दुनिया के कई देशों में डीजल की कमी हो रही है और यही कमी भारत के लिए यह एक बड़ा कारोबारी मौका बन सकता है। भारत की सरकारी तेल कंपनियां अगले साल डीजल बनाने की अपनी क्षमता में सालाना 1.65 करोड़ टन का इजाफा करने जा रही हैं। खास बात यह है कि इसकी प्लानिंग पहले से थी। रिफाइनरियों को भारत में बढ़ती ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया जा रहा था, और अब दुनिया में डीजल की कमी के बीच भारत को इसका फायदा मिल सकता है।
गोवा में हाल में एक इंडस्ट्री कॉन्फ्रेंस के दौरान सरकारी तेल कंपनियों के अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
XAnalysts के संस्थापक और तेल मामलों के जानकार मुकेश सहदेव ने RT से कहा कि रिफाइनरी के विस्तार की योजना कई तरह के फायदे को ध्यान में रखकर बनाई गई है, लेकिन अभी सबसे बड़ा मौका डीजल के कारोबार में दिख रहा है।
दुनिया में डीजल की इतनी कमी क्यों हो रही?
इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष है, जिसने मिडिल ईस्ट से होने वाली ईंधन की सप्लाई को प्रभावित किया है। इधर, रूस की तेल रिफाइनरियों ने भी ईंधन निर्यात पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं जिससे ग्लोबल मार्केट में किल्लत हो गई है।
डीजल का इस्तेमाल गाड़ियों और ट्रकों से लेकर फैक्ट्रियों और खेती में होता है। ऐसे में इसकी कमी का असर कई जरूरी चीजों की कीमतों पर पड़ रहा है और आम लोगों के लिए महंगाई का बोझ बढ़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और एनर्जी इंस्टिट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इस साल जुलाई से सितंबर के बीच दुनिया में डीजल और गैस ऑयल की सप्लाई रोजाना 17 लाख बैरल घट गई। यह जापान में एक दिन में होने वाली डीजल की खपत से करीब ढाई गुना ज्यादा है। यानी दुनिया को हर दिन जितना डीजल कम मिल रहा है, वह अपने आप में बहुत बड़ी मात्रा है।
सितंबर में डीजल की थोक कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। यूरोप और अमेरिका में यह करीब 220 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो युद्ध से पहले की कीमत से लगभग दोगुनी है।
डीजल की कमी इतनी बढ़ गई कि 15 अक्टूबर को IEA के सदस्य देशों ने अपने इमरजेंसी तेल भंडार से ईंधन निकालने की रफ्तार बढ़ाने पर सहमति जताई। इसमें 2 करोड़ बैरल से ज्यादा डीजल भी शामिल है।
भारत की रिफाइनरियों को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत में डीजल बनाने की क्षमता तेजी से बढ़ाई जा रही है। देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) अपनी क्षमता बढ़ाकर हर साल करीब 80 लाख टन ज्यादा डीजल बनाने की तैयारी में है।
वहीं, हिंदुस्तान पेट्रोलियम की राजस्थान रिफाइनरी से अगले साल करीब 30 लाख टन डीजल मिलने की उम्मीद है। असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी के विस्तार से भी हर साल 30 लाख टन डीजल का उत्पादन बढ़ेगा।
इसके अलावा, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन भी सालाना 15 लाख टन उत्पादन बढ़ाने की योजना बना रही है। इन सभी योजनाओं के पूरा होने पर भारत की कुल तेल रिफाइनिंग क्षमता 2030 तक सालाना 26.7 करोड़ टन से बढ़कर 30 करोड़ टन हो जाएगी।
इस्तेमाल से ज्यादा डीजल बना रहा भारत
भारत पहले से ही अपनी जरूरत से ज्यादा डीजल बना रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अप्रैल से सितंबर के बीच देश में करीब 5.9 करोड़ टन डीजल बनाया गया, जबकि इसी दौरान घरेलू खपत करीब 4.6 करोड़ टन रही।
ऐसे में अब जब दुनिया के कई हिस्सों में डीजल की कमी है, भारत के पास दूसरे देशों को ज्यादा डीजल बेचने का मौका है।
ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने RT से कहा कि ये रिफाइनरी प्रोजेक्ट मूल रूप से भारत की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, लेकिन अब दुनिया में डीजल की कमी के चलते इनसे कमाई का मौका भी बन रहा है।
रूसी कच्चे तेल से भारत को मिल सकता है फायदा
सिर्फ रिफाइनरी की क्षमता बढ़ाने से ज्यादा डीजल नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए सही किस्म का कच्चा तेल भी जरूरी है। हर रिफाइनरी में हर तरह के कच्चे तेल को इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और मशीनों की अपनी सीमाएं भी होती हैं।
उन्होंने बताया कि रूस के अलावा इराक और वेनेजुएला से मिलने वाला भारी कच्चा तेल डीजल बनाने के लिए सही है।
S&P ग्लोबल ने जुलाई में बताया था कि राजस्थान की नई रिफाइनरी रूस के यूराल्स और इराक के बसरा ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकती है। सहदेव का कहना है कि मलेशिया और मिडिल ईस्ट से कच्चे तेल की सप्लाई घटने के बाद भारत रूस से ज्यादा मात्रा में तेल खरीद रहा है।
क्या दुनिया में डीजल की कमी पूरी कर पाएगा भारत?
डेटा और एनालिसिस करने वाली कंपनी Kpler के मुताबिक, अमेरिका के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री रास्ते से डीजल निर्यात करने वाला देश है। सितंबर में भारत ने रोजाना करीब 5.96 लाख बैरल डीजल निर्यात किया, जबकि इस साल अब तक रोजाना औसतन 4.82 लाख बैरल डीजल का निर्यात हुआ था।
भारत का बढ़ता उत्पादन दुनिया में डीजल की सप्लाई बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन रूस और मिडिल ईस्ट से सप्लाई में आई कमी को पूरी तरह पूरा करना आसान नहीं होगा।
इसके अलावा, भारत में डीजल की अपनी मांग भी लगातार बढ़ रही है। रिफाइनरियों में कितना उत्पादन होगा और दूसरे देशों तक डीजल पहुंचाने में कितना खर्च आएगा, इन बातों से भी तय होगा कि भारत कितना डीजल निर्यात कर पाएगा।
IEA का अनुमान है कि 2027 में दुनिया भर की रिफाइनरियों में उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन डीजल का भंडार कम होने के कारण अगले साल भी इसकी किल्लत बनी रह सकती है।
सहदेव ने आगाह किया कि सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही काफी नहीं है। भारत को अपने बढ़ते रिफाइनिंग कारोबार का पूरा फायदा उठाने के लिए कमोडिटी ट्रेडिंग नेटवर्क और वित्तीय व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
उन्होंने कहा, 'अगर भारत ऐसा नहीं करता है, तो कोई दूसरा देश भारत की रिफाइनिंग क्षमता से मुनाफा कमाएगा।'
(यह आर्टिकल RT के सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट जोया हुसैन ने अंग्रेजी में लिखा, RT हिंदी की टीम ने अनुवाद किया है।)