानना था कि किसी देश के मंदिर, ऐतिहासिक इमारतें, संग्रहालय और कलाकृतियां केवल उस देश की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरी मानवता की विरासत हैं।
इसी सोच से जुड़ा उनका सबसे महत्वपूर्ण प्रयास ‘रोरिख पैक्ट’ था। 1935 में अमेरिका महाद्वीप के 21 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य युद्ध के समय भी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा सुनिश्चित करना था। इसके साथ जुड़ा ‘बैनर ऑफ पीस’ सांस्कृतिक स्थलों और संस्थानों को पहचान देने का प्रतीक बना।
भारत में भी उनके विचारों को समर्थन मिला। रवींद्रनाथ टैगोर सहित कई भारतीय बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों ने सांस्कृतिक संरक्षण के उनके प्रयासों की सराहना की। रोरिख के लिए भारत और रूस के बीच संबंध केवल राजनीति या व्यापार तक सीमित नहीं थे। वह कला, दर्शन, साहित्य और साझा सांस्कृतिक विरासत को दोनों देशों को करीब लाने वाली ताकत मानते थे।
नग्गर में उन्होंने 1928 में ‘उरुस्वती हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की स्थापना की। संस्कृत के शब्द ‘उरुस्वती’ का अर्थ सुबह के तारे की रोशनी से जोड़ा जाता है। इस संस्थान का उद्देश्य हिमालय और मध्य एशिया के इतिहास, संस्कृति, वनस्पति, जीव-जंतुओं, चिकित्सा परंपराओं और स्थानीय ज्ञान का अध्ययन करना था। यहां प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक शोध को साथ लाने की कल्पना की गई थी।
नेहरू और इंदिरा गांधी से मुलाकात
रोरिख के नग्गर स्थित घर ने भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण मुलाकात भी देखी। 1942 में जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गांधी उनसे मिलने पहुंचे थे। यह वह दौर था, जब भारत स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णायक चरण से गुजर रहा था और दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका का सामना कर रही थी।
नेहरू खुद भारतीय सभ्यता, विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में गहरी रुचि रखते थे। रोरिख के साथ उनकी मुलाकात कला, संस्कृति और मानवता के साझा आदर्शों के महत्व को भी दर्शाती है। एक रूसी कलाकार का हिमाचल के छोटे से पहाड़ी गांव में रहना और वहां भारत के भावी प्रधानमंत्री से मिलना इस रिश्ते की असाधारण प्रकृति को सामने लाता है।
रोरिख की भारत से जुड़ी विरासत परिवार की अगली पीढ़ी ने भी आगे बढ़ाई। उनके छोटे बेटे स्वेतोस्लाव रोरिख ने भी चित्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने हिंदी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी से विवाह किया, जो बॉम्बे टॉकीज की प्रमुख हस्तियों में से एक थीं। देविका रानी और स्वेतोस्लाव का जीवन भी भारत-रूस के सांस्कृतिक रिश्तों का खास चैप्टर बना। बेंगलुरु के पास स्थित उनका तातागुनी एस्टेट इस विरासत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है।
नग्गर में आज भी जिंदा है रोरिख की दुनिया
13 दिसंबर 1947 को निकोलस रोरिख का निधन हो गया। उनके पार्थिव शरीर का नग्गर में अंतिम संस्कार किया गया। हिमालय की ओर मुख किए उनके समाधि स्थल पर उन्हें ‘भारत का महान रूसी मित्र’ बताया गया है। यह शब्द उनके जीवन और भारत से उनके रिश्ते को संक्षेप में बयान करते हैं।
आज नग्गर में स्थित रोरिख एस्टेट उनकी यादों, चित्रों और शोध परंपरा को संजोए हुए है। यहां इंटरनेशनल रोरिख मेमोरियल ट्रस्ट के माध्यम से उनकी विरासत को संरक्षित करने और लोगों तक पहुंचाने का काम किया जाता है। एस्टेट में उनका पुराना निवास, कला से जुड़ी सामग्री और हिमालयी लोक एवं जनजातीय कला से संबंधित संग्रह देखने को मिलते हैं। उरुस्वती संस्थान भी इसी विरासत का हिस्सा है।
रोरिख ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा रूस से दूर बिताया, लेकिन अपनी जन्मभूमि से उनका रिश्ता कभी मिटा नहीं। उन्होंने भारतीय संस्कृति को अपनाया, हिमालय को अपनी कला का केंद्र बनाया और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा को वैश्विक जिम्मेदारी माना।
उनकी कहानी इस बात की याद दिलाती है कि दो देशों के संबंध केवल संधियों, नेताओं और कारोबार से नहीं बनते। कभी-कभी एक कलाकार के रंग, एक दार्शनिक के विचार और किसी पहाड़ से जन्मा प्रेम भी देशों को करीब ला सकता है। निकोलस रोरिख के लिए हिमालय भारत का रत्न था। भारत के लिए वह रूस का ऐसा सांस्कृतिक दूत बने, जिसकी कला आज भी दोनों देशों के बीच दोस्ती के रंग भरती है।