‘छलड़े-छलड़े बाल…’ इंस्टा पर वायरल धुन की पाकिस्तान के सराइकी वाली कहानी पढ़िए

इंस्टाग्राम पर वायरल ‘छलड़े-छलड़े बाल’ सिर्फ कुछ सेकंड का ट्रेंडिंग ऑडियो नहीं, बल्कि एक लंबी संगीत-यात्रा की आवाज है। सराइकी लोकगीत की मिट्टी से निकली यह धुन अब फिर चर्चा में है। इस धुन में लोकसंस्कृति, पुरानी संगीत-स्मृतियां और सरहद पार की आवाजें एक साथ सुनाई देती हैं।

‘छलड़े-छलड़े बाल… मोढ़ा रखदा ऐ काली शॉल…’

घुंघराले बाल, कंधे पर काली शॉल और हाथ में लाल रूमाल... महबूब की इस तस्वीर को उकेरती एक पुरानी सराइकी धुन इन दिनों इंस्टाग्राम रील्स में नई जिंदगी पा रही है। कुछ गीत ऐसे होते हैं जो सिर्फ सुने नहीं जाते, अपने साथ कोई जगह, कोई बोली और कोई भूला-बिसरा किस्सा भी ले आते हैं। ‘छलड़े-छलड़े बाल...’ भी ऐसा ही गीत है। इसकी धुन में पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब की मिट्टी की सुगंध है, शब्दों में सराइकी लोकजीवन की मिठास और पीछे उस सांस्कृतिक दुनिया की छाया है, जहां प्रेम, लोककथा और सूफी परंपरा सदियों से एक-दूसरे में घुलते रहे हैं। आज वही गीत लाखों रील्स में नए चेहरे और नई कहानियों के साथ दिख रहा है।

इन दिनों पाकिस्तान का यह लोकगीत सरहद पार भारत में ऐसी आवाज बन गया है, जो इंस्टाग्राम की हर कुछ रील्स के बाद फिर सुनाई पड़ जाती है। 6 अक्टूबर 2026 तक इसके ऑडियो पर 3.17 लाख से ज्यादा रील्स बन चुकी थीं। कोई इन पंक्तियों के साथ अपने घुंघराले बाल दिखा रहा है, कोई प्रेम की तस्वीर सजा रहा है, तो कोई बस इस मीठी-सी धुन को अपनी कहानी का हिस्सा बना रहा है। लेकिन यह गीत आज का नहीं है। इसके कई रूप और आवाजें पहले से लोगों के बीच मौजूद हैं। मुहम्मद हुसैन बंडियालवी के पुराने संस्करण से लेकर शफाउल्लाह खान रोखड़ी और उनके बेटे जीशान खान रोखड़ी तक, यह धुन सराइकी लोकसंगीत में अपना सफर तय करती रही है। हाल के दिनों में सुनंदा शर्मा की आवाज और इंस्टाग्राम रील ने इसे भारत में एक नई पहचान दे दी।

और फिर इसकी धुन कान में पड़ते ही एक दूसरी याद दस्तक देती है- 1994 की फिल्म ‘मोहरा’ का ‘ना कजरे की धार’। दोनों धुनों की समानता ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। लेकिन इस कहानी को यहीं से शुरू करना भी अधूरा होगा। क्योंकि ‘ना कजरे की धार’ की धुन की अपनी एक पुरानी कहानी है। ऐसी कहानी, जो 1994 से भी पीछे जाती है। यानी इंस्टाग्राम पर कुछ सेकंड के ऑडियो से शुरू हुआ यह किस्सा धीरे-धीरे सराइकी लोकसंगीत, 90 के दशक के बॉलीवुड और उससे भी पुरानी एक धुन की तरफ ले जाता है।

’छलड़े-छलड़े बाल’ का मतलब क्या है?

सबसे पहले उस लाइन को समझिए, जो इस पूरे ट्रेंड की पहचान बन गई है।

'छलड़े-छलड़े बाल,

मोढ़ा रखदा ऐ काली शॉल…'

‘हथ चैना रता रुमाल,

तेरियां रीसां कौन करे…’

सराइकी में 'छलड़े-छलड़े बाल' का मतलब है- लहराते या घुंघराले बाल। गीत में बाल को वाल कहा गया है। 

इसके बाद महबूब की तस्वीर और साफ होती जाती है। गीत कहता है- मोढ़ा रखदा ऐ काली शॉल यानी कंधे पर काली शॉल, हथ चैना रता रुमाल यानी हाथ में लाल रूमाल और फिर

तेरियां रीसां कौन करे यानी तुम्हारी बराबरी कौन कर सकता है? यहां प्रेमी अपने महबूब की खूबसूरती का बखान कर रहा है। गाने में कोई जटिल प्रेम-दर्शन नहीं है। उसकी खूबसूरती को बहुत साधारण चीजों से देखा गया है- बाल, शॉल, रूमाल, आंखें, मुस्कान। यही लोकगीतों की खूबसूरती है। वे प्रेम को बड़े-बड़े शब्दों में नहीं, रोजमर्रा की तस्वीरों में पकड़ते हैं।

’तू सांवल फूल कस्तूरी’… इसमें क्या कहा गया है?

गीत की एक और खूबसूरत लाइन है,

'तू सांवल फूल कस्तूरी,
तेरी थी गई वो मशहूरी…

जा जा ते हर जा ता
पावे देंदे लोक मिसाल'

इसका मतलब है- तुम सांवले रंग के कस्तूरी जैसे सुगंधित फूल हो और तुम्हारी बहुत मशहूरी हो गई है। जगह-जगह पर, हर जगह पर लोग तुम्हारी मिसाल देते रहते हैं।

यह पंजाबी है या सराइकी?

इस गीत को लेकर थोड़ा भ्रम है। कुछ रिपोर्टें इसे सराइकी लोकगीत बताती हैं, तो कुछ सराइकी-पंजाबी लोकसंगीत की साझा परंपरा से जोड़ती हैं। हालांकि शफाउल्लाह खान रोखड़ी का चर्चित संस्करण उपलब्ध स्रोतों में साफ तौर पर सराइकी फोक सॉन्ग के रूप में दर्ज है। इसलिए इसे सराइकी लोकगीत कहना ज्यादा सटीक है।

सराइकी पाकिस्तान की इंडो-आर्यन भाषा है, जिसका मुख्य इलाका दक्षिणी पंजाब है। मुल्तान, बहावलपुर और डेरा गाजी खान इसके प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र हैं। यह भाषा सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के कुछ हिस्सों में भी बोली जाती है। यानी ‘छलड़े-छलड़े बाल’ को सिर्फ पंजाबी गीत कहना इसकी पहचान को अधूरा कर देगा। इसकी असली जड़ें दक्षिणी पंजाब की सराइकी लोक-संस्कृति में हैं।

सराइकी के नक्शे के बीच कहां आता है मुल्तान?

सराइकी की कहानी में मुल्तान सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक धुरी है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दक्षिणी हिस्से में बसा यह शहर सदियों से इस पूरे इलाके का व्यापारिक, सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र रहा है। सिंधु नदी तंत्र के करीब बसे मुल्तान के भूगोल ने यहां की लोकभाषा और लोकसंगीत को भी अपना खास रंग दिया।

लेकिन मुल्तान की पहचान सिर्फ उसके भूगोल से नहीं बनती। इसे लंबे समय से सूफियों की धरती कहा जाता है। यहां बहाउद्दीन जकरिया और शाह रुक्न-ए-आलम की दरगाहें सूफी परंपरा की गहरी छाप छोड़ती हैं। मुल्तान से आगे फैले सराइकी इलाके में ख्वाजा गुलाम फरीद और सखी सरवर जैसे संतों की परंपरा ने भी लोकजीवन, कविता और संगीत को गहराई से प्रभावित किया है। यही वह सांस्कृतिक जमीन है, जहां प्रेम का लोकगीत, सूफी कविता और मिट्टी की अपनी बोली सदियों से एक-दूसरे में घुलते रहे हैं

यहां एक फर्क समझना जरूरी है। ‘छलड़े-छलड़े बाल’ खुद कोई सूफी कलाम नहीं, बल्कि सराइकी लोकगीत है। इसके बोल महबूब की खूबसूरती और प्रेम के इर्द-गिर्द घूमते हैं। लेकिन इसकी मिट्टी उस सांस्कृतिक इलाके की है, जहां लोकगीतों के साथ सूफी कविता और संगीत की भी सदियों पुरानी परंपरा रही है। इसलिए इस गीत में सीधे सूफी संदेश भले न हों, लेकिन इसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर उस विरासत की छाया जरूर दिखाई देती है।

आखिर यह गीत है किसका?

‘छलड़े-छलड़े बाल’ किसी एक गायक का बनाया हुआ नया गाना नहीं है। यह सराइकी लोकगीत है, जिसे अलग-अलग दौर में कई गायकों ने अपनी आवाज दी है।

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, मुहम्मद हुसैन बंदियालवी उन शुरुआती गायकों में हैं जिन्होंने इस लोकगीत को लोकप्रिय बनाया। इसके बाद शफाउल्लाह खान रोखड़ी के संस्करण ने इसे बड़े पैमाने पर पहचान दिलाई। उनके बेटे जीशान खान रोखड़ी समेत दूसरे कलाकारों ने भी इसे अपने अंदाज में गाया।

यानी इसे किसी एक कलाकार का ‘मूल गाना’ कहना ठीक नहीं होगा। लोकगीतों की यही खासियत होती है कि धुन और बोल पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं और अलग-अलग कलाकार उन्हें अपनी आवाज और अंदाज देते रहते हैं।

सराइकी साहित्य की दुनिया कितनी बड़ी है?

सराइकी संस्कृति को सिर्फ उसके संगीत से समझना मुश्किल है। इसकी जड़ें एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा में भी हैं। इस परंपरा में ख्वाजा गुलाम फरीद का नाम बेहद अहम है। 19वीं सदी के इस सूफी कवि ने अपनी मातृभाषा में प्रेम, विरह, प्रकृति, रेगिस्तान और आध्यात्मिक अनुभवों को कविताओं में उतारा। सराइकी साहित्य में काफी जैसी काव्य-संगीत परंपराओं की भी खास जगह रही है। यही वजह है कि यहां प्रेम का गीत और आध्यात्मिक कविता हमेशा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नहीं रहे।

इसी मिली-जुली सांस्कृतिक जमीन से सराइकी का लोकसंगीत निकला। जहां प्रेम, मिट्टी और रूहानी एहसास एक ही धुन में सुनाई देते हैं।

‘मोहरा’ फिल्म से कनेक्शन

अगर ‘छलड़े-छलड़े बाल’ सुनते ही आपको ‘ना कजरे की धार, ना मोतियों का हार…’ याद आ जाता है, तो यह महज इत्तेफाक नहीं है। दोनों की धुन में साफ समानता सुनाई देती है। संगीत विश्लेषण वेबसाइट TrackDecoded के मुताबिक ‘छलड़े-छलड़े बाल’ की धुन ‘ना कजरे की धार’ से मिलती है।

’ना कजरे की धार’ 1994 की फिल्म ‘मोहरा’ का मशहूर गाना था। इसे पंकज उदास और साधना सरगम ने गाया था और संगीत विजू शाह ने दिया था।

लेकिन कहानी यहां से और दिलचस्प हो जाती है।

विजू शाह के मुताबिक ‘ना कजरे की धार’ की धुन उनके पिता कल्याणजी-आनंदजी की पुरानी रचना थी। इसे पहले एक फिल्म के लिए बनाया गया था, लेकिन वह फिल्म नहीं बन सकी और गाना भी रिलीज नहीं हुआ। बाद में विजू शाह ने उसी धुन को ‘मोहरा’ के लिए नए अरेंजमेंट के साथ इस्तेमाल किया। यानी जिस धुन को भारत ने 1994 में सुना, उसकी कहानी उससे भी कई साल पहले शुरू हो चुकी थी और आज वही धुन एक नए सफर पर है। 

यानी इंस्टाग्राम की एक वायरल रील आपको सिर्फ पाकिस्तान के सराइकी लोकसंगीत तक नहीं ले जाती, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत की कई दशक पुरानी कहानी तक पहुंचा देती है।

हालांकि, उपलब्ध रिकॉर्ड यह साफ नहीं करते कि ‘ना कजरे की धार’ की धुन ‘छलड़े-छलड़े बाल’ में कब और किसने अपनाई। इसलिए इसे सीधे ‘कॉपी’ कहना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर कहा जा सकता है कि दोनों गीतों की केंद्रीय धुन में स्पष्ट और मजबूत समानता सुनाई देती है।

इस गाने को असल में वायरल किसने किया?

यहां कहानी में एक और अहम नाम आता है, सुनंदा शर्मा। भारतीय पंजाबी गायिका ने इस गीत को गाते हुए एक वीडियो साझा किया। इसके बाद भारत में लोगों की दिलचस्पी इस गाने में बढ़ी और लोग इसके बोल और मूल वर्जन तलाशने लगे। फिर इसके पुराने संस्करण, नए कवर और लो-फाई वर्जन सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे। इसी सिलसिले में Shanzy Sial का गाया वर्जन भी सामने आया, जिसने गीत को पाकिस्तान की सोशल मीडिया ऑडियंस के बीच भी नई पहुंच दी। हालिया रिपोर्टों ने सुनंदा शर्मा समेत इन नए कवर वर्जन को 2026 में गाने के दोबारा वायरल होने की अहम कड़ी बताया है।

एक रील से कहीं लंबी कहानी

इंस्टाग्राम ने ‘छलड़े-छलड़े बाल’ को पैदा नहीं किया। उसने बस एक पुरानी लोकधुन को एक नई पीढ़ी और दूसरी सीमा तक पहुंचा दिया। शफाउल्लाह खान रोखड़ी का 2018 में अपलोड हुआ वीडियो पहले से ही करोड़ों लोगों तक पहुंच चुका था। आज Rokhri Production के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर इसके 2.38 करोड़ से ज्यादा व्यूज हैं। यानी भारत में इसकी वायरलिटी इसकी लोकप्रियता की शुरुआत नहीं, बल्कि एक नई डिजिटल पारी है।

और इस पारी की सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि एक छोटे से इंस्टाग्राम ऑडियो के पीछे कितनी लंबी कहानी छिपी है। सराइकी भाषा, दक्षिणी पंजाब की लोकसंस्कृति, मुल्तान की मिट्टी, सूफी और लोक परंपरा, बॉलीवुड की 90 के दशक की संगीत स्मृति और एक पुरानी धुन का सफर। आज कोई इसे घुंघराले बालों की रील में इस्तेमाल कर रहा है, कोई काली शॉल के साथ, तो कोई सिर्फ उसकी धुन पर। लेकिन इस कुछ सेकंड के ऑडियो के पीछे कई साल की आवाजें और कई पीढ़ियों की संगीत स्मृतियां हैं।

’छलड़े-छलड़े बाल’ की यही खूबसूरती है। आज की वायरल रील में यह कुछ सेकंड का गीत है, लेकिन अपनी पूरी कहानी में यह सरहदों, भाषाओं और संगीत की यादों को जोड़ती हुई एक लंबी यात्रा है।