EXPLAINED: ईरान ने बिछाई 630 KM लंबी रेल पटरी, भारत के लिए क्यों ये बड़ी बात?

भारत से हजारों किलोमीटर दूर ईरान में एक रेल पटरी बिछी है... लेकिन इसका असर भारत तक नजर आ सकता है। चाबहार-जहेदान रेल लिंक आखिर भारत के व्यापार के लिए कितना अहम साबित हो सकता है, समझिए।

समंदर से दूर बसे मध्य एशिया के देशों के लिए हिंद महासागर तक पहुंच हमेशा चुनौती रही है। अब इस तस्वीर में एक नया रास्ता जुड़ने जा रहा है। ईरान ने चाबहार से जहेदान तक रेल लाइन (Chabahar-Zahedan Railway Line) पर पटरियां बिछाने का काम पूरा कर लिया है।

देखने में यह ईरान के भीतर करीब 630 किलोमीटर लंबी एक रेल परियोजना है, लेकिन इसके मायने इससे कहीं बड़े हैं। एक छोर पर है चाबहार बंदरगाह, जो हिंद महासागर से जुड़ा है और दूसरे छोर पर जहेदान, जहां से आगे अफगानिस्तान और मध्य एशिया की दिशा में कनेक्टिविटी की संभावनाएं बनती हैं।

और इस पूरी तस्वीर में भारत का एंगल भी बेहद अहम है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि ईरान में नई रेल लाइन तैयार हुई है, बल्कि यह है कि क्या इससे भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का एक और रास्ता मिल सकता है?

पहले मिडिल ईस्ट संकट को समझ लेते हैं।
फरवरी में अमेरिका और इजरायल का ईरान से युद्ध शुरू हुआ। शुरुआती हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए। इसके बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से तेल की शिपिंग रोक दी। यमन में हूती सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले कर रहे हैं। फिलहाल पूरा संकट होर्मुज स्ट्रेट, तेल सप्लाई और अमेरिका-ईरान बातचीत की संभावनाओं पर टिका है।

अब समझिए- चाबहार और जहेदान कहां हैं?

चाबहार ईरान के दक्षिण-पूर्व में सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत (Sistan and Baluchestan Province)में स्थित बंदरगाह शहर है। यह ओमान की खाड़ी के तट पर है और हिंद महासागर से सीधे जुड़ा है। वहीं जहेदान इसी प्रांत की राजधानी है, जो ईरान के अंदर की तरफ और अफगानिस्तान-पाकिस्तान की दिशा में स्थित है।

यानी नक्शे पर देखें तो चाबहार समुद्र से जुड़ा दक्षिणी गेट-वे है, जबकि जहेदान ईरान के अंदर से अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया की ओर बढ़ने वाली कड़ी। दोनों के बीच करीब 630 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाई गई है।

अब समझिए-क्या तैयार हुआ है?

ईरान ने चाबहार-जहेदान रेलवे पर रेल ट्रैक बिछाने का काम पूरा कर लिया है। मुख्य लाइन करीब 630 किलोमीटर लंबी है, जबकि शाखा लाइनों को मिलाकर इसकी लंबाई करीब 735 किलोमीटर होगी।

पूरी तरह चालू होने के बाद इस रेल लाइन की सालाना क्षमता करीब 77 लाख टन माल और 22 लाख यात्रियों की बताई गई है।परियोजना में 39 सुरंगें, करीब 17 किलोमीटर की कुल सुरंग लंबाई और 33 स्टेशन शामिल हैं। इसके अलावा सैकड़ों क्रॉसिंग और पुल और करीब 2000 ड्रेनेज सिस्टम भी बनाए गए हैं।

ईरान की सड़क और शहरी विकास मंत्री फरजानेह सादेघ (Farzaneh Sadegh) ने हाल में सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत के दौरे के दौरान इस रेल लाइन पर पटरियां बिछाने का काम पूरा होने की पुष्टि की। फरजानेह ने साथ ही इस प्रोजेक्ट को आसपास के देशों के लिए भी फायदेमंद बताया। 

चाबहार से जहेदान तक कनेक्टिविटी का मतलब क्या है?

इसे आसान भाषा में समझें तो चाबहार समुद्र का दरवाजा है और  जहेदान जमीन के भीतर आगे बढ़ने का रास्ता।

चाबहार बंदरगाह से आने वाला माल रेल नेटवर्क के जरिए ईरान के अंदर जाएगा। वहां से उसे आगे अफगानिस्तान और मध्य एशिया की दिशा में भेजा जा सकता है।

मध्य एशिया के कई देश लैंडलॉक्ड (landlocked) हैं। जैसे-कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान… यानी ये जमीनी इलाके हैं और उनके पास समुद्र तक सीधी पहुंच नहीं है। ऐसे में हिंद महासागर के रास्ते वैश्विक बाजारों तक पहुंच के लिए चाबहार जैसे कनेक्टिविटी कॉरिडोर उनके लिए अहम हो सकते हैं। 

INSTC क्या है?

यहीं पर आता है INSTC यानी इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (International North-South Transport Corridor)

करीब 25 साल पहले भारत, रूस और ईरान ने इस कॉरिडोर की शुरुआत की थी। लेकिन INSTC कोई एक सीधी रेलवे लाइन नहीं है। यह रेल, सड़क और समुद्री रास्तों से बना एक मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क है।

यानी रूस से निकला माल एक ही ट्रेन में लदकर सीधे भारत नहीं पहुंचता। रास्ते में परिवहन का माध्यम बदल सकता है- कहीं रेल, कहीं सड़क और फिर किसी पोर्ट के जरिए समुद्री रास्ता।

इसलिए चाबहार-जहेदान रेलवे और INSTC एक ही चीज नहीं हैं। चाबहार-जहेदान एक खास रेल कनेक्शन है, लेकिन चाबहार को ईरान के रेल नेटवर्क से जोड़ने वाली ऐसी परियोजनाएं बड़े क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नेटवर्क को मजबूत कर सकती हैं।

भारत के लिए क्या फायदा?

भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक ईरानी बंदरगाह नहीं है। भारत ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास और संचालन में भागीदारी की है। अगर चाबहार से आगे ईरान का रेल नेटवर्क इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के तहत भारत की व्यापक कनेक्टिविटी योजनाओं को मजबूत कर सकता है। 

मतलब अगर चाबहार से आगे ईरान का रेल नेटवर्क मजबूत होता है, तो भारत के लिए समुद्र से आगे जमीन के रास्ते माल पहुंचाने के विकल्प भी बढ़ेंगे।

इस रेलवे नेटवर्क से भारत को कौन-कौन से फायदे? 

पहला फायदा-अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच।

भारतीय सामान समुद्र के रास्ते चाबहार पहुंचकर वहां से रेल और सड़क नेटवर्क के जरिए अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया के बाजारों तक जा सकता है।

दूसरा फायदा-पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भरता से बचने का विकल्प।

भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे भूमि मार्ग से व्यापारिक आवाजाही सीमित है। ऐसे में चाबहार ऐसा वैकल्पिक रास्ता देता है, जिसमें भारतीय माल को पाकिस्तान से होकर गुजरने की जरूरत नहीं पड़ती।

तीसरा फायदा-मध्य एशिया के साथ व्यापार को बढ़ाने का विकल्प।

भारत की मध्य एशिया तक सीधी भौगोलिक पहुंच मुश्किल है। चाबहार और INSTC जैसे नेटवर्क समुद्र के रास्ते ईरान पहुंचने और वहां से आगे रेल-सड़क कनेक्टिविटी का विकल्प देते हैं।

अफगानिस्तान के लिए क्यों अहम?

अफगानिस्तान के पास समुद्र तक अपनी सीधी पहुंच नहीं है। चाबहार उसके लिए हिंद महासागर और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक एक वैकल्पिक रास्ता बन सकता है।

अफगान मीडिया के मुताबिक आगे चलकर अगर चाबहार- जहेदान रेल और अफगानिस्तान की खाफ-हेरात रेलवे जैसी परियोजनाएं प्रभावी रूप से जुड़ती हैं, तो अफगानिस्तान से आने-जाने वाले माल को चाबहार के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक ले जाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि इसके लिए सिर्फ रेल लाइन का तैयार होना पर्याप्त नहीं होगा। ट्रांजिट समझौते, सीमा शुल्क, माल ढुलाई की लागत, अफगानिस्तान की रेल कनेक्टिविटी और चाबहार पोर्ट की क्षमता भी अहम होगी।

असली परीक्षा अब शुरू होगी

चाबहार–जहेदान लाइन पर पटरियां बिछ गई हैं, लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई। असली बदलाव तब दिखेगा, जब इस पर नियमित मालगाड़ियां चलेंगी और चाबहार से माल ईरान के रेल नेटवर्क के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया की ओर बढ़ेगा।

यानी फिलहाल इसे सिर्फ एक नई रेल लाइन नहीं, बल्कि हिंद महासागर से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक खुलने वाली संभावित नई व्यापारिक कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। और भारत के लिए इसका मतलब है- समंदर से आगे, जमीन के रास्ते यूरेशिया तक पहुंच का एक और विकल्प।