धरती से 21 किमी ऊपर भारत का ये गुब्बारा जानें क्यों बहुत खास है?

ये दिखता गुब्बारे जैसा है, लेकिन काम बेहद खास है। इसका वर्क स्टेशन है धरती से 21 KM ऊपर, शॉर्ट में इसे कहते हैं HAPS. आगे पढ़िए कैसे बनेगा आसमान में यह निगरानी का नया प्लेटफॉर्म?

आसमान में करीब 21 किलोमीटर ऊपर एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जो पहली नजर में आपको गुब्बारा लग सकता है। लेकिन यह कोई साधारण गुब्बारा नहीं है।

फिर क्या यह ड्रोन है?
क्या यह सैटेलाइट की तरह काम कर सकता है?
और इतनी ऊंचाई से आखिर कितना बड़ा इलाका देखा जा सकता है?

असल में, यह भारत का स्वदेशी High-Altitude Platform System यानी HAPS है। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जिसे धरती से बहुत ऊपर, स्ट्रैटोस्फियर में लंबे समय तक तैनात रहकर निगरानी और कम्युनिकेशन जैसे सीक्रेट मिशन के लिए विकसित किया जा रहा है।DRDO के इस परीक्षण ने एक अहम सवाल खड़ा किया है- आखिर 20-21 किलोमीटर ऊपर उड़ने वाला यह प्लेटफॉर्म कर क्या सकता है?

इन सवालों को समझने के लिए RT हिंदी ने डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज एक्सपर्ट और भारतीय तटरक्षक बल के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर जनरल कृपा नौटियाल से बात की।

पहले समझिए-HAPS है क्या?

High-Altitude Platform System यानी HAPS। कृपा नौटियाल के मुताबिक, इसे एक तरह के हाई-एल्टीट्यूड एयरशिप के रूप में समझना आसान होगा। इसमें हीलियम का इस्तेमाल होता है और यह पारंपरिक विमान की तरह पूरी तरह कठोर धातु के ढांचे पर आधारित नहीं होता।

यह एक lighter-than-air यानी हवा से हल्का सिस्टम है। इसका डिजाइन ऐसा है कि यह हवा में तैरते हुए बेहद ऊंचाई तक पहुंच सके और वहां लंबे समय तक बना रह सके।

यही इसे सामान्य विमान या ड्रोन से अलग बनाता है।

21 किमी की ऊंचाई क्यों खास है?

HAPS को समझने के लिए पहले उस वातावरण को समझना जरूरी है जहां यह काम करता है। 

पृथ्वी के वायुमंडल की निचली परत ट्रोपोस्फियर करीब 10-11 किलोमीटर तक मानी जाती है। बादल, मौसम और हवा की ज्यादातर गतिविधियां इसी क्षेत्र में होती हैं।

इसके ऊपर आता है स्ट्रैटोस्फियर, जहां वायुमंडलीय गतिविधियां तुलनात्मक रूप से कम होती हैं।

HAPS को इसी ऊंचाई वाले क्षेत्र में काम करने के लिए विकसित किया जा रहा है। लेकिन इसकी असली अहमियत सिर्फ 20 या 21 किलोमीटर तक पहुंचने में नहीं है।

असल गेम-चेंजर है वहां लंबे समय तक बने रहना।

किसी खास इलाके के ऊपर लगातार मौजूद रहकर निगरानी करना HAPS की सबसे बड़ी संभावित खूबियों में से एक है।

21 किमी ऊपर DRDO के टेस्ट में क्या हुआ?

DRDO की Aerial Delivery Research and Development Establishment यानी ADRDE, आगरा इस तकनीक को विकसित कर रही है।

हालिया परीक्षण में HAPS समुद्र तल से करीब 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा। इसके बाद यह लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर 30 मिनट से ज्यादा समय तक रहा। टेस्ट के दौरान इसे कमांड देकर वापस नीचे लाया गया और प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रिकवर किया गया।

यानी यह सिर्फ ऊंचाई हासिल करने का परीक्षण नहीं था। इसमें यह भी देखा गया कि इतनी ऊंचाई पर प्लेटफॉर्म के अलग-अलग सिस्टम अपेक्षित तरीके से काम कर रहे हैं या नहीं।

आसमान से LIVE वीडियो जमीन तक पहुंचता रहा

इस परीक्षण की सबसे अहम बातों में से एक थी- real-time video और vehicle performance data का ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचना।

प्लेटफॉर्म में IMU यानी Inertial Measurement Unit, GPS, onboard camera और altitude-control system जैसे उपकरण लगाए गए थे।

मंत्रालय के मुताबिक, उड़ान के दौरान सिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक काम किया।

आसान भाषा में कहें तो 20 किलोमीटर ऊपर मौजूद इस प्लेटफॉर्म की ‘आंख’  से मिलने वाला वीडियो और उसकी उड़ान से जुड़ा डेटा नीचे जमीन पर मौजूद कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचता रहा।

यही क्षमता भविष्य के operational HAPS के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

गुब्बारा है या ड्रोन?

यहीं HAPS सबसे दिलचस्प हो जाता है।

इसे देखकर गुब्बारे का ख्याल आना स्वाभाविक है, क्योंकि यह lighter-than-air system है। लेकिन इसे सिर्फ एक गुब्बारा कहना गलत होगा।

इसमें ऊंचाई नियंत्रित करने और प्लेटफॉर्म को निर्धारित क्षेत्र में बनाए रखने के लिए अलग-अलग control systems होते हैं। इसके अलावा इसमें कैमरे, सेंसर, कम्युनिकेशन उपकरण और आगे चलकर रडार जैसे payload भी लगाए जा सकते हैं।

दूसरी तरफ इसे सामान्य ड्रोन भी नहीं कहा जा सकता।

सामान्य ड्रोन aerodynamic lift के जरिए उड़ते हैं और अपने मिशन के मुताबिक अलग-अलग ऊंचाइयों पर operate करते हैं। HAPS का मूल उद्देश्य अलग है- 

बहुत ज्यादा ऊंचाई पर जाकर लंबे समय तक मौजूद रहना।

ड्रोन से ऊपर, सैटेलाइट से नीचे

HAPS को समझने का शायद सबसे आसान तरीका है- इसे ड्रोन और सैटेलाइट के बीच की एक अलग तकनीक के रूप में देखना।

इसी वजह से इसे कई जगह Pseudo-Satellite यानी छद्म-सैटेलाइट भी कहा जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि HAPS वास्तव में सैटेलाइट है। कृपा नौटियाल के मुताबिक, दोनों के काम करने के तरीके में बड़ा अंतर है।

यानी सैटेलाइट जहां बड़े इलाके की space-based निगरानी देता है, वहीं HAPS किसी खास क्षेत्र में persistent surveillance की अतिरिक्त क्षमता दे सकता है।

क्या HAPS सैटेलाइट की जगह ले सकता है?

पूरी तरह नहीं। बल्कि दोनों की क्षमताएं एक-दूसरे को complement कर सकती हैं।

HAPS जमीन के मुकाबले काफी नीचे है। इसलिए किसी खास क्षेत्र पर लगातार निगरानी, कम्युनिकेशन relay या real-time information उपलब्ध कराने में इसे फायदा मिल सकता है।

वहीं सैटेलाइट बहुत बड़े क्षेत्र को कवर कर सकता है और उसके पास space-based applications की अपनी अलग क्षमताएं हैं।

एक जगह कैसे टिका रहेगा HAPS?

सवाल यह भी है कि हवा में तैरने वाला कोई प्लेटफॉर्म किसी एक इलाके के ऊपर कैसे बना रह सकता है?

कृपा नौटियाल के मुताबिक, इसके लिए GPS, मोटर, रडार और automated control systems मदद कर सकते हैं।

पहले HAPS को एक तय लोकेशन दी जा सकती है। अगर वह उस स्थिति से हटता है तो onboard control system उसकी स्थिति को detect करके corrective action ले सकता है। मोटर और रडर की मदद से प्लेटफॉर्म को वापस निर्धारित क्षेत्र की ओर लाया जा सकता है। यानी यह सिर्फ हवा के भरोसे उड़ता हुआ गुब्बारा नहीं होगा।

20 किमी ऊपर से कितना बड़ा इलाका देख सकता है?

यह सवाल सुनने में आसान है, लेकिन इसका कोई एक तय जवाब नहीं है। क्योंकि निगरानी का दायरा सिर्फ HAPS की ऊंचाई पर निर्भर नहीं करता। इसमें camera की resolution, sensor का प्रकार, optics, payload और मौसम जैसी कई चीजें महत्वपूर्ण होंगी।

कृपा नौटियाल ने अपनी स्टडी के आधार पर शुरुआती तौर पर करीब 500 किलोमीटर तक के क्षेत्र की निगरानी की संभावना का उल्लेख किया है।

लेकिन इसे मौजूदा HAPS की आधिकारिक या अंतिम operational क्षमता नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक coverage इस बात पर निर्भर करेगी कि प्लेटफॉर्म पर किस तरह के payload और sensors लगाए जाते हैं।

अगर भविष्य में इसमें high-resolution cameras, radar और दूसरे advanced sensors लगाए जाते हैं, तो किसी खास इलाके की लगातार निगरानी की क्षमता काफी बढ़ सकती है।

क्या-क्या कर सकता है?

HAPS की संभावित भूमिका सिर्फ कैमरे से तस्वीरें लेने तक सीमित नहीं होगी। इसके संभावित इस्तेमाल में शामिल हैं- 

हालांकि, DRDO के मौजूदा परीक्षण के आधार पर इन सभी क्षमताओं के operational होने का दावा नहीं किया जा सकता।

इस टेस्ट ने मुख्य रूप से high-altitude flight, platform control और real-time video/data transmission जैसी क्षमताओं को demonstrate किया है।

मेरीटाइम सर्विलांस में क्यों अहम हो सकता है?

भारत के लिए HAPS का एक महत्वपूर्ण इस्तेमाल Maritime Surveillance (समुद्र की निगरानी)  हो सकता है।

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किसी समुद्री चोकपॉइंट, शिपिंग रूट या ऐसे क्षेत्र में जहां जहाजों की आवाजाही ज्यादा हो, HAPS लगातार निगरानी की अतिरिक्त परत दे सकता है। उदाहरण के लिए किसी संदिग्ध गतिविधि, असामान्य जहाज की मूवमेंट या पायरेसी जैसी स्थिति पर नजर रखने के लिए इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। HAPS से मिलने वाली जानकारी सीधे ऑपरेशन सेंटर तक पहुंचाई जा सकती है।
कृपा नौटियाल
कृपा नौटियाल
डिफेन्स एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज एक्सपर्ट एवं भारतीय तटरक्षक बल के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक

किसी समुद्री chokepoint, shipping route या ऐसे क्षेत्र में जहां जहाजों की आवाजाही ज्यादा हो, HAPS लगातार निगरानी की अतिरिक्त परत दे सकता है।

उदाहरण के लिए किसी संदिग्ध गतिविधि, असामान्य जहाज की movement या piracy जैसी स्थिति पर नजर रखने के लिए इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। HAPS से मिलने वाली जानकारी सीधे ऑपरेशन सेंटर तक पहुंचाई जा सकती है।

इसका मतलब यह नहीं कि यह मौजूदा maritime radar या satellites को replace कर देगा। बल्कि यह उनके साथ मिलकर एक अतिरिक्त surveillance layer बना सकता है।

असली ताकत- REAL TIME निगरानी

HAPS की पूरी कहानी में शायद सबसे महत्वपूर्ण शब्द है- persistent surveillance।

यानी किसी इलाके की एक बार तस्वीर लेकर आगे बढ़ जाना नहीं, बल्कि वहां लगातार मौजूद रहकर गतिविधियों पर नजर रखना। यही इसे एक संभावित force multiplier बनाता है।

कृपा नौटियाल के मुताबिक, अगर कोई HAPS किसी संवेदनशील इलाके पर लगातार नजर रखता है तो जमीन या समुद्र पर मौजूद सुरक्षा बलों को हर समय खुद जाकर निगरानी करने की जरूरत कम हो सकती है।

HAPS से मिलने वाली जानकारी के आधार पर जरूरत पड़ने पर ground या naval units को तेजी से कार्रवाई के लिए भेजा जा सकता है।

ADRDE की दूसरी उपलब्धि- AHAP

इसी दौरान ADRDE, आगरा ने Advanced High-Altitude Parachute यानी AHAP का maiden flight trial भी सफलतापूर्वक किया। यह परीक्षण Nyoma के Mudh DZ जैसे बेहद ऊंचाई वाले drop zone पर किया गया।

AHAP को आसान भाषा में एक static-line parachute system के रूप में समझा जा सकता है, जिसे aircraft से बड़ी संख्या में paratroopers को एक साथ drop करने के लिए डिजाइन और विकसित किया गया है। यानी HAPS और AHAP का काम पूरी तरह अलग है।

HAPS: बहुत ऊंचाई पर लंबे समय तक रहने वाला surveillance/communication platform।

AHAP: ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्र में aircraft से बड़ी संख्या में paratroopers को सुरक्षित उतारने के लिए विकसित advanced parachute system।

लेकिन असली चुनौती अभी बाकी है

यहां सबसे जरूरी बात यह है कि 21 किलोमीटर तक पहुंचना उपलब्धि है, लेकिन HAPS का अंतिम लक्ष्य सिर्फ ऊंचाई हासिल करना नहीं है।

इस तकनीक की असली परीक्षा होगी- वह कितनी देर तक वहां रह सकता है?

मौजूदा परीक्षण में प्लेटफॉर्म करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर 30 मिनट से ज्यादा रहा। आगे की चुनौती होगी endurance बढ़ाना, ज्यादा उपयोगी payload ले जाना, प्लेटफॉर्म को लंबे समय तक नियंत्रित रखना और अलग-अलग मौसम तथा operational परिस्थितियों में इसकी विश्वसनीयता साबित करना।

यहीं से HAPS एक experimental platform से आगे बढ़कर वास्तविक surveillance और communication system बनने की दिशा में जाएगा।

दुनिया में कौन-कौन कर रहा है काम?

भारत इस तकनीक पर काम करने वाला अकेला देश नहीं है। अमेरिका, जापान, यूरोप और चीन में भी high-altitude, long-endurance platforms पर research और development जारी है।

भारत के लिए इसका मतलब क्या है?

भारत के सामने हिमालयी सीमा से लेकर विशाल समुद्री क्षेत्र तक निगरानी की चुनौती है।

ऐसे में एक ऐसा platform जो स्ट्रैटोस्फियर में जाकर लंबे समय तक किसी खास क्षेत्र पर नजर रख सके और real-time data जमीन तक भेज सके, भविष्य की surveillance architecture में अहम भूमिका निभा सकता है।

बॉर्डर हो, समुद्री सीमा हो या कोई आपदा प्रभावित क्षेत्र- HAPS एक ऐसी अतिरिक्त “आंख” बन सकता है जो लंबे समय तक आसमान से स्थिति पर नजर रखे।