पार्ट टाइम में स्टूडेंट्स कर सकेंगे रूस में जॉब, एक्सपर्ट से जानिए नए कानून से क्या बदलेगा

रूस में कामगारों की कमी के बीच भारत से रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। नए समझौते से भर्ती और कामगारों के अधिकारों के लिए व्यवस्थित ढांचा तैयार होगा।

रूस में भारतीयों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। अब भारत और रूस ने इस आवाजाही को व्यवस्थित करने की दिशा में अहम कदम उठाया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दोनों देशों के नागरिकों को एक-दूसरे के देश में अस्थायी रोजगार देने से जुड़े समझौते के अनुमोदन संबंधी कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ रूस की घरेलू अनुमोदन प्रक्रिया पूरी हो गई है।

दिसंबर 2025 में पुतिन के भारत दौरे के दौरान हुआ यह समझौता सिर्फ रोजगार के नए अवसरों तक सीमित नहीं है। इसका मकसद भर्ती, रोजगार की शर्तों और कामगारों के अधिकारों के लिए एक औपचारिक ढांचा तैयार करना है। हालांकि, रूस की प्रक्रिया पूरी होने का मतलब यह नहीं कि समझौता स्वतः प्रभावी हो गया है। पुतिन ने 12 अक्टूबर को संबंधित कानून पर हस्ताक्षर किए। इससे पहले रूस की स्टेट ड्यूमा ने 1 अक्टूबर और फेडरेशन काउंसिल ने 2 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी थी।

रूस को भारतीय कामगारों की जरूरत क्यों?

रूस में कामगारों की कमी इस समझौते की अहम वजहों में से एक है। रॉयटर्स की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय नागरिकों के लिए जारी रूसी वर्क परमिट की संख्या 2021 में करीब 5,000 थी, जो 2025 में बढ़कर लगभग 72,000 हो गई। रिपोर्ट में रूस में कम से कम 23 लाख कामगारों की कमी का भी जिक्र था। यानी भारत से रूस जाने वाले कामगारों की संख्या समझौते से पहले ही बढ़ रही थी। नया ढांचा इसी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की कोशिश है।

रूसी एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी एंड इंटरनेशनल रिलेशंस में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के रिसर्च फेलो ग्लेब मकारेविच के मुताबिक, यह समझौता दोनों देशों के बीच कामगारों की आवाजाही को संस्थागत रूप देता है। इससे रूस जाने वाले भारतीय कामगारों की संख्या में और बढ़ोतरी हो सकती है।

ग्लेब मकारेविच
यह समझौता रूस के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसे कुशल और अकुशल, दोनों तरह के कामगारों की जरूरत है। भारत के लिए यह श्रम निर्यात बढ़ाने, विदेश से आने वाली कमाई में इजाफा करने और देश की व्यापक शासन व्यवस्था पर सामाजिक दबाव को कुछ हद तक कम करने का अवसर पैदा करता है।
ग्लेब मकारेविच
ग्लेब मकारेविच
रूसी एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के रिसर्चर

भारतीय कामगारों के लिए क्या बदलेगा?

समझौते का मतलब यह नहीं है कि कोई भी भारतीय बिना जरूरी दस्तावेजों के रूस जाकर नौकरी शुरू कर सकता है। आम कामगारों के लिए वर्क परमिट की जरूरत बनी रहेगी और उन्हें निर्धारित काम के लिए ही रोजगार करना होगा। समझौते में वेतन और कामकाजी परिस्थितियों से जुड़े प्रावधान भी हैं। कामगारों को संबंधित रोजगार में स्थानीय कर्मचारियों पर लागू मानकों से कमतर शर्तें नहीं दी जानी चाहिए। नौकरी खत्म होने की कुछ परिस्थितियों में मुआवजे और परमिट की वैधता के दौरान दूसरे नियोक्ता के साथ काम करने के अवसर का भी प्रावधान है।

रूस में फुलटाइम पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्र भी खाली समय में नौकरी कर सकेंगे। इसमें तय व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्र शामिल हैं। इसके लिए उन्हें अलग से वर्क परमिट लेने की जरूरत नहीं होगी, बशर्ते वे समझौते की शर्तें पूरी करते हों। हालांकि, यह सुविधा हर छात्र या हर तरह के रोजगार पर लागू नहीं होती। समझौते का दायरा उन क्षेत्रों, संगठनों और प्रतिष्ठानों तक भी नहीं है, जहां विदेशी नागरिकों के प्रवेश के लिए विशेष अनुमति जरूरी होती है।

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रूसी विशेषज्ञ ने बताई असली चुनौती

रूसी एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ ओरिएंटल स्टडीज में सेंटर फॉर इंडियन स्टडीज की सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. लिडिया कुलिक के मुताबिक, दिसंबर 2025 में पुतिन के भारत दौरे के दौरान श्रम आवाजाही से जुड़े दो समझौते हुए थे। इनमें एक अस्थायी रोजगार और दूसरा अनियमित प्रवासन (Irregular Migration) से निपटने में सहयोग से संबंधित है।

हालांकि, कुलिक के मुताबिक, दोनों देशों को रोजगार की प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने के लिए अभी काफी काम करना होगा। इसके लिए भर्ती से जुड़ी डिजिटल व्यवस्था मजबूत करनी होगी और कर्मचारियों के साथ-साथ कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारियां समझनी होंगी।

वह कहती हैं कि रूस जाने वाले कामगारों के स्किल की जांच, उन्हें बुनियादी रूसी भाषा सिखाना और काम की जगह पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही, उन्हें नौकरी और कामकाज की शर्तों के बारे में पहले से स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। यानी सिर्फ नौकरी के मौके पैदा करना काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि कामगारों को अपने काम, वेतन, कामकाजी माहौल और अधिकारों की पूरी जानकारी हो, ताकि विदेश में नौकरी के दौरान उन्हें परेशानी न हो।

भर्ती और अधिकारों की सुरक्षा क्यों अहम?

विदेश में नौकरी मिलने के साथ कई सवाल जुड़े होते हैं। नौकरी का ऑफर कितना भरोसेमंद है, वेतन और काम के घंटे क्या होंगे, रहने की व्यवस्था कौन करेगा और नौकरी छूटने होने पर कर्मचारी के पास क्या ऑप्शन होंगे?

औपचारिक समझौता इन प्रक्रियाओं और उनकी निगरानी के लिए आधार तैयार करता है, लेकिन इससे भर्ती में धोखाधड़ी या रोजगार से जुड़ी हर समस्या अपने आप खत्म नहीं होगी। इसके लिए पारदर्शी भर्ती, डॉक्यूमेंट्स का वेरिफिकेशन, स्किल ट्रेनिंग और कामगारों को उनके अधिकारों की जानकारी देना जरूरी होगा। पेंशन, सामाजिक बीमा और मेडिकल इंश्योरेंस के मामलों में मेजबान देश के कानून और दोनों देशों के बीच लागू संबंधित समझौतों के प्रावधान अहम होंगे। नए रोजगार समझौते को इन सभी विषयों पर अलग सामाजिक सुरक्षा समझौता नहीं समझना चाहिए।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के लिए रूस में रोजगार के अवसर बढ़ने से कामगारों और उनके परिवारों को विदेश से कमाई भेजने के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, भारतीय कामगारों के स्किल और एक्सपीरिएंस को अंतरराष्ट्रीय रोजगार बाजार तक पहुंचाने का रास्ता भी खुल सकता है।लेकिन भारतीय कामगारों को इसका कितना फायदा मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उन्हें किस तरह की नौकरियां मिलती हैं, सैलकी कितनी मिलती है और रहने का खर्च कितना है। भर्ती की प्रक्रिया कितनी साफ और पारदर्शी है, यह भी अहम होगा।

रूस ने अपनी ओर से समझौते की मंजूरी की प्रक्रिया पूरी कर ली है। अब यह दोनों देशों के बीच तय औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू होगा।

कुल मिलाकर, इस समझौते से रूस को कामगारों की कमी दूर करने में मदद मिल सकती है, जबकि भारतीयों के लिए रोजगार के नए अवसर खुल सकते हैं। लेकिन असली कामयाबी इस बात से तय होगी कि भारतीयों को अच्छी नौकरियां मिलें, उनके अधिकार सुरक्षित रहें और भर्ती की प्रक्रिया पारदर्शी हो।