फसलें डूबीं, कहीं खेत सूखे: किसने बिगाड़ा बारिश का पूरा सिस्टम, अब एक और संकट आने वाला है

फसलें डूबीं, कहीं खेत सूखे: किसने बिगाड़ा बारिश का पूरा सिस्टम, अब एक और संकट आने वाला है

कहीं चार दिन की बारिश एक दिन में हो रही है, तो कहीं खेत पानी को तरस रहे हैं। आखिर मानसून का यह उलटफेर क्यों? अब रबी की बुवाई पर कितना बड़ा संकट मंडरा रहा है?

भारी बारिश से आंध्र प्रदेश में 40,923 हेक्टेयर धान की फसल डूबी। ओडिशा में सामान्य से 30% ज्यादा बारिश हुई।

कर्नाटक के 177 तालुक और महाराष्ट्र की 265 तहसीलें सूखाग्रस्त घोषित।

देश में इस साल मानसून की दो अलग-अलग तस्वीरें दिख रही हैं। कहीं बारिश की कमी से खेत सूख रहे हैं, तो कहीं अचानक हुई भारी बारिश ने खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया। उत्तर प्रदेश में सितंबर के आखिरी दिनों में इतनी ज्यादा बारिश हुई कि 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। तेज हवाओं ने तैयार धान की फसल गिरा दी। वहीं असम में पूरे सीजन में कम बारिश के बावजूद बाढ़ आ गई।


इन हालातों के बीच कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि केंद्र सरकार कर्नाटक और महाराष्ट्र में सूखे का आकलन करने के लिए टीमें भेजेगी। वहीं कृषि सचिव आतिश चंद्रा ने बताया कि बारिश की अनियमितता के कारण आने वाला रबी सीजन चुनौतीपूर्ण रहेगा। खासकर बारिश पर निर्भर खेती वाले इलाकों में खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।

लातूर के औसा तालुका के खरोसा गांव में सूखे से प्रभावित इलाकों का जायजा लेने पहुंचे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस एक भावुक किसान को सांत्वना देते हुए।


आखिर ये सब क्यों हो रहा है? इस सवाल के जवाब में एक नाम "एल नीनो" का लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि एल नीनो की वजह से ही ये सब कुछ हो रहा है।


ऐसे में समझते हैं कि आखिर एल नीनो क्या है, जो मानसून को इतना प्रभावित कर रहा है? क्या इसकी वजह से कहीं सूखा और कहीं अचानक कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो रही है? खड़ी फसलों को कितना नुकसान हुआ और अक्टूबर से शुरू होने वाली रबी की बुवाई पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

एल नीनो क्या है, जो कहीं अचानक बारिश कराता है तो कहीं सूखा?

एल नीनो कोई बारिश वाला बादल या तूफान नहीं है। यह एक मौसमी पैटर्न है। इसे ऐसे समझिए, धरती का बड़ा हिस्सा समुद्र है। समुद्र का पानी हमेशा एक जैसा गर्म नहीं रहता। कुछ सालों में प्रशांत महासागर के बीच और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे समुद्र के ऊपर बहने वाली हवाओं का रुख बदल सकता है। हवा का रुख बदलने से बादलों और बारिश का रास्ता भी प्रभावित होता है।


भारत में ज्यादातर बारिश जून से सितंबर के दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। यह मानसून समुद्र से नमी लेकर आता है। जब एल नीनो मजबूत होता है, तो मानसून की नमी वाली हवाएं कमजोर या असमान हो जाती हैं। इस साल एल नीनो जून में बनना शुरू हुआ और आगे मजबूत होता गया। आशंका है कि यह साल के अंत तक और 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है।


एल नीनो पूरे देश में भारी बारिश नहीं लाता। इसका असर यह होता है कि देश में बारिश अनियमित हो जाती है। कहीं खूब बारिश होती है, वह भी कुछ ही समय में। कहीं सूखे जैसे हालात पैदा हो जाते हैं, यानी कुछ जगहों पर बारिश ही नहीं होती।


बारिश की अनियमितता को कुछ उदाहरणों से समझिए।


जून में देश की बारिश करीब 40% कम रही। IMD ने जुलाई को भी सामान्य से कम बारिश वाला महीना रहने का अनुमान जताया था। लेकिन जुलाई में एक के बाद एक मानसून सिस्टम सक्रिय हुए और बारिश की कमी घटकर करीब 16% रह गई।


जुलाई में असम, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में भारी से बहुत भारी बारिश हुई।


"चार दिन की बारिश एक ही दिन में हो जाती है"

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म हवा ज्यादा नमी रोक सकती है। फिर चार दिन की बारिश एक दिन में हो जाती है। एक इलाके में बाढ़ आती है, तो कुछ सौ किलोमीटर दूर दूसरे इलाके में फसल सूख जाती है। असम इसका उदाहरण है। यहां पूरे सीजन में कम बारिश हुई। फिर भी जो बारिश हुई, वह धीरे-धीरे नहीं, एक साथ बहुत ज्यादा हुई। नतीजा यह हुआ कि वहां बाढ़ आ गई।

प्रयागराज में भारी बारिश के बाद गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने पर, सड़क किनारे सामान बेचने वाले लोग अपना सामान लेकर बाढ़ के पानी से होते हुए सुरक्षित जगह की ओर जाते हुए।

42% जिले डेफिशिएंट या लार्ज डेफिशिएंट कैटेगरी में हैं

4 जून से 26 सितंबर के बीच पूरे देश में 749.2 मिमी बारिश दर्ज हुई। सामान्य 853.4 मिमी है। यानी कमी करीब 12 प्रतिशत। औसत देखें तो आंकड़ा बहुत डरावना नहीं लगता। लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। करीब 42 प्रतिशत जिले डेफिशिएंट या लार्ज डेफिशिएंट कैटेगरी में रहे।


ओडिशा में औसत से 30% ज्यादा बारिश हुई: सबसे ज्यादा बारिश वाले प्रदेशों में ओडिशा है। 1 जून से 27 सितंबर तक ओडिशा में 1,481.2 मिमी बारिश हुई। यह करीब 30 प्रतिशत ज्यादा है। आईएमडी इसे Excess मानता है। केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में सामान्य से 37 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई।


मेघालय में 1,073 मिमी बारिश हुई, फिर भी यह लार्ज डेफिशिएंट रहा क्योंकि वहां सामान्य 2,658.3 मिमी है। कमी 60 प्रतिशत।


यूपी में 8% ज्यादा तो बिहार में 31% कम बारिश हुई: उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड की तस्वीर एक जैसी नहीं है। आईएमडी के 1 जून से 28 सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 805.2 मिमी बारिश हुई। सामान्य से 8% ज्यादा। उत्तराखंड में भी सामान्य से 9 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई। बिहार पीछे रहा। यहां 31 प्रतिशत कम बारिश हुई।

कटिहार में गंगा, कोसी और महानंदा नदियों का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसे हालात


बारिश ज्यादा हुई, फिर भी फसल नहीं बची: आंध्र प्रदेश में 40,923 हेक्टेयर धान प्रभावित

भारी बारिश की वजह से फसलें बुरी तरह प्रभावित हुईं। आंध्र प्रदेश के कृषि विभाग की 26 सितंबर तक की प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक, भारी बारिश और बाढ़ से 43,802.83 हेक्टेयर कृषि भूमि डूब गई। इससे 12 जिलों के किसान प्रभावित हुए हैं। सबसे ज्यादा नुकसान धान की फसल को हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, 40,923 हेक्टेयर धान प्रभावित हुआ।

साल 2026 में देश में कहां कितनी बारिश हुई उसका रिकॉर्ड।


उत्तर प्रदेश में सितंबर के आखिरी दिनों की तेज बारिश और हवा ने तैयार खरीफ की फसल को नुकसान पहुंचाया। कटाई लायक फसल खेतों में ही गिर गई।
लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर और अमेठी में फसलों का बड़ा नुकसान हुआ है।


खरीफ की बुवाई लगभग पिछले साल जैसी, लेकिन धान का रकबा घटा

18 सितंबर तक देश में करीब 1,104 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई हुई, जो पिछले साल से 1.3% कम है। धान की बुवाई करीब 429 लाख हेक्टेयर में हुई, जो पिछले साल से 3.7% कम है।


सूखे की मार: महाराष्ट्र की 265 तहसीलें और कर्नाटक के 177 तालुक सूखाग्रस्त

जहां एक तरफ भारी बारिश फसलों को बर्बाद कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सूखे का भी खतरा पैदा हो रहा है। देश में सूखे का सबसे साफ संकट चार राज्यों में दिखाई दे रहा है: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश।


महाराष्ट्र: 265 तहसीलें सूखाग्रस्त- महाराष्ट्र की 358 में से 265 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। 1 जून से 26 सितंबर तक राज्य में 798.2 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से 18% कम है। मराठवाड़ा के बांधों में पानी का स्तर 46% है, जबकि पिछले साल इसी समय 81% था। बारिश की कमी से सोयाबीन, कपास, तूर, ज्वार और बाजरा की फसलें प्रभावित हुई हैं।


कर्नाटक: 177 तालुक सूखाग्रस्त- कर्नाटक में 177 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के मुताबिक, फसल नुकसान 40 लाख हेक्टेयर से ज्यादा हो सकता है। राज्य सरकार ने करीब 50 लाख किसानों के लिए 1,250 करोड़ रुपये का राहत पैकेज घोषित किया है। साथ ही, केंद्र से अंतरिम राहत के तौर पर पहले मांगी गई राशि का 50% जारी करने की मांग की है।


क्या सूखे की भी वजह एल नीनो है?

नहीं। सिर्फ एल नीनो नहीं है। दरअसल, एल नीनो कोई नई घटना नहीं है। यह 1951, 1965, 1972, 1982, 1987, 2002, 2004 और 2015 में प्रभावी रहा। इनमें कई वर्षों में भारत में मानसून सामान्य से कम रहा। आईएमडी ने अप्रैल 2026 में पूरे देश की मानसूनी बारिश सामान्य का 92 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया था। मई में इसे घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया। यानी एल नीनो वाले वर्षों में बारिश कम रहने का रिकॉर्ड रहा है। लेकिन इस बार बहुत ज्यादा कम नहीं हुई। 


सूखे की बड़ी वजह बारिश का समय पर न आना, लंबे अंतराल और मिट्टी तथा जलाशयों में पानी की कमी रही।

जो फसलें अभी बोई जानी हैं उन पर भी संकट के बादल

इस अनियमित बारिश की रबी की बुवाई पर भी दोहरी मार है। बाढ़ वाले इलाकों में खेतों में पानी भरा होने से बुवाई में देरी हो सकती है, जबकि सूखे वाले इलाकों में नमी की कमी से चना और ज्वार की बुवाई घटने और तूर की फसल को नुकसान का खतरा है। रबी की बुवाई का मतलब है सर्दियों में उगाई जाने वाली फसलें। गेहूं, चना, सरसों और जौ जैसी फसलों की बुवाई आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच होती है और कटाई अप्रैल-मई में की जाती है।


पिछले रबी सीजन में बढ़ा था बुवाई का रकबा, इस बार वही आंकड़ा दोहराना चुनौती

रबी सीजन 2025-26 में बुवाई के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। कृषि मंत्रालय के 26 दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक, कुल रबी कवरेज 614.30 लाख हेक्टेयर था। यह पिछले साल की समान अवधि से 6.87 लाख हेक्टेयर ज्यादा था।

इस बार सवाल यह है कि क्या सूखे और कम नमी वाले इलाकों में किसान वही रकबा दोहरा पाएंगे या नहीं।

केंद्र सरकार महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे सूखाग्रस्त राज्यों में फसल नुकसान का आकलन कर राहत देने की तैयारी कर रही है। साथ ही, रबी की बुवाई से पहले पानी की उपलब्धता के हिसाब से फसल चुनने, कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा देने और तालाबों और बांधों को दुरुस्त करने पर जोर दिया जा रहा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों के लिए राहत और मुआवजे की प्रक्रिया भी चल रही है।


अब अक्टूबर से रबी की बुवाई के साथ खेती की अगली परीक्षा शुरू होगी। सूखे वाले इलाकों में पानी, बीज और चारे का इंतजाम करना होगा, जबकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में खेतों से पानी निकालकर बुवाई की तैयारी करनी होगी। इस साल खेती की चुनौती सिर्फ कम बारिश नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण है। रबी की फसल का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि किसानों को समय पर पानी, मिट्टी में पर्याप्त नमी और बीज मिल पाते हैं या नहीं।