भारत इस बार BRICS समिट 2026 की मेजबानी कर रहा है। यह समिट ऐसे समय हो रहा है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे बड़े ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स में काफी अव्यवस्था या बिखराव दिख रहा है। ब्रिक्स में प्रमुख शक्तियां एक साथ नजर आ रही हैं। ब्रिक्स फोरम भारत के लिए एक बहुत अहम प्लेटफॉर्म है। ब्रिक्स में भारत की भूमिका को लेकर रिटायर्ड कमोडोर सी. उदय भास्कर ने हाल ही में RT के शो ‘न्यू ऑर्डर’ में अपनी राय रखी थी।
BRICS के दायरे में मजबूत हुए भारत-UAE रिश्ते
डिफेंस एक्सपर्ट उदय भास्कर ने बताया कि BRICS के दायरे में ही भारत-UAE के रिश्ते और मजबूत हुए हैं। यह सब प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में हुआ है। जहां तक दोनों देशों के बीच मिलिट्री रिलेशन की बात है, तो यह बात भी अहम है कि अब UAE में भारतीय अफसर उनके लिए ट्रेनिंग दे रहे हैं। इसमें मिलिट्री और एयर फोर्स के ऑफिसर्स भी शामिल है। पहले यह पाकिस्तान के मामले में होता था।
उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि पश्चिम एशिया में भी धीरे-धीरे बदलाव हो रहे हैं। जहां तक ब्रह्मोस की बात है, आप जानते हैं कि भारत ने साउथ-ईस्ट एशिया में भी इसे एक्सपोर्ट किया है या इसकी डील की है। फिलीपींस ने ब्रह्मोस को चुना है। तो इस लिहाज से यह एक सक्सेस स्टोरी है। ब्रह्मोस भारत और रूस का जॉइंट वेंचर है। UAE जैसे देश इसे एक ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं। मुझे लगता है कि यह एक मिलिट्री पार्टनर के तौर पर भारत की विश्वसनीयता को दिखाता है। ये उन देशों के लिए एक विश्वनीय विकल्प है जो देश ऐसी क्षमता चाहते हैं।
BRICS में बैलेंस बनाता भारत
सी. उदय भास्कर ने कहा कि ब्रिक्स की नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर्स (NSAs) की मीटिंग में इस बात पर आम सहमति बनी कि वे इस फोरम का इस्तेमाल अमेरिका या जून के महीनों में वेस्ट एशिया में हुई घटनाओं की आलोचना करने के लिए नहीं करेंगे। इस कदम से संकेत मिलता है कि भारत ने इसी तरह का बैलेंस बनाने की कोशिश की है। सभी सदस्य देशों की इस मीटिंग के बाद कोई संयुक्त बयान जारी न होना यह दिखाता है कि ग्लोबल सिक्योरिटी के बड़े मुद्दों पर सबकी राय और नजरिए बहुत अलग-अलग हैं।
उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर किसी भी तरह के सार्वजनिक मतभेद से बचने के लिए, उन्होंने ग्लोबल सिक्योरिटी के उन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया जहां आतंकवाद और उससे जुड़े मुद्दे मुख्य चिंता का विषय हैं। जहां तक भारत, रूस, चीन और ब्राजील जैसी बड़ी ताकतों की बात है, उन सभी को आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों के मामले में अलग-अलग अनुभव रहे हैं। दूसरा फोकस नई तकनीकों AI और आंतरिक सुरक्षा व स्थिरता पर उनके असर पर था। इसकी वजह है कि यह इन सभी देशों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है।
'ट्रंप के दौर में भारत को आर्थिक झटके'
उदय भास्कर ने कहा, ‘मेरा मानना है कि काफी निजी बातचीत हुई होगी, खासकर तब जब प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली में इन अधिकारियों से मिले थे। मुझे यकीन है कि वे उन बातों को वापस ले जाएंगे जिन पर समिट लेवल पर चर्चा करने की जरूरत है। भारत को इस बात का एहसास है कि जब से डोनाल्ड ट्रंप वाइट हाउस में आए हैं, अमेरिका के कई कदमों का भारत के हितों पर बुरा असर पड़ा है, खासकर आर्थिक क्षेत्र में।’
उन्होंने कहा कि हाई टैरिफ और कड़े नियमों की वजह से भारत की एक बड़ी आबादी की मानवीय सुरक्षा पर असर पड़ा है। ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे भारत निपट रहा है। मुझे लगता है कि भारत ने यह भी समझा है कि अमेरिका के साथ कई मुश्किल मुद्दों पर निजी तौर पर बातचीत करना बेहतर है।
ट्रंप की बेफिक्री, भारत की समझदारी
हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि भारत की तरफ से यह तय किया गया है कि मुश्किल मुद्दों को सार्वजनिक चर्चा से दूर रखा जाए। जब अमेरिकी मिसाइल हमले में भारतीय नाविक मारे गए थे, तो भारत में गुस्सा और दुख था। हालांकि, भारत ने इसे विदेश मंत्री के स्तर पर बहुत समझदारी से संभाला। भारतीय विदेश मंत्री डॉ.जयशंकर ने अपने अमेरिकी समकक्ष मार्को रुबियो के समक्ष इस मामले को उठाया था। इस पर बात हुई। बाद में, जब प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति ट्रंप से मिले, तो यह मुद्दा उठाया गया।
हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे अधिक अहमियत नहीं दी और कहा कि ऐसा तो होता ही रहता है। ट्रंप ने कोई संवेदना नहीं जताई। मेरा कहना है कि अमेरिका का रवैया और प्रतिक्रियाएं ऐसी ही रही हैं। लेकिन मैं यही कह रहा हूं कि भारत ने इसे अपने तक ही सीमित रखने और इन मामलों को निजी कूटनीति के जरिए सुलझाने का फैसला किया है, न कि कोई सार्वजनिक बयान देने का।
उन्होंने कहा कि आपको याद होगा कि पिछली बार, जब ऑपरेशन सिंदूर समाप्त हुआ और राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने युद्ध खत्म कर दिया है और शायद वे नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार हैं। ऐसे में भारत ने इसका समर्थन नहीं किया था। इससे दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि भारत ने इस बात को समझा है। इसीलिए, आप देखेंगे कि प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत गरिमापूर्ण चुप्पी बनाए रखी, तब भी जब राष्ट्रपति ट्रंप ने उस घटना पर वैसी प्रतिक्रिया दी जिसमें अमेरिकी मिसाइल हमले में लोग मारे गए थे।’
‘भारत ने चाबहार छोड़ा नहीं है’
उदय भास्कर ने कहा, ‘मुझे लगता है कि युद्ध शुरू होने से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने 26 फरवरी को इजराइल का दौरा किया था, जो संघर्ष शुरू होने से दो दिन पहले की बात है। उस समय भारत का झुकाव अधिकतर अमेरिका और इजराइल की तरफ था। उन्होंने कहा कि लेकिन मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी का इजराइल दौरा एक राजनीतिक फैसला था। मुझे नहीं लगता कि किसी को अंदाजा था कि कुछ ही दिनों में युद्ध शुरू हो जाएगा। इसका भारत पर बहुत अधिक असर पड़ा। जैसा कि मैंने कहा, उस समय जो माहौल बना और उसके बाद अमेरिका ने जो भी कदम उठाए-जैसे अरब सागर में जहाज को रोकना जब वह एक ट्रिप से लौट रहा था-इन सबने संकेत दिए। भारत और ईरान के रिश्तों के लिहाज से ये संकेत और माहौल बहुत अच्छे नहीं थे। इसीलिए मुझे लगता है कि आज हम ईरान और उससे जुड़े मामलों में जिस स्थिति में हैं, उसकी वजह यही है।
उन्होंने कहा, 'ईरान को द्विपक्षीय रिश्तों में चाबहार की क्षमता और मध्य एशिया के साथ भारत की कनेक्टिविटी का अंदाजा था। मुझे लगता है कि भारत इसे उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ा पाया जितनी हमें उम्मीद थी। चाबहार पर अभी उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लेकिन इसके कई कारण हैं -जैसे ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध और भारत पर उनका असर।' हाल ही में, पिछले साल से जब ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल की दुश्मनी शुरू हुई, मुझे लगता है कि चाबहार पर ध्यान कम हुआ है। दोनों देशों की तरफ से, लेकिन लंबे समय के नजरिए से... मैं फिर से कहता हूं, चाबहार भारत के लिए एक अहम स्ट्रैटेजिक प्राथमिकता बना हुआ है।
भारत पर अमेरिकी दबाव का कितना असर?
रूस से तेल इंपोर्ट पर अमेरिकी दबाव के सवाल पर उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि पिछले साल भारत में अमेरिका के साथ रिश्ते बनाए रखने को लेकर एक तरह का ‘कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस’ (नफा-नुकसान का आकलन) किया गया था। अमेरिका अपने लगभग सभी सहयोगियों पर बहुत ऊंचे टैरिफ लगा रहा है, चाहे वह EU हो या भारत और चीन जैसे देश। इसलिए भारत को वॉशिंगटन के साथ अपने रिश्तों को लेकर एक बड़ा आकलन करना पड़ा।' राष्ट्रपति ट्रंप के दौर में यह तय किया गया कि ईरान जैसे मुद्दों पर भारत अमेरिका की सलाह मानेगा। इसीलिए आप देखेंगे कि भारत की एनर्जी सप्लाई का तरीका बदल गया है।
उन्होंने कहा कि अब इसे समझने के दो तरीके हैं। एक तो यह कहना कि भारत अमेरिका के सामने डटकर खड़ा नहीं हो पाया। यह तो एक तरह से ‘हां या ना’ (ब्लैक एंड व्हाइट) वाली बात हो गई। लेकिन मेरा मानना है कि भारत ने सोच-समझकर कदम उठाए क्योंकि वह अमेरिका के साथ कई मोर्चों पर काम कर रहा था। राष्ट्रपति ट्रंप के स्वभाव और उनकी निजी खूबियों को देखते हुए, मुझे लगता है कि भारत सरकार ने यह तय किया कि पश्चिम एशिया में अस्थिरता को देखते हुए वह अमेरिका की सलाह मानेगा।
खासकर ईरान से तेल आयात कम करने के मामले में और साथ ही चाबहार में जो काम चल रहा था, उसे भी ध्यान में रखेगा। ऐसे में भारत ने यह फैसला किया कि दुनिया की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए ईरान के साथ रिश्तों में थोड़ी सावधानी बरती जाए। मेरा नजरिया यही है।
ईरान से रिश्तों की मजबूती
ईरान के साथ रिश्तों पर सी. उदय भास्कर ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक अमेरिका-ईरान युद्ध को लेकर भी चर्चा हुई। मुझे लगता है कि बातचीत में यूक्रेन और पश्चिम एशिया, दोनों ही मुद्दों पर एक साथ गौर किया गया। साथ ही, उन्होंने यह भी महसूस किया कि मौजूदा मल्टी-लेटरल (बहुपक्षीय) प्लेटफॉर्म काम नहीं कर रहे हैं। इसलिए संकेत यह है कि शायद ब्रिक्स इसका विकल्प दे सके। हो सकता है कि भारत की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हमें यह देखने को मिले।
उन्होंने कहा, 'हालांकि, ईरान के मामले में, मुझे लगता है कि यह बिल्कुल साफ है कि भारत तेहरान के साथ अपने रिश्ते फिर से मजबूत करेगा। इसकी वजह है कि भौगोलिक स्थिति को बदला नहीं जा सकता। ईरान भारत के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण पड़ोसी बना हुआ है। ईरान एनर्जी का एक बहुत महत्वपूर्ण सप्लायर है। लंबे समय में यानी अगले दो-तीन सालों में, जब ईरान अपना इंफ्रास्ट्रक्चर फिर से खड़ा कर लेगा। उसके बाद मुझे लगता है है कि वह भारत के लिए एक बड़े एनर्जी सप्लायर के तौर पर वापसी करेगा।'
उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया की जियोपॉलिटिकल स्थिति भी शायद कुछ अलग रूप लेगी। इसमें ईरान और क्षेत्र की जियोपॉलिटिक्स में उसकी भूमिका को भी जगह दी जाएगी। चाहे वह सऊदी अरब हो, UAE हो या क्षेत्र में अमेरिका के अन्य सहयोगी देश। मेरा यही मानना है।