SCO फोरम में पाकिस्तान को भारत का निमंत्रण भेजना क्या संकेत है, प्रोटोकॉल या कुछ और?

भारत ने अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले SCO फोरम में शामिल होने के लिए पाकिस्तान को आमंत्रण भेजा है। फिलहाल दोनों देशों के बीच संबंध बहुत निचले स्तर पर हैं।

भारत ने 20 नवंबर को नई दिल्ली में होने वाले SCO फोरम के लिए पाकिस्तान को आमंत्रित किया है। यह न्योता इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके बाद भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद पाकिस्तान को भेजा गया यह पहला ऐसा आमंत्रण है। ऐसे में सवाल है कि क्या यह केवल SCO प्रोटोकॉल का हिस्सा है या भारत-पाकिस्तान संबंधों में संवाद और जुड़ाव की कोई नई राह खुलने का संकेत भी है? इस पर विशेषज्ञों की क्या राय है, आइए जानते हैं।

भारत-पाकिस्तान संबंध और SCO फोरम

भारत और पाकिस्तान के संबंध पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाक्रमों के चलते तनावपूर्ण रहे हैं। अगस्त 2019 में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद दोनों देशों के संबंधों में गिरावट आई। हालांकि, तनाव के बीच दोनों देशों ने कुछ मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश भी की। फरवरी 2021 में दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों ने नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम समझौते का सख्ती से पालन करने पर सहमति जताई।

इसके बाद भारत और पाकिस्तान ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठकों में हिस्सा लिया, लेकिन औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई। 16 अक्टूबर 2024 को तत्कालीन विदेश मंत्री एस. जयशंकर SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने इस्लामाबाद पहुंचे थे। उस दौरान भी दोनों देशों के बीच औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव और बढ़ गया।

पहलगाम के बाद सबसे खराब दौर में रिश्ते

भारत ने इस आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया और कई कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिससे राजनयिक गतिरोध और भी ज्यादा गहरा हो गया। इसके बाद भारत ने पाकिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ 'ऑपरेशन सिंदूर' शुरू किया। इस हमले में करीब 100 आतंकी मारे गए। बाद में पाकिस्तान ने भी जवाबी हमले का प्रयास किया, लेकिन उसे इसमें भारी नुकसान हुआ। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के करीब 13 आर्मी बेस को तहस-नहस कर दिया। फिर पाकिस्तान के अनुरोध पर 10 मई को संघर्षविराम की घोषणा कर दी गई।

भारत एससीओ पर है गंभीर

भारत हमेशा से एससीओ को लेकर गंभीर रहा है। इससे पहले भारत ने अपने एक राजनयिक आलोक देमरी को एक और SCO बैठक के लिए पाकिस्तान भेजा था। इसने एक बहुपक्षीय मंच पर आधिकारिक संपर्क की बहाली को चिह्नित किया था। इस कड़ी में भारत ने अब पाकिस्तान के संस्कृति मंत्री औरंगजेब खान खिची को 20 नवंबर को नई दिल्ली में होने वाले 'SCO सिविलाइजेशनल डायलॉग फोरम' के लिए आमंत्रित किया है। अब, यह तनावपूर्ण संबंधों के बीच एक सीमित जुड़ाव का संकेत देता है।

पाकिस्तान को आमंत्रण भेजना क्यों अहम?

वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने RT India से बातचीत में कहा कि इस वक्त पाकिस्तान को भारत का आमंत्रण भेजना गहरा महत्व रखता है, जो प्रोटोकॉल से बहुत परे है। उन्होंने कहा कि यदि भारत SCO का अध्यक्ष होता तो यह पूरी तरह से जरूरी था कि वह किसी कार्यक्रम के लिए पाकिस्तान को आमंत्रित करता। इससे पहले 2023 में भारत ने SCO विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए पाकिस्तानी विदेश मंत्री को आमंत्रित किया था, क्योंकि तब इसकी अध्यक्षता नई दिल्ली के ही पास थी। मगर इस साल पाकिस्तान की बारी है, क्योंकि SCO से जुड़े अधिकांश कार्यक्रमों का प्रभार असल में उसके पास ही है। इसलिए, यह एक विशेष कार्यक्रम है जिसे भारत सरकार आयोजित कर रही है, जो प्रधानमंत्री मोदी की एक पहल थी।

उन्होंने कुछ साल पहले क़िंगदाओ और पिछले साल तियानजिन में भी इसको लेकर बात की थी और कहा था कि वे एक 'SCO सिविलाइज़ेशनल डायलॉग फोरम' को एक साथ आते देखना चाहते हैं। इसलिए यह दिलचस्प बात है। SCO का एक निश्चित प्रारूप है, फिर भी भारत द्वारा पाकिस्तानी विदेश मंत्री को आमंत्रित करने का यह कदम उठाना काफी अहम है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि वह आएंगे या नहीं। इससे पहले जब इस्लामाबाद में 'SCO नेशनल कोऑर्डिनेटर्स' का कार्यक्रम था तो उसमें भारत ने अपने राष्ट्रीय समन्वयक को भेजा। जबकि वह चाहता तो वहां किसी अपने जूनियर राजनयिक को भेज देता। इसलिए यह केवल एक बुनियादी प्रोटोकॉल नहीं है।

बहुपक्षीय मंच पर ऐसे घटनाक्रमों का क्या संकेत?

सुहासिनी हैदर ने इस पर कहा कि सच यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तव में बहुत निम्न स्तर का जुड़ाव बचा है। दोनों देशों के बीच कोई व्यापार नहीं है, कोई परिवहन नहीं है, कोई यात्रा नहीं है। आपात स्थिति या उस तरह की चीजों के लिए भी किसी को वीजा मिलना मुश्किल है। इसलिए, हम एक ऐसे दौर में हैं जहां दोनों देशों के पास जुड़ाव के नाम पर बहुत कुछ नहीं है। हमने सिर्फ एससीओ के लिए यहां एक अपवाद बनते देखा है। जबकि इससे लगभग 10 साल पहले, भारत ने पाकिस्तान में सार्क (SAARC) शिखर सम्मेलन में शामिल न होने का फैसला किया था, और तब से सार्क की बैठक नहीं हो सकी है। यह दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन है।


हालांकि, एक साल बाद भारत और पाकिस्तान दोनों एक साथ शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में शामिल हुए। 2024 में, पाकिस्तान ने शासनाध्यक्षों की बैठक आयोजित की। उस समय भारत ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को भेजा था।

एससीओ के अन्य देशों से भारत चाहता है जुड़ाव

सुहासिनी ने कहा कि SCO के बारे में यह रुख अपनाने का कारण यह है कि भारत अपने क्षेत्रीय उद्देश्यों के लिए, मध्य एशियाई देशों के साथ निपटने के लिए, चीन, रूस व ईरान से एक बहुत महत्वपूर्ण जुड़ाव बनाए रखना चाहता है, और शायद पाकिस्तान से निपटना इसके लिए एक छोटी सी कीमत चुकाने जैसा है। हम देखते हैं कि भारत SCO में किसी भी अन्य बहुपक्षीय संगठन की तुलना में बहुत उच्च स्तर पर भाग लेता है, जिसका दोनों देश हिस्सा हैं।

क्या है भारत की कूटनीति?

अब सवाल यह है कि अगर पाकिस्तान इस साल SCO का अध्यक्ष है तो अगस्त 2027 में जब वह 'राष्ट्रध्यक्षों की परिषद' का आयोजन करेगा, तो क्या भारत उसमें प्रधानमंत्री मोदी या उनके द्वारा नियुक्त कोई अहम शख्सियत को भेजने की संभावना को खारिज करना चाहता है? फिलहाल तो नहीं। इसलिए, मुझे लगता है कि एक छोटी सी खिड़की खुली छोड़ी जा रही है, ताकि यदि भारत उस समय यह फैसला करता है कि अन्य स्थितियां शायद इस दिशा में निर्णय लेने के लिए मजबूर करती हैं, तो आप किसी वरिष्ठ मंत्री या स्वयं प्रधानमंत्री मोदी को उसके लिए पाकिस्तान जाते हुए देख सकते हैं। कोई भी फैसला कार्यक्रम से केवल 10 दिन या एक हफ्ते पहले ही लिया जाएगा, लेकिन भारत जो भी चुनने और तय करने का फैसला करे, उसके लिए एक रास्ता खुला रखा जा रहा है।


पाकिस्तान के साथ शिखर सम्मेलन में कब शामिल हुआ था भारत?

सुहासिनी हैदर ने कहा कि पाकिस्तान के साथ सार्क शिखर सम्मेलन का हिस्सा बने भारत को 10 साल हो गए हैं। दोनों देशों के बीच संबंधों में गिरावट आए भी लगभग इतने ही साल हो चुके हैं। साल 2019 के बाद उन्होंने शायद एक सैन्य संबंध को छोड़कर व्यावहारिक रूप से सब कुछ खत्म कर दिया। वे टकराव प्रबंधन करने में सक्षम हैं। उन्होंने 2021 में सीजफायर का ऐलान किया। 2025 में, उनके बीच चार दिनों तक चले संघर्ष के बाद, उन्होंने सीजफायर पर चर्चा करने के लिए उन्हीं सैन्य चैनलों का इस्तेमाल किया। तो, एक तरह से, कोई अन्य बातचीत नहीं चल रही है, और दिल्ली व इस्लामाबाद दोनों में उच्चायोगों का आकार पूरी तरह से छोटा कर दिया गया है।

मंच देता है अवसर

उन्होंने कहा कि ऐसे मंच एक अवसर प्रदान करते हैं। अगर दो नेता मिलते हैं, बात करते हैं, चर्चा करते हैं। उदाहरण के लिए, 2019 के बाद वह तमाम समस्याओं के बावजूद संबंधों को आगे बढ़ाने और करतारपुर कॉरिडोर शुरू करने में सफल रहे थे। यह दोनों तरफ के पंजाब के बीच सिखों के लिए एक तीर्थयात्रा गलियारा है, और इसे शुरू किया गया था। इसके लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने में काफी पैसा लगाया गया था, और फिर अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमलों के बाद से 2025 से उसे भी बंद कर दिया गया।

इसलिए यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसे वे फिर से खोलने पर विचार कर सकते हैं। बेशक, दोनों तरफ के उच्चायोग हैं, जिनका दर्जा घटा दिया गया है और कर्मचारियों के मामले में उन्हें काफी सीमित कर दिया गया है। अगर दोनों देश उस विचार के साथ मिलकर काम करते हैं तो तीर्थयात्राओं को उनकी पूरी क्षमता के साथ फिर से खोलना, कुछ वीजा जारी करने जैसा कदम उठा सकते हैं। अभी हालत यह है कि सीमा के दोनों ओर परिवार भी आपस में नहीं मिल सकते हैं।