फर्क दिखता है! अमेरिका कॉकपिट में जाने नहीं देता, रूस ने भारतीय पायलट को एडवांस्ड जेट में बिठा दिया

एक तरफ अमेरिका का F-35, तो दूसरी तरफ रूस का Su-30SM। भारत के दो बड़े रक्षा साझेदारों से जुड़े ये किस्से बताते हैं कि सैन्य रिश्तों में भरोसे और सहयोग की तस्वीर हमेशा एक जैसी नहीं होती।

कोई कार खरीदने जाएं, तो शोरूम में बैठकर उसका स्टीयरिंग घुमाने से शायद ही कोई रोके। लेकिन बात जब दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में से एक की हो, तो मामला इतना आसान नहीं रहता।

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने कुछ दिन पहले अमेरिका के एक फाइटर जेट को लेकर मजाकिया अंदाज में एक तंज किया। बात हंसी-मजाक में कही गई थी, लेकिन हल्के अंदाज में कही गई इस बात का सार ये था कि- जब विमान बेचने की चर्चा हो रही हो, तो उसे करीब से देखने की छूट कितनी है?

अब आपको दूसरी तस्वीर दिखाते हैं। जहां रूस में भारतीय और रूसी पायलट आसमान में साथ उड़ान भर रहे हैं। यहां बात सिर्फ विमान को करीब से देखने की नहीं, बल्कि रूस ने अपना एडवांस्ड लड़ाकू जेट भारतीय पायलटों के साथ उड़ान के लिए उतार दिया।

दो देश, दो विमान, दो अलग-अलग किस्से… लेकिन सवाल एक- रक्षा के मैदान में भरोसा आखिर कितना मायने रखता है?

भारत के इन दोनों रक्षा साझेदारों के साथ रिश्तों की कहानी को समझने के लिए पहले लौटते हैं जोधपुर, जहां वायुसेना प्रमुख ए.पी. सिंह की एक टिप्पणी ने सबका ध्यान खींच लिया था।

F-35 के कॉकपिट पर पहरा, ए.पी. सिंह ने ली चुटकी

जोधपुर में 26 सितंबर से 12 अक्टूबर तक तरंग शक्ति अभ्यास आयोजित किया गया था। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे सात देशों ने हिस्सा लिया। 11 अक्टूबर को अभ्यास के समापन के मौके पर वायुसेना प्रमुख ए.पी. सिंह अमेरिकी पैसिफिक एयर फोर्सेज के कमांडर जनरल केविन शाइंडर (Kevin Schneider) के साथ मंच साझा कर रहे थे। इसी दौरान उनसे अमेरिका के पांचवीं पीढ़ी के F-35 लड़ाकू विमान को लेकर सवाल पूछा गया।

ए.पी. सिंह ने अमेरिकी कमांडर की मौजूदगी में चुटीले अंदाज में कहा, “आपके लोग हमें विमान के पास भी नहीं जाने देते और आप इसे हमें बेचने की बात करते हैं।”

उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय पक्ष को F-35 का कॉकपिट नहीं दिखाया गया, हालांकि भारतीय लड़ाकू विमानों को उसके साथ करीबी फॉर्मेशन में उड़ान भरने की अनुमति मिली थी। इस अभ्यास में छह अमेरिकी F-35 विमानों ने पहली बार भारत में हिस्सा लिया था। 

लेकिन इस टिप्पणी को भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में किसी बड़े टकराव का संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। ए.पी. सिंह ने बाद में साफ किया कि उनकी बात मजाकिया अंदाज में कही गई थी और इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।

उन्होंने यह भी माना कि हर देश अपनी संवेदनशील सैन्य तकनीक की सुरक्षा करता है और भारत भी कुछ चीजें दूसरे देशों के साथ साझा नहीं करता। 

यानी बात केवल अमेरिकी फाइटर के दरवाजे बंद रखने की नहीं, बल्कि सैन्य तकनीक पर नियंत्रण बनाए रखने की भी है। फिर भी, इस घटना ने एक दिलचस्प सवाल जरूर खड़ा कर दिया।

रूस में Su-30SM के साथ भारतीय पायलटों की उड़ान

इस सवाल का दूसरा पहलू INDRA-2026 सैन्य अभ्यास में दिखाई देता है। रूस के चेल्याबिंस्क क्षेत्र में रूसी एयरोस्पेस फोर्सेज और भारतीय वायुसेना के क्रू ने Su-30SM लड़ाकू विमानों पर संयुक्त उड़ानें भरीं।

रूसी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इन उड़ानों के दौरान छोटे आकार के कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों से निपटने और कम व मध्यम दूरी के हवाई हथियारों को ले जाने वाले विमानों को निशाना बनाने का अभ्यास किया गया। पायलटों ने मध्यम और कम ऊंचाई पर हवाई युद्धाभ्यास के अलग-अलग तरीके भी आजमाए।

यहां एक बात समझना जरूरी है। संयुक्त उड़ान का मतलब यह नहीं कि रूस ने अपने विमान भारतीय वायुसेना को सौंप दिए या भारत को उसकी पूरी संवेदनशील तकनीक तक खुली पहुंच दे दी। लेकिन ऐसे अभ्यास में दोनों देशों के क्रू को एक-दूसरे के साथ काम करने, उड़ान के दौरान तालमेल बैठाने और सैन्य प्रक्रियाओं को समझने का अवसर जरूर मिलता है।

यही सहयोग की व्यावहारिक परत है। भरोसा केवल किसी हथियार या सैन्य उपकरण को देखने या उसे इस्तेमाल करने से ही नहीं बनता। वह तब भी विकसित होता है, जब अलग-अलग देशों के सैन्यकर्मी एक साझा मिशन के लिए साथ प्रशिक्षण लेते हैं और एक-दूसरे की वर्किंग स्टाइल से परिचित होते हैं।

Su-30SM और भारत का सुखोई कनेक्शन

Su-30SM भारत के लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि भारतीय वायुसेना भी Su-30MKI लड़ाकू विमान इस्तेमाल करती है। दोनों विमान एक ही सुखोई-30 परिवार के हैं, लेकिन उनकी तकनीक और उपकरणों में कुछ फर्क है। Su-30SM को रूस की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है, जिसमें उसका रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं।

भारत में Su-30MKI का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की भागीदारी से हुआ है। इस पीढ़ी के विमान ने वर्षों से भारतीय वायुसेना की काम करने की क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब भारत अपने Su-30MKI बेड़े को और आधुनिक बनाने की योजना पर भी काम कर रहा है, जिसे ‘सुपर सुखोई’ कार्यक्रम के नाम से जाना जाता है।

इसलिए भारतीय और रूसी पायलटों का Su-30 फैमिली के विमानों पर साथ अभ्यास करना महज एक तस्वीर नहीं है। इसके पीछे विमानों के संचालन, प्रशिक्षण और सैन्य तालमेल से जुड़ा लंबा अनुभव भी है।

हालांकि, Su-30SM और Su-30MKI, दोनों के उपकरणों और प्रणालियों में अंतर हैं। 

सिर्फ फाइटर जेट नहीं, Mi-8 हेलिकॉप्टरों के साथ भी अभ्यास

INDRA-2026 में सहयोग लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रहा। भारतीय और रूसी सैन्यकर्मियों ने Mi-8 सैन्य हेलिकॉप्टरों के साथ भी अभ्यास किया।

रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन अभ्यासों में विशेष अभियान बलों की तैनाती और दुर्गम इलाकों में संकट में फंसे विमानकर्मियों की तलाश और रेस्क्यू अभियान शामिल थे। ऐसे मिशनों में हेलिकॉप्टर क्रू, जमीनी सैनिकों और अभियान से जुड़े दूसरे कर्मियों के बीच तालमेल बेहद जरूरी होता है। 

INDRA-2026 का दायरा वायुसेना से आगे नौसेना और थलसेना तक फैला था। समुद्री चरण में भारतीय नौसेना के INS सह्याद्रि और रूसी नौसेना के कोरवेट Aldar Tsydenzhapov ने हिस्सा लिया, जबकि थलसेना के अभ्यास में संयुक्त अभियान और कमान-नियंत्रण पर जोर दिया गया।

तकनीक की सुरक्षा या दोस्ती का भरोसा? 

अमेरिका और रूस की इन घटनाओं से यह कहना सही नहीं होगा कि एक भारत पर भरोसा करता है और दूसरा नहीं। दोनों देशों की सैन्य तकनीक साझा करने की नीतियां और सहयोग के तरीके अलग हैं।

अमेरिका ने F-35 के कॉकपिट तक पहुंच सीमित रखी, जबकि रूस में INDRA अभ्यास के दौरान भारतीय और रूसी क्रू ने Su-30SM विमानों पर साथ उड़ान भरी।

हर देश अपनी संवेदनशील सैन्य तकनीक की सुरक्षा करता है। लेकिन रक्षा साझेदारी में कभी-कभी तकनीक से आगे दोस्ती की गहराई और आपसी भरोसा भी अहम हो जाता है।